जननी तेरा स्मरण करता हूँ, प्रतिपल श्वांस-प्रश्वांस में |
ह्रदय मंदिर में तू बसी है, मेरे रोम-रोम विश्वास में |
गोदी में तेरे खेल कूद कर बड़े हुए हैं |
घुटनों के बल सरक-सरक कर खड़े हुए हैं |
तेरी कृपा से जीवन का सब सुख पाया है,
अमृत-सा नीर पिया अन्न खाया है |
तेरी कृपा से बढ़कर संसार का कोई उपहार नहीं |
जिस क्षण तेरा स्मरण न हो, इससे बड़ा अपराध नहीं |
इस नश्वर संसार में, तेरा अस्तित्व ही शाश्वत है |
तेरी सेवा सभी व्रतों से बड़ा व्रत है ||
क्या दूँ तुझे ?
शरीर, रक्त, मांस, प्राण सब कुछ तेरा है |
तू ही प्रकाशपूंज है और सारा संसार अँधेरा है |
प्रेम, श्रद्धा, भक्ति का एक भाव बार है भीतर |
तेरी प्रकाश की आभा से चमक रहा है अंतस |
हे मातृदेवता ! मेरे प्रत्येक कर्म में तू विराज |
पुण्यपथ का अनुगामी, अपना ले मुझको आज |
लखेश्वर चंद्रवंशी
संपादक : भारत वाणी
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