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शून्यता

आजकल मुझे कुछ सुहाता नहीं है,
एकांत के सिवा कुछ भाता नहीं है
मन में अनेकों विचार आते हैं
परन्तु रहता वह शून्य !
केवल द्वंद्व चलता है,
असंतोष हृदय में पलता है |
क्या करूँ…क्या नहीं ?
किसके विषय में सोचूं
और क्यों विचार करूँ ?
असमंझस !
कवि हृदय है
परन्तु,
न जाने किसी सुन्दरता को देख
मोहित नहीं हो पाता हूँ |
न कविता, न शायरी
कुछ भी तो नहीं लिख पाता हूँ |
क्या हृदय में
किसी नवीन कल्पना की
तलाश जारी है,
या फिर
किसी ज्ञात विषय को
ठीक से जानने की तैयारी है |
सचमुच…अद्भुत प्रश्न है |
पर इस बात को जानता हूँ
अपने मन की दशा को पहचानता हूँ,
अन्तर्निहित दिव्यता के साक्षात्कार की भी
लालसा नहीं है |
ये मन अब किसी का मोह हृदय में
पालता नहीं है |
- लखेश्वर चंद्रवंशी “लखेश”
… ख़याल आया है ?
तेरे जन्म लेते ही
सबसे पहले जिसने तुझे
निज आँचल में उठाया |
लड़खड़ाते पैरों से जब तू चलता था
और गिरता था
तब अपनी गोदी का सहारा देकर
जिसने तुझे उठाया |
जिसके एक स्पर्श ने
तुम्हारे होठों को
किल्कारी मारकर हँसना सिखाया |
जिसकी ममता ने
अधरों को सबसे पहले
“माँ” कहना सिखलाया |
घाव लग जाने पर
जिसके वनों से तुम औषधी पाते हो,
अपनी प्रिये को मनाने
जिसकी फुलवारी से फूल लाते हो |
जीवन का सारा सुख और आनंद
तुमने जिसकी कृपा से पाया है |
हे मेरे देशवासी युवा साथियों !
जरा हृदय पर हाथ रखकर सोचो कि
क्या तुम्हें इस भारत माँ का
तनिक भी ख़याल आया है ?…
- लखेश्वर चंद्रवंशी “लखेश”
संपादक : भारत वाणी
तुम्हारी ये नजरें…
करती शरारत तुम्हारी ये नजरें,
करती तुम्हारी इबादत,…….ये नजरें !
नजर का ये आलम गजब ढा रहा है,
नजर का नशा हर तरफ छा रहा है ||
नजर को सम्भालूं मैं कैसे नजर से ?
नजर का ये आलम बना है नजर से |
नज़रों की बातें नजर ही तो जानें,
इजहारे मुहब्बत है होती नजर से |
नज़रों के हालात जानें नजर से,
होती बयां दिल की बातें नजर से |
तेरी नजर से नजर ने ये जाना,
गुजरा न होगा बिन तेरे नजर के ||
- लखेश्वर चंद्रवंशी “लखेश”
ऐसा वार हुआ मुझ पर…
कि मेरी तो संवेदनाएं ही चली गई |
कौन मेरे पास आया,
मुझसे बतियाया,
और चला गया,
पता नहीं !!
किसी का कत्ल होने पर
उसकी स्थिति होती कुछ ऐसे…
शरीर क्षत-विक्षत
कोई रहता मुंड-विहीन
किसी का हाथ कटा,
पैर टूटा…..आदि |
पर हमारी तो स्थिति इन सबसे
एकदम अलग ही हो गई…
शरीर का कोई भाग ले जाती
तो शिकायत ना होती
कम्बख़त जिगर ही ले गई
और हमें पता भी नहीं चला |
– लखेश चंद्रवंशी




