शक्तिशाली संघ के रहते ‘आपातकाल’ कैसे टिक सकता था?

सामान्य

– लखेश्वर चंद्रवंशी ‘लखेश’

25 जून, 1975 की काली रात को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने ‘आपातकाल’ (Emergency) लगाकर देश को लगभग 21 माह के लिए अराजकता और अत्याचार के घोर अंधकार में धकेल दिया। 21 मार्च, 1977 तक भारतीय लोकतंत्र ‘इंदिरा निरंकुश तंत्र’ बनकर रह गया। उस समय जिन्होंने आपातकाल की यातनाओं को सहा, उनकी वेदनाओं और अनुभवों को जब हम पढ़ते हैं या सुनते हैं तो बड़ी हैरत होती है। आपातकाल के दौरान समाचार-पत्रों पर तालाबंदी, मनमानी ढंग से जिसे चाहें उसे कैद कर लेना और उन्हें तरह-तरह की यातनाएं देना, न्यायालयों पर नियंत्रण, ‘न वकील न दलील’ जैसी स्थिति लगभग 21 माह तक बनी रही। आज की पीढ़ी ‘आपातकाल की स्थिति’ से अनभिज्ञ है, वह ऐसी स्थिति की कल्पना भी नहीं कर सकती। क्योंकि हम लोग जो 80 के दशक के बाद पैदा हुए, हमें ‘इंदिरा के निरंकुश शासन’ के तथ्यों से दूर रखा गया। यही कारण है कि हमारी पीढ़ी ‘आपातकाल’ की जानकारी से सरोकार नहीं रख सके।

हम तो बचपन से एक ही बात सुनते आए हैं कि इंदिरा गांधी बहुत सक्षम और सुदृढ़ प्रधानमंत्री थीं। वे बहुत गरीब हितैषी, राष्ट्रीय सुरक्षा और बल इच्छाशक्ति वाली नारी थीं। ऐसे अनेक प्रशंसा के बोल अक्सर सुनने को मिलते रहे हैं। पर आज देश में भाजपानीत ‘एनडीए’ की मोदी सरकार का शासन है। यही कारण है तथ्यों से परदा उठना शुरू हो गया है। अब पता चल रहा है कि कांग्रेस पार्टी और उसके नेताओं ने किस तरह इंदिरा का महिमामंडन कर ‘आपातकाल’ के निरंकुश शासन के तथ्यों से देश को वंचित रखा।

आपातकाल लगाना जरुरी था या मज़बूरी?  

कांग्रेस के नेता यह दलील देते हैं कि उस समय ‘आपातकाल’ लगाना बहुत जरुरी था, इसके आभाव में शासन करना कठिन हो गया था। पर तथ्य कुछ और है? कांग्रेस के कुशासन और भ्रष्टाचार से तंग आकर जनता ने भूराजस्व भी देना बंद कर दिया था। जनता ने अवैध सरकार के आदेशों की अवहेलना शुरू कर दी थी। पूरे देश में इन्दिरा सरकार इतनी अलोकप्रिय हो चुकी थी कि चारों ओर से बस एक ही आवाज़ आ रही थी – इन्दिरा गद्दी छोड़ो। इधर लोकनायक जय प्रकाश नारायण का आन्दोलन अपने चरम पर था। बिहार में प्रत्येक कस्बे, तहसील, जिला और राजधानी में भी जनता सरकारों का गठन हो चुका था। जनता सरकार के प्रतिनिधियों की बात मानने के लिए ज़िला प्रशासन भी विवश था। ऐसे में इंदिरा गांधी के लिए शासन करना कठिन हो गया।

दूसरी ओर, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने जब इन्दिरा गांधी के रायबरेली लोकसभा क्षेत्र से चुनाव को अवैध ठहराने तथा उन्हें छह वर्षों तक चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया तो इंदिरा गांधी को अपनी सत्ता से बेदखल होने का दर सताने लगा। न्यायालय के इस निर्णय के बाद नैतिकता के आधार पर इंदिरा गांधी को इस्तीफा देना चाहिए था, लेकिन सत्ता के मोह ने उन्हें जकड लिया। सभी को किसी अनहोनी की आशंका तो थी ही, लेकिन इंदिरा ऐसी निरंकुश हो जाएंगी, इसका किसी को अंदाजा नहीं था। उन्होंने इस्तीफ़ा नहीं दिया, बल्कि लोकतंत्र का गला घोंटना ही उचित समझा।

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आकाशवाणी से 25 जून, 1975 की रात को ‘आपातकाल (इमर्जेन्सी) की घोषणा कर दी और भोर होने से पूर्व ही सीपीआई को छोड़कर सभी विरोधी दलों के नेताओं को जेलों में ठूंस दिया गया। इस अराजक कार्रवाई में न किसी की उम्र का लिहाज किया गया और न किसी के स्वास्थ्य की फ़िक्र ही की गई, बस जिसे चाहा उसे कारावास में डाल दिया गया। आपातकाल के दौरान लोकनायक जय प्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, चरण सिंह, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, जार्ज फर्नांडिस जैसे नेताओं और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के तत्कालीन सरसंघचालक श्री बालासाहब देवरस सहित हजारों स्वयंसेवकों को कैद कर लिया गया। देश के इन राष्ट्रीय स्तर के नेताओं को मीसा (Maintenance of Internal Security Act) के तहत अनजाने स्थान पर कैद कर रखा गया। मीसा वह काला कानून था जिसके तहत कैदी को कोर्ट में पेश करना आवश्यक नहीं था। इसमें ज़मानत का भी प्राविधान नहीं था। सरकार ने जिनपर थोड़ी रियायत की उन्हें डीआईआर (Defence of India Rule) के तहत गिरफ़्तार किया गया। यह थोड़ा नरम कानून था। इसके तहत गिरफ़्तार व्यक्ति को कोर्ट में पेश किया जाता था।

आपातकाल और मीडिया

उस समय शहरों को छोड़कर दूरदर्शन की सुविधा कहीं थी नहीं। समाचारों के लिए सभी को आकाशवाणी तथा समाचार पत्रों पर ही निर्भर रहना पड़ता था। 25 जून, 1975 को आकाशवाणी ने रात के अपने समाचार बुलेटिन में यह समाचार प्रसारित किया कि अनियंत्रित आन्तरिक स्थितियों के कारण सरकार ने पूरे देश में आपातकाल (Emergency) की घोषणा कर दी है। बुलेटिन में कहा गया कि आपातकाल के दौरान जनता के मौलिक अधिकार स्थगित रहेंगे और सरकार विरोधी भाषणों और किसी भी प्रकार के प्रदर्शन पर पूर्ण प्रतिबंध रहेगा। समाचार पत्र विशेष आचार संहिता का पालन करेंगे जिसके तहत प्रकाशन के पूर्व सभी समाचारों और लेखों को सरकारी सेन्सर से गुजरना होगा।

आपातकाल के दौरान 250 भारतीय पत्रकारों को बंदी बनाया गया, वहीं 51 विदेशी पत्रकारों की मान्यता ही रद्द कर दी गई। इंदिरा गांधी के इस तानाशाही के आगे अधिकांश पत्रकारों ने घुटने ही टेक दिए, इतना ही नहीं तो पत्रकारों ने ‘आप जैसा कहें, वैसा लिखेंगे’ की तर्ज पर काम करने को राजी हो गए। उस दौरान ‘दी इंडियन एक्सप्रेस’ ने अपना सम्पादकीय कॉलम कोरा प्रकाशित किया और ‘जनसत्ता’ ने प्रथम पृष्ठ पर कोई समाचार न छापकर पूरे पृष्ठ को काली स्याही से रंग कर ‘आपातकाल’ के खिलाफ अपना विरोध जताया था।

आपातकाल का उद्देश्य

– कांग्रेस विरोधी दलों को समाप्त करना।

– देश में भय का वातावरण निर्माण करना।

– प्रसार माध्यमों पर नियंत्रण रखना।

– ‘इंदिरा विरोधी शक्तियों को विदेशी शक्तियों के साथ सम्बन्ध’ की झूठी अफवाहों से जनता को भ्रमित करना, तथा इस आधार पर उन्हें कारागार में डालना।

– लोक लुभावन घोषणा देकर जनमत को अपनी ओर खींचना।

– राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को समाप्त कर संगठित विरोध को पूरी तरह समाप्त करने का षड़यंत्र।

आपातकाल की समाप्ति में संघ की भूमिका

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने ‘आपातकाल’ के विरुद्ध देश में भूमिगत आन्दोलन, सत्याग्रह और सत्याग्रहियों के निर्माण के लिए एक व्यापक योजना बनाई। संघ की प्रेरणा से चलाया गया भूमिगत आन्दोलन अहिंसक था। जिसका उद्देश्य देश में लोकतंत्र को बहाल करना था, जिसका आधार मानवीय सभ्यता की रक्षा, लोकतंत्र की विजय, पूंजीवाद व अधिनायकवाद का पराभव, गुलामी और शोषण का नाश, वैश्विक बंधुभाव जैसे उदात्त भाव समाहित था। आपातकाल के दौरान संघ ने भूमिगत संगठन और प्रचार की यंत्रणा स्थापित की, जिसके अंतर्गत सही जानकारी और समाचार गुप्त रूप से जनता तक पहुंचाने के लिए सम्पादन, प्रकाशन और वितरण की प्रभावी व्यवस्था बनाई गई। साथ ही जेलों में बंद व्यक्तियों के परिवारजनों की सहायता के लिए भी व्यवस्थाएं विकसित की। संघ ने जनता के मनोधैर्य बना रहे, इसके लिए व्यापक कार्य किया। इस दौरान आपातकाल की सही जानकारी विदेशों में प्रसारित करने की भी योजना बनाई गई, इस कार्य के लिए सुब्रह्मण्यम स्वामी, मकरंद देसाई जैसे सक्षम लोग प्रयासरत थे।

आपातकाल के विरुद्ध सत्याग्रह 

आपातकाल के विरुद्ध राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने जन आन्दोलन को सफल बनाने के लिए बहुत बहुत बड़ी भूमिका निभाई। 14 नवम्बर, 1975 से 14 जनवरी, 1976 तक पूरे देश में हजारों स्थानों पर सत्याग्रह हुए। तथ्यों के अनुसार देश में कुल 5349 स्थानों पर सत्याग्रह हुए, जिसमें 1,54,860 सत्याग्रही शामिल हुए। इन सत्याग्रहियों में 80 हजार संघ के स्वयंसेवकों का समावेश था। सत्याग्रह के दौरान कुल 44,965 संघ से जुड़े लोगों को गिरफ्तार किया गया, जिनमें से 35,310 स्वयंसेवक थे तथा 9,655 संघ प्रेरित अन्य संगठनों के कार्यकर्ताओं का समावेश था।

संघ ने सत्याग्रहियों के निर्माण के लिए व्यापक अभियान चलाया। संघ समर्थक शक्तियों से सम्पर्क की यंत्रणा बनाई और सांकेतिक भाषा का उपयोग किया। देशभर में मनोधैर्य बनाए रखने तथा जागरूकता बहाल करने के लिए अनेक पत्रक बांटे गए। सारे देश में जन चेतना जाग्रत होने लगी। इसका ही परिणाम था कि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के मन में जन विरोध का भय सताने लगा। अचानक तानाशाही बंद  हो गईं, गिरफ़्तारियां थम गईं। पर लोकतंत्र को कुचलने के वे काले दिन इतिहास के पन्नों में अंकित हो गया, पर ‘आपातकाल’ का इतिहास विद्यार्थियों तक पहुंच न सका। ऐसी आपातकाल देश में दुबारा न आए, पर पाठ्यक्रम में जरुर आना चाहिए जिससे इस पीढ़ी को जानकारी मिल सके।

राष्ट्र, राष्ट्रीयता और देशभक्ति की उदात्त संकल्पना

सामान्य

इन दिनों राष्ट्र, राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद जैसे शब्दों का प्रयोग आम हो चला है। जबकि इन शब्दों के पीछे गहन चिंतन विद्यमान है। इसलिए ‘राष्ट्र’ शब्द का प्रयोग किस देश के लिए किया जाए इसपर भी चिंतन करना बहुत आवश्यक है। मीडिया, जिसकी पहुंच बड़े धनवानों से लेकर सामान्य जनता तक है, आज बहुत हद तक सत्ता परिवर्तन के लिए कारक है। मीडिया केवल खबरें नहीं दिखाती, वह समस्याओं के समाधान भी तलाशती हैं। पर कई बार सामान्य जनता को भ्रम में डालने का काम भी करती है, कभी जानबूझकर तो कभी अज्ञानता के कारण। इसलिए जब भारत राष्ट्र की बात हो तो मीडियाकर्मियों के लिए आवश्यक है कि वे अपनी भूमिका को राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में समझें। हम लोग भारतीय हैं, एक अर्थ में “भारत” ही हैं। ऐसे में आवश्यक है कि ‘भारत का भारत से परिचय हो’।

दुनिया के सभी मत-सम्प्रदाय, यहां तक के वैज्ञानिक भी मानते हैं कि इस सृष्टि को कोई दैवीय शक्ति संचालित कर रही है। वह शक्ति कौन सी है, उसका स्वरूप कैसा है, इसपर ऋषियों ने बहुत अनुसंधान किये, तप किया। दैवीय शक्ति को जानने की जिज्ञासा अबतक शांत नहीं हुई और अनादि कल से यह अनुसंधान चलता आ रहा है।

राष्ट्र व देश की अवधारणा

हमारे यहां कहा जाता है कि सृष्टि यह दैवीय शक्ति से संचालित है, संसार की रचना ईश्वर ने की है। इसलिए कहा जाता है कि “देव निर्मितं देशं”। जिस भूमि विशेष का निर्धारण एक विशिष्ट सीमा तक सीमित हो, उसे देश कहते हैं। देश का एक शासक होता है, जिसके मार्गदर्शन में देश की व्यवस्थाएं संचालित होती हैं। पहले उस शासक को राजा के रूप में सब जानते थे। युग बदला, और ‘राजा’ के स्थान पर प्रधानमंत्री अथवा प्रेसिडेंट रूपी शासक अस्तित्व में आया। हम कह सकते हैं कि ‘देश’ राजनीति के  आधार पर चलता है।

वहीं राष्ट्र (Nation) की अवधारणा व्यापक है। राष्ट्र किसी सीमा में नहीं बंधता, क्योंकि राष्ट्र यह सांस्कृतिक और आध्यात्मिक मनोभाव से परिपूर्ण होता है। इसलिए कहा जाता है- “ऋषि निर्मितं राष्ट्रं”। ऋषिगण अपने तप, ज्ञान, शील और चरित्र से एक सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जीवन मूल्यों को समाज में प्रतिष्ठित करते हैं। ऋषियों के संदेश को जीवन का अंग बनाकर जीनेवाले मनुष्यों के समूह से एक आदर्श समाज की रचना होती है। आदर्श समाज वह, जहां के मनुष्य समष्टि के हित के लिए स्वयं का त्याग करने को तत्पर रहता है। उस समाज की संस्कृति आध्यात्मिक मूल्यों पर आधारित होती है। समाज में परस्पर सहयोग की भावना होती है, आपस में कोई विद्वेष नहीं होता। ऐसे समाज जहां भी हो वह ‘राष्ट्र’ है।

आदर्श समाज रचना की संकल्पना भारत की देन है। ईश्वर की खोज और विश्व के कल्याण के लिए अनुसंधान करनेवाले ऋषि-मुनि हमारे यहां ही हुए, इसलिए हमारे भारतवर्ष को युगों से राष्ट्र की संज्ञा दी गई है। लेकिन आज भारत राष्ट्र में आदर्श समाज के बीच में बहुत सारे रोड़े हैं। सामाजिक विषमता, भेदभाव, आपसी विद्वेष और राजनीतिक स्वार्थ ने भारत के ‘राष्ट्र गौरव’ को चोट पहुंचाने का काम किया है। स्वार्थ इतना हावी है कि अपनी जाति, राजनीति और विद्वेष के चलते भारतीय जीवन मूल्यों को समाज जीवन से मिटाने का षड्यंत्र चल रहा है। भारत के इतिहास, संस्कृति और शिक्षा को लेकर आपस में कोई सहमति दिखाई नहीं देती।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के संस्थापक और आद्य सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने ‘राष्ट्र’ की संकल्पना को बहुत स्पष्टता से व्यक्त किया है। वे कहते हैं, “हम ऐसे लोगों के समूह को ‘राष्ट्र’ नहीं कह सकते जो भिन्न-भिन्न संस्कृतियों वाले, भिन्न-भिन्न विचारधाराओं वाले हों तथा जिनके इतिहास भिन्न हों, हिताहित कल्पनाएं परस्पर विरोधी हों, परस्पर शत्रुभाव मानते हों, जिनके आपसी सम्बन्ध भक्ष्य-भक्षक के रहे हों और जिनके रहने के मूल कारण भी एक से न हो।”

संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरूजी गोलवलकर के अनुसार, “राष्ट्र सांस्कृतिक ईकाई होती है। जब किसी जनसमूह की ऐतिहासिक, धार्मिक, सांस्कृतिक परम्पराएं एक हों, तब तक वह ‘राष्ट्र’ कहलाता है।” वहीं अन्त्योदय के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने कहा है, “जब एक मानव-समुदाय के समक्ष एक मिशन, विचार या आदर्श रहता है और वह समुदाय किसी भूमि विशेष को मातृभाव से देखता है तो वह ‘राष्ट्र’ कहलाता है।” दीनदयालजी ने यह भी कहा कि, “‘राष्ट्र’ एक स्थायी सत्य है। राष्ट्र की आवश्यकताओं को पूर्ण करने के लिए ‘राज्य’ पैदा होता है।”

इस तरह सामान इतिहासबोध, समान सांस्कृतिक जीवन, सामान विचारधारा, परस्पर मैत्रीभाव और किसी उदात्त ध्येय के लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग कर देनेवाले लोगों का समूह जिस स्थान पर हो, जिस देश में हो वह ‘राष्ट्र’ ही कहलायेगा। वहीं स्वामी विवेकानन्दजी ने राष्ट्र के ध्येय के सम्बन्ध में कहा है, “प्रत्येक राष्ट्र का लक्ष्य विधाता द्वारा निर्धारित है। प्रत्येक राष्ट्र के पास संसार को देने के लिए कोई न कोई संदेश है। प्रत्येक राष्ट्र को किसी विशेष संकल्प की पूर्ति करनी है।” स्वामीजी ने आगे कहा, “व्यक्ति को मुक्तिमार्ग पर बढ़ने के लिए पूर्ण आध्यात्मिक स्वतंत्रता, यही है हमारा राष्ट्रीय उद्देश्य। तुम चाहे वैदिक, जैन या बौद्ध, चाहे अद्वैत, विशिष्टाद्वैत अथवा द्वैत, किसी भी ‘मत’ को टटोल लो, ये सभी इस उद्देश्य पर एक हैं।” स्वामीजी ने कहा है, “हमारा ‘धर्म’ ही हमारे तेज, हमारे बल, इतना ही नहीं तो हमारे राष्ट्रीय जीवन का भी मूलाधार है।” स्वामी विवेकानन्द के अनुसार, धर्म ही भारत का प्राण है, हमें इसे ही पुष्ट करना होगा। इस दृष्टि से कहा जाए तो धर्म ही “राष्ट्र” का प्राण होता है।

राष्ट्रवाद और राष्ट्रीयता 

राष्ट्रवाद और राष्ट्रीयता इन दोनों शब्दों का प्रयोग आजकल सामान्य हो चले हैं। हिंदी शब्दकोष में भी इसके लगभग सामान अर्थ हैं। शब्दकोश के अनुसार, ‘राष्ट्रवाद’ वह सिद्धांत है जिसमें अपने राष्ट्र के हितों को सबसे अधिक प्रधानता दी जाती है, जबकि ‘राष्ट्रवादी’ वह है जो अपने राष्ट्र या देश के कल्याण का पक्षपाती हो। राष्ट्रीयता का तात्पर्य है अपने राष्ट्र के विशेष गुण अथवा अपने राष्ट्र के प्रति उत्कट प्रेम।

आजकल राजनीतिक दल और मीडिया के लोग किसी व्यक्ति के पद विशेष पर “राष्ट्रीय” शब्द का प्रयोग करते दिखाई देते हैं। जैसे राष्ट्रीय अध्यक्ष, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, राष्ट्रीय महासचिव आदि। कांग्रेस जो भारत की स्वतंत्रता के लिए बनी थी, आजकल “भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस” के नाम से जानी जाती है। वर्तमान कांग्रेस में ‘राष्ट्रीयता’ कितनी है, सब जानते हैं। अध्यक्ष, उपाध्यक्ष या महासचिव के हृदय में ‘राष्ट्रीयता’ हो न हो उसके पद और नाम के आगे ‘राष्ट्रीय’ लगा दिया जाता है। ‘राष्ट्रीय’ का अर्थ ‘अखिल भारतीय’ नहीं है, इसलिए किसी व्यक्ति या संगठन के नाम के पहले ‘राष्ट्रीय’ तभी लगाना चाहिए जब वह राष्ट्र के लिए समर्पित हो, अन्यथा ‘अखिल भारतीय’ ही कहना ही उचित होगा।

‘राष्ट्रीयता’ के मर्म को स्वामी विवेकानन्द, महात्मा गांधी, डॉ. हेडगेवार, डॉ. आंबेडकर, माखनलाल चतुर्वेदी, मैथिलीशरण गुप्त, रामधारीसिंह दिनकर आदि महापुरुष समझते थे। इसलिए उनके संवाद, उनके संदेश, उनकी कविताएं “राष्ट्रीयता” के परिचायक थे। इसलिए राष्ट्र को समर्पित संगठन के रूप में डॉ. हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) नामक संगठन की स्थापना की।

जब राष्ट्रीयता शब्द अपनेआप में पूर्ण है तो राष्ट्रवादी शब्द आया कहां से? मार्क्सवाद की तर्ज पर समाजवाद, मनुवाद जैसे शब्द तो मार्क्सवादियों ने गढ़े। बाद में हमारे हिंदी के प्रगतिवादी लेखकों और मीडिया ने राष्ट्रीयता की भावना जो प्रत्येक देशवासी के लिए ऊर्जा, प्रेरणा और समर्पण के संस्कार जगाती है, के स्थान पर ‘राष्ट्रवादी” शब्द का प्रयोग करना प्रारंभ कर दिया। राष्ट्र के प्रति प्रेम व समर्पण की भावना वाले को “राष्ट्र का पक्षपाती” के रूप में ‘राष्ट्रवादी’ बना दिया गया। यह शब्द इतना अधिक प्रचलित हो गया कि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के रूप में राजनीतिक दल भी बन गया। ‘राष्ट्रीयता’ यह अपने राष्ट्र के प्रति भक्तिभाव को प्रगट करता है, जबकि ‘राष्ट्रवाद’ शब्द प्रगतिवादी लेखकों की देन है।

देशप्रेम और देशभक्ति

मानवीय जीवन में प्रेम को सबसे अधिक महत्त्व प्राप्त हुआ है। महापुरुषों ने प्रेम की महिमा गाई है। सद्गुरु कबीर साहब ने प्रेमरहित मनुष्य हृदय के सम्बन्ध में कहा है,

जा घट प्रेम न संचरे, सो घट जान मसान

जैसे खाल लुहार की, सांस लेतु बिन प्रान।।

स्वामी विवेकानन्द जब साढ़े तीन वर्षों के बाद अमेरिका से भारत लौट रहे थे, तब उनके एक  विदेशी मित्र ने पूछा, “स्वामीजी, आप तीन वर्षों तक वैभवशाली देश में रहकर अपने गरीब देश भारत में लौट रहे हैं। अब अपने देश के प्रति आपकी कैसी भावना है?”

स्वामीजी ने बहुत मार्मिक उत्तर दिया जिससे प्रेम और भक्ति की अवधारणा स्पष्ट हो जाएगी। स्वामी विवेकानन्दजी ने कहा, “पहले तो मैं अपनी मातृभूमि से प्रेम ही करता था अब तो इसका कण–कण मेरे लिए तीर्थ हो गया है।”  अर्थात प्रेम से ऊपर का भाव भक्ति है। ‘हिंदी साहित्य का इतिहास” के लेखक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अपने निबंध “श्रद्धा-भक्ति” में कहा है, “प्रेम का कारण बहुत कुछ अनिर्दिष्ट और अज्ञात होता है; पर श्रद्धा का कारण निर्दिष्ट और ज्ञात होता है।” आचार्य शुक्ल ने आगे कहा कि, “श्रद्धा और प्रेम के योग का नाम भक्ति है।” इससे स्पष्ट होता है कि समर्पण की भावना का पहला आयाम प्रेम है, उसके बाद श्रद्धा और फिर भक्ति। भक्ति यह समर्पण की सर्वोच्च स्थिति है। इसलिए प्रेम, श्रद्धा और भक्ति की अवधारणा को समझे बिना देशप्रेम और देशभक्ति की संकल्पना को नहीं समझा जा सकता।

यूं तो हमारे मीडिया जगत में देशभक्ति और देशप्रेम की गाथा को बहुत बार दोहराया जाता है। विशेषकर, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में 15 अगस्त और 26 जनवरी, क्रिकेट या युद्ध के दौरान देशभक्तों का गुणगान करने और देशभक्ति जगाने के लिए सिनेमा के गीतों को दिखाने की परम्परा रही है। पर मीडिया में देशभक्ति की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए कोई कार्यक्रम नहीं दिखाया जाता। देशभक्ति के प्रगटीकरण के भी कुछ आयाम होते हैं। क्या इस बात पर मीडिया ने कभी अनुसंधान किया है? नहीं। यदि ऐसा होता तो क्रिकेट में जीत के बाद अथवा 15 अगस्त और 26 जनवरी को सड़कों पर डीजे की धुन में हो-हल्ला मचाते, थिरकते युवाओं के असभ्य और अनुशासनहीन कृत्यों को अनुशासित कृति में परिवर्तित करने के लिए कोई अभियान चलाया जाता।

हमारे देश में तो क्रिकेट, युद्ध, 15 अगस्त और 26 जनवरी के दौरान ही देशवासियों की लिमिटेड देशभक्ति सड़कों पर भिन्न-भिन्न प्रकार से दिखाई देती है। ऐसा नहीं है कि देशप्रेम अथवा देशभक्ति हमारे नागरिकों में है ही नहीं। निश्चित रूप से देशभक्त, देशप्रेमी अपने जीवन के महत्वपूर्ण समय निराश्रित बालकों के पोषण, स्वस्थ्य और शिक्षा के लिए लगाते हैं। सीमा पर जवान, देश में किसान, समाज में विद्वान् यहां तक कि सफाई कर्मचारी अपने कर्मों के द्वारा भारतमाता की पूजा करते हैं। पर ऐसे समर्पित लोग कभी हो-हल्ला नहीं मचाते। इसलिए  देशभक्ति के आयाम को भी हमें समझना होगा।

9 फरवरी, 1897 को मद्रास (चेन्नई) के विक्टोरिया पब्लिक हॉल में “मेरी क्रांतिकारी योजना” नामक अपने व्याख्यान में स्वामी विवेकानन्द ने ‘देशभक्ति’ की तीन सीढ़ियां बतलाई।

स्वामीजी ने कहा, “लोग देशभक्ति की चर्चा करते हैं। मैं भी देशभक्ति में विश्वास करता हूं, और देशभक्ति के सम्बन्ध में मेरा भी एक आदर्श है। बड़े काम करने के लिए तीन बातों की आवश्यकता होती है। पहला है – हृदय की अनुभव शक्ति। बुद्धि या विचारशक्ति में क्या है? वह तो कुछ दूर जाती है और बस वहीं रुक जाती है। पर हृदय तो प्रेरणास्त्रोत है! प्रेम असंभव द्वारों को भी उद्घाटित कर देता है। यह प्रेम ही जगत के सब रहस्यों का द्वार है। अतएव, ऐ मेरे भावी सुधारकों, मेरे भावी देशभक्तों, तुम अनुभव करो!

क्या तुम अनुभव करते हो कि देव और ऋषियों की करोड़ों संतानें आज पशु-तुल्य हो गयीं हैं? क्या तुम हृदय से अनुभव करते हो कि लाखों आदमी आज भूखे मर रहे हैं, और लाखों लोग शताब्दियों से इसी भांति भूखों मरते आए हैं? क्या तुम अनुभव करते हो कि अज्ञान के काले बदल ने सारे भारत को ढंक लिया है? क्या तुम यह सब सोचकर बेचैन हो जाते हो? क्या इस भावना ने तुमको निद्राहीन कर दिया है? क्या यह भावना तुम्हारे रक्त के साथ मिलकर तुम्हारी धमनियों में बहती है? क्या वह तुम्हारे हृदय के स्पंदन से मिल गयी है? क्या उसने तुम्हें पागल-सा बना दिया है? क्या देश की दुर्दशा की चिंता ही तुम्हारे ध्यान का एकमात्र विषय बन बैठी है? और क्या इस चिंता में विभोर हो जाने से तुम अपने नाम-यश, पुत्र-कलत्र, धन-संपत्ति, यहां तक  कि अपने शरीर की भी सुध बिसर गए हो? तो जानो, कि तुमने देशभक्त होने की पहली सीढ़ी पर पैर रखा है- हां, केवल पहली ही सीढ़ी पर!”

स्वामी विवेकानन्द ने आगे कहा, “अच्छा, माना कि तुम अनुभव करते हो; पर पूछता हूं, क्या केवल व्यर्थ की बातों में शक्तिक्षय न करके इस दुर्दशा का निवारण करने के लिए तुमने कोई यथार्थ कर्त्तव्य-पथ निश्चित किया है? क्या लोगों की भर्त्सना न कर उनकी सहायता का कोई उपाय सोचा है? क्या स्वदेशवासियों को उनकी इस जीवन्मृत अवस्था से बाहर निकालने के लिए कोई मार्ग ठीक किया है? क्या उनके दुखों को कम करने के लिए दो सांत्वनादायक शब्दों को खोजा है? यही दूसरी बात है। किन्तु इतने से ही पूरा न होगा!”

उन्होंने कहा, “क्या तुम पर्वताकार विघ्न-बाधाओं को लांघकर कार्य करने के लिए तैयार हो? यदि सारी दुनिया हाथ में नंगी तलवार लेकर तुम्हारे विरोध में खड़ी हो जाए, तो भी क्या तुम जिसे सत्य समझते हो उसे पूरा करने का साहस करोगे? यदि तुम्हारे सगे-सम्बन्धी तुम्हारे विरोधी हो जाएं, भाग्यलक्ष्मी तुमसे रूठकर चली जाए, नाम-कीर्ति भी तुम्हारा साथ छोड़ दे, तो भी क्या तुम उस सत्य में संलग्न रहोगे? फिर भी क्या तुम उसके पीछे लगे रहकर अपने लक्ष्य की ओर सतत बढ़ते रहोगे? क्या तुममे ऐसी दृढ़ता है? बस यही तीसरी बात है।” स्वामी विवेकानन्द ने जोर देकर आगे कहा, “यदि तुममे ये तीन बातें हैं, तो तुममे से प्रत्येक अद्भुत कार्य कर सकता है। तब तुम्हें समाचारपत्रों में छपवाने की अथवा व्याख्यान देते फिरने की आवश्यकता न होगी। स्वयं तुम्हारा मुख ही दीप्त हो उठेगा! फिर तुम चाहे पर्वत की कन्दरा में रहो, तो भी तुम्हारे विचार चट्टानों को भेदकर बाहर निकल आयेंगे और सैकड़ों वर्ष तक सारे संसार में प्रतिध्वनित होते रहेंगे। और हो सकता है तब तक ऐसे ही रहें, जब तक उन्हें किसी मस्तिष्क का आधार न मिल जाए, और वे उसी के माध्यम से क्रियाशील हो उठें। विचार, निष्कपटता और पवित्र उद्देश्य में ऐसी ही ज़बर्दस्त शक्ति है।”

स्वामी विवेकानन्द के उपर्युक्त कथन से स्पष्ट होता है कि देशप्रेम और देशभक्ति की बातें करना जितना आसान है, उस पथ पर चलना उतना ही कठिन।

राष्ट्र है तो व्यक्ति है

व्यक्ति का जीवन, उसका ध्येय सबकुछ देश पर निर्भर करता है। जिस राष्ट्र में वह रहता है, उस राष्ट्र की संस्कृति, धर्म, उसका इतिहासबोध उसके जीवन की उन्नति के लिए प्रेरणादायी होता है। यदि हम सीरिया, ईराक या पाकिस्तान में पैदा होते तो हमारा जीवन कुछ और होता। हम भारत में जन्में हैं इसलिए हमारे जीवन का उद्देश्य उनसे अलग है। हमारी सोच, विचार और व्यवहार अन्य देश के नागरिकों से अलग है। क्योंकि हमारे राष्ट्र की संस्कृति, समाज की व्यवस्था और परिवार के संस्कारों में हमारा पोषण होता है। राष्ट्र के कारण राज्य हैं, राज्य के अन्दर समाज है, समाज के अन्दर परिवार है और परिवार में व्यक्ति पोषित होता है। इसलिए कहा जाता है, “देश हमें देता है सबकुछ हम भी तो कुछ देना सीखें।”

बड़ी ईकाई राष्ट्र है और राष्ट्र की सबसे छोटी ईकाई व्यक्ति है। सबसे छोटी ईकाई व्यक्ति ही समाज और राष्ट्र की शक्ति होती है। इसलिए मनुष्य के चरित्र निर्माण पर जोर दिया जाता है। हमें यह बात हमेशा याद रखनी चाहिए कि राष्ट्र शाश्वत है जबकि मनुष्य मरता है। इसलिए राष्ट्र का महत्त्व मनुष्य से अधिक है। यही कारण है कि देशभक्तों ने महान राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए हंसते-हंसते अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया।

पश्चिमी राष्ट्रवाद और भारत का राष्ट्रीय उद्देश्य  

यह सत्य नहीं है कि यूरोप, अफ्रीका, लतीनी अमेरिका जैसे पश्चिमी देशों में राष्ट्रवाद समाप्त हो रहा है। बल्कि पश्चिम में अपने राष्ट्र के हित के लिए वहां की जनता अधिक सजग और मुखर दिखाई देते हैं। पश्चिम जगत में तो अपने देश के हित के लिए दूसरे देश को समाप्त कर देने की तो होड़ लगी है। तेल संग्रह करने, व्यापार को बढ़ाने या फिर परमाणु शक्ति को बढ़ाने के लिए पश्चिमी देश सदैव आगे रहते हैं। जबकि भारत के सम्बन्ध में ऐसा नहीं कहा जा सकता। हमारे यहां राजनीतिक दल आपसी जीत-हार के लिए अधिक उत्सुक और प्रयत्नशील रहते हैं। दूसरा, अपने हित के लिए अन्य देशों को हानी पहुंचाना यह कभी भारत का उद्देश्य रहा ही नहीं। इतिहास साक्षी है कि भारत ने कभी भी दूसरे देशों में आक्रमण नहीं किया, न ही किसी देश की भूभाग को कब्जा करने की कभी चेष्टा की।

पश्चिम का राष्ट्रवाद भोग, व्यापार और विस्तारवाद पर आधारित है, जबकि भारत का राष्ट्रीय उद्देश्य अध्यात्म केन्द्रित है। भारत विश्व के कल्याण की कामना करता है। इसलिए भारत के इतिहास, धर्म, संस्कृति, शिक्षा और जीवन मूल्यों पर अध्ययन करना आज की आवश्यकता है। इसलिए मीडिया भारत की जनमानस को बदलने की क्षमता रखता है, उसके कर्ता-धर्ता, सम्पादकों और पत्रकारों की यह सामूहिक जिम्मेदारी है कि वह भारत को समझें, भारत को जानें और देश की जनता को भ्रम के मकड़जाल से निकालें। ‘भारत राष्ट्र’ को कभी भी ‘वाद’ का विषय न बनाएं, समस्यायों का समाधान तलाशें। इसी में राष्ट्र का हित है, सबका हित है।

– लखेश्वर चंद्रवंशी “लखेश”

नोटबंदी पर जनमत : संसद को बाधित करनेवालों पर हो सख्त कार्रवाई

सामान्य

lok-sabhaलोकसभा और राज्यसभा में हंगामा और विरोध का सिलसिला जारी है। ऐसा लग रहा है कि सदन हंगामा करनेवालों के लिए ही बना है। लोकसभा की माननीय अध्यक्ष श्रीमती सुमित्रा महाजन के तमाम समझाइश का असर मोदी सरकार के विपक्षी दलों पर दिखाई नहीं देता। पहले ‘भूमि अधिग्रहण विधेयक’, फिर कथित ‘असहिष्णुता के नाम पर’ और फिर ‘जेएनयू प्रकरण’ के नाम पर सदन की कार्यवाही को कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्षी दलों बाधित किया। लोकसभा और राज्यसभा देशहित में विमर्श, चर्चा और निर्णय लेने का स्थान है। लेकिन सदन में हंगामा और विरोध बदस्तूर जारी है। इस माहौल पर देश की जनता खामोश नहीं है। जनता सोच रही है, समझ रही है और अपनी राय गली, मोहल्ला और चौपालों में अपने मित्रों के बीच जाहिर भी कर रही है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सोच-समझकर और बड़ी योजनाबद्ध तरीके से 8 नवम्बर को 500 और 1000 के नोट पर बंदी की घोषणा की। इसके तुरंत बाद कांग्रेस ने भी सरकार के इस निर्णय का स्वागत किया था। आम आदमी पार्टी (आआपा) भी दो दिन तक खामोश रही। फिर सभी मोदी विरोधी एक हो गए। सबसे पहले तृणमूल कांग्रेस की मुखिया और पश्चिम बंगाल की मुखिया ममता बनर्जी ने इसका विरोध किया। और इसके बाद कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी, गुलाम नबी आजाद और आआपा के केजरीवाल के साथ शिवसेना ने भी अपना विरोध जताना शुरू किया। हालांकि, बाद में शिवसेना के रुख में बदलाव आया और अब वह सरकार के निर्णय के साथ खड़ी दिखाई दे रही है।

विरोध किसलिए?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा लिए गए ‘नोटबंदी’ के निर्णय से जनता खुश है। सामान्य नागरिक सरकार के इस निर्णय की प्रशंसा कर रहे हैं। हां, कुछ राजनीतिक दल 500 और 1000 रुपये के पुराने नोट को अचानक बंद कर देने के निर्णय का विरोध कर रहे हैं। यहां विपक्षी दल नोटबंदी का विरोध करने का कारण क्या बता रहे हैं, यह भी सोचनेवाली बात है।

राहुल गांधी, केजरीवाल सहित सभी विपक्षी दलों का कहना है कि नोटबंदी की वजह से जनता को परेशानी हो रही है, क्योंकि सरकार ने नोटबंदी का फैसला तो ले लिया लेकिन सरकार ने फैसले से पूर्व कोई तैयारी नहीं की थी। तैयारी पूरी नहीं होने के कारण नोटबंदी के बाद लोगों की शादी और इलाज के लिए आवश्यक रुपये उन्हें नहीं मिल पा रहे हैं। नोटबंदी की वजह से कई लोग बैंकों में कतार लगाने से मर गए। यह सही है कि नागपुर में एक बैंक में कार्यरत व्यक्ति का  हार्टअटैक की वजह से निधन हो गया। खबर ऐसी भी आयी कि अधिक काम की वजह से कई बैंक कर्मी परेशान हैं। एक-दो बैंककर्मियों के बेहोश हो जाने की भी खबर चली। वहीं कतार में खड़े एक व्यक्ति या बैंक से घर जाने के बाद कुछ लोगों के निधन हो जाने पर कुछ टीवी चैनलों ने हो हल्ला मचाया कि नोटबंदी ने उन लोगों की जान ले ली। इस खबर के बाद सभी विपक्षी दल बार-बार बोलने लगे और मीडिया भी उनकी बातों को भुनाने में लग गई कि 50, फिर 55 और अब 75 लोग नोटबंदी की वजह से मर गए।

उल्लेखनीय है कि जनता की सुविधा के लिए बैंककर्मी भी खूब मेहनत कर रहे हैं। वहीं सरकार ने शादी का कार्ड दिखाकर बैंकों से 2.50 लाख रुपये निकालने की अनुमति दी। यही नहीं तो सरकारी व निजी अस्पतालों में 500 और 1000 के नोट का उपयोग करने की अनुमति दी, जिसकी वजह से दिनों-दिन बैंकों और एटीएम के बाहर भीड़ कम होती जा रही है। इसके बावजूद तमाम विपक्षी दल लोकसभा और राज्यसभा में सदन की कार्यवाही को चलने नहीं दे रहे हैं। जबकि बैंकों और एटीएम पर अपने पैसे के लिए कतार में खड़े नागरिकों की परेशानियों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहे हैं। क्यों?

विरोधियों की असली पीड़ा

नोटबंदी के विरोधी दल कांग्रेस, आआपा, तृणमूल और सीपीएम के नेता जोर देकर कह रहे हैं, “मोदीजी ने अपने मित्रों और भाजपा के लोगों को पहले ही नोटबंदी की जानकारी दी थी।” लेकिन विरोधियों की यह बात सही नहीं है। ऐसा कहकर विरोधी इस बात को साबित कर रहे हैं कि उनको अपने धन का जुगाड़ करने में समय नहीं मिला। ऐसा लगता है कि यही उनकी असली पीड़ा है कि उनको समय नहीं मिला। संभवतः इसलिए 25 नवम्बर को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने “भारत का संविधान” पुस्तक के विमोचन में कह दिया, “पिछले 70 साल में कानूनों और संविधान का दुरुपयोग करने वालों ने देश को भ्रष्टाचार में डुबो दिया है। इन दिनों देश भ्रष्टाचार और कालेधन के खिलाफ बड़ी लड़ाई लड़ रहा है और इस लड़ाई में आम नागरिक एक ‘सैनिक’ है। लेकिन कुछ लोग अब भी आलोचना कर रहे हैं कि सरकार ने पूरी तैयारी नहीं की। मेरा मानना है कि मुद्दा यह नहीं है कि सरकार ने पूरी तैयारी नहीं की थी। बल्कि मुझे लगता है कि ऐसे लोगों को इस बात की पीड़ा है कि सरकार ने उन्हें किसी तैयारी का मौका नहीं दिया।” प्रधानमंत्री मोदी ने जोर देकर कहा, “अगर इन लोगों को तैयारी करने के लिए 72 घंटे मिल जाते तो वे तारीफ करते कि मोदी जैसा कोई नहीं है।”

कुछ लोगों की पीड़ा यह है कि सरकार ने उनको “तैयारी” करने का समय नहीं दिया।

जबरदस्त जनसमर्थन

मोदी सरकार के नोटबंदी के फैसले को जनता का जबरदस्त समर्थन है। ऑटो चालक, चायवाला, सब्जीवाला आदि छोटे व्यवसायी कह रहे हैं कि ‘उनका व्यवसाय थोड़ा मंद हो गया था लेकिन अब वह ठीक से चल रहा है। हम सरकार के इस फैसले के साथ खड़े हैं।’ देश के ईमानदार लोग घर में संग्रहित धन को बैंकों में जमा कर रहे हैं, इससे देश का राजकोष निरंतर समृद्ध हो रहा है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, नोटबंदी के फैसले के सिर्फ 13 दिनों के बाद ही जनधन खाता में लोगों ने 21,000 करोड़ जमा कराए हैं। वहीं नोटबंदी के चलते आतंकियों व नक्सलियों की मदद करनेवाले देशद्रोहियों और विदेशी शत्रुओं के षड्यंत्रों पर निश्चित रूप से लगाम लगा है। यह स्पष्ट है कि वो लोग इस निर्णय का विरोध कर रहे हैं जिनके पास कालाधन है। सरकार को इन विरोधियों के धन की तलाशी करनी चाहिए। सीमा पर हमारे जवान देश व हमारी सुरक्षा के लिए दिन-रात खड़े हैं। इसी तरह देशहित में लिए गए सरकार के इस निर्णय के साथ जनता खड़ी है।

ऐसे में जनता पूछ रही है कि विपक्षी दल सदन की कार्यवाही क्यों चलने नहीं दे रहे हैं। चाय के ठेले, गांव के चौपाल और शहरों बस स्टैंड से लेकर किराने के दुकान सहित ट्रेन की जनरल और स्लीपर कोच में सफ़र कर रहे यात्री कहते हैं कि सदन नहीं चलने देनेवाले विपक्षी दलों पर सदन में कार्रवाई क्यों नहीं होती? लोग पूछ रहे हैं कि सांसदों को वेतन कितना मिलता है? संसदीय कार्य में भाग लेने पर कितना रूपया मिलता है?

जनता के इस सवाल पर हमने कुछ खोज की तो पाया कि इस समय संसद सदस्‍य को 50,000/- रु. प्रतिमाह वेतन, 45,000/रु. प्रतिमाह नि‍र्वाचन क्षेत्र भत्ते के रूप में मि‍लते हैं और 45,000/रु. प्रति‍माह कार्यालयीन व्‍यय के रूप में मि‍लते हैं जि‍समें 15,000/रु.लेखन-सामग्री व पत्राचार और 30,000 वैयक्तिक सहायक के लि‍ए सम्मिलित हैं। सदस्य को सभा अथवा समि‍ति‍यों की बैठक अथवा अन्‍य संसदीय कार्य में भाग लेने के लि‍ए 2000/- का दैनि‍क भत्ता भी मि‍लता है।

जब हमने सासदों के वेतन और संसदीय कार्य में भाग लेने के लिए मिलनेवाले दैनिक भत्ते के बारे में पूछनेवालों को बताया तो जनता की प्रतिक्रिया बहुत बढ़िया लगी। एक ने कहा कि संसदीय कार्य में रूकावट डालनेवालों को सदन से उठाकर बाहर कर देना चाहिए। दूसरे ने कहा कि हंगामा करनेवाले सांसदों के दैनिक भत्ते को बंद कर देना चाहिए। तीसरे ने तो ऐसा सवाल किया, “भैया! सदन में हंगामा और विरोध तो सांसद करते हैं तो लोकसभा अध्यक्ष बार-बार “आई एम सॉरी” क्यों कहती है?”

हमने कहा, “सांसदों का मान रखने के लिए।” मेरी बातों पर प्रतिक्रिया देते हुए वह बोला, “जो लोकसभा स्पीकर की बात न माने, उनकी समझाइशों की अवमानना करे उसका क्या मान रखना। स्पीकर को “आई एम सॉरी” के बदले उनपर सख्त कार्रवाई करना चाहिए।”

जन-मन की बात को प्रस्तुत करने का मन हुआ और यह लेख लिखा। लोकसभा अध्यक्ष एक शिक्षक की तरह सांसदों की उद्दंडताओं या शोर-शराबे को संयमित करते हैं। तथापि एक शिक्षक के रूप में उद्दंडता करनेवाले को दंडित भी करते हैं। ऐसे में देखना होगा कि लोकसभा व राज्यसभा में सरकारी रुपयों व समय का अपव्यय करनेवाले सांसदों पर स्पीकर कौन-सा रुख अपनाते हैं? या फिर हंगामा ऐसा ही चलता रहेगा या फिर सदन की कार्यवाही इसी तरह बाधित होती रहेगी?

– लखेश्वर चंद्रवंशी ‘लखेश’

 

आम्बेडकर के कथनानुसार – “मार्क्स नहीं, बुद्ध ही सही”

सामान्य

bhagwan-buddha-dr-babasaheb-ambedkar-karl-marksभगवान विष्णु के नवम अवतार माने-जानेवाले भगवान बुद्ध के विचार व सिद्धांत आधुनिक युग में सबसे अधिक प्रासंगिक माने जा रहे हैं। सारी दुनिया में बुद्ध के विचारों की प्रासंगिकता पर बड़े-बड़े विमर्श के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। भारत में भी भगवान बुद्ध की बृहद मान्यता है। स्वतंत्र भारत के संविधान के सूत्रधार डॉ.भीमराव आम्बेडकर ने 14 अक्टूबर, 1956 में बौद्ध धम्म स्वीकार कर बुद्ध मत के अनुयायी बनें। डॉ.आम्बेडकर के साथ महार जाति के अनगिनत लोगों ने भी अपने को बौद्ध धम्म का अनुयायी मान लिया। आज लाखों की संख्या में भारत में जातिगत दलित समाज हैं और बहुतांश दलित समाज स्वयं को बौद्ध मतावलंबी कहता है। विशेषकर महाराष्ट्र में इनकी संख्या अधिक है।

भगवान बुद्ध का जीवन और सन्देश जितना सहज है, उसका अनुकरण उतना ही कठिन। समाज में फैले हिंसाचार और अनैतिकता को समाप्त कर आदर्श व शांति का पथ दिखानेवाले भगवान बुद्ध की प्रासंगिकता को क्या हम समझ रहे हैं? क्या बौद्ध धम्म के अनुयायी और भारतीय समाज क्या उनके सिद्धांतों का अनुसरण कर रहे हैं? यह चिंतन का विषय है। क्योंकि वर्तमान भारत में बाबासाहेब आम्बेडकर की फोटो को सामने रखकर मार्क्सवाद का ढोल पिटा जा रहा है। स्वयं को आम्बेडकर के अनुयायी माननेवाले लोग आज राजनीतिक षड्यंत्रों की भेंट चढ़ रहे हैं। दलित समाज की जातिगत राजनीति में भगवान बुद्ध का सन्देश कहीं धूमिल होता दिख रहा है। इसलिए डॉ. बाबासाहब आम्बेडकर की बहुत याद आती है। डॉ.बाबासाहब आम्बेडकर ने अक्टूबर,1956 में बौद्ध धम्म स्वीकार किया और इसके लगभग 2 महीने बाद उनका निधन हो गया। बाबासाहब कुछ और वर्ष जीते तो गरीब, अनपढ़, वंचित, शोषित व पीड़ित दलित समाज को भगवान बुद्ध के संदेशों को सहजता से पहुंचा सकते थे। पर देश का दुर्भाग्य ही है कि बाबासाहब बौद्ध धम्म स्वीकारने के 2 माह के भीतर हो गया। फिर भी बाबासाहब का एक भाषण जो उनके अनुयायी और भारतीय समाज के लिए बहुत बड़ा सन्देश दे गया, उसे समझना बेहद जरुरी है।

29 नवम्बर, 1956 काठमांडू (नेपाल) के वर्ल्ड बुद्धिष्ट कोंफेरेंस में डॉ.भीमराव आम्बेडकर ने “बुद्ध या कार्ल मार्क्स नामक ऐतिहासिक भाषण दिया। इस भाषण में बाबासाहब ने भगवान बुद्ध के पंचशील, अष्टांग मार्ग और अहिंसा व न्याय के संबंध में संकल्पना को स्पष्ट किया। यही नहीं तो उन्होंने सारी दुनिया को बता दिया कि कार्ल मार्क्स के सिद्धांत विश्व का कल्याण नहीं कर सकते।

“बाबासाहब ने भगवान बुद्ध के समतावादी आदर्श के सामने मार्क्स के साम्यवाद का तुलनात्मक विश्लेषण किया और बता दिया कि भगवान बुद्ध के विचार समाज का उत्थान और विश्व का कल्याण कर सकता है, न कि मार्क्स के सिद्धांत।”

डॉ. भीमराव आंबेडकर ने पाने इस भाषण में कहा, “मार्क्स बहुत आधुनिक और बुद्ध बहुत पुरातन हैं। मार्क्सवादी यह कह सकते हैं कि उनके गुण की तुलना में बुद्ध केवल आदिम व अपरिष्कृत ही ठहर सकते हैं। फिर, दो व्यक्तियों के बीच क्या समानता या तुलना हो सकती है? एक मार्क्सवादी बुद्ध से क्या सीख सकता है? बुद्ध एक मार्क्सवादी को क्या शिक्षा दे सकते हैं? फिर भी इन दोनों के बीच तुलना आकर्षक तथा शिक्षाप्रद है। इन दोनों के अध्ययन तथा इन दोनों की विचारधारा व सिद्धांत में मेरी भी रूचि है। इस कारण इन दोनों के बीच तुलना करने का विचार मेरे मन में आया। यदि मार्क्सवादी अपने पूर्वाग्रहों को पीछे रखकर बुद्ध का अध्ययन करें और उन बातों को समझें जो उन्होंने कही हैं और जिनके लिए उन्होंने संघर्ष किया, तो मुझे यकीन है उनका दृष्टिकोण बदल जाएगा। वास्तव में उनसे (मार्क्सवादी) यह आशा नहीं की जा सकती कि बुद्ध की हंसी व मजाक उड़ाने का निश्चय करने के बाद वे उनकी प्रार्थना करेंगे, परंतु इतना कहा जा सकता है कि उनको यह महसूस होगा कि बुद्ध की शिक्षाओं व उपदेशों में कुछ ऐसी बात है, जो ध्यान में रखने के योग्य और बहुत लाभप्रद है।”

डॉ.आम्बेडकर ने कहा, “बुद्ध का नाम सामान्यतः अहिंसा के सिद्धांत के साथ जोड़ा जाता है। अहिंसा को ही उनकी शिक्षाओं व उपदेशों का समस्त सार माना जाता है। उसे ही उनका प्रारंभ व अंत समझा जाता है। बहुत कम व्यक्ति इस बात को जानते हैं कि बुद्ध ने जो उपदेश दिए, वे बहुत ही व्यापक है, अहिंसा से बहुत बढ़कर हैं।”

भगवान बुद्ध का सिद्धांत

बौद्ध धम्म के मुख्य ग्रन्थ “त्रिपिटक” का अध्ययन करनेवाले डॉ.आम्बेडकर ने इस भाषण में भगवान बुद्ध के सिद्धांतों को विस्तापूर्वक प्रस्तुत किया। भगवान बुद्ध के सिद्धांतों की चर्चा करते हुए आम्बेडकर ने कहा, “ मुक्त समाज के लिए पंथ (Religion) आवश्यक है। प्रत्येक पंथ अंगीकार करने योग्य नहीं होता। ईश्वर को पंथ (Religion) का केंद्र बनाना अनुचित है। आत्मा की मुक्ति या मोक्ष को पंथ (Religion) का केंद्र बनाना अनुचित है। पशुबलि को पंथ का केंद्र बनाना अनुचित है। वास्तविक पंथ का वास मनुष्य के हृदय में होता है, शास्त्रों में नहीं। पंथ (Religion) का केंद्र मनुष्य तथा नैतिकता होने चाहिए। यदि नहीं, तो पंथ (Religion) एक क्रूर अंधविश्वास है।” उन्होंने कहा, “पंथ का कार्य विश्व का पुनर्निर्माण करना तथा उसे प्रसन्न रखना है, उसकी उत्पत्ति या उसके अंत की व्याख्या करना नहीं। संसार में दुःख स्वार्थों के टकराव के कारण होता है और इसके समाधान का एकमात्र तरीका अष्टांग मार्ग का अनुसरण करना है।”

भगवान बुद्ध के सिद्धांतीं में मानवीय गुणों के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए आम्बेडकर ने कहा, “सभी मानव प्राणी समान हैं। मनुष्य का मापदंड उसका गुण होता है, जन्म नहीं। जो चीज महत्त्वपूर्ण है, वह है उच्च आदर्श, न कि उच्च कुल में जन्म। सबके प्रति मैत्री का साहचर्य व भाईचारे का कभी भी परित्याग नहीं करना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को विद्या प्राप्त करने का अधिकार है। मनुष्य को जीवित रहने के लिए ज्ञान विद्या की उतनी ही आवश्यकता है, जितनी भोजन की। अच्छा आचारणविहीन ज्ञान खतरनाक होता है। युद्ध यदि सत्य तथा न्याय के लिए न हो, तो वह अनुचित है। पराजित के प्रति विजेता के कर्तव्य होते हैं।”

बाबासाहब कहते हैं कि भगवान बुद्ध का सिद्धांत जितना प्राचीन है उतना ही नवीन भी। उनके उपदेश बहुत व्यापक तथा गंभीर हैं।

मार्क्स का सिद्धांत

कार्ल मार्क्स के मूल सिद्धांत का विवेचन करते हुए बाबासाहब आम्बेडकर ने कहा, “इसमें संदेह नहीं कि मार्क्स आधुनिक समाजवाद या साम्यवाद का जनक है। मार्क्स का सिद्धांत जितना पूंजीपतियों के विरुद्ध था, उतना ही उन लोगों के विरुद्ध भी था, जिन्हें वह स्वप्नदर्शी या अव्यावहारिक समाजवादी कहता था। वह उन दोनों को ही पसंद नहीं करता था।”

आम्बेडकर के अनुसार, मार्क्स का सिद्धांत कहता है कि एक वर्ग का दूसरे वर्ग के साथ स्वार्थ व हित का टकराव व उनमें संघर्ष का होना है। संपत्ति के व्यक्तिगत स्वामित्व से एक वर्ग को शक्ति प्राप्त होती है और दूसरे वर्ग को शोषण के द्वारा दुःख पहुंचाया जाता है। समाज की भलाई के लिए यह आवश्यक है कि व्यक्तिगत संपत्ति का उन्मूलन करके, दुःख का निराकरण किया जाए।

आम्बेडकर ने कहा, “मार्क्सवादी सिद्धांत को उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में जिस समय प्रस्तुत किया गया था, उसी समय से इसकी काफी आलोचना होती रही है। इस आलोचना के फलस्वरूप कार्ल मार्क्स द्वारा प्रस्तुत विचारधारा का काफी बड़ा ढांचा ध्वस्त हो चुका है। इसमें कोई संदेह नहीं कि मार्क्स का यह दावा कि उसका समाजवाद अपरिहार्य है, पूर्णतया असत्य सिद्ध हो चुका है। सर्वहारा वर्ग की तानाशाही सर्वप्रथम 1917 में, उसकी पुस्तक दास कैपिटल, समाजवाद का सिद्धांत के प्रकाशित होने के लगभग सत्तर वर्ष के बाद सिर्फ एक देश में स्थापित हुई थी। यहां तक कि साम्यवाद, जो कि सर्वहारा वर्ग की तानाशाही का दूसरा नाम है, रूस में आया तो यह किसी प्रकार के मानवीय प्रयास के बिना किसी अपरिहार्य वस्तु के रूप में नहीं आया था। वहां एक क्रांति हुई थी और इसके रूस में आने से पहले भारी रक्तपात हुआ था तथा अत्यधिक हिंसा के साथ वहां सोद्देश्य योजना करनी पड़ी थी। शेष विश्व में अब भी सर्वहारा वर्ग की तानाशाही के आने की प्रतीक्षा की जा रही है।”

बुद्ध तथा मार्क्स के साधनों की तुलना

“भगवान बुद्ध ने साध्य की प्राप्ति के लिए जो साधन बताए हैं, वह है पंचशील और आर्य अष्टांग मार्ग। जबकि मार्क्स के साम्यवाद के लक्ष्य का साधन हिंसाचार है।”

बाबासाहब ने दुःख के निराकरण के लिए पंचशील के आचरण को महत्वपूर्ण बताया। भगवान बुद्ध के पंचशील में निम्नलिखित बातें आती हैं :- 1. किसी जीवित वस्तु को न ही नष्ट करना और न ही कष्ट पहुंचाना। 2. चोरी अर्थात दूसरे की संपत्ति की धोखाधड़ी या हिंसा द्वारा न हथियाना और न उस पर कब्जा करना। 3. झूठ न बोलना। 4. तृष्णा न करना। 5. मादक पदार्थों का सेवन न करना।

आम्बेडकर के अनुसार, “बुद्ध का मत है कि संसार में कुछ कष्ट व दुःख मनुष्य का मनुष्य के प्रति पक्षपात है। इस पक्षपात का निराकरण किस प्रकार किया जाए? मनुष्य के प्रति मनुष्य के पक्षपात का निराकरण करने के लिए बुद्ध ने आर्य अष्टांग मार्ग निर्धारित किया। इस अष्टांग मार्ग के तत्व इस प्रकार हैं : – 1. सम्यक दृष्टि, 2. सम्यक संकल्प, 3. सम्यक वचन, 4. सम्यक आचरण, 5. सम्यक आजीविका, 6. सम्यक परिरक्षण (प्रयत्न), 7. सम्यक स्मृति, 8. सम्यक समाधि।

आम्बेडकर ने कहा कि “इस आर्य अष्टांग मार्ग का उद्देश्य पृथ्वी पर धर्मपरायणता तथा न्यायसंगत राज्य की स्थापना करना तथा उसके द्वारा संसार के दुःख तथा विषाद को मिटाना है। प्रत्येक व्यक्ति को चाहिए कि वह इन गुणों को अपनी पूर्ण सामर्थ्य के साथ अपने व्यवहार में अपनाए। इन पर आचरण करे। यही कारण है कि इन्हें परिमिता (पूर्णता की स्थिति) कहा जाता है। यही वह सिद्धांत है, जिसे बुद्ध ने संसार में दुःख तथा क्लेश की समाप्ति के लिए अपने बोध व ज्ञान के परिणामस्वरूप प्रतिपादित किया है।”

बाबासाहब आम्बेडकर ने कहा, “बुद्ध ने जो साधन अपनाए, वे स्वेच्छापूर्वक अनुसरण करके मनुष्य की नैतिक मनोवृत्ति को परिवर्तित करने के लिए थे। जबकि साम्यवादी कहते हैं कि साम्यवाद को स्थापित करने के केवल दो साधन हैं, पहला है हिंसा। वर्तमान व्यवस्था को भंग करने व तोड़ने के लिए इससे कम कोई भी कार्य या योजना पर्याप्त नहीं होगी। दूसरा साधन है, सर्वहारा वर्ग की तानाशाही। नई व्यवस्था को जारी रखने के लिए उससे कम कोई चीज पर्याप्त नहीं होगी।”

बाबासाहब ने कहा कि समता की बातें बुद्ध तथा कार्ल मार्क्स दोनों ही करते थे, यह दोनों में समानताएं हैं। पर दोनों के साधनों में बहुत अंतर व विषमताएं हैं। साध्य दोनों में समान हैं।

बुद्ध और मार्क्स के साधनों का मूल्यांकन

डॉ.आम्बेडकर अपने इस भाषण में बुद्ध और मार्क्स के साधनों के मूल्यांकन का विवेचन करते हैं। वे कहते हैं कि हमें इस बात को देखना चाहिए कि किसके साधन श्रेष्ठ तथा दीर्घ काल तक ठहरने व स्थाई बने रहने वाले हैं। आम्बेडकर सवाल पूछते हुए कहते हैं, “साधनों का मूल्य क्या है? किसके साधन अंततः श्रेष्ठ तथा स्थाई हैं? क्या साम्यवादी यह कह सकते हैं कि अपने मूल्यवान साध्य को प्राप्त करने में उन्होंने अन्य मूल्यवान साध्यों को नष्ट नहीं किया है? उन्होंने निजी व्यक्तिगत संपत्ति को नष्ट किया है।”

आम्बेडकर ने जोर देते हुए कहा, “साम्यवादियों ने अपने साध्य व लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए न जाने कितने लोगों की हत्या की है? क्या मानव जीवन का कोई मूल्य नहीं है? क्या वे संपत्ति को उसके स्वामी का जीवन लिए बिना उससे नहीं ले सकते? तानाशाही का साध्य व लक्ष्य क्रांति को एक स्थाई क्रांति बनाना होता है। यह एक मूल्यवान साध्य है, परंतु क्या साम्यवादी यह कह सकते हैं कि इस साध्य को उपलब्ध करने के लिए उन्होंने अन्य मूल्यवान साध्यों को नष्ट नहीं किया है? तानाशाही में आपका केवल कर्तव्य होता है कि आप कानून का पालन करें, परंतु आपको उसकी आलोचना करने का कोई अधिकार नहीं होता है। जबकि बुद्ध यह चाहते थे कि प्रत्येक व्यक्ति नैतिक रूप में इतना प्रशिक्षित होना चाहिए कि वह स्वयं ही धर्मपरायणता व न्यायसंगतता का प्रहरी हो जाए।

आम्बेडकर कहते हैं, “जहां तक हिंसा का संबंध है, हिंसा का नाम सुनते ही, उसके विचार से बहुत से लोगों को कंपकंपा आ जाएगी, परंतु यह केवल भावुकता है। हिंसा का पूर्णतया त्याग नहीं किया जा सकता। यहां तक कि गैर-साम्यवादी देशों में भी हत्यारे को फांसी पर लटकाया जाता है। क्या फांसी पर लटकाना हिंसा नहीं है? गैर-साम्यवादी देश एक-दूसरे के साथ युद्ध करते हैं। युद्ध में लाखों लोग मारे जाते हैं। क्या यह हिंसा नहीं है? यदि एक हत्यारे को इसलिए मारा जा सकता है, क्योंकि उसने एक नागरिक को मारा है, उसकी हत्या की है, यदि एक सिपाही को युद्ध में इसलिए मारा जा सकता है, क्योंकि वह शत्रु राष्ट्र से संबंधित है, तो यदि संपत्ति का स्वामी स्वामित्व के कारण शेष मानव जाति को दुःख पहुंचाता है, तो उसे क्यों नहीं मारा जा सकता? ”

आम्बेडकर भगवन बुद्ध के अहिंसा की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि, “बुद्ध हिंसा के विरुद्ध थे, परंतु वह न्याय के पक्ष में भी थे और जहां पर न्याय के लिए बल प्रयोग अपेक्षित होता है, वहां उन्होंने बल प्रयोग करने की अनुमति दी है।”

भगवान बुद्ध और वैशाली सेनाध्यक्ष संवाद

आम्बेडकर ने अपने भाषण में वैशाली के सेनाध्यक्ष सिंहा सेनापति के साथ भगवान बुद्ध के वार्तालाप का उल्लेख किया। सिंहा ने बुद्ध से पूछा, “भगवन, अहिंसा का उपदेश देते व प्रचार करते हैं। क्या भगवन, एक दोषी को दंड से मुक्त करने व स्वतंत्रता देने का उपदेश देते व प्रचार करते हैं? क्या भगवन यह उपदेश देते हैं कि हमें अपनी पत्नियों, अपने बच्चों तथा अपनी संपत्ति को बचाने के लिए, उनकी रक्षा करने के लिए युद्ध नहीं करना चाहिए? क्या अहिंसा के नाम पर हमें अपराधियों के हाथों कष्ट झेलते रहना चाहिए। क्या तथागत उस समय भी युद्ध का निषेध करते हैं, जब वह सत्य तथा न्याय के हित में हो?”

बुद्ध ने उत्तर दिया, – “मैं जिस बात का प्रचार करता हूं व उपदेश देता हूं, आपने उसे गलत ढंग से समझा है। एक अपराधी व दोषी को दंड अवश्य दिया जाना चाहिए और एक निर्दोष व्यक्ति को मुक्त व स्वतंत्र कर दिया जाना चाहिए। यदि एक दंडाधिकारी एक-एक अपराधी को दंड देता है, तो यह दंडाधिकारी का दोष नहीं है। दंड का कारण अपराधी का दोष व अपराध होता है। जो दंडाधिकारी दंड देता है, वह न्याय का ही पालन कर रहा होता है। उस पर अहिंसा का कलंक नहीं लगता। जो व्यक्ति न्याय तथा सुरक्षा के लिए लड़ता है, उसे अहिंसा का दोषी नहीं बनाया जा सकता। यदि शांति बनाए रखने के सभी साधन असफल हो गए हों, तो हिंसा का उत्तरदायित्व उस व्यक्ति पर आ जाता है, जो युद्ध को शुरू करता है। व्यक्ति को दुष्ट शक्तियों के समक्ष आत्मसमर्पण नहीं करना चाहिए। यहां युद्ध हो सकता है, परंतु यह स्वार्थ की या स्वार्थपूर्ण उद्देश्यों की शर्तों के लिए नहीं होना चाहिए।”

आम्बेडकर कहते हैं कि बुद्ध तानाशाही का बिलकुल समर्थन नहीं करते। वे कहते हैं, “बुद्ध लोकतंत्रवादी के रूप में पैदा हुए थे और लोकतंत्रवादी के रूप में ही मरे। उनके समय में चौदह राजतंत्रीय राज्य थे और चार गणराज्य थे। वह शाक्य थे और शाक्यों का राज्य एक गणराज्य था। उन्हें वैशाली से अत्यंत अनुराग था, जो उनका द्वितीय घर था, क्योंकि वह एक गणराज्य था। उन्होंने महानिर्वाण से पूर्व अपना वर्षावास वैशाली में व्यतीत किया था। अपने वर्षावास के पूरा हो जाने के बाद उन्होंने वैशाली को छोड़कर कहीं और जाने का निश्चय किया, जैसी उनकी आदत थी। कुछ दूर जाने के बाद, उन्होंने मुड़कर वैशाली की ओर देखा और फिर आनंद से कहा, ‘तथागत वैशाली के अंतिम बार दर्शन कर रहे हैं।’ उससे पता चलता है कि इस गणराज्य के प्रति उनका कितना लगाव व प्रेम था।”

भगवान बुद्ध पूर्णतः समतावादी

आम्बेडकर कहते हैं कि भगवान बुद्ध पूर्णतः समतावादी थे। वे बताते हैं कि एक बार बुद्ध की मां महाप्रजापति गौतमी ने, जो भिक्षुणी संघ में शामिल हो गई थी, सुना कि बुद्ध को सर्दी लग गई है। उन्होंने उनके लिए एक गुलूबंद तैयार करना तुरंत शुरू कर दिया। इसे पूरा करने के बाद वह उसे बुद्ध के पास ले गईं और उसे पहनने के लिए कहा, परंतु उन्होंने यह कहकर इसे स्वीकार करने से इंकार कर दिया कि यदि यह एक उपहार है, तो उपहार समूचे संघ के लिए होना चाहिए, संघ के एक सदस्य के लिए नहीं। उन्होंने बहुत अनुनय-विनय की, परंतु उन्होंने (बुद्ध ने) उसे स्वीकार करने से इंकार कर दिया, वह बिल्कुल नहीं माने।

आम्बेडकर कहते हैं कि भिक्षु संघ का संविधान सबसे अधिक लोकतंत्रात्मक संविधान था। बुद्ध संघ के भिक्षुओं में से केवल भिक्षु थे। वह तानाशाह कभी नहीं थे। उनकी मृत्यु से पहले उनको दो बार कहा गया कि वह संघ पर नियंत्रण रखने के लिए किसी व्यक्ति को संघ का प्रमुख नियुक्त कर दें, परंतु हर बार उन्होंने यह कहकर इंकार कर दिया कि धम्म संघ का सर्वोच्च सेनापति है। उन्होंने तानाशाह बनने और तानाशाह नियुक्त करने से इंकार कर दिया।

आम्बेडकर कहते हैं कि बुद्ध ने (बौद्ध) संघ में तानाशाही-विहीन साम्यवाद की स्थापना की थी। यह हो सकता है कि वह साम्यवाद बहुत छोटे पैमाने पर था, परंतु वह तानाशाही-विहीन साम्यवाद था, वह एक चमत्कार था।

बुद्ध का तरीका साम्यवादियों से बिलकुल अलग

बुद्ध का तरीका अलग था। उनका तरीका मनुष्य के मन को परिवर्तित करना, उसकी प्रवृत्ति व स्वभाव को परिवर्तित करना था, ताकि मनुष्य जो भी करे, उसे स्वेच्छा से बल-प्रयोग या बाध्यता के बिना करे। मनुष्य की चित्तवृत्ति व स्वभाव को परिवर्तित करने का उनका मुख्य साधन उनका धम्म (धर्म) था तथा धम्म के विषय में उनके सतत उपदेश थे। बुद्ध का तरीका लोगों को उस कार्य करने के लिए, वे जिसे पसंद नहीं करते थे, बाध्य करना नहीं था, चाहे वह उनके लिए अच्छा ही हो। उनकी पद्धति मनुष्यों की चित्तवृत्ति व स्वभाव को बदलने की थी, ताकि वे उस कार्य को स्वेच्छा से करें, जिसको वे अन्यथा न करते।

आम्बेडकर कहते हैं कि साम्यवादियों की दृष्टि में धर्म (धम्म) अभिशाप है। धर्म के प्रति उनमें घृणा इतनी गहरी बैठी है कि वे साम्यवादियों के लिए सहायक धर्मों तथा जो उनके लिए सहायक नहीं हैं, उन धर्मों के बीच भी भेद नहीं करेंगे। साम्यवादी ईसाई मत के प्रति अपनी घृणा को बौद्ध धर्म तक ले गए हैं।”

आम्बेडकर कहते हैं, “मानवता के लिए केवल आर्थिक मूल्यों की ही आवश्यकता नहीं होती, उसके लिए आध्यात्मिक मूल्यों को बनाए रखने की आवश्यकता भी होती है। स्थाई तानाशाही ने आध्यात्मिक मूल्यों की ओर कोई ध्यान नहीं दिया और वह उनकी ओर ध्यान देने की इच्छुक भी नहीं है। मनुष्य का विकास भौतिक रूप के साथ-साथ आध्यात्मिक रूप से भी होना चाहिए।” आम्बेडकर कहते हैं कि भ्रातृत्व, स्वतंत्रता तथा समानता, ये तीनों तभी विद्यमान रह सकती हैं, जब व्यक्ति बुद्ध के मार्ग का अनुसरण करे।

– लखेश्वर चंद्रवंशी ‘लखेश’  

क्या मौर्य खिलाएंगे उत्तरप्रदेश में कमल?

सामान्य

kp-maurya-लोकसभा चुनाव में प्रदेश की 80 में से 73 सीटें भाजपा गठबंधन को मिली थी जबकि राज्य विधानसभा (2012) में उसके 403 विधानसभा सीटों में से केवल 47 विधायक हैं। भले ही 2014 में लोकसभा चुनावों के बाद 71 सांसदों के होने के बाद भी जितने उपचुनाव हुए उनमें अधिकांश में पराजय का मुंह देखना पड़ा है। ऐसी स्थिति में, फूलपुर में पहली बार कमल खिलानेवाले केशव प्रसाद मौर्य भाजपा को पुनः सत्ता में वापस ला सकेंगे, ऐसी उम्मीद की जा रही है।

– लखेश्वर चंद्रवंशी ‘लखेश’

भारतीय नववर्ष विक्रम संवत 2073 के आते ही भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने उत्तर प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष पद के रूप में केशव प्रसाद मौर्य को नियुक्त कर सबको चौका दिया। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के इस निर्णय ने पार्टी के कार्यकर्ताओं सहित सपा, बसपा, कांग्रेस तथा मीडिया को भी अचम्भित कर दिया। यूं तो अमित शाह भाजपा के चाणक्य माने जाते हैं पर मौर्य की नियुक्ति कर क्या उत्तर प्रदेश में कमल खिलाने के लक्ष्य को साध पाएंगे? यह प्रश्न हर किसी के मन में उठना स्वाभाविक है, क्योंकि मीडिया और राजनितिक गलियारे में केशव प्रसाद मौर्य नाम की चर्चा नहीं के बराबर थी। कोई नहीं जानता था कि केशव प्रसाद देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश (यूपी) के भाजपा अध्यक्ष होंगे। अब जब उनकी भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के रूप में नियुक्ति हो चुकी है तो इसपर चर्चा करना प्रासंगिक भी है और महत्वपूर्ण भी, क्योंकि अगले वर्ष 2017 में यूपी में विधानसभा चुनाव होनेवाले हैं।

अबतक और आगे क्या?

अबतक कहा जा रहा था कि सपा और बसपा जातिगत समीकरण बनाने के काम में तेजी से जुटे हुए हैं और अधिकांश प्रत्याशियों का निर्णय भी हो चुका है और भाजपा अभी तक अपने प्रदेश अध्यक्ष का नाम भी घोषित नहीं कर पाई है। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने केशव कुमार मौर्य को नया प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बनाकर सबको चौका दिया है। राज्य के सभी वर्गों में उत्सुकता जगी है कि आखिरकार यह केशव कौन है? भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व ने केशव की नियुक्ति करके बहुत सारे चुनावी समीकरणों को तोड़ने साहसिक निर्णय लिया। गहन विचार-विमर्श के बाद केशव प्रसाद मौर्य की नियुक्ति करके भाजपा अध्यक्ष ने वंशवाद, जातिवाद तथा समय-समय पर अपनी दावेदारी पेश करनेवालों को हैरानी में डाल दिया है। नए भाजपा अध्यक्ष की नियुक्ति के बाद पार्टी के आंतरिक गुटबाज परेशान हो गए हैं। मौर्य को भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने पर पार्टी की महिला नेता राजेश्वरी पटेल ने विरोध किया तो  पार्टी ने उसे तत्काल निष्कासित कर दिया और यह संकेत भी दे दिया गया कि अनावश्यक बयानबाजी करनेवाले नेताओं व कार्यकर्ताओं पर पार्टी कठोर कार्रवाई करेगी।

मौर्य का राजनीतिक जीवन

पूर्वी उत्तर प्रदेश के कौशाम्बी में किसान परिवार में पैदा हुए केशव प्रसाद मौर्य के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने संघर्ष के दौर में पढ़ाई के लिए अखबार भी बेचे और चाय की दुकान भी चलाई। मौर्य राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस), विश्व हिन्दू परिषद् (विहिप) और बजरंग दल में 12 वर्षों से सक्रियता से कार्यरत रहे हैं। मौर्य ने राम जन्मभूमि तथा गोरक्षा आंदोलन जैसे हिंदुत्व अभियानों में भाग लिया और इसके लिए वे जेल भी गए। इन सबके बावजूद उत्तर प्रदेश की राजनीतिक पटल पर उनकी बड़ी पहचान नहीं रही है।

केशव प्रसाद मौर्य को भाजपा में बहुत काम लोग जानते हैं। भाजपा में उनका राजनीतिक जीवन सिर्फ 4 वर्षों का है। मौर्य का राजनीतिक जीवन 2012 में शुरू हुआ। 2012 में इलाहाबाद की सिराथू सीट से वे विधायक बने। 47 साल के केशव प्रसाद मौर्य जिस फूलपुर से पार्टी के सांसद हैं, वहीं से देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू तीन बार चुनाव जीते हैं। लेकिन पिछले लोकसभा चुनाव में मौर्य ने तीन लाख वोटों से क्रिकेटर मोहम्मद कैफ को हराकर पहली बार फूलपुर में भाजपा का कमल खिलाया। मौर्य 2016 में पार्टी के उत्तर प्रदेश अध्यक्ष बन गए हैं। केशव प्रसाद भले ही प्रदेश की कमान संभालने वाले 12 वें भाजपा नेता हो, लेकिन पिछड़ा समाज से आकर प्रदेश की कमान संभालनेवाले नेताओं के क्रम में उनका स्थान चौथा है। इससे पूर्व कल्याण सिंह, ओम प्रकाश सिंह और विनय कटियार प्रदेश भाजपा अध्यक्ष रह चुके हैं।

mayawati-akhilesh-yadav-keshavprasad-mauryaउत्तर प्रदेश : राजनीति में जातिगत समीकरण हावी  

उत्तर प्रदेश एक ऐसा राज्य है, जो दीर्घकाल से देश की राजनीतिक दशा व दिशा को तय करता आ रहा है। यहां की राजनीति में जातिगत और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का खेल चलता रहता है। यही कारण है कि यह यूपी संप्रदाय और जाति आधारित राजनीति की प्रयोगशाला बनकर रह गया है। इस प्रदेश में 18 मंडल, 75 जनपद, 312 तहसील, 80 लोकसभा, 30 राज्यसभा के साथ 403 विधानसभा सीटें हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार उत्तर प्रदेश में लगभग 20 करोड़ की आबादी है, जिसमें 79.73 प्रतिशत हिंदू, 19.26 प्रतिशत मुस्लिम, 0.18 प्रतिशत ईसाई तथा 0.32 प्रतिशत सिख हैं।

उत्तर प्रदेश के चुनाव में जातिगत समीकरण को खूब महत्त्व दिया जाता है। ऐसा कहा जाता है कि यहां के मतदाता अपना वोट नेता को नहीं, जाति को देते हैं। इसलिए ऐसे कयास लगाए जा रहे हैं कि हमेशा की तरह इस बार भी मतदाता वोट तो जाति को ही देंगे। इसलिए सभी राजनीतिक दल अधिकाधिक जातियों को साधने में लगे हैं। उत्तर प्रदेश में जातिगत वोटबैंक की बात करें तो यहां अगड़ी जाति से 16 प्रतिशत और पिछड़ी जाति से 35 प्रतिशत वोट आते हैं, वहीं 25 प्रतिशत दलित, 18 प्रतिशत मुस्लिम, 5 प्रतिशत जाट और 1 प्रतिशत अन्य वोटर्स तय करते हैं कि राज्य में सर्कार किसकी बनेगी। अगड़ी जाति में 8 प्रतिशत ब्राह्मण, 5 प्रतिशत ठाकुर और 3 प्रतिशत अन्य हैं, वहीं पिछड़ी जातियों में 13 प्रतिशत यादव, 12 प्रतिशत कुर्मी और 10 प्रतिशत अन्य हैं।

उत्तर प्रदेश की चुनावी गणित के अध्ययन से पता चलता है कि उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में जिस पार्टी को 30 प्रतिशत वोट मिलेंगे, उसकी जीत पक्की है। 2007 के विधानसभा चुनाव में मायावती ने 25 प्रतिशत दलित, 8 प्रतिशत ब्राह्मण और 18 प्रतिशत मुस्लिम वोटों को अपनी पार्टी में जोड़ने में सफल रहीं थीं और यूपी में बसपा की पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनी थी। इसी तरह 2012 में 35 प्रतिशत पिछड़ी जातियों सहित 18 प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं को अपनी ओर खींचने में मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी (सपा) को सफलता मिली और सपा की पूर्ण बहुमतवाली सरकार बनी। पर 2014 में लोकसभा चुनाव के दौरान मोदी लहर के चलते यूपी में भाजपा गठबंधन को 80 में से 73 सीटें मिली, जबकि बसपा सफा हो गई और सपा को केवल 5 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा था।

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इसलिए मौर्य का चयन सटीक

केशव प्रसाद मौर्य कोइरी समाज के हैं और प्रदेश में कुर्मी, कोइरी और कुशवाहा ओबीसी में आते हैं। पिछले लोकसभा चुनाव के साथ ही अन्य चुनावों में भी भाजपा को गैर यादव जातियों में इन जातियों का समर्थन मिलता रहा है। भाजपा ने केशव प्रसाद मौर्य का प्रदेश भाजपा अध्यक्ष के रूप में चयन कर पिछड़ी जातियों को अपने समर्थन का संदेश भी दे दिया है।

उत्तर प्रदेश में सरकार बनने के लिए भाजपा को अगड़े-पिछड़े दोनों का समर्थन प्राप्त करना बेहद जरुरी है। केशव प्रसाद मौर्य की हिंदुत्व छवि जहां सवर्णों का विश्वास अर्जित करने में सक्षम है, वहीं उनकी पिछड़ी जाति होने के कारण वे प्रदेश की पिछड़ी जातियों और दलित वर्गों को अपनी ओर आकर्षित करने में कारगर साबित हो सकती है। इस दृष्टि से मौर्य एक उत्तर प्रदेश के लिए एक संतुलित चेहरा है और उत्तर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष के रूप में नियुक्ति बेहद सटीक निर्णय माना जा रहा है। भाजपा ने ज़िला और मंडल स्तर पर भी बड़ी संख्या में ओबीसी नेताओं को कमान दे दिया है। भाजपा के इस कदम से सामाजिक समीकरणों को दुरुस्त करने की कोशिश हो रही है, जिसने विरोधियों की बेचैनी को बढ़ा दिया है। यही कारण है कि यूपी की सियासत अब राजनीतिक माहौल रोमांचक होनेवाला है। अखिलेश यादव और मायावती जैसे बड़े चेहरों के सामने केशव प्रसाद मौर्य की चुनौती विधानसभा चुनाव को कितना प्रभावित करेगी, इसपर सब अपने-अपने तरीके से अलग-अलग विश्लेषण कर रहे हैं।

मौर्य की नियुक्ति और संभावनाएं   

केशव प्रसाद मौर्य की नियुक्ति करके भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने प्रदेश के जातिगत समीकरणों को साधने का प्रयास किया है। भाजपा के इस निर्णय का संघ परिवार में भी स्वागत हो रहा है। इस कारण प्रदेश के विरोधी दल सकपका गए हैं और कुछ हद तक उनकी प्रारम्भिक बैचेनी भी दिखाई दी। माना जा रहा है कि मौर्य जातिगत समीकरणों में 50 प्रतिशत फिट बैठ रहे हैं वह जिस पिछड़ी जाति से आते हैं उसके 50 प्रतिशत वोटर प्रदेश में हैं। मौर्य के अध्यक्ष बनने से पार्टी को सबसे बड़ा लाभ यह हुआ है कि कल्याण सिंह, उमाभारती, संतोष गंगवार और विनय कटियार जैसे पिछड़े नेताओं के बाद भाजपा को एक और युवा पिछड़ा नेता मिल गया है।

मौर्य की नियुक्ति होने के बाद प्रदेश के विरोधी दलों ने आरोप लगाना शुरू कर दिया कि मौर्य दागी राजनेता हैं तथा उन पर कई प्रकार के आपराधिक मुकदमें चल रहे हैं। मौर्य ने सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि उन पर लगे सभी केस दरअसल राजनीति से प्रेरित हैं और वे अधिकांश मामलों में बरी हो चुके हैं। उन्होंने 2017 के विधान सभा चुनाव में सपा-बसपा के सफाए के साथ ही भाजपा के लिए 265 प्लस का लक्ष्य भी निर्धारित कर दिया।   अपना काम संभालने के बाद कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए मौर्य ने स्पष्ट कर दिया है कि भगवान राम और अयोध्या का राम मंदिर आस्था का मुद्दा है, राजनीति का नहीं। अगले साल उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में विकास हमारा मुद्दा रहेगा। हम सपा-बसपा मुक्त उत्तर प्रदेश और कांग्रेस मुक्त भारत बनाएंगे।

चुनावी दृष्टि से उत्तर प्रदेश सबसे महत्वपूर्ण   

निश्चय ही मौर्य के सामने प्रधानमंत्री मोदी व भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के सपनों को पूरा करने की बड़ी भारी चुनौती है। उत्तर प्रदेश एक अतिमहत्वपूर्ण राज्य है। यदि यहां पर भारतीय जनता पार्टी सभी प्रकार के राजनीतिक समीकरणों को लोकसभा चुनावों की तर्ज पर ध्वस्त करते हुए चली गई तो केंद्र की सत्ता मजबूत हो जाएगी। राज्यसभा में अपना पूर्ण बहुमत हो जाएगा तथा फिर राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति का चयन अपनेनुसार हो सकेगा। हर जगह ही भाजपा का अपना पूर्ण बहुमत होने की स्थिति में ही राममंदिर का सपना पूरा हो सकेगा। यही कारण है कि भाजपा ने बहुत ही सधे हुए कदमों से फैसले लेने प्रारम्भ कर दिए हैं।

उत्तर प्रदेश में एक तरफ सपा सत्ता में वापसी की उम्मीद लगाए बैठी है, दूसरी तरफ बसपा भी सत्ता में वापसी के लिए जोर लगा रही है, वहीं भाजपा उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव के प्रदर्शन को दोहराना चाहती है। विगत चार विधानसभा चुनावों से विधानसभा में भाजपा के विधायकों की संख्या लगातार कम होती जा रही है। भले ही 2014 में लोकसभा चुनावों के बाद 71 सांसदों के होने के बाद भी जितने उपचुनाव हुए उनमें अधिकांश में पराजय का मुंह देखना पड़ा है। ऐसी स्थिति में, फूलपुर में पहली बार कमल खिलानेवाले केशव प्रसाद मौर्य भाजपा को पुनः सत्ता में वापस ला सकेंगे, ऐसी उम्मीद की जा रही है।

क्रिकेट का बढ़ता रोमांच और हमारी भारतीय टीम  

सामान्य

indian-cricketफुटबॉल के बाद क्रिकेट ही ऐसा खेल है जो विश्व में दिन ब दिन अधिक लोकप्रिय होता जा रहा है। इसका कारण क्रिकेट में बेहतरीन बल्लेबाजी, गेंदबाजी, क्षेत्ररक्षण और विकेट कीपिंग का रोमांच है। टेस्ट और वन डे क्रिकेट मैचों ने लोगों के बीच खूब लोकप्रियता बटोरी। इसके बाद क्रिकेट प्रेमियों में धुआंधार क्रिकेट की इच्छा जगी और शुरू हुआ टी-20 मैचों का दौर! समयाभाव के दौर में शुरू हुए इस झटपट क्रिकेट ने हुनरमंद और शक्तिशाली बल्लेबाजों को अच्छा मंच प्रदान किया है।

माना जाता है कि सोलहवीं शताब्दी में क्रिकेट शुरू हुआ, परन्तु पहला अन्तराष्ट्रीय क्रिकेट 18वीं शताब्दी में खेला गया। 19वीं शताब्दी में क्रिकेट का रंग दुनिया में छाने लगा था, लेकिन क्रिकेट का रोमांच 19वीं शताब्दी के अंतिम 3 दशकों में ज्यादा बढ़ने लगा जब 1975 को अन्तराष्ट्रीय विश्वकप क्रिकेट आयोजन किया गया।

49-percentक्रिकेट में रोमांच को बढ़ानेवालों में दुनिया के अनेक देशों के खिलाड़ियों ने योगदान दिया है, जिसमें सर डॉन ब्रेडमैन (ऑस्ट्रेलिया), सर विवियन रिचर्ड्स (वेस्ट इंडीज), सर रिचर्ड हेडली (न्यूजीलैंड), सर गैरी सोबर्स (वेस्ट इंडीज), कार्ल हूपर (वेस्ट इंडीज), कर्टनी हैब्रोस (वेस्ट इंडीज), कपिल देव (भारत), सुनील गावस्कर (भारत), फारूक इंजिनियर (भारत), दिलीप वेंगसरकर (भारत), इमरान खान (पाकिस्तान), जावेद मियांदाद (पाकिस्तान), ब्रायन लारा (वेस्ट इंडीज), सचिन तेंदुलकर (भारत), शेन वार्न (ऑस्ट्रेलिया), वसिम अकरम (पाकिस्तान), मुथैया मुरलीधरन (श्रीलंका), सनथ जयसूर्या (श्रीलंका) आदि क्रिकेटरों का नाम उल्लेखनीय है।

क्रिकेट के रोमांच में भारत का योगदान   

19वीं शताब्दी से अबतक क्रिकेट इतिहास में नजर डालें तो क्रिकेट के प्रति लोगों की रूचि बढ़ाने में भारत का बहुत बड़ा योगदान है। तकनीक के मास्टर खिलाड़ी सुनील गावस्कर, श्रेष्ठ गेंदबाज और आलराउंडर कपिल देव तथा क्रिकेट के भगवान के नाम से जग विख्यात मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर क्रिकेट जगत के लिए वरदान साबित हुए हैं। भारतीय क्रिकेट के वर्तमान नायक के रूप में विराट कोहली का डंका सारे विश्व में बज रहा है। इन खिलाड़ियों के बेहतरीन खेल के कारण भारत में क्रिकेट के प्रति लोगों की रूचि दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। इसलिए भारत में होनेवाले मैचों में पूरा स्टेडियम खचाखच भरा रहता है और घर, ऑफिस, दुकान हर तरफ लोग जहां भी हो इस खेल का भरपूर लुफ्त उठाते हैं।

भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) ने इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) शुरू कर दुनिया के धाकड़ बल्लेबाजों और श्रेष्ठ गेंदबाजों को अवसर दिया। भारत में शुरू हुए इस आईपीएल के आयोजनों ने क्रिकेट के खुमार को और बढ़ा दिया। आज दुनिया के खिलाड़ी भारत में क्रिकेट की लोकप्रियता के चलते अपने चयन को अपना भाग्य मानते हैं, क्योंकि आईपीएल में खिलाड़ियों का चयन, उनका प्रदर्शन उनके देश की टीम में जगह पक्का कराने के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है और यह उस खिलाड़ी की लोकप्रियता के साथ उसके धनार्जन का महत्वपूर्ण साधन भी होता है।

no-bollअब नो बॉल भी बढ़ाता है रोमांच  

भारतीय क्रिकेट टीम दुनिया की बेहतरीन क्रिकेट टीमों में से एक है। 1983 और 2011 में विश्वकप जीतनेवाली भारतीय टीम ने 2007 में पहले टी-20 विश्वकप का ख़िताब अपने नाम किया है। खेल में हार-जीत चलती रहती है। क्रिकेट प्रेमियों द्वारा अपनी टीम की जीत पर ख़ुशी मनाना और हार पर मलाल जाहिर करना भी स्वाभाविक है। हाल ही में 31 मार्च हो हुए भारत-वेस्ट इंडीज टी-20 के सेमीफाइनल में भारत को हार का सामना करना पड़ा। इस मैच में आर. अश्विन और हार्दिक पंड्या द्वारा डाले गए दोनों नो बॉल में विकेट गए थे, पर नो बॉल के चलते भारत को इसका लाभ नहीं मिल सका। विश्लेषकों और खुद कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने अपनी टीम की हार में इन 2 गेंदों को मुख्य कारण माना है। इस तरह की नो बॉल की गलतियां और इसके बदले विपक्षी टीम को मिलनेवाले 1 और गेंद व फ्री हित का मौका क्रिकेट को रोमांच प्रदान करते हैं। जो मौके को चौकों और छक्कों में भुनाए या फील्डिंग वाली टीम फील्डिंग से बल्लेबाज को रनआउट करे, सफलता उनकी ओर दौड़ती है। यही इस मैच में हुआ। वेस्टइंडीज की जीत के हीरो रहे लेंडल सिमंस 2 बार कैच आउट हुए पर नो बॉल ने उसे जीवनदान दिया और इस अवसर को भुनाते हुए उसने वेस्ट इंडीज को जीत दिलाया। इसके साथ भारतीय टीम टी-20 विश्वकप के ख़िताब से बाहर हो गई और अब उसे भावी टूर्नामेंट की तैयारी में लगना है।

sachin-and-sehwagभारतीय टीम की ओपनिंग जोड़ी  

इस दौर में भारतीय क्रिकेट टीम बेहतर खेल का प्रदर्शन कर रही है, चूंकि इसमें कुछ कमी दिखाई देती है। पहले सौरव गांगुली और सचिन तेंदुलकर भारतीय पारी की शुरुवात करते थे, इसके बाद सचिन के साथ विरेन्द्र सहवाग ओपनिंग बैटिंग करते थे। यह दुनिया की खतरनाक ओपनिंग जोड़ी मानी जाती थी, बड़े से बड़ा गेंदबाज इस जोड़ी के सामने नहीं टिकते थे। अब भारतीय पारी की शुरुवात रोहित शर्मा और शिखर धवन करते हैं, जो कभी चलता है कभी नहीं। इसमें नियमितता जरुरी है।

dravid-viratनंबर 3 का कमाल जारी  

भारतीय टीम में पहले नम्बर 3 पर बल्लेबाजी कर ‘दि-वाल’ के नाम से ख्यात राहुल द्रविड़ ने छाप छोड़ी, वहीं वीवीएस लक्ष्मण ने भी मध्यक्रम में अपने बल्लेबाजी का लोहा मनवाया था। अब विराट कोहली तीसरे नंबर पर बल्लेबाजी करने आते हैं और वे इस क्रम में खेलनेवाले दुनिया के सबसे श्रेष्ठ बल्लेबाज हैं, यह उन्होंने अबतक साबित कर दिखाया है। 4 और 5 वे नंबर पर कभी सुरेश रैना, कभी युवराज सिंह या कभी अजिंक्य रहाणे आते हैं। इसके बाद कप्तान महेंद्र सिंह धोनी बैटिंग करते हैं। क्रिकेट के मध्यक्रम बल्लेबाजी में चौथे और पांचवे क्रम का स्थान बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। पर इस स्थान पर कौन बल्लेबाजी करेगा यह पक्का नहीं रहता है। इस दृष्टि से चार और पांच क्रमांक पर निश्चित खिलाड़ी रखना जरुरी है, तभी वह खिलाड़ी टीम में अपनी निश्चित भूमिका ठीक तरह निभा सकेगा।

dhoniyuvrajptilनम्बर 4 और 5 क्रम को बनाएं मजबूत       

सारी दुनिया युवराज सिंह और धोनी के विस्फोटक बल्लेबाजी से परिचित हैं और वे परिस्थिति के अनुरूप खेल सकने में सक्षम हैं, जबकि सुरेश रैना जरुरत के समय पार्टनरशिप करने में सफल नहीं हो पाते। बल्लेबाजी करते समय रैना की भूमिका पार्टनरशिप बनाने की जगह ताबड़तोड़ बल्लेबाजी की दिखाई देती है। पार्टनरशिप करने के लिए रूककर खेलना रैना के स्वभाव के विपरीत है। इसलिए क्रिकेटप्रेमियों का मानना है कि युवराज सिंह और कप्तान महेंद्र सिंह धोनी को नम्बर 4 और 5 पर बल्लेबाजी करनी चाहिए, ताकि मध्यक्रम मजबूत हो। इसके बाद रैना, रविन्द्र जडेजा, आर.अश्विन या हरभजन सिंह बल्लेबाजी करते हैं तो निचले क्रम को मजबूती मिलेगी।

indian-bowlersगेंदबाजों को मिले अनुभवी गेंदबाजों का साथ  

गेंदबाजी में कपिल देव, जवागल श्रीनाथ, वेंकटेश प्रसाद और अनिल कुंबले जैसे दिग्गजों का दौर समाप्त हो गया है। तेज गेंदबाज जाहिर खान संन्यास ले चुके हैं और भारतीय टीम में अब आशीष नेहरा और हरभजन सिंह सर्वाधिक अनुभवी गेंदबाज हैं। नए गेंदबाजों को समय रहते उनके अनुभवों का लाभ मिल सकता है। आर. अश्विन ने अपने स्पिन गेंदबाजी का लोहा मनवाया है, वहीं जसप्रीत बुमरा ने योर्कर और स्विंग गेंदबाजी करने में प्रशंसा बटोरी है। भारत को अच्छे तेज गेंदबाजों की जरुरत है। ऐसा नहीं कि सवा सौ करोड़ जनसंख्यावाले देश में खिलाड़ियों की कमी है। भारत की घरेलु क्रिकेट प्रतियोगिता, – रणजी ट्रॉफी, दिलीप ट्रॉफी, ईरानी ट्रॉफी और देवधर ट्रॉफी में बेहतर प्रदर्शन करनेवाले खिलाड़ियों का चयन भारतीय टीम के लिए किया जाता है। खिलाड़ियों का चयन, चयन के बाद उनके मेहनत और अभ्यास पर ही उम्मीद टिकी है। भारतीय टीम धोनी के नेतृत्व में अबतक अच्छा प्रदर्शन करती आई है। भारतीय क्रिकेट प्रेमियों का उन्हें भरपूर समर्थन मिलता है। कामना करते हैं कि भारत को अच्छे गेंदबाज मिले, भारत की पूरी टीम हर फोर्मेट में अच्छा खेले और अपने श्रेष्ठ प्रदर्शन से विश्व पटल पर देश की कीर्ति बढ़ाए।

– लखेश्वर चंद्रवंशी ‘लखेश’   

अब देश को पुनः प्रल्हाद चाहिए

सामान्य

bhakt-prahlad.jpg(होली पर्व पर विशेष लेख)  

होली का महापर्व आज मनोरंजन, नशा और मजाक बनकर रह गया है। डीजे की कर्कश आवाज पर थिरकने वाले तथा कटे-फटे कपड़े पहनकर, बेढ़ंग फैशन पर गर्व करनेवाला युवा समाज रंग से रंग तो जाता है परंतु होली के पर्व के मर्म को समझने की इच्छा उसके मन में कभी नहीं जगती।

होली का पर्व है और बाल-गोपाल सहित युवा तथा बुजुर्गों में भी होली को लेकर बहुत उत्साह है। एक ऐसा समय था जब लोग इस पर्व को अधिक उत्साह व उमंग से किस प्रकार मनाया जा सकता है, इसका नियोजन होली के एक माह पूर्व ही कर लेते थे। इस अवसर पर गांव में खेल प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता था। इन प्रतियोगिताएं में लोग बड़े उत्साह से सहभागी होते थे। तरह-तरह के पकवान बनाये जाते थे, सारा गांव स्वादिष्ट व्यंजनों की खुशबू से भर जाता था। रंग-गुलाल के रंगीन दृश्य से वातावरण मनोहारी हो जाता था, किन्तु आज आधुनिकता और फूहड़ता के प्रवाह में ये सभी आनंद देनेवाले क्षण धीरे-धीरे समाप्त हो रहे हैं।

Okहोली का महापर्व आज मनोरंजन, नशा और मजाक बनकर रह गया है। होली के अवसर पर फाग गानेवाले लोग प्रायः लुप्त होते जा रहे हैं। डीजे की कर्कश आवाज पर थिरकने वाले तथा कटे-फटे कपड़े पहनकर, बेढ़ंग फैशन पर गर्व करनेवाला युवा समाज रंग से रंग तो जाता है परंतु होली के पर्व के मर्म को समझने की इच्छा उसके मन में कभी नहीं जगती। इस आधुनिक पीढ़ी में त्योहारों को लेकर उत्साह तो है और उसको वे अभिव्यक्त भी करते हैं, परंतु अभिव्यक्ति का माध्यम क्या है, उसकी दिशा कौन-सी हो सकती है? होली क्यों मनाते हैं और इसे कैसे मनाना चाहिए? कौन बताए? मस्ती की पाठशाला कहकर होली के रंग-गुलाल में रंगे लोगों के फूहड़ नाच-गानों को मीडिया में प्रदर्शित किया जाता है और होलिका दहन की कहानी बता दी जाती है। इससे क्या होगा? होली में लोग शराब आदि का नशा करना क्या छोड़ देंगे? क्या लोग नशे में धूत होकर गाली-गलौच करना बंद कर देंगे? ऐसे अनेक प्रश्न हैं, जिसका समाधान खोजने की नितांत आवश्यक है।Bhagwan_Narsingh

होली का त्योहार तो हरिभक्त प्रह्लाद को स्मरण करने का पर्व है। हिरण्यकश्यपु के घर जन्म लेनेवाले बालक प्रल्हाद की भक्ति को आत्मीयता से हम कितने भारतीय स्मरण करते हैं? हिरण्यकश्यपु द्वारा दिए गए भयंकर यातनाओं से तनिक भी भयभीत न होनेवाले बालक प्रह्लाद क्या हमारे आदर्श नहीं हो सकते? याद कीजिए भक्त प्रल्हाद की वह हरिभक्ति, जिसके कारण भगवान विष्णु को अपने इस परम बालभक्त से मिलने बैकुंठ से भारतभूमि पर अवतरित होना पड़ा। प्रल्हाद ऐसा महान भक्त, जो न आग में जला, न पानी में डूबा, न तलवार की धार ने उसे कुछ नुकसान पहुंचाया। भगवान विष्णु ने नृसिंह रूप में प्रगट होकर प्रल्हाद हो नष्ट करने का प्रयत्न करनेवाले हिरण्यकश्यपु का संहार किया और अपने अनन्य भक्त प्रल्हाद को अपनी गोद में बिठाकर स्नेह की वर्षा की। परन्तु हमने तो प्रल्हाद को ही भूला दिया।

आज हमारे देश में एक तरफ ईश्वर के अस्तित्व को नकारनेवाले अनगिनत विधर्मी मिलते हैं और वहीं दूसरी ओर अपने धार्मिक होने का दावा ठोकने वालों की भी कोई कमी नहीं है। कथा, प्रवचन और सत्संग-भागवत के आयोजन के अवसर पर भारी संख्या में लोगों की भीड़ भी दिखने लगी है। फिर भी धर्माधारित जीवन जीनेवाले लोग कम ही दिखाई देते हैं। एक तरफ धार्मिक कार्यक्रमों में लोगों की भारी भीड़ तो दूसरी ओर धर्माधारित जीवन जीनेवालों की कमी! बहुत विरोधाभासी स्थिति है। यह इसलिए कि हम अपने धर्म, कर्तव्य और दायित्व को पहचान नहीं पाए। भक्त प्रह्लाद का जीवन धर्म, कर्तव्य और दायित्व बोध का आदर्श प्रस्तुत करता है। वह प्रल्हाद जिसके पिता स्वयं राजा थे और जो श्री हरि विष्णु के प्रबल विरोधी थे। विष्णु का नाम लेनेवालों की वह प्राण हर लेते थे। इस भयानक और त्रासदी युक्त वातावरण में प्रल्हाद ने बड़ी हिम्मत दिखाई। ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ का जाप करनेवाले भक्त प्रल्हाद ने पूरी निर्भयता के साथ भगवान विष्णु के नाम का प्रचार किया और अपनी भक्ति के प्रभाव से भयभीत समाज में भगवान के प्रति आस्था और विश्वास जगाया, इसी की परिणति है कि युगों से आज तक होली का पर्व मनाने की परम्परा अक्षुण्ण है।

परंतु मात्र पर्व मनाने से कार्य पूर्ण नहीं हो जाता, हमें तो ऐसे प्रल्हादों को खोज निकालना होगा जो ईश्वरीय कार्य को अपना ध्येय बना ले। आज जिस तरह भगवान श्रीराम, श्रीकृष्ण, शिवजी यहां तक की सनातन हिन्दू धर्म की देवियों को लेकर अनर्गल प्रचार करनेवालों की पूरी फ़ौज सक्रिय है, ऐसे में प्रल्हाद की भक्तिभाव का आदर्श समाज में ईश्वर के प्रति विश्वास को जगाता है। यदि हम प्रल्हाद के बीज बन पाएं तो निश्चय ही निर्भिक और आदर्श पीढ़ी का निर्माण कर सकेंगे। यह धर्म की पुन:स्थापना के लक्ष्य में यह सार्थक पहल होगा।

– लखेश्वर चंद्रवन्शी