विवेकानन्द शिलास्मारक

समुद्री लहरों के तेज थपेडे खाकर

मां का चरण सन्यासी का नमन पाकर

भारत को देखते

निर्भय बना हुआ है

नमन करता भारत मां के

चरणों में खडा हुआ है ।

विवेकानन्द शिलास्मारक

सुनों ! क्या बता रहा है ?

त्याग और सेवा ही साधना है ,

समर्पण का हमें मार्ग दिखा रहा है ।

यहां जो भी आता है , विस्मय विमुग्ध हो जाता है ।

अहंकार मन का , स्वयं सागर में,

बूंद बनकर खो जाता है ॥

तीन महासागरों का मिलन समन्वय सिखाता है ।

एकनाथजी की मेहनत के आगे

ह्रदय नतमस्तक हो जाता है ।

स्वामीजी की खडी प्रतिमा,

कदम बढाओ कहती है ।

आखों का भेद , चेहरे का तेज ,

लक्ष्य निर्धारित करती है ।

हे अमृत के पुत्र , परमहंस के शिष्य,

पौरूष से युक्त , तुम और तुम्हारी छबि महान है ।

मैं गागर हूं तुम सागर हो, आप जैसा कर दो मुझे,

तुम्हें बारम्बार प्रणाम है, बारम्बार प्रणाम है ॥

– लखेश

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