हे भारत ! क्या तुम्हें याद है ?

         

   आज जब नागपुर के अनेक चौराहों पर “क्रिसमस की शुभकामनायें” ऐसी पोस्टर देखने को मिली तब एकाएक भारतीय इतिहास का वह स्वर्णिम दिन याद आ गया, जिसके विषय में आपको बताने की आत्मीय इच्छा हो गई | और क्यों न बताऊँ आपसे शुद्ध सात्विक प्रेम जो है | तो घटना आज से 119 वर्ष पूर्व की है | अंग्रेजों के शासन काल में भारतीय जनता अपने आप को भारतीय कहलाने में हीनता का अनुभव करती थी | ईसाई मिशनरियों द्वारा हिन्दुधर्म की निंदा कर भारत का अपमान किया जाने लगा | भारत के इस आत्माग्लानि को दूर करना अति आवश्यक हो गया था | पर भारत और भारतीय संस्कृति का ऐसा महान ज्ञाता भला कहाँ मिलता ? इतिहास उस महापुरुष की बेसब्री से प्रतिक्षा कर रहा था | भारतमाता अपने इस सुपुत्र की बाट निहार रही थी जो भारत की जनता में स्वाभिमान भर उसमें आत्मविश्वास का अलख जगा सके | यह प्रतिक्षा दूर हुई जब एक युवा संन्यासी स्वामी विवेकानन्द संपूर्ण भारत का भ्रमण करते हुए भारत की आत्मा को टटोल रहा था | भारत की विशेषताओं को बड़ी बारीकी से अनुभव कर रहा था |

          इस दौरान वे गरीब से गरीब तथा बड़े-बड़े राजा-महाराजाओं से मिले | एक तरफ धनवानों की टोली तो दूसरी ओर दुखी, असहाय और बेबस जनता | इस विषमता और भेदभाव को देखकर स्वामीजी का ह्रदय द्रवित हो गया | भारत में व्याप्त दरिद्रता, विषमता तथा आत्मग्लानि से उनका मन पीड़ा से भर उठा | अंत में वे भारत के अंतिम छोर कन्याकुमारी पहुंचे | देवी कन्याकुमारी के मंदिर में माँ के चरणों से वे लिपट गए | माँ को उन्होंने शाषटांग प्रणाम किया और भारत की व्यथा को दूर करने की प्रार्थना करते हुए वे फफक – फफक कर रोने लगे | भारत की इस दयनीय परिस्थिति को दूर करने के लिए उनका मन छटपटाने लगा | भारत के पुनरुत्थान को व्याकुल इस संन्यासी ने हिंद महासागर में छलांग लगाई और पहुँच गए उस श्रीपाद शिला पर जहाँ देवी कन्याकुमारी ने शिवजी को प्रसन्न करने के लिए तप किया था | २५, २६, और २७ दिसंबर १८९२ को तीन दिन और तीन रात बिना खाए – पिए ध्यानस्थ हो गए | पर यह कैसा अनोखा ध्यान था ? व्यक्तिगत मुक्ति या सिद्धियों की प्राप्ति को छोड़ कर भारत के पुनरुत्थान के लिए किया गया ध्यान था यह ! भारत के खोये हुए आत्मविश्वास और खोई हुई आत्माश्रद्धा को दूर करने की व्यापक योजना स्वामी विवेकानन्द ने इसी समय बनाई थी | यह वही ध्यान है जिसने अपने वैचारिक स्पष्टता के बल पर विश्व का मार्गदर्शन किया | हम सभी भारतीय विवेकानन्द के वंशज ही तो हैं जिन्होंने ११ सितम्बर, १८९३ को केवल ०७ मिनट के अपने छोटे से भाषण से संपूर्ण विश्व का ह्रदय जीत लिया | उनके ही भाषणों ने देश में क्रांतिकारियों को जन्म दिया | सुभाषचन्द्र बोस हो या सावरकर, महात्मा गाँधी हो या आम्बेडकर, ऐसा कोई भारतभक्त नहीं जिन्होंने स्वामीजी से प्रेरणा नहीं पाई |

 क्या आपको याद है ?

 यदि ना हो स्मरण २५, २६ और २७ दिसंबर का यह ऐतिहासिक ध्यान, तो अपने भारतीय होने पर करना होगा विचार…

यदि ना हो ज्ञात तो पढ़ना शुरू कर दें क्योंकि स्वामी विवेकानन्द की १५०वीं जयंती २०१३ में आ रही है |

विश्व की जनता उनकी जयंती मनाने की तैयारी में जुट गई है और आप…?

आज ही हो जाइये तैयार…

आपको शुद्ध सात्विक प्रेम से सस्नेह नमस्कार…

लखेश

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