जाग कवि अब जाग कवि

जाग कवि अब जाग कवि

 खो गया प्रकाश छुप गया रवि ||

 शांत धरा है मौन गगन, आलस फैलाता नीरस पवन |

रुष्ट मुकुल कुम्हलाये सुमन, जलहीन है अतृप्त चमन |

 शांत धरा में उत्साह भर दो, मौन गगन में नाद कर दो |

  नवस्फूर्ति का प्रस्फुटन करने,

  गाओ तुम नवगान कवि ||

    जाग कवि अब जाग…

 बढ़ रहा आतंकवाद, जड़ जमाता भोगवाद |

सोया है मानव समाज, कौन लडेगा इससे आज ?

स्वार्थ का विस्तार हुआ है, निश्चिन्त हो सब सोये हैं |

 संवेदनहीन होकर लोग, अपनी मस्ती में खोये हैं |

 जगाने सोये प्राणों को,

  करो तेज हुँकार कवि ||  जाग कवि अब जाग…

लुप्त हो गया विश्वास आपस का, अन्धकार जग में छा गया |

सभ्य- सुसंस्कृत हिन्दू समाज में, कोई विद्वेष की अग्नि सुलगा गया |

जातिगत विद्वेष से बँट रहा है देश, राष्ट्रभक्ति के आभाव में बढ़ रहा है क्लेश |

प्रेम-विश्वास के मधुर डोर से,

  करो एकता का संचार कवि ||

 जाग कवि अब जाग…

क्यों रुपयों के आगे थिरकते हो, राजनीतिज्ञों के पचड़े में पड़ते हो |

चुटकुलों में अंतरात्मा को बेच दिया, मर्यादा का उल्लंघन करते हो |

कौन है तू, तेरा कम है क्या ?

आत्मावलोकन कर कवि ||

 जाग कवि अब जाग…

आपस के व्यर्थ विवाद को छोडो, समाज के लिए सतत झरो |

राष्ट्रहित का  ध्यान रखो तुम, सद्कर्म से कभी ना टरो |

स्वाध्याय कर, कृति कर,

 युग कर रहा पुन: आह्वान कवि ||

 जाग कवि अब जाग…

तेरे जागने से तिमिर न कभी रह पायेगा |

तू तो स्वयं प्रकाशपूंज है, तेरी वाणी से जग जगमगाएगा |

जब तू जागेगा……

    तो तेरी वाणी में कबीर, तुलसी बोलेंगे |

      सुर, मीरा की भक्ति देख तुझमें,

    तेरे प्रकाश में लोग डोलेंगे |

 प्रसाद का अध्ययन, गुप्त का चिंतन, तेरी लेखनी में दिखेगा |

 गुरु गोविन्द का तेज तेरे मुखमंडल पर चमकेगा |

विवेकानन्द-सी आखें होगी, शंकर-सा तू योगी होगा |

जीवन के प्रत्येक संकट को झेल सकेगा, तू हंसकर

निराला सम जब ह्रदय तुम्हारा होगा |

अधर्म का फैल रहा हलाहल,

 प्राषण कर तू नीलकंठ बन जा कवि ||

 जाग कवि अब जाग…

                                                                                           – लखेश्वर चंद्रवंशी ‘लखेश’

                                                                                             संपादक : भारत वाणी

 

 

 

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जननी तेरा स्मरण…

जननी तेरा स्मरण करता हूँ, प्रतिपल श्वांस-प्रश्वांस में।
ह्रदय मंदिर में तू बसी है, मेरे रोम-रोम विश्वास में।
गोदी में तेरे खेल कूद कर बड़े हुए हैं।
घुटनों के बल सरक-सरक कर खड़े हुए हैं।
तेरी कृपा से जीवन का सब सुख पाया है,
अमृत-सा नीर पिया अन्न खाया है।।
तेरी कृपा से बढ़कर संसार का कोई उपहार नहीं।
जिस क्षण तेरा स्मरण न हो, इससे बड़ा अपराध नहीं।
इस नश्वर संसार में, तेरा अस्तित्व ही शाश्वत है।
तेरी सेवा सब व्रतों से बड़ा है। 
क्या दूँ तुझे?
शरीर, रक्त, मांस, प्राण सब कुछ तेरा है।
तू ही प्रकाशपूंज है और सारा संसार अंधेरा है।
प्रेम, श्रद्धा, भक्ति का एक भाव भरा है भीतर। 
तेरी प्रकाश की आभा से चमक रहा है अंतस।
हे मातृदेवता ! मेरे प्रत्येक कर्म में तू विराज।
पुण्यपथ का अनुगामी, अपना ले मुझको आज।।

– लखेश्वर चंद्रवंशी