धर्म का विजय पर्व

 

जरा देखो ! ये कौन आ रहा है ?

 हर जगह प्रकाश-सा छा रहा है |

 चेहरे पर अद्भुत तेज है,

 ललाट पर वैभव का सेज है |

 हिमालय

 मुकुट बन हीरे जड़ रहा है |

 मोती

 सागर से निकलकर चरणों में चढ़ रहा है |

 सुशोभित है मेरी भारत माँ,

ज्ञान, मान, धन से सुसज्जित है |

प्रत्येक जीव सुखी है,

 हर मनुष्य जाग्रत है आज |

सुनाई दे रहा है मुझे

 पांचजन्य का वह विजयनाद |

 ऐसा लग रहा है

सम्पूर्ण विश्व आनंद मना रहा है |

 हाँ…हाँ…

 मेरा यह स्वर्णिम स्वप्न

साकार होने जा रहा है |

 देखो, मेरे युवा साथियों !

 धर्म का विजय पर्व आ रहा है…

 समर्थ भारत पर्व आ रहा है |

 – लखेश्वर चन्द्रवंशी “लखेश”

 स्वामी विवेकानन्दजी की १५०वीं जयंती निकट २०१३ में आ रही है |  उन्होंने देखा था स्वप्न भारतमाता को वैभवशाली सिंहासन पर प्रतिष्ठित करने का |  स्वामीजी का यह स्वप्न हमारी प्रेरणा है |  आइये, उनके सार्ध शती को भारत के पुनरुथान का स्वर्णिम अवसर बनाये |  अपने मन से, आचरण से…और आदर्श जीवन से !

 यह सार्धशती “धर्म का विजय पर्व” बन जाये…|

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3 thoughts on “धर्म का विजय पर्व

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