समर्थ गुरु रामदास

       प्रत्येक माता-पिता की कामना रहती है कि उसका पुत्र बडा होगा तो उसका विवाह होगा । घर खुशहाली से भर जाएगा । एक बार विवाह की चर्चा छिडने पर नारायण घर से जंगल भाग गए । उनके बडे भाई गंगाधर ने उन्हें बहुत समझाया और घर ले आए । गंगाधर को छोटे भाई की विरक्ति का पता था अतः मां को समझाते कि नारायण पर विवाह के लिए दबाव न डाले । किन्तु आखिर मां का हृदय तो मां का ही होता है । एक दिन मां नारायण को एकान्त में ले जाकर बोली – पुत्र ! मेरी हर बात मानता है या नहीं ? बालक नारायण ने कहा- मां, यदि तेरी बात नहीं मानूँगा तो किसकी बात मानूँगा । मां बोली तो अच्छा बता जब मैं विवाह की बात करती हूँ तो क्यों मना करता है ? कुछ देर नारायण ने विचार किया और बोले कि अच्छा अन्तरपट पकडने तक मैं मना नहीं करूँगा । मां समझी नारायण विवाह के लिए मान गया ।

       नारायण विवाह के लिए तैयार है ऐसा मानकर सबकी सम्मति से एक कुलीन ब्राह्मण कुल की कन्या के साथ उनका विवाह निश्चित हो गया । विवाह के दिन बारात लेकर वरपक्ष के लोग कन्या पक्ष के यहां पहुँच गए । लग्न समय में जब अन्तरपट पकडने का अवसर आया और सभी ब्राह्मण एक साथ ‘सावधान’ बोले तो नारायण सचेत होकर कहने लगे, अपना वचन पूरा हुआ और एकाएक लग्न मण्डप से उठरकर भाग गए । कुछ लोग उनके पीछे भागे भी, पर कौन हवा को पकड सकता है ? कभी समय (काल) पकडा जा सकता है ? ब्राह्मणों ने लडकी के लिए तुरन्त दूसरा वर ढूँढकर उसका विवाह कर दिया ।

       समर्थ रामदास के विषय में कहा जाता है कि वह हनुमान के अवतार थे । एक बार वे फिर रामराज्य की कल्पना को साकार करने आए थे । भविष्य पुराण में लिखा भी है –

       कृतेहु मारुता ख्याश्र्च त्रेतायां पवनात्मजः ।
        द्वापरे भीम संज्ञश्च रामदासः कलौयुगे ॥

       यानि सतयुग में हनुमान, त्रेता में पवनात्मज, द्वापर में भीम तथा कलियुग में रामदास के नाम से प्रसिद्ध होंगे ।

       भारत के दक्षिण में जब पठानों का पतन हो गया और हिन्दू राजाओं ने अपने-अपने राज्य स्थापित कर लिए, तब वे राजा बहुत से लोगों को जमीन और धन देकर अपने राज्य में बसाते थे । अनेकों लोग निजामशाही छोडकर गोदावरी के किनारे बस गए । उन लोगों में कृष्ण जी पन्त नाम के ब्राह्मण भी सन्‌ ९६२ ईस्वी में उत्तर गोदावरी के तट बीड प्रान्त में हिबरा नामक गांव में परिवार सहित रहने लगे । इनके बडे पुत्र का नाम दशरथ पन्त था । अपने पिता की सम्पत्ति लिए बिना वह हिबरा से १२ किलोमीटर दूरी पर बडगाँव में गए । यहाँ वह पुरोहित का काम करने लगे । इनके बडे पुत्र का नाम रामजी पन्त था । पिता की मृत्यु के पश्चात रामजी पन्त को ङङ्गजांब’ क्षेत्र मिला । रामजी पन्त के पुत्र सूर्याजी पन्त हुए जो प्रसिद्ध भगवद्‌भक्त तथा एक प्रबुद्ध व्यक्ति थे । इनकी पत्नी का नाम रणूबाई था । यही समर्थ रामदास के माता-पिता थे ।
       सन्‌ १६०८ ईस्वी को ठीक रामजन्म के समय रणूबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया । इस बच्चे के जन्म के पश्चात परिवार की सुख समृद्धि में वृद्धि होने लगी । बच्चे का नामकरण हुआ । नाम रखा गया नारायण जो कालान्तर में समर्थ रामदास के नाम से प्रसिद्ध हुए ।

        पांच वर्ष के हो जाने के बाद नारायण का उपनयन संस्कार हो गया । उसी वर्ष पाठशाला में उन्हें भेजा गया । नारायण को जो पढाया जाता वह तुरन्त याद कर लेते । उन दिनों ब्राह्मण बालक के लिए पुरुष सूक्त, रुद्र, वैश्वदेव, ब्रह्मयज्ञ और कुछ जमा खर्च का शिक्षण यह अनिवार्य विषय थे । कोई भी बालक इनको पूरा किए बिना छूट नहीं सकता था । नारायण ने बहुत जल्दी ही यह सब काम पूरा कर लिया । उनका शब्दों का उच्चारण बहुत ही स्पष्ट और शुद्ध होता था । जब वह रुद्री जपा करते तो सारे गांव के लोग उनकी ओर एकटक देखा करते थे ।
       बाल्यकाल से ही निरोगी एवं बलिष्ठ शरीर का धनी नारायण गाँव में ङङ्गबागी’ नाम से प्रसिद्ध था । अपनी अवस्था के बालकों का वह नेतृत्व करता था । तैरना, पेडों पर चढने के खेलों को खेलना इनके स्वभाव में था । कभी-कभी खेलते-खेलते वह लडकों को छोडकर अकेले ही एकान्त में जाकर यों ही बैठ जाया करते थे ।
       एक दिन मां ने नारायण से कहा – ”ओ रे नारायण, कैसा लडका है तू ? दिन भर इधर-उधर घूमा करता है, कुछ काम नहीं करता । अरे तू पुरुष है ! पुरुष को जरा घर बाहर की चिन्ता करनी चाहिए ।” नारायण ने यह सुनकर मां से कहा- अच्छा, माँ, अब की बार देख लेना । अब से मैं चिन्तन किया करूँगा और एक दिन घर से गायब हो गए । घर के लोग चिन्तित हुए, बहुत ढूँढा । जंगल, नदी तट इत्यादि सब स्थानों पर देख लिया पर नारायण नहीं मिला । माँ तो रोने लगी । पिता घबरा गए । रात हो गई सभी चिन्ता से व्याकुल थे । मां इधर-उधर दौड रही थी पर वह करे तो क्या करे ? तभी एक घर की अंधेरी कोठरी में वह गईं तो उनका पैर किसी से टकराया । चौंककर उन्होंने पूछा- ”कौन हो ?”
       नारायण ने कहा ‘मैं हूँ माँ – क्या बात है ?’     

”क्या कर रहा है यहाँ ?”,  मां ने कहा |

”अरे तूने जो कहा था कि पुरुष को घर की चिंता करनी चाहिए ? मैं तो घर की ही नहीं विश्व की चिंता करने बैठा था ।” सूर्याजी पन्त ने जब सुना तो उन्हें विश्वास हो गया कि अपने को मिला वरदान यथार्थ है ।
       नारायण की एकान्त प्रियता बढती जा रही थी । प्रतिदिन उठकर स्नान के पश्चात बारह सौ सूर्यनमस्कार कर लेना, इसके बाद मित्रों के साथ तैरने जाना उनका नियम बन गया । तत्पश्चात एकान्त स्थान में जाकर ध्यान में बैठ जाते थे ।
उन्होंने स्वयं को अत्यन्त कठोर नियमों में बांध लिया । तेरह करोड बार ‘राम, जय राम, जय जय राम’ उन्हें बोलना था । ”त्रयोदशाक्षरी” मंत्र का इतना जप करना अपने आप में कठिन कार्य था । सूर्योदय से पूर्व उठकर दैनिक कार्यों से निवृत्त होने के पश्चात गोदावरी में छाती तक पानी में खडे होकर उन्होंने साधना की । मछलियाँ काटती रहती थीं पर वे अविचलित भाव से साधना रत रहते ।
       उन्होंने दासबोध नामक अति उत्कृष्ट ग्रंथ लिखा । उस ग्रंथ में ब्रह्मसूत्र, संहिता, उपनिषद, भागवत, रामायण, गीता के वचन उद्‌धृत किए गए हैं ।
       अध्ययन के पश्चात सायं पुनः गोदावरी के तट पर जाते और शान्त चित्त से समाज चिन्तन में लग जाते । वहाँ वह घण्टों बैठते । उनके चिन्तन का विषय रहता- ”यह मेरा विशाल समाज और यह उस समाज की मातृभूमि । अत्यन्त विशाल होने के बाद भी यह मातृभूमि परवशता के चंगुल में फँसी है । हमारी संस्कृति इतनी जीर्ण क्यों हो गई है ? हमारे यहाँ किस चीज की कमी है ? क्या हम दूसरों से कम वीर हैं ? क्या अपनी संस्कृति की नींव कमजोर है ? आखिर इसका कारण क्या है ? जिसके फलस्वरूप हमारे समाज की यह दशा हुई है।” ऐसे प्रश्न और उनके निराकरण के लिए वह घण्टों विचार किया करते थे ।
       तेरह करोड जप साधना पूर्ण करने के पश्चात जब वे ध्यानवस्था में बैठे थे तो भगवान श्रीराम ने उन्हें दर्शन देकर कहा, बस अब परमार्थ साधना पूर्ण हुई । समाज तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है । जाओ, उसे आतताइयों से मुक्त करवाओ ।
भगवान श्रीराम से आज्ञा लेकर नासिक छोडकर तीर्थ यात्रा को निकल गए । नर्मदा नदी पार कर वे उत्तर दिशा में जाने लगे तो रास्ते में कई दुःखद प्रसंग देखे और सुने । कहीं गाँव जलाए गए थे, कहीं किसानों के खलिहान लूट लिए गए थे, किसी गाँव की बहू-बेटियों को दुष्ट लोग उठाकर ले गए थे । किसी गाँव के सभी लोगों को बिना पारिश्रमिक दिए जबरन काम करवाया जाता था । इस प्रकार चारों तरफ मुस्लिम शासकों के सिपाहियों की मनमानी चल रही थी । जब किसी धर्मशाला या किसान की झोपडी में समर्थ रामदास जी रुकते थे, वहाँ के सैकडों लोग अपनी व्यथाकथा उनसे आकर कहते थे । वे उन्हें समझाते, ढाँढस बँधाते थे । जब वे एकान्त में बैठकर चिन्तन करते तो समाज की व्यथा देखकर अत्यन्त कष्ट होता था । समाज की इस दुर्दशा को देखकर वे अनेकों बार रोए भी । जैसे-जैसे वे उत्तर दिशा में बढते जाते उनके सम्मुख अनेक दर्दनाक चित्र उभरते जाते । जब वे अयोध्या पहुँचे तो दुःख का ठिकाना ही न रहा । प्रत्यक्ष राम जन्मभूमि में आतताइयों ने अपना कब्जा जमा लिया था । वे जब काशी पहुंचे तो वहाँ भी वही भयानक दृश्य ! विश्वनाथ महादेव जी को अपनी जगह छोडनी पडी । मथुरा-वृन्दावन में भी वही दशा । अब तो अनका हृदय अत्यन्त व्यथित हो गया । वे चिंतानिमग्न हो गए । बारह वर्ष तक पूरे भारत में वे घूमते रहे । सब जगह एक जैसा ही हाल था ।
         समर्थ रामदासजी ने विचार किया कि हमारे समाज में इतनी कायरता आ गई है । पहले तो समाज से कायरता दूर करनी होगी । इस प्रकार समर्थ रामदास स्वामी ने समाज में स्वतंत्रता के विषय में वैचारिक क्रान्ति का अलख जगाने का कार्य प्रारंभ कर दिया । जब शिवाजी को इस बात की जानकारी मिली तो वे स्वामीजी के दर्शन के लिए लालायित हो उठे । एक दिन छत्रपति शिवाजी स्वयं स्वामीजी के दर्शन के लिए निकल पडे । बडी कठिनाई के पश्चात शिवाजी को समर्थ रामदासजी के दर्शन हुए । वहीं शिवाजी ने मंत्रोपदेश लिया । अब अध्यात्म और शक्ति के योग से जनक्रांति उत्पन्न होने लगीं ।

        शिवाजी समर्थ स्वामीजी के प्रिय शिष्य थे । दोनों की आयु में २२ वर्षों का अन्तर था । जब भी शिवाजी को राज्य कार्य से कुछ समय निकलता वह स्वामी जी के दर्शन के लिए आते । 

         एक बार शिवाजी एक दुर्ग को नए ढंग से बनवा रहे थे । वहाँ पर हजारों श्रमिक काम कर रहे थे । शिवाजी को कदाचित विचार आया कि, इन सबको मैं पल रहा हूँ । उसी समय चिरपरिचित पवित्र घोष हुआ ”जय जय जय रघुवीर समर्थ” ।
         मेंढक को देख स्वामीजी ने कहा कि मेरे राम की भी अनोखी लीला है । इस मेंढक को उसका दाना पानी कौन दे रहा होगा ?
शिवाजी को अपनी भूल का स्मरण हो आया ! और स्वामीजी के चरणों को पकडते हुए कहा कि मुझे क्षमा करें, मेरे अन्दर कुछ समय के लिए दम्भ आ गया था । आपकी कृपा से मेरा अहंकार दूर हो गया है ।
          एक बार शिवाजी के मन में विरक्ति उत्पन्न हो गई । उसी समय वहां स्वामी समर्थ रामदासजी ने दरवाजे पर आकर भिक्षा के लिए आवाज लगाई – ”जय जय जय रघुवीर समर्थ !” शिवाजी स्वयं भिक्षा देने आए । भिक्षापात्र में एक पर्ची डाल दी । स्वामीजी ने कहा यह क्या है भाई ? न चावल, न दाल, कागज की भी भिक्षा दी जाती है क्या ?
           स्वामीजी ने कागज निकाला और पढा । उस पर लिखा था, मेरा सब राज्य आपके चरणों में अर्पित है । कागज पढकर वे जोर से हँसे और बोले- ”मैं तुम्हारी भिक्षा स्वीकारता हूँ और अपने राज्य को सँभालने के लिए तुम्हें ही नियुक्त करता हूँ ।” यह श्री रामजी का राज्य है, ऐसा समझकर उसे ठीक ढंग से सँभालो । राज्य का ध्वज भगवा रखना । राज्य में मुनादी करवा दो कि जब कभी दो लोग मिलें तो राम राम ही कहें क्योंकि यह रामजी का राज्य है ।
           भारत में आज प्रत्येक छोटे-बडे गांव, नगर की बस्तियों और कॉलोनियों में हमें श्री हनुमानजी के मंदिर देखने को मिलते हैं । आज भी व्यक्ति एक-दूसरे से मिलते समय राम राम करते हैं । समाज में भक्ति और शक्ति का अद्‌भुत समन्वय को स्थापित करने के लिए समर्थ गुरु रामदासजी ने आश्रम व व्यायाम शाला के निर्माण की योजना बनाई और उसका क्रियान्वयन भी किया । उन्होंने १२ हजार मठों व मंदिरों की स्थापना की थी, जिसके माध्यम से स्वराज्य की स्थापना एवं उसके संचालन के लिए लोगों को प्रशिक्षित कर उन्हें सामर्थ्यशाली बनाने का कार्य चलता था । आज समाज बहुत सारी विकृतियों ने घिरा है । समाज में शक्ति और भक्ति का अभाव दिखता है । अतः समर्थ रामदासजी की इस जयंती के अवसर पर हम भी सज्जनों को सामर्थ्यशाली बनाने का कार्य करने का संकल्प लें ।
                                                                                                                       – लखेश्वर चंद्रवन्शी

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गलती का अहसास…

लक्ष्य महत्त्वपूर्ण है…मनुष्य नहीं ! पर मनुष्य बिना कार्य कैसे संभव है ? इसलिए मनुष्य जोडे…तोडे नहीं…साथ ही अपने कार्यकर्ता के मन की दशा और दिशा की प्रत्येक दृष्टि से हमें विचार करना चाहिए ! इस बात को अधिक स्पष्टता से समझने की दृष्टि से सादर है मराठा इतिहास का एक प्रसंग…

कार्यकर्ता अपना कार्यकर्तापन किसी भी स्थिति में न भूलें !
            जब बाजीराव पेशवा पद पर आरूढ थे, तब सारे भारत में मराठों का दबदबा था । बाजीराव के पराक्रम नीति-न्याय से मराठों का सिर गर्व से ऊँचा था। एक बार उनके मित्र राज्य ने शत्रुओं से मुकाबला करने के लिए उन्हें बुलाया । मराठों की सेना मित्र-राज्य की सहायता के लिए चल पडी। मार्ग में पडाव डाला गया। आस-पास किसानों के खेत थे। एक दिन सेना नायक कहीं गये हुए थे। मराठा सेना के कुछ सैनिकों ने खेतों की कुछ फसलें काट ली और घोडों को खिला दी। परेशान किसान शिविर में आए और उन्होंने सेना के उच्च अधिकारी पेशवा बाजीराव से अपनी तकलीफ कहीं। बाजीराव ने शिकायत की जाँच पडताल शुरु की दी। ज्ञात होने पर उन्होंने उद्दंड सैनिकों को फटकारा। ये सैनिक मल्हारराव होलकर के थे, उन्होंने बाजीराव को अपने सैनिकों पर फटकार लगाते देखा, तो वे सहन न कर सके। क्रूद्ध होकर उन्होंने बाजीराव पर एक बडा-सा पत्थर दे मारा। उनके माथे से खून बहने लगा। बाजीराव लौट आए।
              सेनानायक जब शिविर में वापस आए तो उन्हें घटना का वृतांत मालूम हुआ। दोष मल्हार राव का था। उन्हें दंड देने तथा किसानों की सहायता करने के लिए सेनाधिकारियों की बैठक हुई। सैनिकों को दंडित किया गया। ऐसा तय हुआ कि मल्हार राव बाजीराव से क्षमा मांगें। मल्हार राव ने इसे सामूहिक अपमान समझा। उसने अपने मन में यह गांठ बांध ली कि इस अपमान का बदला बाजीराव से अवश्य लेना है। सोचा कि बाजीराव जब कभी एकांत में मिले तो उन्हें वहीं मौत के घाट उतार दिया जाए।


           एक दिन ऐसा ही अवसर मिला। बाजीराव एकांत में टहल रहे थे। बाजीराव को रोकते हुए होल्कर ने तलवार निकाली, और कहा- ”रूक रे नरकीटक ! आज मैं अपने अपमान का बदला लेकर रहूँगा।” तब बाजीराव ने मल्हार राव के पास पहूँचकर कहा- ”मल्हार राव ! तुम वीर हो और हम सब एक लक्ष्य लेकर निकले हैं। यदि मुझे मारकर ही तुम शांत हो सकते हो तो बेहिचक मार डालो, पर मराठा जाति के लक्ष्य मार्ग में फूट के कांटे मत डालो।” इस दूरदर्शिता पर मल्हार राव पिघल गया और उसने एकांत में बाजीराव के पैरों में गिरकर क्षमा मांगी।
                 ”मैं कार्यकर्ता हूं”, यह बात तो एकदम सही है । लेकिन कभी-कभी हम अपने कार्यकर्ता होने के भाव को भूल जाते हैं । जब किसी बात पर हमारी आपस में कुछ तनातनी हो जाती है तब उस समय हम अपने लक्ष्य को भूल व्यर्थ विवादों में उलझ जाते हैं, जो न संगठन के लिए ठीक है न अपने लिए ! जहां तक संभव हो झगडों को टालना चाहिए । इसका श्रेष्ठ माध्यम है अपने वाणी पर संयम रखना । कब, कहाँ, क्यों, कैसे, किससे और क्या बोलें ? इस पर हमारा चिन्तन होना चाहिए । यदि गलती हो तो स्वीकार कर क्षमा मांग लें और बडे अधिकारी विशाल ह्रदय से उसे स्वीकार कर लें । बात बन जाती है ।
स्मरण रहे –
             संगठन में व्यक्तिगत द्वेष और कटु वचन कार्यकर्ता को संगठन के महान लक्ष्य से दूर ले जाता है । इसलिए कार्यकर्ता सावधान !
                                                                                           – लखेश्वर चंद्रवन्शी

सज्जन जन तो है वही…

सज्जनों को शक्तिशाली और शक्तिशालियों को सज्जन बनाना, यही हमारे  कार्य का मूल है | – श्री भैय्याजी जोशी

          किसी की वाणी में ऐसी अद्भुत शक्ति होती है, जो सामान्य मनुष्य के जीवन को असामान्य बना देता है । ऐसे मनुष्यों का सानिध्य में कुछ क्षण बिताने पर मन प्रसन्न हो जाता है । ऐसे प्रसन्नता युक्त वातावरण की अनुभूति मुंबई में हुई । जहां देशभर के ३०० से अधिक कार्यकर्ता एकत्रित हुए थे । ये सभी स्वामी विवेकानन्द की सार्ध शती समारोह की तैयारी के लिए चिन्तन बैठक में आए थे । इस अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह माननीय श्री भैय्याजी जोशी और विवेकानन्द केन्द्र के राष्ट्रीय अध्यक्ष माननीय श्री परमेश्वरन् जी का मार्गदर्शन प्राप्त हुआ ।

          बैठक के उद्घाटन सत्र में श्री भैय्याजी जोशी ने स्वामी विवेकानन्द के मर्मस्पर्शी विचारों की प्रासंगिकता का महत्व बताया और कहा कि स्वामीजी की सार्ध शती से हमें क्या साध्य करना है ? देश के कोने-कोने में समाज के सभी घटकों में स्वामी विवेकानन्द के संदेशों को पहुँचाना, मतलब करना क्या है ? केवल कार्यक्रम करने से लक्ष्य की पूर्ति तो नहीं हो जाती । अत: आयोजन के उद्देश्य को सतत् स्मरण रखना होगा । उन्होंने कहा कि “समाज के सभी सज्जन लोगों को हमें शक्तिशाली बनाना है और जो शक्तिशाली हैं उन्हें सज्जन बनाना है । इस बात का स्मरण रखेंगे तो हम अधिकाधिक कार्यकर्ताओं का निर्माण कर सकेंगे ।”
          “सज्जनों को शक्तिशाली और शक्तिशालियों को सज्जन बनाना”, सभी समस्याओं को सुलझाने का कितना मार्मिक समाधान है यह ? अद्वितीय और अद्भुत विचार ! जिसने सुन लिया, वह कभी भूल ही नहीं सकता । बस, इस एक पंक्ति ने वहाँ उपस्थित सभी कार्यकर्ताओं को यह सोचने के लिए मजबूर कर दिया कि श्री भैय्याजी जोशी का चिन्तन का स्तर कितना ऊँचा है?

                   उनके विचारों के प्रवाह में गोते लगाते हुए यदि हम अपने देश के इतिहास पर दृष्टि डालेंगे तो बहुत सारी बातें स्पष्ट हो जाती हैं । आर्य चाणक्य ने ठीक ही कहा था कि समाज की अवनति दुर्जनों की सक्रियता से अधिक सज्जनों की निष्क्रियता के वजह से होती है । इसलिए समाज में रहने वाले सभी दुर्जनों का नाश कर दिया जाए तो समाज सुखी हो जाएगा, ऐसा सभी को लगता है। लेकिन सज्जनों को बचाने के लिए केवल दुर्जनों का नाश, यह कोई समाधान कारक उपाय नहीं है । 

          मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने रावण को युद्ध से पहले उसे सुधरने का अवसर प्रदान किया था । हमारे देश में शत्रुओं के पास राजदूत भेजने का अर्थ ही है- सुधरने का अवसर देना, शांति स्थापित करना । राम के जीवन में हम देखते हैं कि कैसे उन्होंने सुग्रीव को मित्र बनाया । वानरराज बाली सुग्रीव से अधिक शक्तिशाली था । उसने सुग्रीव को राज्य से बाहर निकाल दिया था । सुग्रीव जैसे सज्जन व्यक्ति को शक्तिशाली बनाने के लिए ही तो श्रीराम ने उससे मित्रता की थी । तब जाकर वानरों एवं भालूओं की सेना का संगठन तैयार हुआ और सज्जनों की सामूहिक शक्ति से रावण का संहार हुआ ।
          जब-जब दुर्जन शक्ति सज्जनों पर हावी होने लगे तो सज्जनों को उनसे अधिक शक्तिशाली बनाना होता है । यह एक मार्ग है । परंतु शक्तिशाली दुर्जनों को सज्जन बनाना भी तो जरूरी है । इस कार्य को हम भूल जाते हैं । परंतु भगवान बुद्ध को देखिए उन्होंने कैसे अंगुलिमाल को सज्जन बनाया । चाणक्य ने शक्तिशाली राक्षस को कैसे चन्द्रगुप्त शासन का अमात्य घोषित कर उसे सही मार्ग पर लाया । महारानी लक्ष्मीबाई ने डाकू समरसिंह को और वीर सावरकर ने मदनलाल धींगरा को भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का महान क्रांतिकारी बना दिया । यह आदर्श है शक्तिशालियों को सज्जन बनाने का । परंतु संत कबीर भयभीत लोगों को सज्जन मानते ही नहीं । वे कहते हैं-                                           सज्जन जन तो है वही, जो ढाल सरीखा होय ।

 दुःख में तो आगे रहे, सुख में पीछे होय ॥

          युद्ध के दौरान शत्रु के तलवार के वार से ढाल ही तो रक्षा करता है । संत कबीर के अनुसार तो सज्जन ढाल की तरह होता है, जो प्रत्येक प्रहार पर अन्यों की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहता है ! अब हमें तय करना है कि हम सज्जन हैं या नहीं ।    

भीष्म प्रतिज्ञा, भीम पराक्रम और भगीरथ प्रयास  – श्री पी. परमेश्वरन् जी

           बैठक का समापन सत्र भी उद्घाटन की तरह उत्साहवर्धक और प्रेरणादायक था । विवेकानन्द केन्द्र के राष्ट्रीय अध्यक्ष मा. श्री पी. परमेश्वरन् जी ने समापन सत्र में कार्यकर्ताओं को आनेवाले स्वामी विवेकानन्द की सार्ध शती समारोह के लिए मानसिक एवं शारीरिक दृष्टि से सुदृढ रहने का आह्वान किया और कहा कि अगले दो वर्ष तक एक दिन भी किसी कार्यकर्ता को बिमार नहीं होना है । स्वस्थ शरीर, दृढ मनोबल और उदात्त संकल्प ही हमें शक्ति प्रदान करता है ।      उन्होंने कहा कि स्वामी विवेकानन्द की सार्ध शती समारोह के अवसर पर सम्पूर्ण भारत को जाग्रत करना है । भारत जागेगा तभी विश्व का कल्याण होगा । इसलिए इस समारोह का ध्येय वाक्य ‘‘ भारत जागो ! विश्व जगाओ !!” रखा है । इस समारोह में विजयी होने के लिए चाहिए भीष्म प्रतिज्ञा, भीम पराक्रम और भगीरथ प्रयास ! मा. परमेश्वरन् जी के इस शक्तिदायी विचारों ने कार्यकर्ताओं को स्वामी विवेकानन्द की सार्ध शती में भारतभक्तों की सक्रिय भूमिका के महत्व को उजागर कर दिया ।                                           मा. परमेश्वरन् जी तथा मा. भैय्याजी जोशी के ये बहुमूल्य तथा अविस्मरणीय प्रेरणादायी विचार एक पल के लिए भी हमसे विस्मृत न हो। अपने मन, बुद्धि शरीर और आत्मा से हम सदैव तत्पर रहें, यही समय की आवश्यकता है ।

                                                                                                                                                                                               – लखेश्वर चंद्रवन्शी

राम की शक्तिपूजा


                     जब श्रीराम की सेना के सम्मुख रावण खडा था तो रावण की मायावी शक्ति के आगे राम की सेना टिक नहीं पायी । वानर सेना मारे डर के तितर-बितर भागने लगी । हजारों वानर सैनिक रावण के घातक प्रहार से मारे गये । सूर्यास्त के समय जब दोनों की सेना अपने-अपने शिविरों में लौटे, तब विजय के दंभ के कारण चलते हुए राक्षस अपने भारी पगों से पृथ्वी को कंपा रहे थे । उनके विजय हर्ष के कोलाहल से जैसे सारा आकाश गूँज रहा था । इसके विपरीत वानर-सेना के मन में घोर निराशा थी । अपनी सेना के मुख-मंडल पर व्याप्त निरुत्साह को देखकर राम का हृदय व्याकुल हो गया । उन्हें लगने लगा कि रावण की शक्ति और पराक्रम के बल के आगे अपनी सेना टिक नहीं पायेगी और सीता को रावण की कैद से छुडाना असंभव है । इस चिंता में डूबे श्रीराम के शिथिल चरण-चिन्हों को देखती वानर-सेना अपने शिविर की ओर बिखरी-सी चल रही थी । मुरझाकर झुक जानेवाले कमलों के समान मुँह लटकाये लक्ष्मण के पीछे सारी वानर-सेना चल रही थी । उनके आगे अपने माखन जैसे कोमल पग टेकते राम चल रहे थे । उनके धनुष की डोरी इस समय ढीली पड रही थी । तरकश को धारण करनेवाला कमरबंध भी एकदम ढीला-ढाला हो गया था । राम इस समय ऐसे प्रतीत हो रहे थे जैसे किसी कठिन पर्वत पर रात्रि का अंधकार उतर आया हो ।
                    वे सब लोग चलते हुए पहाड की चोटी पर बसे अपने शिविर में पहुँचे । सुग्रीव, विभीषण, जांबवान आदि वानर; विशेष दलों के सेनापति; हनुमान, अंगद, नल, नील, गवाक्ष आदि अपनी सेनाओं को विश्राम शिविरों में लौटाकर अगली सुबह होनेवाले युद्ध के लिए विचार-विमर्श करने हेतु बडे ही मंद कदमों से अर्थात पराजय की चिंता में डूबे हुए वहाँ पहुँचे ।
                       रघुकुल भूषण श्रीराम एक श्वेत पत्थर के आसन पर बैठ गए । उसी क्षण स्वभाव से चतुर हनुमान उनके हाथ-पांव धोने के लिए स्वच्छ पानी ले आए । बाकी के सभी वीर योद्धा संध्याकालीन पूजा-पाठ आदि करने के लिए पास वाले सरोवर के किनारे चले गये । अपने संध्या-पूजा से शीघ्र निवृत्त होकर जब वे सभी वापस लौटे, तो राम की आज्ञा को तत्परता से सुनने के लिए सभी लोग उन्हें घेरकर बैठ गए । लक्ष्मण राम के पीछे बैठे थे । मित्र-भाव से विभीषण और स्वभाव से धैर्यवान, जाम्बवन्त भी उनके समीप ही बैठे थे । राम के एक तरफ सुग्रीव थे और चरण-कमलों के पास महावीर हनुमान विराजमान थे । बाकी सभी सेनानायक अपने-अपने उचित और योग्य स्थानों पर बैठकर रात के नीले कमल के विकास और शोभा को भी जीत लेनेवाले श्याम-मुख को देख रहे हैं । इधर राम के मन में हार-जीत का संशय भाव रह-रहकर उद्वेलित हो रहा था । राम का जो हृदय शत्रुओं का नाश करते समय आज-तक कभी भी थका या भयभीत नहीं हुआ था, राम का जो हृदय अकेलेपन में भी कभी विचलित नहीं हुआ था, वही इस समय रावण से युद्ध करने के लिए व्याकुल होकर भी, प्रस्तुत रह कर भी बार-बार अपनी असमर्थता और पराजय को स्वीकार कर रहा था । श्री राम के चेहरे में उमटी इस चिन्ता की रेखा को देखकर जाम्बवन्त ने इसका कारण पूछा । तब श्रीराम ने कहा, ” रावण के पास मायावी शक्ति है और युद्धकला में वह निपुण है । जिस तरह उसने हमारी सेना का संहार किया उससे तो ऐसा लगता है कि उसपर विजय प्राप्त करना असम्भव है । हमारी सेना में उसके मायावी शक्ति का कोई तोड नहीं है ।”
                          राम की बातें सुनने के बाद वृद्ध जाम्बवन्त ने राम को महाशक्ति की आराधना करने की सलाह दी और कहा कि, ” हे राम ! यदि रावण शक्ति के प्रभाव से हमें डरा सकता है तो निश्चय ही आप महाशक्ति की पूर्ण सिद्धि प्राप्त करके उसे नष्ट कर पाने में समर्थं होंगे । अतः आप भी शक्ति की नव्य कल्पना करके उसकी पूजा करो । आपके साधना की सिद्धि जब तक प्राप्त नहीं हो पाती, तब तक युद्ध करना छोड दीजिए । तब तक विशाल सेना के नेता बनकर लक्ष्मण जी सबके बीच में रहेंगे, हनुमान, अंगद, नल-नील और स्वयं मैं भी उनके साथ रहूँगा । इसके अतिरिक्त जहाँ कहीं भी हमारी सेना के लिए भय का कोई कारण उपस्थित होगा; वहाँ सुग्रीव, विभीषण आदि अन्य पहुँच कर सहायता करेंगे ।’जाम्बवन्त की सलाह सुनकर सभा खिल गई।”
                             जाम्बवन्त के परामर्शानुसार श्रीराम ने हनुमानजी को १०८ सहस्त्रदल कमल लाने का आदेश दिया । हनुमानजी ने वैसा ही किया । सारी वानर सेना देवी आराधना के लिए आवश्यक साधन जुटाने तथा उसकी व्यवस्था करने में व्यस्त हो गये । सभी के मन में माँ दुर्गा के दर्शन की अपार लालसा थी । आठ दिन प्रभु श्रीराम युद्ध के मैदान से दूर माँ भगवती की पूजा में लीन हो गए । राम द्वारा महाशक्ति की आराधना के पाँच दिन क्रम से बीत गए । उनका मन भी उसी क्रम से विभिन्न साधना-चक्रों को पार करते हुए ऊपर ही ऊपर उठता गया । प्रत्येक मंत्रोच्चार के साथ एक कमल महाशक्ति को वे अर्पित कर देते । इस प्रकार वे अपनी साधनाहित किया जानेवाला मंत्र-जाप और स्तोत्र पाठ पूरा कर रहे थे । राम की साधना का जब आठवाँ दिन आया तो ऐसा लगने लगा जैसे उन्होंने सारे ब्रम्हांड को जीत लिया । यह देखकर देवता भी स्तब्ध-से होकर रह गए। परिणामस्वरूप राम के जीवन की समस्त कठिन परिस्थितियों के परिणाम नष्ट हो करके रह गए । अब पूजा का एक ही कमल महाशक्ति को अर्पित करने के लिए बाकी रह गया था । राम का मन सहस्रार देवी दुर्गा को भी पार कर जाने के लिए निरंतर देख रहा था । रात का दूसरा पहर बीत रहा था । तभी देवी दुर्गा गुप्त रूप से वहाँ स्वयं प्रकट हो गई और उन्होंने पात्र में रखे एक शेष कमल पुष्प को उठा लिया । देवी-साधना का अंतिम जाप करते हुए, राम ने जैसे ही अंतिम नील कमल लेने के लिए अपना हाथ बढाया, उनके हाथ कुछ भी न लगा । परिणामस्वरूप उनका साधना में स्थिर मन घबराहट के कारण चंचल हो उठा । वे अपनी निर्मल आँखें खोलकर ध्यान की स्थिति त्याग वास्तविक संसार में आए और देखा कि पूजा का पात्र रिक्त पडा है। यह जाप की पूर्णता का समय था, आसन को छोडने का अर्थ साधना को भंग करना था । अतः राम के दोनों नयन निराशा के आँसुओं से एक बार फिर भर गए ।
                            अपने जीवन को धिक्कारते हुए, राम कहने लगे,- ” मेरे इस जीवन को धिक्कार है जो कि प्रत्येक कदम पर अनेक प्रकार के विरोध ही पाता आ रहा है । उन साधनों को भी धिक्कार है कि जिनकी खोज में यह जीवन सदा ही भटकता रहा। हाय जानकी ! अब साधना पूरी न हो पाने की स्थिति में प्रिय जानकी का उद्धार संभव नहीं हो सकेगा ।” इसके अतिरिक्त राम का एक और मन भी था, जो कभी थकता न था और न ही अनुत्साह का अनुभव ही किया करता था । जो न तो दीनता प्रकट करना जानता था और न विपत्तियों के आगे कभी झुकना ही जानता था । राम का वह स्थिर मन माया के समस्त आवरणों को पार कर बडी तेज गति से बुद्धि के दुर्ग तक जा पहुँचा । अर्थात्‌ इस निराशाजनक स्थिति में भी राम ने बुद्धि-बल का आश्रय नहीं छोडा था । राम की अतीत की स्मृतियाँ जाग उठीं । उनमें विशेष भाव पाकर उनका मन प्रसन्न हो गया । ‘ बस, अब यही उपाय है ‘, राम ने बादलों की गंभीर गर्जना के स्वर में स्वयं से कहा- ” मेरी माता तुझे सदा ही कमलनयन कहकर पुकारा करती थीं । इस दृष्टि से मेरी आँख के रूप में दो नीले कमल अभी भी बाकी हैं । अतः हे माँ दुर्गे ! अपनी आँख रूपी एक कमल देकर मैं अपना यह मंत्र या स्तोत्र-पाठ करता हूँ।” ऐसा कहकर राम ने अपने तरकश की तरफ देखा, जिसमें एक ब्रह्म बाण झलक रहा था । राम ने लक-लक करते उस लंबे फल वाले बाण को अपने हाथ में ले लिया । अस्त्र अर्थात्‌ बाण को बाएँ हाथ में लेकर राम ने दाएँ हाथ से अपनी दायाँ नेत्र पकडा । वे उस नयन को कमल के स्थान पर अर्पित करने के लिए तैयार हो गए । जिस समय अपना नेत्र बेंधने का राम का पक्का निश्चय हो गया, सारा ब्रह्मांड भय से काँप उठा । उसी क्षण बडी शीघ्र गति से देवी दुर्गा भी प्रकट हो गई।”
                      महाशक्ति दुर्गा ने यह कहते हुए राम का हाथ थाम लिया कि धन्य हो । धैर्यपूर्वक साधना करनेवाले राम, तुम्हारा धर्म भी धन्य-धन्य है । तब राम ने पलकें उठाकर सामने देखा- अपने परमोज्ज्वल और तेजस्वी रूप में साक्षात्‌ दुर्गा देवी खडी थीं । उनका स्वरूप साकार ज्योति के समान था । दस हाथों में अनेक प्रकार के शस्त्रास्त्र सजे हुए थे । मुख पर मंद मुस्कान झिलमिला रही थी । उस मुस्कान को देखकर सारे संसार की शोभा जैसे लज्जित होकर रह जाती थी । उसके दाईं ओर लक्ष्मी और बायीं ओर युद्ध की वेश-भूषा में सजे हुए देव-सेनापति कार्तिकेय जी थे । मस्तक पर स्वयं भगवान शिव विराजमान थे । देवी के इस अद्‌भुत रूप को निहार मंद स्वरों में वंदना करते हुए राम प्रणाम करने के लिए उनके चरण-कमलों में झुक गए।
                 अपने सामने नतमस्तक राम को देखकर देवी ने आशीर्वाद और वरदान देते हुए कहा – ” हे नवीन पुरुषोत्तम राम ! निश्चय ही तुम्हारी जय होगी।” इतना कहकर वह महाशक्ति राम में विलीन हो गई । उन्हीं में अंतर्हित होकर रह गई ।
                  माँ के आशीर्वाद से ही राम की सेना में महाशक्ति का अविर्भाव हुआ और श्रीराम ने रावण का वध करके माता जानकी को उसके चंगुल से मुक्त किया । हमारे देश में प्रभु श्रीराम के इस समर्पित भक्ति के आदर्श को धारण करने वालों का अभाव दिखता है । भले ही आज माँ की पूजा में बडे-बडे देवियों की मूर्ति की स्थापना की जाती है, बडे-बडे पेंडाल लगाए जाते हैं परंतु माँ तो राम के भक्ति से ही प्रगट होती है । राम का आदर्श लिए बिना शक्ति की आराधना अधुरी है । शक्ति को धारण करने के लिए रामवत हृदय की आवश्यकता है । आइए, इस नवरात्री पर्व के इस पावन अवसर पर हम शक्ति साधना के व्रत को समाज में जागृत करने का संकल्प लें,…पर शुरुवात तो स्वयं से ही करनी होगी ।
                                                              !! जय मां शक्ति….जय श्री राम…जय हनुमान !!
                                                                                                                                                         – लखेश्वर चंद्रवंशी

हम पागल ही अच्छे हैं…

‘रौलट एक्ट’ ऐसा कानून था जिसके तहत अंग्रेज प्रशासन द्वारा किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार करने और बिना मुकदमे के बन्दीगृह में डाल दिया जाता। अंग्रेजी शासन के इस अन्यायपूर्ण नीति के विरुद्ध सन्‌ १९१९ को पंजाब के जलियांवाला बाग में एक बडी सभा का आयोजन किया गया। लगभग दस हजार संख्या से भरे उस भव्य सभा में जनरल डायर के आदेश पर चारों ओर से निहत्थे लोगों पर गोलियां चलाई गईं। हजारों की संख्या में लोग मारे गये। उस मैदान में अपने प्राण बचाने के लिए सैकडों लोग कुएँ में कूद गए। लाशों से भरे उस मैदान में रक्त से गीलीमिट्‌टी को देखकर हृदय पीडा से भर उठता । जलियांवाला बाग की इस घटना से एक बारह वर्षीय छात्र के कोमल हृदय में संवेदना की अग्नि धधक उठी । पानी की बोतल में रक्त से गीली उस मिट्‌टी को भरकर अश्रु भरे आंखों से वह लाशों को देख रहा था। शहीदों के रक्त को हाथ में लेकर उसने शपथ ली कि ‘ जब तक अंग्रेज अत्याचारियों से भारत को मुक्ति नहीं मिलेगी, मैं चैन से नहीं बैठूंगा।’ यही बालक सरदार भगत सिंह के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

भगत सिंह का जन्म २८ सितम्बर सन १९०७ को पंजाब के लायलपुर प्रान्त के बंगा नामक गाँव में हुआ था। देशभक्ति का पाठ उन्होंने अर्जुन पुत्र अभिमन्यु की तरह माँ के गर्भ से ही सीखना शुरू कर दिया था। भगतसिंह के पिता किशनसिंह स्वयं एक क्रांतिकारी थे। उनके घर ‘क्रांति निकेतन’ में कई क्रांतिकारी एकत्र होते थे। घर के वातावरण में देशभक्ति की चर्चा और गीतों का मेला लगा रहता था । एक बार खेत में खेलते हुए वह जमीन में पिस्तौल गाड रहा था। पिता ने उससे पूछा, “क्या कर रहे हो बेटा भगत” तो बालक ने तत्काल उत्तर दिया, “पिताजी मैं पिस्तौल बो रहा हूँ। जब इसका पेड बन जाएगा तो आम की तरह अनेक पिस्तौल लगेंगी। मैं सब पिस्तौलों को अपने मित्रों में बाँट दूँगा और हम सभी मित्र मिलकर अंग्रेजों को खत्म कर देंगे।”  देश के प्रति इतना चिन्तन क्या आज के बालकों में दृष्टिगोचर होता है ? क्या आज भारत की सुरक्षा, विकास और समृद्धि के लिए मौलिक विचारों का वातावरण हम समाज में बना पाते हैं ? क्या हम सच में देशभक्त हैं ? इस प्रकार के प्रश्न क्या कभी हम अपने आप से पूछते हैं ? यदि इसका उत्तर “हाँ” है तो स्वामी विवेकानंद की ये बातें भी हमें ध्यान में रखनी होंगी ।

स्वामीजी कहते हैं -“क्या तुम हृदय से अनुभव करते हो कि देव और ऋषियों की करोडों सन्तानें आज पशुतुल्य हो गयी हैं ? क्या तुम हृदय से अनुभव करते हो कि लाखों आदमी आज भूखे मर रहे हैं और लाखों लोग शताब्दियों से इसी भांति भूखे मरते आये हैं ? क्या तुम अनुभव करते हो कि अज्ञान के काले बादल ने सारे भारत को ढंक लिया है ? क्या तुम यह सब सोचकर बेचैन हो जाते हो ? क्या इस भावना ने तुमको निद्राहीन कर दिया है ? क्या यह भावना तुम्हारे रक्त के साथ मिलकर तुम्हारी धमनियों में बहती है ? क्या यह तुम्हारे हृदय के स्पन्दन से मिल गयी है ? क्या उसने तुम्हें पागल सा बना दिया है ? क्या देश की दुर्दशा की चिन्ता ही तुम्हारे ध्यान का एकमात्र विषय बन बैठी है ? और क्या इस चिन्ता में विभोर हो जाने से तुम अपने नाम-यश, पुत्र-कलत्र, धन-सम्पत्ति यहाँ तक कि अपने शरीर की भी सुध बिसर गये हो ? क्या तुमने ऐसा किया है ? यदि “हाँ” तो जानो कि तुमने देश भक्त होने की पहली सीढी पर पैर रखा है – हाँ, केवल पहली ही सीढी पर !” “राष्ट्रभक्त क्रांतिकारियों में भारत के प्रति श्रद्धा, समर्पण और त्याग की अटूट धारा प्रवाहित होती है । उन्होंने अपने आपको राष्ट्र के लिए अर्पित कर दिया। झाँसी रानी के एक चित्र को देखकर बालक सुखदेव ने माँ से पूछा, “माँ ! मैं भी वीर बनना चाहता हूँ। झाँसी की रानी की तरह अंग्रेजों से युद्ध करना चाहता हूँ।” पुत्र की इस बात को सुनकर उसकी माँ गद्‌गद्‌ हो गई। लाहौर के नेशनल कॉलेज में पढते समय सुखदेव ने अपने मन में संकल्प किया कि वे महाविद्यालय में ही अपने राष्ट्रभक्त मित्रों की टोली का निर्माण करेंगे। भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु तीनों में बडी मित्रता हो गई और क्रांति के इतिहास में एक नया अध्याय शुरू हो गया। भगतसिंह की मातृभाषा पंजाबी थी परंतु उन्होंने हिन्दी व देव भाषा संस्कृत का भी अध्ययन किया। अंग्रेजी भाषा में वे इतने प्रवीण थे कि अंग्रेजी भाषा में इतने कुशलतापूर्वक बयान दिया कि कानूनी अधिकारियों के मन में उनके प्रति प्रशंसा की भावना थी। 

भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु ये तीनों शारीरिक शक्ति, निष्ठा व भक्ति के कारण बडे-बडे पहलवानों को भी दोनों हाथों से उठाकर हवा में झुलाकर फेंक देते। (युवा आयु में देश सेवा की भावना का निर्माण होना गौरव की बात है) कॉलेज में रहकर ये लोग ड्रामा करते । राणा प्रताप, शिवाजी आदि पर आधारित नाटक प्रस्तुत कर महाविद्यालय में देश प्रेम का वातावरण बनाते । मैजिक लालटेन में वे शहीदों के चित्र दिखलाते थे। इस प्रकार के अनेक रोचक उपक्रमों के माध्यम से सरदार भगतसिंह की क्रांति की टोली बडी होती गई। इधर भगतसिंह के माता-पिता ने जब उनकी शादी की बात की तभी वे लाहौर से अपना घर छोडकर तत्काल कानपुर चले गये। वहीं उनका परिचय चन्द्रशेखर आजाद, बटुकेश्वर दत्त, जयदेव कपूर व कुन्दनलाल से हुआ । “हिन्दुस्तानी-समाजवादी-प्रजातंत्र सेना” नामक क्रांतिकारियों के इस संगठन में वे शामिल हो गए । ८ सितम्बर १९२८ को सारे देश के युवा क्रांतिकारी राजगुरु, भगतसिंह आदि फिरोजशाह कोटला मैदान में मिले और चन्द्रशेखर आजाद के नेतृत्व में भारत को स्वतंत्रता दिलाने के उद्देश्य से देशभर में क्रांति की लहर जागृत करने का कार्य प्रारंभ हुआ। ३० अक्टूबर १९२८ को जब साइमन कमीशन भारत में फैली अशान्ति की जाँच करने आया, तो उसके विरोध में काले झंडों का प्रदर्शन किया गया । निहत्थे लोगों पर पुलिस ने खूब लाठियाँ बरसाईं । लाला लाजपत राय ने अपनी छाती पर लाठियों के वार सहे और१७ नवम्बर को उनका देहान्त हो गया । चन्द्रशेखर आजाद के नेतृत्व में भगतसिंह और राजगुरु ने उक्त घटना के जिम्मेदार पुलिस अफसर सैंडर्स की उस समय गोली मार कर हत्या कर दी । विधान सभा में बम फेंकनाभगतसिंह और उनके साथियों ने निश्चित किया कि वीरतापूर्ण व साहसी आत्म बलिदान के कार्यों द्वारा ही जनता को ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध जागृत किया जा सकता है और इसी योजना के अंतर्गत “केन्द्रीय कार्यकारिणी सभा” में जब “पब्लिक सेफ्टी बिल” पर वाद-विवाद चल रहा था, तो भगतसिंह अपने साथी बटुकेश्वर दत्त के साथ विदेशी वेशभूषा में अन्दर बम, पिस्तौल और पर्चों आदि को छुपाकर दर्शक गैलरी में जाकर बैठ गए । जैसे ही बिल रखा जाने लगा इन वीर युवाओं ने विधानसभा के फर्श पर बम फेंके और पिस्तौल से कुछ गोलियाँ हवा में दागीं, तत्पश्चात हाथ से लिखे ‘बम का दर्शन’ की प्रतियाँ हॉल में फेंकनी शुरू कर दीं । सम्पूर्ण हॉल इन जवानों की क्रांति के जय-जयकार से गूंज उठा । भगतसिंह एवं बटुकेश्वर दत्त का मुख्य लक्ष्य था आत्मबलिदान । इसलिए गोलियाँ दागने के बाद उन्होंने अपनी पिस्तौल फेंक दी और तब तक वही खडे रहे जब तक उन्हें गिरफ्तार नहीं कर लिया गया । सैंडर्स की हत्या, विधानसभा में बम फेंकने का दोषी और बम बनाने का आरोप लगाकर भगतसिंह सहित लगभग५२ क्रांतिकारियों को जेल में डाल दिया गया । जेल में कैदियों के साथ क्रूर व्यवहार किया जाता था। इसके विरोध में क्रांतिकारियों ने उपवास किया । लगातार ६५दिन तक उपवास करने वाले भगतसिंह को अनेक प्रकार की यातनाएँ दी गईं । साम-दाम-दण्ड-भेद सारे प्रयत्न विफल रहे। सारे देश में भगतसिंह की चर्चा होने लगी। जन-जन में क्रांति की भावना जाग उठी और लोगों ने इन क्रांतिकारियों के विरुद्ध गवाही देने से इंकार कर दिया । इस बाधा को पार करने के लिए अंग्रेज सरकार ने एक अध्यादेश जारी किया । जिसमें लाहौर षड्यंत्र केस के कैदियों पर मुकदमा चलाने के लिए एक विशेष अदालत का प्रबंध किया गया । जिसके अंतर्गत कोई भी न्यायिक तरीका उनके कार्यों में बाधा नहीं डाल सकता था और जिसके द्वारा दिए गए फैसले की कोई अपील भी नहीं हो सकती थी। इस अदालत ने भगत सिंह और उनके साथियों सुखदेव और राजगुरु को फांसी की सजा सुना दी । इतना होने पर तीनों क्रांतिकारियों को दुख था कि वे अपने राष्ट्र को स्वतंत्र कराने के लिए कुछ अधिक नहीं कर पाये । क्रांतिकारियों की फांसी की बात सुनकर कुछ कांग्रेसी नेता उनकी हंसी उडा रहे थेऔर कहते कि ये क्रांतिकारी कहलाने वाले लोग पागल हैं। इनको स्वतंत्रता का आदर्श रास्ता पता नहीं है । इसका जवाब देते हुए एक क्रांतिकारी ने कहा, “हमारे इन बिगडे दिमागों में बलिदानी विचार अच्छे हैं, हमें पागल ही रहने दो, हम पागल ही अच्छे हैं।”

सचमुच लोग सिरफिरे ही थे। सांसरिक मोह, व्यक्तिगत सुख, सारी इच्छाओं को जिन्होंने ठोकर मारकर उडा दिया और राष्ट्र की बलिवेदी पर अपना तन-मन-धन, घर-परिवार सर्वस्व लुटा दिया । उनके इस राष्ट्रभक्ति को भला हमारी छोटी बुद्धि क्या समझ पायेगी ? भगतसिंह सहित अनेक क्रांतिकारियों को नास्तिक कहने वाले लोग ये भूल जाते हैं कि क्रांतिकारियों के मन में भारतमाता के प्रति अटूट आस्था थी। उन्होंने किसी देवी-देवता की भले ही पूजा-अर्चना नहीं की, परंतु दुर्गा स्वरूपा भारतमाता के लिए उन्होंने अपने प्राण न्यौछावर कर दिये। इस भारत माता के पुजारियों के जागृत देवता भारतवासी थे । वे उनके सुख-दुख को देखकर दुखी होते और देश की दुर्दशा को देखकर ही तो उन्होंने अपनी जवानी देश हित में अर्पित की। हमें भी भारतभक्त भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की भांति कार्य करना होगा। केवल व्यक्तिगत सुख के लिए पढाई और कमाई करने वाले स्वार्थी व्यक्ति बनने से अच्छा तो क्रांतिकारियों की तरह त्याग व सेवा की वृत्ति धारण करने वाला पागल बनना ज्यादा श्रेष्ठ है। महाविद्यालय के प्राध्यापक व युवाओं ने मिलकर अपने महाविद्यालयों में ऐसे राष्ट्रभक्तों की टोली का निर्माण करना चाहिए। महिलाएं अपने घर व कालोनियों में संस्कारमय वातावरण का निर्माण कर सकती हैं। कुल मिलाकर इस भ्रष्टाचार, आंतरिक सुरक्षा और भोगवाद की चुनौतियों से जूझते भारत को पुनः क्रांतिकारियों की तरह राष्ट्रभक्ति से युक्त पागलों की आवश्यकता है। 

२३ मार्च को भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरु के बलिदान दिवस के उपलक्ष्य में हम सधे राष्ट्रभक्त होने का संकल्प लें। इस वर्ष इस दिन वर्ष प्रतिपदा है और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आ सरसंघचालक परम पूजनीय डॉ. हेडगेवार की भी जयन्ती है । हिन्दू नववर्ष के इस पावन पर्व पर हिन्दू राष्ट्र को विश्वगुरु के रूप में प्रतिष्ठित होते देखना डॉ.हेडगेवार का स्वप्न था । उनका यह स्वप्न हमारा ध्येय बनें तथा संगठन के सूत्र में बंधकर हम अपने जीवन को सफल बनाए । भारतीय नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं…

                                                                     -लखेश्वर चंद्रवन्शी  ‘लखेश’

                                                                                    नागपुर

आज है होली..

 

 

आज है होली

मन चाहता है

करे सभी से हंसी ठिठोली |

 कोई रंग खरीद रहा है,

 कोई खरीद रहा गुलाल |

 कोई बजा रहा है बाजा,

 कोई पूछ रहा सवाल |

 कि, आज और कल की तैयारी में

 कौन-सा काम रह गया बाकी ?

 रंग लगेगा, पकवान बनेंगे

कहीं पर फाग गूंजेगा

 या दिखेगी कोई झांकी ?

इन प्रश्नों पर

क्या जरुरी है चिंतन करना ?

 या अपने जीवन के इस अनमोल क्षण में

 आवश्यक है आत्ममंथन करना !!!

 क्योँ मनाते हैं हम होली ?

 केवल हुडदंग मचाने को,

 डीजे की शोर में

 केवल फूहड़ नाचने-गाने को…

 शराब पीने को…भांग खाने को…

 जबरदस्ती रंग ज़माने को

 या फिर होली के नाम पर

 अभद्र व्यवहार का दाग लगाने को….?

  क्यों ?

ये प्रश्न पूछ रहा है

विश्व की सर्वश्रेष्ठ हिन्दू संस्कृति,

 भक्त प्रल्हाद की भक्ति

और राधा-कृष्ण की पवित्र स्मृति |

 क्या स्मरण है आपको…

 हिरण्यकश्यप का वह कुशासन |

 अहंकार से पूर्ण,  अधर्म का सिंहासन |

पांच वर्ष के अपने बेटे को

श्री हरि विष्णु के नाम जप करने पर

देता था जो दंड |

कभी खौलते तेल की कढाई में

 प्रल्हाद को वह देता डाल |

 कभी पहाड़ से फ़ेंक देता उसे

 कभी विषैले सर्पों की पहना देता माल |

 कभी तलवारों से करता वार

 तो कभी समुद्र में देता डाल |

 पर धन्य प्रल्हाद की भक्ति

पिता के इस भयंकर प्रताड़नाओं से

 तनिक न हुआ वह भयभीत |

खुद जपता “ॐ नमों भगवते वासुदेवाय …”

औरों को भी दी प्रभु भक्ति की सीख |

इस चक्कर में हिरण्यकश्यप की बहन

 होलिका भी जल गई |

 रक्षा की प्रभु ने प्रल्हाद की,

 और इससे दानवों में भी भक्ति जाग गई |

 छोटे बालक को बचाने

श्री हरि विष्णु नृसिंह बनकर आये |

 हिरण्यकश्यप को मार प्रभु ने

 प्रल्हाद को हरिरूप का दर्शन दिए कराये |

 क्या हम प्रल्हाद को आदर्श अपना मानते हैं ?

 या होली के इस महापर्व को

महज मौज मस्ती का त्यौहार जानते हैं ?

 ये हम पर निर्भर है

 हमें किस मार्ग पर चलना है…

 प्रल्हाद की भक्ति को स्मरण करना है…

या हुडदंगी बनकर अपनी संस्कृति को छलना है ?

                                                                                                                     – लखेश चंद्रवंशी