हम पागल ही अच्छे हैं…

‘रौलट एक्ट’ ऐसा कानून था जिसके तहत अंग्रेज प्रशासन द्वारा किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार करने और बिना मुकदमे के बन्दीगृह में डाल दिया जाता। अंग्रेजी शासन के इस अन्यायपूर्ण नीति के विरुद्ध सन्‌ १९१९ को पंजाब के जलियांवाला बाग में एक बडी सभा का आयोजन किया गया। लगभग दस हजार संख्या से भरे उस भव्य सभा में जनरल डायर के आदेश पर चारों ओर से निहत्थे लोगों पर गोलियां चलाई गईं। हजारों की संख्या में लोग मारे गये। उस मैदान में अपने प्राण बचाने के लिए सैकडों लोग कुएँ में कूद गए। लाशों से भरे उस मैदान में रक्त से गीलीमिट्‌टी को देखकर हृदय पीडा से भर उठता । जलियांवाला बाग की इस घटना से एक बारह वर्षीय छात्र के कोमल हृदय में संवेदना की अग्नि धधक उठी । पानी की बोतल में रक्त से गीली उस मिट्‌टी को भरकर अश्रु भरे आंखों से वह लाशों को देख रहा था। शहीदों के रक्त को हाथ में लेकर उसने शपथ ली कि ‘ जब तक अंग्रेज अत्याचारियों से भारत को मुक्ति नहीं मिलेगी, मैं चैन से नहीं बैठूंगा।’ यही बालक सरदार भगत सिंह के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

भगत सिंह का जन्म २८ सितम्बर सन १९०७ को पंजाब के लायलपुर प्रान्त के बंगा नामक गाँव में हुआ था। देशभक्ति का पाठ उन्होंने अर्जुन पुत्र अभिमन्यु की तरह माँ के गर्भ से ही सीखना शुरू कर दिया था। भगतसिंह के पिता किशनसिंह स्वयं एक क्रांतिकारी थे। उनके घर ‘क्रांति निकेतन’ में कई क्रांतिकारी एकत्र होते थे। घर के वातावरण में देशभक्ति की चर्चा और गीतों का मेला लगा रहता था । एक बार खेत में खेलते हुए वह जमीन में पिस्तौल गाड रहा था। पिता ने उससे पूछा, “क्या कर रहे हो बेटा भगत” तो बालक ने तत्काल उत्तर दिया, “पिताजी मैं पिस्तौल बो रहा हूँ। जब इसका पेड बन जाएगा तो आम की तरह अनेक पिस्तौल लगेंगी। मैं सब पिस्तौलों को अपने मित्रों में बाँट दूँगा और हम सभी मित्र मिलकर अंग्रेजों को खत्म कर देंगे।”  देश के प्रति इतना चिन्तन क्या आज के बालकों में दृष्टिगोचर होता है ? क्या आज भारत की सुरक्षा, विकास और समृद्धि के लिए मौलिक विचारों का वातावरण हम समाज में बना पाते हैं ? क्या हम सच में देशभक्त हैं ? इस प्रकार के प्रश्न क्या कभी हम अपने आप से पूछते हैं ? यदि इसका उत्तर “हाँ” है तो स्वामी विवेकानंद की ये बातें भी हमें ध्यान में रखनी होंगी ।

स्वामीजी कहते हैं -“क्या तुम हृदय से अनुभव करते हो कि देव और ऋषियों की करोडों सन्तानें आज पशुतुल्य हो गयी हैं ? क्या तुम हृदय से अनुभव करते हो कि लाखों आदमी आज भूखे मर रहे हैं और लाखों लोग शताब्दियों से इसी भांति भूखे मरते आये हैं ? क्या तुम अनुभव करते हो कि अज्ञान के काले बादल ने सारे भारत को ढंक लिया है ? क्या तुम यह सब सोचकर बेचैन हो जाते हो ? क्या इस भावना ने तुमको निद्राहीन कर दिया है ? क्या यह भावना तुम्हारे रक्त के साथ मिलकर तुम्हारी धमनियों में बहती है ? क्या यह तुम्हारे हृदय के स्पन्दन से मिल गयी है ? क्या उसने तुम्हें पागल सा बना दिया है ? क्या देश की दुर्दशा की चिन्ता ही तुम्हारे ध्यान का एकमात्र विषय बन बैठी है ? और क्या इस चिन्ता में विभोर हो जाने से तुम अपने नाम-यश, पुत्र-कलत्र, धन-सम्पत्ति यहाँ तक कि अपने शरीर की भी सुध बिसर गये हो ? क्या तुमने ऐसा किया है ? यदि “हाँ” तो जानो कि तुमने देश भक्त होने की पहली सीढी पर पैर रखा है – हाँ, केवल पहली ही सीढी पर !” “राष्ट्रभक्त क्रांतिकारियों में भारत के प्रति श्रद्धा, समर्पण और त्याग की अटूट धारा प्रवाहित होती है । उन्होंने अपने आपको राष्ट्र के लिए अर्पित कर दिया। झाँसी रानी के एक चित्र को देखकर बालक सुखदेव ने माँ से पूछा, “माँ ! मैं भी वीर बनना चाहता हूँ। झाँसी की रानी की तरह अंग्रेजों से युद्ध करना चाहता हूँ।” पुत्र की इस बात को सुनकर उसकी माँ गद्‌गद्‌ हो गई। लाहौर के नेशनल कॉलेज में पढते समय सुखदेव ने अपने मन में संकल्प किया कि वे महाविद्यालय में ही अपने राष्ट्रभक्त मित्रों की टोली का निर्माण करेंगे। भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु तीनों में बडी मित्रता हो गई और क्रांति के इतिहास में एक नया अध्याय शुरू हो गया। भगतसिंह की मातृभाषा पंजाबी थी परंतु उन्होंने हिन्दी व देव भाषा संस्कृत का भी अध्ययन किया। अंग्रेजी भाषा में वे इतने प्रवीण थे कि अंग्रेजी भाषा में इतने कुशलतापूर्वक बयान दिया कि कानूनी अधिकारियों के मन में उनके प्रति प्रशंसा की भावना थी। 

भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु ये तीनों शारीरिक शक्ति, निष्ठा व भक्ति के कारण बडे-बडे पहलवानों को भी दोनों हाथों से उठाकर हवा में झुलाकर फेंक देते। (युवा आयु में देश सेवा की भावना का निर्माण होना गौरव की बात है) कॉलेज में रहकर ये लोग ड्रामा करते । राणा प्रताप, शिवाजी आदि पर आधारित नाटक प्रस्तुत कर महाविद्यालय में देश प्रेम का वातावरण बनाते । मैजिक लालटेन में वे शहीदों के चित्र दिखलाते थे। इस प्रकार के अनेक रोचक उपक्रमों के माध्यम से सरदार भगतसिंह की क्रांति की टोली बडी होती गई। इधर भगतसिंह के माता-पिता ने जब उनकी शादी की बात की तभी वे लाहौर से अपना घर छोडकर तत्काल कानपुर चले गये। वहीं उनका परिचय चन्द्रशेखर आजाद, बटुकेश्वर दत्त, जयदेव कपूर व कुन्दनलाल से हुआ । “हिन्दुस्तानी-समाजवादी-प्रजातंत्र सेना” नामक क्रांतिकारियों के इस संगठन में वे शामिल हो गए । ८ सितम्बर १९२८ को सारे देश के युवा क्रांतिकारी राजगुरु, भगतसिंह आदि फिरोजशाह कोटला मैदान में मिले और चन्द्रशेखर आजाद के नेतृत्व में भारत को स्वतंत्रता दिलाने के उद्देश्य से देशभर में क्रांति की लहर जागृत करने का कार्य प्रारंभ हुआ। ३० अक्टूबर १९२८ को जब साइमन कमीशन भारत में फैली अशान्ति की जाँच करने आया, तो उसके विरोध में काले झंडों का प्रदर्शन किया गया । निहत्थे लोगों पर पुलिस ने खूब लाठियाँ बरसाईं । लाला लाजपत राय ने अपनी छाती पर लाठियों के वार सहे और१७ नवम्बर को उनका देहान्त हो गया । चन्द्रशेखर आजाद के नेतृत्व में भगतसिंह और राजगुरु ने उक्त घटना के जिम्मेदार पुलिस अफसर सैंडर्स की उस समय गोली मार कर हत्या कर दी । विधान सभा में बम फेंकनाभगतसिंह और उनके साथियों ने निश्चित किया कि वीरतापूर्ण व साहसी आत्म बलिदान के कार्यों द्वारा ही जनता को ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध जागृत किया जा सकता है और इसी योजना के अंतर्गत “केन्द्रीय कार्यकारिणी सभा” में जब “पब्लिक सेफ्टी बिल” पर वाद-विवाद चल रहा था, तो भगतसिंह अपने साथी बटुकेश्वर दत्त के साथ विदेशी वेशभूषा में अन्दर बम, पिस्तौल और पर्चों आदि को छुपाकर दर्शक गैलरी में जाकर बैठ गए । जैसे ही बिल रखा जाने लगा इन वीर युवाओं ने विधानसभा के फर्श पर बम फेंके और पिस्तौल से कुछ गोलियाँ हवा में दागीं, तत्पश्चात हाथ से लिखे ‘बम का दर्शन’ की प्रतियाँ हॉल में फेंकनी शुरू कर दीं । सम्पूर्ण हॉल इन जवानों की क्रांति के जय-जयकार से गूंज उठा । भगतसिंह एवं बटुकेश्वर दत्त का मुख्य लक्ष्य था आत्मबलिदान । इसलिए गोलियाँ दागने के बाद उन्होंने अपनी पिस्तौल फेंक दी और तब तक वही खडे रहे जब तक उन्हें गिरफ्तार नहीं कर लिया गया । सैंडर्स की हत्या, विधानसभा में बम फेंकने का दोषी और बम बनाने का आरोप लगाकर भगतसिंह सहित लगभग५२ क्रांतिकारियों को जेल में डाल दिया गया । जेल में कैदियों के साथ क्रूर व्यवहार किया जाता था। इसके विरोध में क्रांतिकारियों ने उपवास किया । लगातार ६५दिन तक उपवास करने वाले भगतसिंह को अनेक प्रकार की यातनाएँ दी गईं । साम-दाम-दण्ड-भेद सारे प्रयत्न विफल रहे। सारे देश में भगतसिंह की चर्चा होने लगी। जन-जन में क्रांति की भावना जाग उठी और लोगों ने इन क्रांतिकारियों के विरुद्ध गवाही देने से इंकार कर दिया । इस बाधा को पार करने के लिए अंग्रेज सरकार ने एक अध्यादेश जारी किया । जिसमें लाहौर षड्यंत्र केस के कैदियों पर मुकदमा चलाने के लिए एक विशेष अदालत का प्रबंध किया गया । जिसके अंतर्गत कोई भी न्यायिक तरीका उनके कार्यों में बाधा नहीं डाल सकता था और जिसके द्वारा दिए गए फैसले की कोई अपील भी नहीं हो सकती थी। इस अदालत ने भगत सिंह और उनके साथियों सुखदेव और राजगुरु को फांसी की सजा सुना दी । इतना होने पर तीनों क्रांतिकारियों को दुख था कि वे अपने राष्ट्र को स्वतंत्र कराने के लिए कुछ अधिक नहीं कर पाये । क्रांतिकारियों की फांसी की बात सुनकर कुछ कांग्रेसी नेता उनकी हंसी उडा रहे थेऔर कहते कि ये क्रांतिकारी कहलाने वाले लोग पागल हैं। इनको स्वतंत्रता का आदर्श रास्ता पता नहीं है । इसका जवाब देते हुए एक क्रांतिकारी ने कहा, “हमारे इन बिगडे दिमागों में बलिदानी विचार अच्छे हैं, हमें पागल ही रहने दो, हम पागल ही अच्छे हैं।”

सचमुच लोग सिरफिरे ही थे। सांसरिक मोह, व्यक्तिगत सुख, सारी इच्छाओं को जिन्होंने ठोकर मारकर उडा दिया और राष्ट्र की बलिवेदी पर अपना तन-मन-धन, घर-परिवार सर्वस्व लुटा दिया । उनके इस राष्ट्रभक्ति को भला हमारी छोटी बुद्धि क्या समझ पायेगी ? भगतसिंह सहित अनेक क्रांतिकारियों को नास्तिक कहने वाले लोग ये भूल जाते हैं कि क्रांतिकारियों के मन में भारतमाता के प्रति अटूट आस्था थी। उन्होंने किसी देवी-देवता की भले ही पूजा-अर्चना नहीं की, परंतु दुर्गा स्वरूपा भारतमाता के लिए उन्होंने अपने प्राण न्यौछावर कर दिये। इस भारत माता के पुजारियों के जागृत देवता भारतवासी थे । वे उनके सुख-दुख को देखकर दुखी होते और देश की दुर्दशा को देखकर ही तो उन्होंने अपनी जवानी देश हित में अर्पित की। हमें भी भारतभक्त भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की भांति कार्य करना होगा। केवल व्यक्तिगत सुख के लिए पढाई और कमाई करने वाले स्वार्थी व्यक्ति बनने से अच्छा तो क्रांतिकारियों की तरह त्याग व सेवा की वृत्ति धारण करने वाला पागल बनना ज्यादा श्रेष्ठ है। महाविद्यालय के प्राध्यापक व युवाओं ने मिलकर अपने महाविद्यालयों में ऐसे राष्ट्रभक्तों की टोली का निर्माण करना चाहिए। महिलाएं अपने घर व कालोनियों में संस्कारमय वातावरण का निर्माण कर सकती हैं। कुल मिलाकर इस भ्रष्टाचार, आंतरिक सुरक्षा और भोगवाद की चुनौतियों से जूझते भारत को पुनः क्रांतिकारियों की तरह राष्ट्रभक्ति से युक्त पागलों की आवश्यकता है। 

२३ मार्च को भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरु के बलिदान दिवस के उपलक्ष्य में हम सधे राष्ट्रभक्त होने का संकल्प लें। इस वर्ष इस दिन वर्ष प्रतिपदा है और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आ सरसंघचालक परम पूजनीय डॉ. हेडगेवार की भी जयन्ती है । हिन्दू नववर्ष के इस पावन पर्व पर हिन्दू राष्ट्र को विश्वगुरु के रूप में प्रतिष्ठित होते देखना डॉ.हेडगेवार का स्वप्न था । उनका यह स्वप्न हमारा ध्येय बनें तथा संगठन के सूत्र में बंधकर हम अपने जीवन को सफल बनाए । भारतीय नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं…

                                                                     -लखेश्वर चंद्रवन्शी  ‘लखेश’

                                                                                    नागपुर

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4 thoughts on “हम पागल ही अच्छे हैं…

    1. आपकी हार्दिक प्रतिक्रिया के लिए विनम्र धन्यवाद् |
      बौद्धिक क्षत्रिय बनने और बनाने का यह है सार्थक प्रयत्न |
      आपकी इस क्रन्ति भावधारा में सहर्ष स्वागत है…
      मंगल कामनाओं के साथ….
      वन्दे मातरम ….

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