सज्जन जन तो है वही…

सज्जनों को शक्तिशाली और शक्तिशालियों को सज्जन बनाना, यही हमारे  कार्य का मूल है | – श्री भैय्याजी जोशी

          किसी की वाणी में ऐसी अद्भुत शक्ति होती है, जो सामान्य मनुष्य के जीवन को असामान्य बना देता है । ऐसे मनुष्यों का सानिध्य में कुछ क्षण बिताने पर मन प्रसन्न हो जाता है । ऐसे प्रसन्नता युक्त वातावरण की अनुभूति मुंबई में हुई । जहां देशभर के ३०० से अधिक कार्यकर्ता एकत्रित हुए थे । ये सभी स्वामी विवेकानन्द की सार्ध शती समारोह की तैयारी के लिए चिन्तन बैठक में आए थे । इस अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह माननीय श्री भैय्याजी जोशी और विवेकानन्द केन्द्र के राष्ट्रीय अध्यक्ष माननीय श्री परमेश्वरन् जी का मार्गदर्शन प्राप्त हुआ ।

          बैठक के उद्घाटन सत्र में श्री भैय्याजी जोशी ने स्वामी विवेकानन्द के मर्मस्पर्शी विचारों की प्रासंगिकता का महत्व बताया और कहा कि स्वामीजी की सार्ध शती से हमें क्या साध्य करना है ? देश के कोने-कोने में समाज के सभी घटकों में स्वामी विवेकानन्द के संदेशों को पहुँचाना, मतलब करना क्या है ? केवल कार्यक्रम करने से लक्ष्य की पूर्ति तो नहीं हो जाती । अत: आयोजन के उद्देश्य को सतत् स्मरण रखना होगा । उन्होंने कहा कि “समाज के सभी सज्जन लोगों को हमें शक्तिशाली बनाना है और जो शक्तिशाली हैं उन्हें सज्जन बनाना है । इस बात का स्मरण रखेंगे तो हम अधिकाधिक कार्यकर्ताओं का निर्माण कर सकेंगे ।”
          “सज्जनों को शक्तिशाली और शक्तिशालियों को सज्जन बनाना”, सभी समस्याओं को सुलझाने का कितना मार्मिक समाधान है यह ? अद्वितीय और अद्भुत विचार ! जिसने सुन लिया, वह कभी भूल ही नहीं सकता । बस, इस एक पंक्ति ने वहाँ उपस्थित सभी कार्यकर्ताओं को यह सोचने के लिए मजबूर कर दिया कि श्री भैय्याजी जोशी का चिन्तन का स्तर कितना ऊँचा है?

                   उनके विचारों के प्रवाह में गोते लगाते हुए यदि हम अपने देश के इतिहास पर दृष्टि डालेंगे तो बहुत सारी बातें स्पष्ट हो जाती हैं । आर्य चाणक्य ने ठीक ही कहा था कि समाज की अवनति दुर्जनों की सक्रियता से अधिक सज्जनों की निष्क्रियता के वजह से होती है । इसलिए समाज में रहने वाले सभी दुर्जनों का नाश कर दिया जाए तो समाज सुखी हो जाएगा, ऐसा सभी को लगता है। लेकिन सज्जनों को बचाने के लिए केवल दुर्जनों का नाश, यह कोई समाधान कारक उपाय नहीं है । 

          मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने रावण को युद्ध से पहले उसे सुधरने का अवसर प्रदान किया था । हमारे देश में शत्रुओं के पास राजदूत भेजने का अर्थ ही है- सुधरने का अवसर देना, शांति स्थापित करना । राम के जीवन में हम देखते हैं कि कैसे उन्होंने सुग्रीव को मित्र बनाया । वानरराज बाली सुग्रीव से अधिक शक्तिशाली था । उसने सुग्रीव को राज्य से बाहर निकाल दिया था । सुग्रीव जैसे सज्जन व्यक्ति को शक्तिशाली बनाने के लिए ही तो श्रीराम ने उससे मित्रता की थी । तब जाकर वानरों एवं भालूओं की सेना का संगठन तैयार हुआ और सज्जनों की सामूहिक शक्ति से रावण का संहार हुआ ।
          जब-जब दुर्जन शक्ति सज्जनों पर हावी होने लगे तो सज्जनों को उनसे अधिक शक्तिशाली बनाना होता है । यह एक मार्ग है । परंतु शक्तिशाली दुर्जनों को सज्जन बनाना भी तो जरूरी है । इस कार्य को हम भूल जाते हैं । परंतु भगवान बुद्ध को देखिए उन्होंने कैसे अंगुलिमाल को सज्जन बनाया । चाणक्य ने शक्तिशाली राक्षस को कैसे चन्द्रगुप्त शासन का अमात्य घोषित कर उसे सही मार्ग पर लाया । महारानी लक्ष्मीबाई ने डाकू समरसिंह को और वीर सावरकर ने मदनलाल धींगरा को भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का महान क्रांतिकारी बना दिया । यह आदर्श है शक्तिशालियों को सज्जन बनाने का । परंतु संत कबीर भयभीत लोगों को सज्जन मानते ही नहीं । वे कहते हैं-                                           सज्जन जन तो है वही, जो ढाल सरीखा होय ।

 दुःख में तो आगे रहे, सुख में पीछे होय ॥

          युद्ध के दौरान शत्रु के तलवार के वार से ढाल ही तो रक्षा करता है । संत कबीर के अनुसार तो सज्जन ढाल की तरह होता है, जो प्रत्येक प्रहार पर अन्यों की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहता है ! अब हमें तय करना है कि हम सज्जन हैं या नहीं ।    

भीष्म प्रतिज्ञा, भीम पराक्रम और भगीरथ प्रयास  – श्री पी. परमेश्वरन् जी

           बैठक का समापन सत्र भी उद्घाटन की तरह उत्साहवर्धक और प्रेरणादायक था । विवेकानन्द केन्द्र के राष्ट्रीय अध्यक्ष मा. श्री पी. परमेश्वरन् जी ने समापन सत्र में कार्यकर्ताओं को आनेवाले स्वामी विवेकानन्द की सार्ध शती समारोह के लिए मानसिक एवं शारीरिक दृष्टि से सुदृढ रहने का आह्वान किया और कहा कि अगले दो वर्ष तक एक दिन भी किसी कार्यकर्ता को बिमार नहीं होना है । स्वस्थ शरीर, दृढ मनोबल और उदात्त संकल्प ही हमें शक्ति प्रदान करता है ।      उन्होंने कहा कि स्वामी विवेकानन्द की सार्ध शती समारोह के अवसर पर सम्पूर्ण भारत को जाग्रत करना है । भारत जागेगा तभी विश्व का कल्याण होगा । इसलिए इस समारोह का ध्येय वाक्य ‘‘ भारत जागो ! विश्व जगाओ !!” रखा है । इस समारोह में विजयी होने के लिए चाहिए भीष्म प्रतिज्ञा, भीम पराक्रम और भगीरथ प्रयास ! मा. परमेश्वरन् जी के इस शक्तिदायी विचारों ने कार्यकर्ताओं को स्वामी विवेकानन्द की सार्ध शती में भारतभक्तों की सक्रिय भूमिका के महत्व को उजागर कर दिया ।                                           मा. परमेश्वरन् जी तथा मा. भैय्याजी जोशी के ये बहुमूल्य तथा अविस्मरणीय प्रेरणादायी विचार एक पल के लिए भी हमसे विस्मृत न हो। अपने मन, बुद्धि शरीर और आत्मा से हम सदैव तत्पर रहें, यही समय की आवश्यकता है ।

                                                                                                                                                                                               – लखेश्वर चंद्रवन्शी

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