गलती का अहसास…

लक्ष्य महत्त्वपूर्ण है…मनुष्य नहीं ! पर मनुष्य बिना कार्य कैसे संभव है ? इसलिए मनुष्य जोडे…तोडे नहीं…साथ ही अपने कार्यकर्ता के मन की दशा और दिशा की प्रत्येक दृष्टि से हमें विचार करना चाहिए ! इस बात को अधिक स्पष्टता से समझने की दृष्टि से सादर है मराठा इतिहास का एक प्रसंग…

कार्यकर्ता अपना कार्यकर्तापन किसी भी स्थिति में न भूलें !
            जब बाजीराव पेशवा पद पर आरूढ थे, तब सारे भारत में मराठों का दबदबा था । बाजीराव के पराक्रम नीति-न्याय से मराठों का सिर गर्व से ऊँचा था। एक बार उनके मित्र राज्य ने शत्रुओं से मुकाबला करने के लिए उन्हें बुलाया । मराठों की सेना मित्र-राज्य की सहायता के लिए चल पडी। मार्ग में पडाव डाला गया। आस-पास किसानों के खेत थे। एक दिन सेना नायक कहीं गये हुए थे। मराठा सेना के कुछ सैनिकों ने खेतों की कुछ फसलें काट ली और घोडों को खिला दी। परेशान किसान शिविर में आए और उन्होंने सेना के उच्च अधिकारी पेशवा बाजीराव से अपनी तकलीफ कहीं। बाजीराव ने शिकायत की जाँच पडताल शुरु की दी। ज्ञात होने पर उन्होंने उद्दंड सैनिकों को फटकारा। ये सैनिक मल्हारराव होलकर के थे, उन्होंने बाजीराव को अपने सैनिकों पर फटकार लगाते देखा, तो वे सहन न कर सके। क्रूद्ध होकर उन्होंने बाजीराव पर एक बडा-सा पत्थर दे मारा। उनके माथे से खून बहने लगा। बाजीराव लौट आए।
              सेनानायक जब शिविर में वापस आए तो उन्हें घटना का वृतांत मालूम हुआ। दोष मल्हार राव का था। उन्हें दंड देने तथा किसानों की सहायता करने के लिए सेनाधिकारियों की बैठक हुई। सैनिकों को दंडित किया गया। ऐसा तय हुआ कि मल्हार राव बाजीराव से क्षमा मांगें। मल्हार राव ने इसे सामूहिक अपमान समझा। उसने अपने मन में यह गांठ बांध ली कि इस अपमान का बदला बाजीराव से अवश्य लेना है। सोचा कि बाजीराव जब कभी एकांत में मिले तो उन्हें वहीं मौत के घाट उतार दिया जाए।


           एक दिन ऐसा ही अवसर मिला। बाजीराव एकांत में टहल रहे थे। बाजीराव को रोकते हुए होल्कर ने तलवार निकाली, और कहा- ”रूक रे नरकीटक ! आज मैं अपने अपमान का बदला लेकर रहूँगा।” तब बाजीराव ने मल्हार राव के पास पहूँचकर कहा- ”मल्हार राव ! तुम वीर हो और हम सब एक लक्ष्य लेकर निकले हैं। यदि मुझे मारकर ही तुम शांत हो सकते हो तो बेहिचक मार डालो, पर मराठा जाति के लक्ष्य मार्ग में फूट के कांटे मत डालो।” इस दूरदर्शिता पर मल्हार राव पिघल गया और उसने एकांत में बाजीराव के पैरों में गिरकर क्षमा मांगी।
                 ”मैं कार्यकर्ता हूं”, यह बात तो एकदम सही है । लेकिन कभी-कभी हम अपने कार्यकर्ता होने के भाव को भूल जाते हैं । जब किसी बात पर हमारी आपस में कुछ तनातनी हो जाती है तब उस समय हम अपने लक्ष्य को भूल व्यर्थ विवादों में उलझ जाते हैं, जो न संगठन के लिए ठीक है न अपने लिए ! जहां तक संभव हो झगडों को टालना चाहिए । इसका श्रेष्ठ माध्यम है अपने वाणी पर संयम रखना । कब, कहाँ, क्यों, कैसे, किससे और क्या बोलें ? इस पर हमारा चिन्तन होना चाहिए । यदि गलती हो तो स्वीकार कर क्षमा मांग लें और बडे अधिकारी विशाल ह्रदय से उसे स्वीकार कर लें । बात बन जाती है ।
स्मरण रहे –
             संगठन में व्यक्तिगत द्वेष और कटु वचन कार्यकर्ता को संगठन के महान लक्ष्य से दूर ले जाता है । इसलिए कार्यकर्ता सावधान !
                                                                                           – लखेश्वर चंद्रवन्शी

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