समर्थ गुरु रामदास

       प्रत्येक माता-पिता की कामना रहती है कि उसका पुत्र बडा होगा तो उसका विवाह होगा । घर खुशहाली से भर जाएगा । एक बार विवाह की चर्चा छिडने पर नारायण घर से जंगल भाग गए । उनके बडे भाई गंगाधर ने उन्हें बहुत समझाया और घर ले आए । गंगाधर को छोटे भाई की विरक्ति का पता था अतः मां को समझाते कि नारायण पर विवाह के लिए दबाव न डाले । किन्तु आखिर मां का हृदय तो मां का ही होता है । एक दिन मां नारायण को एकान्त में ले जाकर बोली – पुत्र ! मेरी हर बात मानता है या नहीं ? बालक नारायण ने कहा- मां, यदि तेरी बात नहीं मानूँगा तो किसकी बात मानूँगा । मां बोली तो अच्छा बता जब मैं विवाह की बात करती हूँ तो क्यों मना करता है ? कुछ देर नारायण ने विचार किया और बोले कि अच्छा अन्तरपट पकडने तक मैं मना नहीं करूँगा । मां समझी नारायण विवाह के लिए मान गया ।

       नारायण विवाह के लिए तैयार है ऐसा मानकर सबकी सम्मति से एक कुलीन ब्राह्मण कुल की कन्या के साथ उनका विवाह निश्चित हो गया । विवाह के दिन बारात लेकर वरपक्ष के लोग कन्या पक्ष के यहां पहुँच गए । लग्न समय में जब अन्तरपट पकडने का अवसर आया और सभी ब्राह्मण एक साथ ‘सावधान’ बोले तो नारायण सचेत होकर कहने लगे, अपना वचन पूरा हुआ और एकाएक लग्न मण्डप से उठरकर भाग गए । कुछ लोग उनके पीछे भागे भी, पर कौन हवा को पकड सकता है ? कभी समय (काल) पकडा जा सकता है ? ब्राह्मणों ने लडकी के लिए तुरन्त दूसरा वर ढूँढकर उसका विवाह कर दिया ।

       समर्थ रामदास के विषय में कहा जाता है कि वह हनुमान के अवतार थे । एक बार वे फिर रामराज्य की कल्पना को साकार करने आए थे । भविष्य पुराण में लिखा भी है –

       कृतेहु मारुता ख्याश्र्च त्रेतायां पवनात्मजः ।
        द्वापरे भीम संज्ञश्च रामदासः कलौयुगे ॥

       यानि सतयुग में हनुमान, त्रेता में पवनात्मज, द्वापर में भीम तथा कलियुग में रामदास के नाम से प्रसिद्ध होंगे ।

       भारत के दक्षिण में जब पठानों का पतन हो गया और हिन्दू राजाओं ने अपने-अपने राज्य स्थापित कर लिए, तब वे राजा बहुत से लोगों को जमीन और धन देकर अपने राज्य में बसाते थे । अनेकों लोग निजामशाही छोडकर गोदावरी के किनारे बस गए । उन लोगों में कृष्ण जी पन्त नाम के ब्राह्मण भी सन्‌ ९६२ ईस्वी में उत्तर गोदावरी के तट बीड प्रान्त में हिबरा नामक गांव में परिवार सहित रहने लगे । इनके बडे पुत्र का नाम दशरथ पन्त था । अपने पिता की सम्पत्ति लिए बिना वह हिबरा से १२ किलोमीटर दूरी पर बडगाँव में गए । यहाँ वह पुरोहित का काम करने लगे । इनके बडे पुत्र का नाम रामजी पन्त था । पिता की मृत्यु के पश्चात रामजी पन्त को ङङ्गजांब’ क्षेत्र मिला । रामजी पन्त के पुत्र सूर्याजी पन्त हुए जो प्रसिद्ध भगवद्‌भक्त तथा एक प्रबुद्ध व्यक्ति थे । इनकी पत्नी का नाम रणूबाई था । यही समर्थ रामदास के माता-पिता थे ।
       सन्‌ १६०८ ईस्वी को ठीक रामजन्म के समय रणूबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया । इस बच्चे के जन्म के पश्चात परिवार की सुख समृद्धि में वृद्धि होने लगी । बच्चे का नामकरण हुआ । नाम रखा गया नारायण जो कालान्तर में समर्थ रामदास के नाम से प्रसिद्ध हुए ।

        पांच वर्ष के हो जाने के बाद नारायण का उपनयन संस्कार हो गया । उसी वर्ष पाठशाला में उन्हें भेजा गया । नारायण को जो पढाया जाता वह तुरन्त याद कर लेते । उन दिनों ब्राह्मण बालक के लिए पुरुष सूक्त, रुद्र, वैश्वदेव, ब्रह्मयज्ञ और कुछ जमा खर्च का शिक्षण यह अनिवार्य विषय थे । कोई भी बालक इनको पूरा किए बिना छूट नहीं सकता था । नारायण ने बहुत जल्दी ही यह सब काम पूरा कर लिया । उनका शब्दों का उच्चारण बहुत ही स्पष्ट और शुद्ध होता था । जब वह रुद्री जपा करते तो सारे गांव के लोग उनकी ओर एकटक देखा करते थे ।
       बाल्यकाल से ही निरोगी एवं बलिष्ठ शरीर का धनी नारायण गाँव में ङङ्गबागी’ नाम से प्रसिद्ध था । अपनी अवस्था के बालकों का वह नेतृत्व करता था । तैरना, पेडों पर चढने के खेलों को खेलना इनके स्वभाव में था । कभी-कभी खेलते-खेलते वह लडकों को छोडकर अकेले ही एकान्त में जाकर यों ही बैठ जाया करते थे ।
       एक दिन मां ने नारायण से कहा – ”ओ रे नारायण, कैसा लडका है तू ? दिन भर इधर-उधर घूमा करता है, कुछ काम नहीं करता । अरे तू पुरुष है ! पुरुष को जरा घर बाहर की चिन्ता करनी चाहिए ।” नारायण ने यह सुनकर मां से कहा- अच्छा, माँ, अब की बार देख लेना । अब से मैं चिन्तन किया करूँगा और एक दिन घर से गायब हो गए । घर के लोग चिन्तित हुए, बहुत ढूँढा । जंगल, नदी तट इत्यादि सब स्थानों पर देख लिया पर नारायण नहीं मिला । माँ तो रोने लगी । पिता घबरा गए । रात हो गई सभी चिन्ता से व्याकुल थे । मां इधर-उधर दौड रही थी पर वह करे तो क्या करे ? तभी एक घर की अंधेरी कोठरी में वह गईं तो उनका पैर किसी से टकराया । चौंककर उन्होंने पूछा- ”कौन हो ?”
       नारायण ने कहा ‘मैं हूँ माँ – क्या बात है ?’     

”क्या कर रहा है यहाँ ?”,  मां ने कहा |

”अरे तूने जो कहा था कि पुरुष को घर की चिंता करनी चाहिए ? मैं तो घर की ही नहीं विश्व की चिंता करने बैठा था ।” सूर्याजी पन्त ने जब सुना तो उन्हें विश्वास हो गया कि अपने को मिला वरदान यथार्थ है ।
       नारायण की एकान्त प्रियता बढती जा रही थी । प्रतिदिन उठकर स्नान के पश्चात बारह सौ सूर्यनमस्कार कर लेना, इसके बाद मित्रों के साथ तैरने जाना उनका नियम बन गया । तत्पश्चात एकान्त स्थान में जाकर ध्यान में बैठ जाते थे ।
उन्होंने स्वयं को अत्यन्त कठोर नियमों में बांध लिया । तेरह करोड बार ‘राम, जय राम, जय जय राम’ उन्हें बोलना था । ”त्रयोदशाक्षरी” मंत्र का इतना जप करना अपने आप में कठिन कार्य था । सूर्योदय से पूर्व उठकर दैनिक कार्यों से निवृत्त होने के पश्चात गोदावरी में छाती तक पानी में खडे होकर उन्होंने साधना की । मछलियाँ काटती रहती थीं पर वे अविचलित भाव से साधना रत रहते ।
       उन्होंने दासबोध नामक अति उत्कृष्ट ग्रंथ लिखा । उस ग्रंथ में ब्रह्मसूत्र, संहिता, उपनिषद, भागवत, रामायण, गीता के वचन उद्‌धृत किए गए हैं ।
       अध्ययन के पश्चात सायं पुनः गोदावरी के तट पर जाते और शान्त चित्त से समाज चिन्तन में लग जाते । वहाँ वह घण्टों बैठते । उनके चिन्तन का विषय रहता- ”यह मेरा विशाल समाज और यह उस समाज की मातृभूमि । अत्यन्त विशाल होने के बाद भी यह मातृभूमि परवशता के चंगुल में फँसी है । हमारी संस्कृति इतनी जीर्ण क्यों हो गई है ? हमारे यहाँ किस चीज की कमी है ? क्या हम दूसरों से कम वीर हैं ? क्या अपनी संस्कृति की नींव कमजोर है ? आखिर इसका कारण क्या है ? जिसके फलस्वरूप हमारे समाज की यह दशा हुई है।” ऐसे प्रश्न और उनके निराकरण के लिए वह घण्टों विचार किया करते थे ।
       तेरह करोड जप साधना पूर्ण करने के पश्चात जब वे ध्यानवस्था में बैठे थे तो भगवान श्रीराम ने उन्हें दर्शन देकर कहा, बस अब परमार्थ साधना पूर्ण हुई । समाज तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है । जाओ, उसे आतताइयों से मुक्त करवाओ ।
भगवान श्रीराम से आज्ञा लेकर नासिक छोडकर तीर्थ यात्रा को निकल गए । नर्मदा नदी पार कर वे उत्तर दिशा में जाने लगे तो रास्ते में कई दुःखद प्रसंग देखे और सुने । कहीं गाँव जलाए गए थे, कहीं किसानों के खलिहान लूट लिए गए थे, किसी गाँव की बहू-बेटियों को दुष्ट लोग उठाकर ले गए थे । किसी गाँव के सभी लोगों को बिना पारिश्रमिक दिए जबरन काम करवाया जाता था । इस प्रकार चारों तरफ मुस्लिम शासकों के सिपाहियों की मनमानी चल रही थी । जब किसी धर्मशाला या किसान की झोपडी में समर्थ रामदास जी रुकते थे, वहाँ के सैकडों लोग अपनी व्यथाकथा उनसे आकर कहते थे । वे उन्हें समझाते, ढाँढस बँधाते थे । जब वे एकान्त में बैठकर चिन्तन करते तो समाज की व्यथा देखकर अत्यन्त कष्ट होता था । समाज की इस दुर्दशा को देखकर वे अनेकों बार रोए भी । जैसे-जैसे वे उत्तर दिशा में बढते जाते उनके सम्मुख अनेक दर्दनाक चित्र उभरते जाते । जब वे अयोध्या पहुँचे तो दुःख का ठिकाना ही न रहा । प्रत्यक्ष राम जन्मभूमि में आतताइयों ने अपना कब्जा जमा लिया था । वे जब काशी पहुंचे तो वहाँ भी वही भयानक दृश्य ! विश्वनाथ महादेव जी को अपनी जगह छोडनी पडी । मथुरा-वृन्दावन में भी वही दशा । अब तो अनका हृदय अत्यन्त व्यथित हो गया । वे चिंतानिमग्न हो गए । बारह वर्ष तक पूरे भारत में वे घूमते रहे । सब जगह एक जैसा ही हाल था ।
         समर्थ रामदासजी ने विचार किया कि हमारे समाज में इतनी कायरता आ गई है । पहले तो समाज से कायरता दूर करनी होगी । इस प्रकार समर्थ रामदास स्वामी ने समाज में स्वतंत्रता के विषय में वैचारिक क्रान्ति का अलख जगाने का कार्य प्रारंभ कर दिया । जब शिवाजी को इस बात की जानकारी मिली तो वे स्वामीजी के दर्शन के लिए लालायित हो उठे । एक दिन छत्रपति शिवाजी स्वयं स्वामीजी के दर्शन के लिए निकल पडे । बडी कठिनाई के पश्चात शिवाजी को समर्थ रामदासजी के दर्शन हुए । वहीं शिवाजी ने मंत्रोपदेश लिया । अब अध्यात्म और शक्ति के योग से जनक्रांति उत्पन्न होने लगीं ।

        शिवाजी समर्थ स्वामीजी के प्रिय शिष्य थे । दोनों की आयु में २२ वर्षों का अन्तर था । जब भी शिवाजी को राज्य कार्य से कुछ समय निकलता वह स्वामी जी के दर्शन के लिए आते । 

         एक बार शिवाजी एक दुर्ग को नए ढंग से बनवा रहे थे । वहाँ पर हजारों श्रमिक काम कर रहे थे । शिवाजी को कदाचित विचार आया कि, इन सबको मैं पल रहा हूँ । उसी समय चिरपरिचित पवित्र घोष हुआ ”जय जय जय रघुवीर समर्थ” ।
         मेंढक को देख स्वामीजी ने कहा कि मेरे राम की भी अनोखी लीला है । इस मेंढक को उसका दाना पानी कौन दे रहा होगा ?
शिवाजी को अपनी भूल का स्मरण हो आया ! और स्वामीजी के चरणों को पकडते हुए कहा कि मुझे क्षमा करें, मेरे अन्दर कुछ समय के लिए दम्भ आ गया था । आपकी कृपा से मेरा अहंकार दूर हो गया है ।
          एक बार शिवाजी के मन में विरक्ति उत्पन्न हो गई । उसी समय वहां स्वामी समर्थ रामदासजी ने दरवाजे पर आकर भिक्षा के लिए आवाज लगाई – ”जय जय जय रघुवीर समर्थ !” शिवाजी स्वयं भिक्षा देने आए । भिक्षापात्र में एक पर्ची डाल दी । स्वामीजी ने कहा यह क्या है भाई ? न चावल, न दाल, कागज की भी भिक्षा दी जाती है क्या ?
           स्वामीजी ने कागज निकाला और पढा । उस पर लिखा था, मेरा सब राज्य आपके चरणों में अर्पित है । कागज पढकर वे जोर से हँसे और बोले- ”मैं तुम्हारी भिक्षा स्वीकारता हूँ और अपने राज्य को सँभालने के लिए तुम्हें ही नियुक्त करता हूँ ।” यह श्री रामजी का राज्य है, ऐसा समझकर उसे ठीक ढंग से सँभालो । राज्य का ध्वज भगवा रखना । राज्य में मुनादी करवा दो कि जब कभी दो लोग मिलें तो राम राम ही कहें क्योंकि यह रामजी का राज्य है ।
           भारत में आज प्रत्येक छोटे-बडे गांव, नगर की बस्तियों और कॉलोनियों में हमें श्री हनुमानजी के मंदिर देखने को मिलते हैं । आज भी व्यक्ति एक-दूसरे से मिलते समय राम राम करते हैं । समाज में भक्ति और शक्ति का अद्‌भुत समन्वय को स्थापित करने के लिए समर्थ गुरु रामदासजी ने आश्रम व व्यायाम शाला के निर्माण की योजना बनाई और उसका क्रियान्वयन भी किया । उन्होंने १२ हजार मठों व मंदिरों की स्थापना की थी, जिसके माध्यम से स्वराज्य की स्थापना एवं उसके संचालन के लिए लोगों को प्रशिक्षित कर उन्हें सामर्थ्यशाली बनाने का कार्य चलता था । आज समाज बहुत सारी विकृतियों ने घिरा है । समाज में शक्ति और भक्ति का अभाव दिखता है । अतः समर्थ रामदासजी की इस जयंती के अवसर पर हम भी सज्जनों को सामर्थ्यशाली बनाने का कार्य करने का संकल्प लें ।
                                                                                                                       – लखेश्वर चंद्रवन्शी

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