”शिक्षार्जन” के बदलते मानक

MAGDH MAHILA COLLEGE ME B.ED KE FORM KE LIYE LAGI BHEEDस्कूली परीक्षा समाप्त होते ही विद्यालयों में प्रवेश पाने के लिए होड़ सी मच गई है। इन विद्यालयों को विद्यालय नहीं, सुपर विद्यालय कहिए तो अच्छा होगा! देश के छोटे-बड़े सभी शहरों में ऐसे कई विद्यालय हैं जो यह कहते नहीं थकते कि हमारी स्कूल शहर की नामी स्कूलों में से एक है। वे यहां तक कहने में नहीं चुकते कि हमारी स्कूल ही शहर में सबसे बेस्ट है। ये विद्यालय जितने बड़े होते हैं, उससे कहीं अधिक बढ़ा-चढ़ाकर वे अपने शिक्षा संस्था की विशेषताओं का बखान करते हैं, और यही इन शिक्षालयों की सबसे बड़ी विशेषता भी बन गई है। हैरान करने वाली बात यह है कि इन विद्यालयों की बहुरंगी प्रवेश पत्रिका और स्कूल परिसर की साज-सज्जा, कार्टूनों के चित्रों आदि ताम-झाम के आकर्षण से अभिभावक बच नहीं पाते और अपने बच्चों को शिक्षा सम्पन्न बनाने के लिए हजारों-लाखों रुपये खर्च करने में तनिक भी नहीं हिचकिचाते। कई ऐसे भी अभिभावक होते हैं जो आर्थिक तंगी के बावजूद कर्ज लेकर बड़े स्कूल में अपने बच्चे का एडमिशन करवाते हैं।

क्या केवल रुपये खर्च करने मात्र से ही ज्ञान प्राप्त हो जाता है? क्या नामी विद्यालयों में प्रवेश पा जाने भर से विद्यार्थी का विकास हो जाता है? इन प्रश्नों पर गंभीरता से अभिभावकों के साथ ही समग्र समाज को चिंतन करना आवश्यक है। फिर, ज्ञानार्जन की श्रेष्ठ विधि कौन-सी है? यह भी बात मन में उठती है। वैसे वर्तमान पीढ़ी बाल्यवस्था के प्रति अधिक सचेत लगती है। चाहे वह शिक्षा का क्षेत्र हो या बच्चों के स्वास्थ्य का विषय। अपने बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य को लेकर अभिभावकों के इस चिंता का लाभ उठाकर ही व्यवसायी बुद्धि के शिक्षा के ठेकेदार और डॉक्टर्स अधिकाधिक धन बटोरने में लगे हैं। अभिभावकगण अपने बच्चों के विकास के लिए हर संभव प्रयत्न करते हैं फिर भी इच्छानुरूप सकारात्मक परिवर्तन दिखाई नहीं देता। छात्र तनावपूर्ण अवस्था में स्कूली जीवन गुजारता है और अभिभावक बालकों को सफल जीवन जीने योग्य सक्षम बनाने के लिए जी तोड़ मेहनत करते हैं। इतनी मेहनत कि कभी-कभी तो छात्र अभिभावक से परेशान हो जाते हैं और विद्यार्थी जीवन उसके लिए बोझिल हो जाता है। वहीं आए दिन समाचार पत्रों और टीवी चैनलों पर अनेक समाचार आते रहते हैं जिससे स्कूलों में हुए शोषण,दुष्कर्म,हत्या जैसी घटनाओं का पता चलता है। टीवी पर कई दिनों तक इस पर बहस का दौर चलता है कि मोटी फीस देकर भी बड़े-बड़े स्कूलों में छात्र-छात्राएं सुरक्षित क्यों नहीं? पर कोई इस बात पर विमर्श नहीं करता कि देश में शिक्षा का स्तर कैसा हो? शिक्षा के साथ संस्कार कैसे दिये जाएं? आदर्श समाज कैसे बनें? इसके लिए हमें क्या करना चाहिए?

NOTREDOM SCHOOL MAI ADDMISSION KE LIYE BACHCHE KO LEKER JATEआज माँटेसरी (नर्सरी)शिक्षा को प्राथमिकता देने के कारण प्रारंभ से ही छात्रों के ज्ञानेन्द्रियों को तीक्ष्ण बनाने पर जोर दिया जा रहा है। परंतु यदि मन ही चौकस, तीक्ष्ण, ग्रहणशील और प्रशिक्षित न हो तो ज्ञानेन्द्रियां ज्ञान को ग्रहण नहीं कर सकतीं। इसलिए प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति ज्ञानेन्द्रियों की अपेक्षा मन को प्रशिक्षित करने पर जोर देती थी। तभी तो हमारे पूर्वज प्रखर बुद्धिमान और ओजस्वी थे। उनकी मेधा शक्ति इतनी विकसित थी कि स्मरण, आकलन और ज्ञान के प्रकटीकरण में आज वे विश्वविख्यात हैं।  

यह समझना हमारे लिए अतिआवश्यक है कि केवल इमारत खड़ा कर देने से ही “शिक्षण” का कार्य शुरू नहीं हो जाता, न ही “शिक्षा” किसी विद्यालय का पर्याय हो सकता है। आज विद्यालय में बड़ी-बड़ी इमारतें हैं, कक्षाएं हैं, प्रयोगशालाएं हैं, परीक्षार्थी और परीक्षक भी हैं। परंतु विद्यार्जन का योग्य वातावरण नहीं है। शिक्षिकाएं सज-धजकर पूरे मेकअप के साथ विद्यालय में आती हैं। उनके परिधान में इतनी विविधता होती है कि सभी का ध्यान उनके पोषाक की ओर ही जाता है। यहां तक कि विद्यालय के वार्षिक सम्मेलन में आजकल विद्यार्थियों का फैशन शो रखा जा रहा है, मौके का फायदा उठाकर शिक्षक, विशेषकर शिक्षिकाएं फैशन शो में उतर रही हैं। स्कूलों में जिन गानों पर आजकल विद्यार्थी डांस करते हैं वह भी बेहद चिंताजनक है। यूं तो आजकल सिनेमा जगत के लगभग हर फिल्म में शराब, पार्टी तथा बेपरवाही के नाम पर लापरवाही माहौल को बढ़ावा देकर समाज को कलुषित करने का षड्यंत्र चल रहा है। और इस माहौल से हमारा समाज ही नहीं तो देश की शिक्षण संस्थाएं खूब प्रभावित हैं। आप भी निजी तौर पर कई स्कूल और महाविद्यालयों को जानते ही होंगे जहां इस तरह का वातावरण बनाया जाता है। फिर आप ही सोचिए कि, बाहरी दिखावे में व्यस्त तथा पाठ्यक्रम को पूर्ण करने में तनावग्रस्त शिक्षक-शिक्षिकाएं भला छात्रों को तनाव मुक्त कैसे बना सकते हैं? ऐसे समय में तनावरहित ज्ञानार्जन की पद्धति से अवगत होना अत्यावश्यक है।

school_buildingअभिभावकगण विज्ञापनों तथा करियर को लेकर बढ़ती प्रतिस्पर्धा के प्रभाव में बह जाते हैं। इसलिए वे अपने बच्चों को ट्यूशनस, डांस, तैराकी सभी तरह के प्रशिक्षण में व्यस्त कर देते हैं। उन्हें लगता है कि नाच-गाना, तैराकी और फैशन से उनके बच्चों का शारीरिक व मानसिक विकास होता है। परंतु वे इस बात को भूल जाते हैं कि शरीर, मन और बुद्धि की क्षमता का विकास तो पवित्र वातावरण में ही हो सकता है। इसलिए समाज में पवित्रता का वातावरण बनना आवश्यक है।

शिक्षा तो ज्ञान के वातावरण का नाम है, जहां पर आते ही सीखने की जिज्ञासा स्वतः प्रगट होती है। इसलिए जहां ज्ञानार्जन का वातावरण है उसे ही विद्यालय कहना चाहिए। वास्तव में शिक्षार्जन का योग्य वातावरण की निर्मिति करना आवश्यक है, क्योंकि उचित वातावरण में शिष्य पौधे की भांति विकास करता है। नियमित प्रार्थनाएं और पवित्र वातावरण बालकों की कल्पनाशीलता, तार्किकता और निर्णय क्षमता को विकसित करने के लिए सहायक होती हैं। इसके द्वारा ही मन को प्रशिक्षित किया जाता है। परंतु आज की शिक्षा पद्धति मन के प्रशिक्षण की ओर अधिक ध्यान नहीं देता। क्या ज्ञान को बाहर से भरा जा सकता है जैसा कि, आधुनिक शिक्षाविद्‌ सलाह देते हैं।

हमारा दर्शन शास्त्र कहता है, “ज्ञान हमारे अंदर ही है” और हमारी संस्कृति में इसी को महत्व दिया गया है। इस विधि में छात्र को ज्ञान अर्जित करने के लिए स्वयं को प्रयास करना होता है। उपयुक्त वातावरण और अनुशासन के पालन से ही छात्रों में अंतर्निहित ज्ञान प्रकट होता था। जिसका उपयोग वे जीवन के सभी क्षेत्रों में करते थे। इसलिए अनुशासन को इतना अधिक महत्व दिया जाता था। स्वामी विवेकानन्द ने शिक्षा को व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के उत्थान के लिए आवश्यक माना है। उन्होंने हर समस्या का निदान शिक्षा को बताया। स्वामीजी के अनुसार, शिक्षा का उद्देश्य मानव में निहित पूर्णता की अभिव्यक्ति है। इस दृष्टि से मनुष्य निर्माण ही शिक्षा का मुख्य उद्देश्य है।

प्राचीन शिक्षा विधि में विषय को याद करने और सीखने में इतना मानसिक तनाव नहीं झेलना पड़ता था क्योंकि विद्यार्थी परीक्षा में उत्तीर्ण होने के लिए नहीं वरन ज्ञानार्जन के लिए शिक्षा ग्रहण करते थे। इसलिए वे परीक्षा देने के लिए सदैव तत्पर रहते थे और परीक्षा देने के बाद भी उनका ज्ञान कम नहीं होता था। इसके विपरीत वर्तमान छात्र को परीक्षा देने के लिए विशेष तैयारी करनी पड़ती है, वे पाठों को रटते हैं और परीक्षक को अपनी उत्तर पुस्तिका थमाने के साथ ही वह ज्यादातर रटी-रटायी बातें भूल जाता है। आजकल एक कहावत खूब प्रचलित है- “इतिहास भूगोल बड़ी बेवफ़ा, रात में पढ़ो दिन में सफा।”

imagesआधुनिक शिक्षित मनुष्य का ज्ञान उसकी पुस्तकों में है और वह अपने नोट्‌स देखे बिना शायद ही किसी कथन को अधिकारपूर्वक बोल सकता है। जबकि प्राचीन शिक्षक चलते-फिरते पुस्तकालय थे और हर समय संदर्भ दे सकते थे, इसलिए उन्हें पंडित भी कहा जाता था। पश्चिम के बहाव में बहने वाले हमारे भारतीय समाज को ज्ञानार्जन की सही पद्धति की आवश्यकता है। व्याख्यान विधि का अधिकाधिक प्रयोग तो पश्चिमी देशों में होता है। जबकि प्राचीन शिक्षा पद्धति में शिक्षक द्वारा प्रश्नोत्तर विधि का खुलकर प्रयोग किया जाता था। शिक्षक और विद्यार्थी के मध्य अद्वितीय और आदर्श संबंध थे। शिक्षा की पवित्र पीठों में स्नेह, सौहार्द्र और निष्कपटता का वातावरण था। शिक्षक-विद्यार्थी परस्पर धर्म के सूत्र में बंधे होते थे। शिक्षक छात्र को पितृवत्त स्नेह देते थे और छात्र उनके प्रति गहन श्रद्धा रखते थे। भावनाओं का यह मधुर संगम इस धरती पर स्वर्ग से भी उत्तम परिस्थितियों को उपस्थित करता था। लेश मात्र भी वाणिज्य बुद्धि का इन संबंधों में स्थान नहीं था। गुरु पूर्ण ईमानदारी से व प्रेमपूर्वक अपना पाठ पढ़ाते थे और शिष्य भी उसे श्रद्धापूर्वक ग्रहण करते थे।

परंतु दुर्भाग्य से यह स्थिति बदल गई है। आधुनिकीकरण की आड़ में पश्चिमीकरण से बालक अकर्मण्य और सुविधाभोगी बनते जा रहा है। इंटरनेट, मोबाइल जैसी सुविधाएं जानकारी बढ़ाने, संग्रहित और सम्प्रेषित करने के लिए तो उपयुक्त तो है ही, किन्तु सोशल मीडिया का गुलाम हो जाना या उसी पर आश्रित हो जाना ठीक नहीं है। इंटरनेट ऐसी वस्तु है जहां विषअमृत रहे एक ही संगावाली बात है। विवेक बुद्धि जबतक सक्रिय है मन को सही दिशा में ले जाती है। लेकिन समाज और विद्यालय में योग्य वातावरण नहीं मिले तो इंद्रिय संयम और मन के प्रशिक्षण की सारी व्यवस्थाएं चौपट हो जाती हैं। इसलिए भारत को “भारत” बनाने के लिए हमें फिर से हमारे शिक्षा के सिद्धांतों पर विचार करना होगा एवं उचित शिक्षा-विधियों के द्वारा हमें भारतीय संस्कृति का पुनर्जागरण करना होगा। व्यवसायी बुद्धि से भरे शिक्षालयों के ठेकेदारों को इस बात पर चिंतन करना होगा। सभी शिक्षण संस्थाओं को अपने विद्यालयों में पवित्र वातावरण के निर्माण के लिए योजना बनानी होगी, जिससे कि छात्र अपने जीवन में भौतिक व आध्यात्मिक दृष्टि से पूर्णता की ओर अग्रसर हो सके।

संक्षेप में कहा जाए तो आज भारतीय शिक्षा पद्धति के अध्ययन व अनुसन्धान की आवश्यकता है, इस पर भारतीय शिक्षण मंडल कार्य कर रहा है। वहीं रामकृष्ण मिशन, विवेकानन्द केन्द्र, शारदा मठ, विद्याभारती जैसे संगठन अपने विद्यालयों के माध्यम से शिक्षा और संस्कार का अलख जा रहे हैं। विवेकानन्द केन्द्र ने असम, अरुणाचल, नागालैंड, अंदमान, तमिलनाडु और कर्णाटक राज्य में विवेकानन्द केन्द्र विद्यालय तथा आनंदालय के माध्यम “मनुष्य निर्माण और राष्ट्र पुनरुत्थान” के ध्येय के अनुरूप शैक्षिक वातावरण बनाया है। केन्द्र को इसमें अच्छी सफलता भी मिली है। आवश्यकता है कि देश की सभी शिक्षा संस्था/संस्थान अपने विद्यालयों तथा महाविद्यालयों में शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार की दिशा में गंभीरता से कार्य करें। देश की समग्र शिक्षा संस्थान यह ठान ले कि हम अपने विद्यालयों में भाषा, गणित, विज्ञान, इतिहास, भूगोल, पर्यावरण आदि विषयों के साथ ही चरित्र निर्माण पर जोर देंगे तो निश्चय ही समाज में परिवर्तन आएगा।  

                                                                                                       – लखेश्वर चंद्रवन्शी लखेश”, नागपुर

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सब लोग कुछ समय दें…


     स्वामी विवेकानंदजी की १५०वीं जयन्ती २०१३ में आ रही है । इस उपलक्ष्य में विश्वभर में बडे-बडे कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है । बडे शहरों और छोटे-बडे ग्रामों में इसके आयोजन को लेकर बहुत उत्साह है । कीर्तनकारों की टोलियां स्वामी विवेकानंदजी के जीवन तथा संदेश को लेकर इसकी तैयारी में जुट गई हैं । नाटक मंडली और उसके लेखक प्रस्तुति एवं लेखन की दृष्टि से अनेक नए-पुराने उपकरणों तथा साहित्य के चुनाव में लग गए हैं, ताकि स्वामीजी के संदेशों को अधिक सजीवता से समाज में प्रगट किया जा सके । कई शहरों एवं गावों में महानाट्‌यों, कीर्तनों तथा व्याख्यान माला का श्रीगणेश भी हो चुका है ।

     स्वामी विवेकानंद एक ऐसे संन्यासी जिन्होंने कला, साहित्य, विज्ञान, आध्यात्म तथा सामाजिक उत्थान के किसी भी क्षेत्र की अनदेखी नहीं की । अपने बुद्धिबल, अपनी हृदय की संवेदना तथा अपने जीवन यात्रा के सारे अनुभवों के आधार पर उन्होंने सामाजिक तथा वैश्विक जीवन के प्रत्येक विषयों को बडी बारीकी से देखा । भारतीय मनीषियों के सिद्धांतों एवं इतिहास के सकारात्मक तथा नकारात्मक परिणामों पर गहन चिन्तन किया । अपने गुरु ठाकुर रामकृष्ण परमहंस के चरणों में बैठकर उन्होंने धर्म, आध्यात्म तथा सामाजिक समरसता की शिक्षा ग्रहण की । इतना ही नहीं, उन्होंने अपने गुरुदेव के निर्देशों का पालन करने के लिए संसार की सारी चुनौतियों के बीच सिंहवत खडे होकर प्रत्युत्तर देने के लिए आजीवन कार्य किया ।
     ठाकुर द्वारा बताए गए संदेशों में, ”मानव सेवा ही माधव सेवा है” यह संदेश इस बात को रेखांकित करता है कि मनुष्य-मनुष्य के बीच व्याप्त विषमता को दूर करने के लिए मानव के भीतर ”नारायण” को देखना चाहिए । जाति-भाषा के आधार पर समाज में एक-दूसरे के प्रति आपसी कटुता का भाव का होना परमात्मा का अपमान ही तो है । फिर समाज का एक तथाकथित पढा-लिखा वर्ग धर्म, सम्प्रदाय, संस्कृति, समानता तथा आधुनिकता का वास्तविक अर्थ जाने बिना मनमानी तरीके से उसके प्रतिपादन में लगा रहता है । ऋषि-मुनियों की महान साधना से युक्त हमारा देश अपने ही लोगों के मानसिक गुलामी का दंश झेल रहा है । अज्ञानता तथा वैचारिक अस्पष्टता के इस अंधकार को दूर करने के लिए विवेकानंद के विचारों का प्रगटीकरण होना युगानुकूल है । स्वामी विवेकानंदजी की यह सार्धशती समारोह इसके लिए सर्वोत्तम अवसर है ।

              हम बडे ही सौभाग्यशाली हैं कि हमारे जीवन काल में स्वामी विवेकानंदजी की १५०वीं जयंती आ रही है । न जाने उनकी द्विशताब्धी (२००वीं) जयंती पर हममें से कितने बचेंगे और बच भी गए तो क्या शरीर में शक्ति भी होगी ? तो इस युवाजीवन में उनकी इस जयंती के अवसर पर २ वर्ष, १ वर्ष, ६ महीने का महत्वपूर्ण क्षण क्या हम अर्पित कर सकते हैं ? यदि हम प्रबुद्ध समाज हैं तोअपने अनुभव के आधार पर युवा पूर्णकालीन तथा स्थानिय कार्यकर्ताओं के साथ तन-मन-धन से खडे हो सकते हैं । सेवानिवृत्त ५० से ६० वर्ष के आयु वाले बडे बुजुर्ग वानप्रस्थी कार्यकर्ता बन दो वर्ष का अपना पूरा समय दे सकते हैं ।
             शिक्षक एवं प्राध्यापक अपने छात्रों में स्वामीजी के जीवन तथा संदेशों पर आधारित अनेक स्पर्धाओं का आयोजन कर सकते हैं । साहित्य प्रकाशन संस्था तथा लेखक इस अवसर पर स्वामी विवेकानंद सार्धशती समारोह का “लोगो” अपनी पुस्तकों, दिनदर्शिका तथा दैनंदिनी में छपवा सकते हैं । सायकिल यात्रा, पद यात्रा, पथनाट्‌य स्पर्धा, वक्तृत्व स्पर्धा तथा अध्यात्म, मानवता, शिक्षा, समानता आदि विषयों पर सेमिनार, संगोष्ठी तथा परिचर्चाओं का भी आयोजन किया जा सकता है ।
            समाज का प्रत्येक व्यक्ति, बालक से बुजुर्ग तक, पुरुष-महिला, शिक्षक, प्राध्यापक, इंजीनियर, वकील, व्यापारी या सरकारी कर्मचारी सब मिलकर निभा सकते हैं अपनी महत्वपूर्ण भूमिका । क्योंकि स्वामीजी की जयंती का सुनियोजित तथा व्यवस्थित सामूहिक समारोह ही विजयी होने का उत्साह भारत में भर सकता है । विश्व का नेतृत्व करने की अब हमारी बारी है । ”जगद्‌गुरु भारत” का उद्‌घोष शीघ्र ही अखिल विश्व में गूंजेगा । बस, माँ भारती को आपकी भूमिका की प्रतीक्षा है । इसलिए सब लोग ”कुछ” समय दें । क्षमता से अधिक कार्य करें । रामसेतु के निर्माण में तो गिलहरी ने भी अपना सौ प्रतिशत से अधिक योगदान दिया था । परंतु हमें तो हनुमान की भूमिका निभानी है, साथ में जाम्बवन्त, सुग्रीव, नल-नील, अंगद और विभिषण के साथ ही सारी वानर सेना भी चाहिए ।
      आइये, पूरी निष्ठा तथा पूर्ण समर्पण से राष्ट्र पुनरूत्थान के इस धर्म कार्य में हम सभी मिलकर अपनी सक्रिय भूमिका निभाएँ।
                                    स्मरण रहे – सब लोग कुछ समय अवश्य दें…
                                                                                                      – लखेश्वर चंद्रवन्शी

मनुष्य, केवल ”मनुष्य” ही चाहिए !!

        गरीबी रेखा निर्धारण की अवधारणा को लेकर भारत के वैचारिक जगत में एक बार फिर खलबली मच गई है सरकार में रहकर योजना बनाने वाले तथा सरकार के बाहर राष्ट्रीय विषयों पर चिन्तन करने वाले अनेकों विद्वान इस पर मंथन कर रहे हैं । इस मन्थन प्रक्रिया में विष और अमृत दोनों का निकलना सहज स्वाभाविक है । यही इसकी सच्चाई है । पर इस मंथन से जो भी प्राप्त करना है वह तो स्पष्ट हो ।
        सारे मंथन का मूल एक ही है भारत को खुशहाल बनाना । प्रत्येक व्यक्ति को समृद्ध बनाना । कितना मौलिक विचार है यह ! सुनकर ही मन खुशी से झूम उठता है । परंतु समृद्धि का मापदण्ड कैसा हो ? समृद्धि के लक्षण क्या है ? क्या केवल मनुष्य को धन की पूर्ति कर देने से ही सारी समस्याएँ सुलझ जाती हैं ? इन प्रश्नों पर भी चिन्तन करने की आवश्यकता है । अभी तो देश में केवल गरीबी रेखा के निर्धारण पर बहस हो रही है । उसे दूर करने के लिए उचित सरकारी योजना तथा उसके क्रियान्वयन को लेकर बात चल रही है । ऐसे में भला हम क्यों ‘समृद्धि’ के मापदण्ड पर चर्चा करें, ऐसा प्रश्न उपस्थित होता है ।
        एक तरफ गरीबी रेखा का निर्धारण और दूसरी तरफ समृद्ध होने के मापदण्ड दोनों अलग-अलग विषय लग सकते हैं, पर ये दोनों मुद्दे एक ही हैं । योजना आयोग ने गांवों में २२.४२ रुपये तथा शहरों में २८.६५ रुपये प्रतिदिन आय को गरीबी रेखा मानने का निर्णय लिया है । परंतु हर किसी को पता है कि २२ या २८ रुपये से घर नहीं चलता । एक व्यक्ति साधारण होटल पर जब नाश्ता करता है तो ३० रुपये भी उसके लिए कम ही होते हैं फिर सरकारी मापदण्ड के अनुसार ङङ्गहम दो हमारे दो’ के गणित में २८ रुपये की आय कहीं जँचती नहीं । योजना बनाने वाले भी इस बात को जानते हैं कि चार सदस्यों के छोटे परिवार में एक दिन में कम से कम ४०० रुपये तो लगते ही हैं । फिर भी गरीबी रेखा के निर्धारण के नाम पर केवल कंगाली में जीवन-यापन करने वालों को रखा जा रहा है ।
        ऐसा कहते ही ‘कंगाली और दरिद्रता’ पर विमर्श शुरू हो जाएगा और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत में कितने प्रतिशत लोग दरिद्र हैं, इसका चित्रीकरण हो जाएगा । हमारे देश में बहस का मुद्दा समस्याओं के निर्धारण का होता है, उसे सुलझाने को लेकर नहीं । पर जब कभी सुधार को लेकर चर्चा चलती है तब पश्चिमी देशों की सुधारवादी नीतियों को उसका आधार बनाया जाता है। अलग देश, अलग मिट्टी, भिन्न स्वभाव, भिन्न स्थिति, इन भिन्नताओं के बावजूद पश्चिम का अंधानुकरण करना हमारे लिए उचित नहीं है । अतः हमें इस परिप्रेक्ष्य में भारतीय परिवेश के अनुसार नियोजन करना चाहिए, कार्ययोजना बनानी चाहिए ।

पहले भारत को समझें

        विचारवंत लोग अपनी योजना बनाते समय भारत के भौगोलिक, सामाजिक, धार्मिक एवं क्षेत्रशः समाज के मनोदशा का गहन अध्ययन करना चाहिए । क्योंकि भारत के सभी राज्यों की अपनी एक विशेषता है भाषा, वेशभूषा, सामाजिक एवं धार्मिक दृष्टि से उनमें भिन्नता पायी जाती है । यहाँ तक कि वैचारिक दृष्टि से भी उनकी सोच में कुछ अंतर दिखाई पडता है । इतनी विविधताओं के बावजूद कोई ऐसा सूत्र है जो सारे भारत वर्ष को आपस में जोडता है । हमारे देश की संस्कृति में वह ताकत है जो सारी विविधताओं को उनकी विशेषता के रूप में महिमामण्डित करने और उसे समाज द्वारा विशाल हृदय से स्वीकारने की राष्ट्रीय दृष्टिकोण प्रदान करती है । भारत में वह ‘धर्म’ समान रूप से प्रत्येक मनुष्य में व्याप्त है जो एक-दूसरे के हित की बात सोचने की प्रेरणा देता है । समाज में यही धार्मिक व्यवस्था है जो अपने साथ ही अन्यों के आराध्य देव का भी आदर करती है । हिन्दूधर्म के इस महान अवधारणा को समाज में सही रूप से प्रगट करने की आवश्यकता है । क्योंकि भारत रुपयों-पैसों की लालच से नहीं जागता, न ही सरकारी योजनाओं से, वह तो जागता है मानवता के लिए किये जानेवाले निस्वार्थ प्रयासों से । अतः योजना बनाना ऊपरी तौर पर नहीं होना चाहिए बल्कि इसका आधार सामाजिक आत्मीयता हो । 

गरीबी हटाने का समृद्ध विचार

स्वामी विवेकानन्द ने देश के सुधारवादी नीतियों के निर्धारण के सन्दर्भ में एक बार कहा था कि ”एक छोटे से गांव में यदि करोडों रुपये खर्च कर दिये जाएं तो वह गांव सुधर जाएगा, ऐसा सोचना गलत है । गांव की स्थिति सुधारने के लिए धन की आवश्यकता होती है, यह बात सही है । परंतु धन उडेलने से गांव नहीं सुधरेगा । गांव की स्थिति सुधारने के लिए वहाँ के लोगों को आत्मनिर्भरता की शिक्षा देनी होगी ।”
        सच है धन की प्रचुरता मनुष्य में विकृति को बढावा देती है । ऐसे बहुत कम लोग होते हैं जो धन पाकर अन्यों की सहायता करते हैं । इसलिए ऐसे मनुष्यों की खोज करनी होगी जो उपेक्षितों की सहायता के लिए सदैव तत्पर रहते हैं । ऐसे मनुष्यों को एकत्रीकरण कर योजना बनाना ही समाज हित में है।

वह व्यक्ति गद्दार है जो..

        हम अपने आसपास ऐसे सामर्थ्यशाली व्यक्तियों को देखते हैं जो अपने धन और पद के अहंकार में चूर होकर दूसरे लोगों की हँसी उडाते हैं, उन्हें हीन दृष्टि से देखते हैं । ऐसे लोगों के बारे में स्वामी विवेकानन्द कहते हैं कि ”मैं उस प्रत्येक व्यक्ति को गद्दार मानता हूँ जो समाज के बल पर खडा हुआ और अब वह उसकी ओर ध्यान नहीं देता ।” कितना अच्छा होता कि समाज के सक्षम व्यक्ति कम से कम एक अक्षम व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनाने का कार्य करते । इस तरीके से ही अमीरी-गरीबी की विषमता दूर हो सकती है । अतः सामर्थ्यशाली लोगों को भी इस दृष्टि से संगठित करने की आवश्यकता है । ऐसे लाखों धनी एवं उदार व्यक्ति हमारे देश में हैं जो अपने-अपने स्तर पर समाज के उपेक्षितों की सहायता करते हैं । पर ऐसे भी धनी लोग हैं जो राजनेताओं के प्रचार-प्रसार में धन खर्च करते हैं । उन्हें भी सद्‌कार्य में व्यय करने के लिए प्रवृत्त किया जा सकता है ।

सेवा की चौथी कडी

        स्वामी विवेकानन्द ने राष्ट्र के विकास के लिए तीन स्तरों, पर कार्य करने का निर्देश दिया । उन्होंने कहा कि ”त्याग और सेवा” यही भारत के राष्ट्रीय आदर्श हैं और बिना त्याग के सेवा सम्भव नहीं । अतः सारी समस्याओं के समाधान के लिए प्रत्येक मनुष्य को आत्मनिर्भर बनाना होगा । इसके लिए स्वामीजी ने कहा था –

(१) मनुष्य की न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति करना । रोटी, कपडा और निवास की व्यवस्था उपलब्ध कराना, प्रथम प्रकार की भौतिक सेवा ।

(२) रोटी, कपडा और घर के साथ ही शिक्षार्जन के लिए मनुष्य को आत्मनिर्भर बनाना, दूसरी प्रकार की सेवा है । 

(३) ”मैं कौन हूँ … मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है”, इस बात का बोध कराने में सहयोग देना, यह सर्वोच्च आध्यात्मिक सेवा है ।

        स्वामी विवेकानन्द के इन विचारों का गहन अध्ययन करने वाले विवेकानन्द केन्द्र के संस्थापक स्वर्गीय श्री एकनाथजी ने चौथी प्रकार की सेवा की संकल्पना देते हुए कहा कि  “ऐसे समाज की रचना करना जहाँ सेवा की आवश्यकता ही न हो ।”
        हमें सच में ऐसे आदर्श समाज की रचना करनी होगी जहाँ पर कोई सेवा की आवश्यकता न हो । ऐसा समाज जहाँ पर ‘मैं और तू’ की चर्चा न हो, बल्कि  ‘मैं’ नहीं ‘हम’ की बात हो । एक-दूसरे की सहायता के लिए योजना न बनानी पडे । जिसे सहायता की आवश्यकता दिखे, वह स्वयं प्रेरित होकर उसके सहयोग के लिए दौड पडे । फिर सेवा की बात ही नहीं होगी । वहाँ तो बस ‘कर्तव्य’ का बोध ही रहेगा । पर आदर्श समाज के निर्माण के लिए तो मनुष्य तो चाहिए ही ना । ये मनुष्य दूसरे देश से तो नहीं आयेंगे । हमें ही “Man-Making” करना होगा । … मनुष्य निर्माण एक अर्थ में कार्यकर्ताओं का निर्माण!! स्वामी विवेकानन्दजी के ही शब्दों में – ”चाहिए मनुष्य,….. केवल मनुष्य भर चाहिए । आवश्यकता है – वीर्यवान, तेजस्वी, दृढ विश्वासी और निष्कपट नवयुवकों की ! बाकी सब अपने आप हो जाएगा ।”
        आइये, हम अपने माध्यम से ऐसे मनुष्यों की खोज करें जो आदर्श समाज की रचना में अपना सर्वस्व अर्पित कर दें । ताकि हर समस्या सुलझ जाये ।….
                                                                                                     – लखेश्वर चंद्रवन्शी