मनुष्य, केवल ”मनुष्य” ही चाहिए !!

        गरीबी रेखा निर्धारण की अवधारणा को लेकर भारत के वैचारिक जगत में एक बार फिर खलबली मच गई है सरकार में रहकर योजना बनाने वाले तथा सरकार के बाहर राष्ट्रीय विषयों पर चिन्तन करने वाले अनेकों विद्वान इस पर मंथन कर रहे हैं । इस मन्थन प्रक्रिया में विष और अमृत दोनों का निकलना सहज स्वाभाविक है । यही इसकी सच्चाई है । पर इस मंथन से जो भी प्राप्त करना है वह तो स्पष्ट हो ।
        सारे मंथन का मूल एक ही है भारत को खुशहाल बनाना । प्रत्येक व्यक्ति को समृद्ध बनाना । कितना मौलिक विचार है यह ! सुनकर ही मन खुशी से झूम उठता है । परंतु समृद्धि का मापदण्ड कैसा हो ? समृद्धि के लक्षण क्या है ? क्या केवल मनुष्य को धन की पूर्ति कर देने से ही सारी समस्याएँ सुलझ जाती हैं ? इन प्रश्नों पर भी चिन्तन करने की आवश्यकता है । अभी तो देश में केवल गरीबी रेखा के निर्धारण पर बहस हो रही है । उसे दूर करने के लिए उचित सरकारी योजना तथा उसके क्रियान्वयन को लेकर बात चल रही है । ऐसे में भला हम क्यों ‘समृद्धि’ के मापदण्ड पर चर्चा करें, ऐसा प्रश्न उपस्थित होता है ।
        एक तरफ गरीबी रेखा का निर्धारण और दूसरी तरफ समृद्ध होने के मापदण्ड दोनों अलग-अलग विषय लग सकते हैं, पर ये दोनों मुद्दे एक ही हैं । योजना आयोग ने गांवों में २२.४२ रुपये तथा शहरों में २८.६५ रुपये प्रतिदिन आय को गरीबी रेखा मानने का निर्णय लिया है । परंतु हर किसी को पता है कि २२ या २८ रुपये से घर नहीं चलता । एक व्यक्ति साधारण होटल पर जब नाश्ता करता है तो ३० रुपये भी उसके लिए कम ही होते हैं फिर सरकारी मापदण्ड के अनुसार ङङ्गहम दो हमारे दो’ के गणित में २८ रुपये की आय कहीं जँचती नहीं । योजना बनाने वाले भी इस बात को जानते हैं कि चार सदस्यों के छोटे परिवार में एक दिन में कम से कम ४०० रुपये तो लगते ही हैं । फिर भी गरीबी रेखा के निर्धारण के नाम पर केवल कंगाली में जीवन-यापन करने वालों को रखा जा रहा है ।
        ऐसा कहते ही ‘कंगाली और दरिद्रता’ पर विमर्श शुरू हो जाएगा और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत में कितने प्रतिशत लोग दरिद्र हैं, इसका चित्रीकरण हो जाएगा । हमारे देश में बहस का मुद्दा समस्याओं के निर्धारण का होता है, उसे सुलझाने को लेकर नहीं । पर जब कभी सुधार को लेकर चर्चा चलती है तब पश्चिमी देशों की सुधारवादी नीतियों को उसका आधार बनाया जाता है। अलग देश, अलग मिट्टी, भिन्न स्वभाव, भिन्न स्थिति, इन भिन्नताओं के बावजूद पश्चिम का अंधानुकरण करना हमारे लिए उचित नहीं है । अतः हमें इस परिप्रेक्ष्य में भारतीय परिवेश के अनुसार नियोजन करना चाहिए, कार्ययोजना बनानी चाहिए ।

पहले भारत को समझें

        विचारवंत लोग अपनी योजना बनाते समय भारत के भौगोलिक, सामाजिक, धार्मिक एवं क्षेत्रशः समाज के मनोदशा का गहन अध्ययन करना चाहिए । क्योंकि भारत के सभी राज्यों की अपनी एक विशेषता है भाषा, वेशभूषा, सामाजिक एवं धार्मिक दृष्टि से उनमें भिन्नता पायी जाती है । यहाँ तक कि वैचारिक दृष्टि से भी उनकी सोच में कुछ अंतर दिखाई पडता है । इतनी विविधताओं के बावजूद कोई ऐसा सूत्र है जो सारे भारत वर्ष को आपस में जोडता है । हमारे देश की संस्कृति में वह ताकत है जो सारी विविधताओं को उनकी विशेषता के रूप में महिमामण्डित करने और उसे समाज द्वारा विशाल हृदय से स्वीकारने की राष्ट्रीय दृष्टिकोण प्रदान करती है । भारत में वह ‘धर्म’ समान रूप से प्रत्येक मनुष्य में व्याप्त है जो एक-दूसरे के हित की बात सोचने की प्रेरणा देता है । समाज में यही धार्मिक व्यवस्था है जो अपने साथ ही अन्यों के आराध्य देव का भी आदर करती है । हिन्दूधर्म के इस महान अवधारणा को समाज में सही रूप से प्रगट करने की आवश्यकता है । क्योंकि भारत रुपयों-पैसों की लालच से नहीं जागता, न ही सरकारी योजनाओं से, वह तो जागता है मानवता के लिए किये जानेवाले निस्वार्थ प्रयासों से । अतः योजना बनाना ऊपरी तौर पर नहीं होना चाहिए बल्कि इसका आधार सामाजिक आत्मीयता हो । 

गरीबी हटाने का समृद्ध विचार

स्वामी विवेकानन्द ने देश के सुधारवादी नीतियों के निर्धारण के सन्दर्भ में एक बार कहा था कि ”एक छोटे से गांव में यदि करोडों रुपये खर्च कर दिये जाएं तो वह गांव सुधर जाएगा, ऐसा सोचना गलत है । गांव की स्थिति सुधारने के लिए धन की आवश्यकता होती है, यह बात सही है । परंतु धन उडेलने से गांव नहीं सुधरेगा । गांव की स्थिति सुधारने के लिए वहाँ के लोगों को आत्मनिर्भरता की शिक्षा देनी होगी ।”
        सच है धन की प्रचुरता मनुष्य में विकृति को बढावा देती है । ऐसे बहुत कम लोग होते हैं जो धन पाकर अन्यों की सहायता करते हैं । इसलिए ऐसे मनुष्यों की खोज करनी होगी जो उपेक्षितों की सहायता के लिए सदैव तत्पर रहते हैं । ऐसे मनुष्यों को एकत्रीकरण कर योजना बनाना ही समाज हित में है।

वह व्यक्ति गद्दार है जो..

        हम अपने आसपास ऐसे सामर्थ्यशाली व्यक्तियों को देखते हैं जो अपने धन और पद के अहंकार में चूर होकर दूसरे लोगों की हँसी उडाते हैं, उन्हें हीन दृष्टि से देखते हैं । ऐसे लोगों के बारे में स्वामी विवेकानन्द कहते हैं कि ”मैं उस प्रत्येक व्यक्ति को गद्दार मानता हूँ जो समाज के बल पर खडा हुआ और अब वह उसकी ओर ध्यान नहीं देता ।” कितना अच्छा होता कि समाज के सक्षम व्यक्ति कम से कम एक अक्षम व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनाने का कार्य करते । इस तरीके से ही अमीरी-गरीबी की विषमता दूर हो सकती है । अतः सामर्थ्यशाली लोगों को भी इस दृष्टि से संगठित करने की आवश्यकता है । ऐसे लाखों धनी एवं उदार व्यक्ति हमारे देश में हैं जो अपने-अपने स्तर पर समाज के उपेक्षितों की सहायता करते हैं । पर ऐसे भी धनी लोग हैं जो राजनेताओं के प्रचार-प्रसार में धन खर्च करते हैं । उन्हें भी सद्‌कार्य में व्यय करने के लिए प्रवृत्त किया जा सकता है ।

सेवा की चौथी कडी

        स्वामी विवेकानन्द ने राष्ट्र के विकास के लिए तीन स्तरों, पर कार्य करने का निर्देश दिया । उन्होंने कहा कि ”त्याग और सेवा” यही भारत के राष्ट्रीय आदर्श हैं और बिना त्याग के सेवा सम्भव नहीं । अतः सारी समस्याओं के समाधान के लिए प्रत्येक मनुष्य को आत्मनिर्भर बनाना होगा । इसके लिए स्वामीजी ने कहा था –

(१) मनुष्य की न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति करना । रोटी, कपडा और निवास की व्यवस्था उपलब्ध कराना, प्रथम प्रकार की भौतिक सेवा ।

(२) रोटी, कपडा और घर के साथ ही शिक्षार्जन के लिए मनुष्य को आत्मनिर्भर बनाना, दूसरी प्रकार की सेवा है । 

(३) ”मैं कौन हूँ … मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है”, इस बात का बोध कराने में सहयोग देना, यह सर्वोच्च आध्यात्मिक सेवा है ।

        स्वामी विवेकानन्द के इन विचारों का गहन अध्ययन करने वाले विवेकानन्द केन्द्र के संस्थापक स्वर्गीय श्री एकनाथजी ने चौथी प्रकार की सेवा की संकल्पना देते हुए कहा कि  “ऐसे समाज की रचना करना जहाँ सेवा की आवश्यकता ही न हो ।”
        हमें सच में ऐसे आदर्श समाज की रचना करनी होगी जहाँ पर कोई सेवा की आवश्यकता न हो । ऐसा समाज जहाँ पर ‘मैं और तू’ की चर्चा न हो, बल्कि  ‘मैं’ नहीं ‘हम’ की बात हो । एक-दूसरे की सहायता के लिए योजना न बनानी पडे । जिसे सहायता की आवश्यकता दिखे, वह स्वयं प्रेरित होकर उसके सहयोग के लिए दौड पडे । फिर सेवा की बात ही नहीं होगी । वहाँ तो बस ‘कर्तव्य’ का बोध ही रहेगा । पर आदर्श समाज के निर्माण के लिए तो मनुष्य तो चाहिए ही ना । ये मनुष्य दूसरे देश से तो नहीं आयेंगे । हमें ही “Man-Making” करना होगा । … मनुष्य निर्माण एक अर्थ में कार्यकर्ताओं का निर्माण!! स्वामी विवेकानन्दजी के ही शब्दों में – ”चाहिए मनुष्य,….. केवल मनुष्य भर चाहिए । आवश्यकता है – वीर्यवान, तेजस्वी, दृढ विश्वासी और निष्कपट नवयुवकों की ! बाकी सब अपने आप हो जाएगा ।”
        आइये, हम अपने माध्यम से ऐसे मनुष्यों की खोज करें जो आदर्श समाज की रचना में अपना सर्वस्व अर्पित कर दें । ताकि हर समस्या सुलझ जाये ।….
                                                                                                     – लखेश्वर चंद्रवन्शी                              

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4 thoughts on “मनुष्य, केवल ”मनुष्य” ही चाहिए !!

  1. क्योंकि भारत रुपयों-पैसों की लालच से नहीं जागता, न ही सरकारी योजनाओं से, वह तो जागता है मानवता के लिए किये जानेवाले निस्वार्थ प्रयासों से । अतः योजना बनाना ऊपरी तौर पर नहीं होना चाहिए बल्कि इसका आधार सामाजिक आत्मीयता हो ।

    mai es sentence se bahooy impress hua.

  2. यह संस्कृतिक विसंगति का दौर है जिसमें आप और हम भी कुछ खास नहीं कर सकते सिर्फ प्रतिक्रिया देने के अलावा।
    मुझे उस मार्ग की तलाश है जिस पर चलकर भारत पुन: अपने गौरवशाली आचरण का अनुकरण कर सके।

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