सब लोग कुछ समय दें…


     स्वामी विवेकानंदजी की १५०वीं जयन्ती २०१३ में आ रही है । इस उपलक्ष्य में विश्वभर में बडे-बडे कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है । बडे शहरों और छोटे-बडे ग्रामों में इसके आयोजन को लेकर बहुत उत्साह है । कीर्तनकारों की टोलियां स्वामी विवेकानंदजी के जीवन तथा संदेश को लेकर इसकी तैयारी में जुट गई हैं । नाटक मंडली और उसके लेखक प्रस्तुति एवं लेखन की दृष्टि से अनेक नए-पुराने उपकरणों तथा साहित्य के चुनाव में लग गए हैं, ताकि स्वामीजी के संदेशों को अधिक सजीवता से समाज में प्रगट किया जा सके । कई शहरों एवं गावों में महानाट्‌यों, कीर्तनों तथा व्याख्यान माला का श्रीगणेश भी हो चुका है ।

     स्वामी विवेकानंद एक ऐसे संन्यासी जिन्होंने कला, साहित्य, विज्ञान, आध्यात्म तथा सामाजिक उत्थान के किसी भी क्षेत्र की अनदेखी नहीं की । अपने बुद्धिबल, अपनी हृदय की संवेदना तथा अपने जीवन यात्रा के सारे अनुभवों के आधार पर उन्होंने सामाजिक तथा वैश्विक जीवन के प्रत्येक विषयों को बडी बारीकी से देखा । भारतीय मनीषियों के सिद्धांतों एवं इतिहास के सकारात्मक तथा नकारात्मक परिणामों पर गहन चिन्तन किया । अपने गुरु ठाकुर रामकृष्ण परमहंस के चरणों में बैठकर उन्होंने धर्म, आध्यात्म तथा सामाजिक समरसता की शिक्षा ग्रहण की । इतना ही नहीं, उन्होंने अपने गुरुदेव के निर्देशों का पालन करने के लिए संसार की सारी चुनौतियों के बीच सिंहवत खडे होकर प्रत्युत्तर देने के लिए आजीवन कार्य किया ।
     ठाकुर द्वारा बताए गए संदेशों में, ”मानव सेवा ही माधव सेवा है” यह संदेश इस बात को रेखांकित करता है कि मनुष्य-मनुष्य के बीच व्याप्त विषमता को दूर करने के लिए मानव के भीतर ”नारायण” को देखना चाहिए । जाति-भाषा के आधार पर समाज में एक-दूसरे के प्रति आपसी कटुता का भाव का होना परमात्मा का अपमान ही तो है । फिर समाज का एक तथाकथित पढा-लिखा वर्ग धर्म, सम्प्रदाय, संस्कृति, समानता तथा आधुनिकता का वास्तविक अर्थ जाने बिना मनमानी तरीके से उसके प्रतिपादन में लगा रहता है । ऋषि-मुनियों की महान साधना से युक्त हमारा देश अपने ही लोगों के मानसिक गुलामी का दंश झेल रहा है । अज्ञानता तथा वैचारिक अस्पष्टता के इस अंधकार को दूर करने के लिए विवेकानंद के विचारों का प्रगटीकरण होना युगानुकूल है । स्वामी विवेकानंदजी की यह सार्धशती समारोह इसके लिए सर्वोत्तम अवसर है ।

              हम बडे ही सौभाग्यशाली हैं कि हमारे जीवन काल में स्वामी विवेकानंदजी की १५०वीं जयंती आ रही है । न जाने उनकी द्विशताब्धी (२००वीं) जयंती पर हममें से कितने बचेंगे और बच भी गए तो क्या शरीर में शक्ति भी होगी ? तो इस युवाजीवन में उनकी इस जयंती के अवसर पर २ वर्ष, १ वर्ष, ६ महीने का महत्वपूर्ण क्षण क्या हम अर्पित कर सकते हैं ? यदि हम प्रबुद्ध समाज हैं तोअपने अनुभव के आधार पर युवा पूर्णकालीन तथा स्थानिय कार्यकर्ताओं के साथ तन-मन-धन से खडे हो सकते हैं । सेवानिवृत्त ५० से ६० वर्ष के आयु वाले बडे बुजुर्ग वानप्रस्थी कार्यकर्ता बन दो वर्ष का अपना पूरा समय दे सकते हैं ।
             शिक्षक एवं प्राध्यापक अपने छात्रों में स्वामीजी के जीवन तथा संदेशों पर आधारित अनेक स्पर्धाओं का आयोजन कर सकते हैं । साहित्य प्रकाशन संस्था तथा लेखक इस अवसर पर स्वामी विवेकानंद सार्धशती समारोह का “लोगो” अपनी पुस्तकों, दिनदर्शिका तथा दैनंदिनी में छपवा सकते हैं । सायकिल यात्रा, पद यात्रा, पथनाट्‌य स्पर्धा, वक्तृत्व स्पर्धा तथा अध्यात्म, मानवता, शिक्षा, समानता आदि विषयों पर सेमिनार, संगोष्ठी तथा परिचर्चाओं का भी आयोजन किया जा सकता है ।
            समाज का प्रत्येक व्यक्ति, बालक से बुजुर्ग तक, पुरुष-महिला, शिक्षक, प्राध्यापक, इंजीनियर, वकील, व्यापारी या सरकारी कर्मचारी सब मिलकर निभा सकते हैं अपनी महत्वपूर्ण भूमिका । क्योंकि स्वामीजी की जयंती का सुनियोजित तथा व्यवस्थित सामूहिक समारोह ही विजयी होने का उत्साह भारत में भर सकता है । विश्व का नेतृत्व करने की अब हमारी बारी है । ”जगद्‌गुरु भारत” का उद्‌घोष शीघ्र ही अखिल विश्व में गूंजेगा । बस, माँ भारती को आपकी भूमिका की प्रतीक्षा है । इसलिए सब लोग ”कुछ” समय दें । क्षमता से अधिक कार्य करें । रामसेतु के निर्माण में तो गिलहरी ने भी अपना सौ प्रतिशत से अधिक योगदान दिया था । परंतु हमें तो हनुमान की भूमिका निभानी है, साथ में जाम्बवन्त, सुग्रीव, नल-नील, अंगद और विभिषण के साथ ही सारी वानर सेना भी चाहिए ।
      आइये, पूरी निष्ठा तथा पूर्ण समर्पण से राष्ट्र पुनरूत्थान के इस धर्म कार्य में हम सभी मिलकर अपनी सक्रिय भूमिका निभाएँ।
                                    स्मरण रहे – सब लोग कुछ समय अवश्य दें…
                                                                                                      – लखेश्वर चंद्रवन्शी

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