”शिक्षार्जन” के बदलते मानक

MAGDH MAHILA COLLEGE ME B.ED KE FORM KE LIYE LAGI BHEEDस्कूली परीक्षा समाप्त होते ही विद्यालयों में प्रवेश पाने के लिए होड़ सी मच गई है। इन विद्यालयों को विद्यालय नहीं, सुपर विद्यालय कहिए तो अच्छा होगा! देश के छोटे-बड़े सभी शहरों में ऐसे कई विद्यालय हैं जो यह कहते नहीं थकते कि हमारी स्कूल शहर की नामी स्कूलों में से एक है। वे यहां तक कहने में नहीं चुकते कि हमारी स्कूल ही शहर में सबसे बेस्ट है। ये विद्यालय जितने बड़े होते हैं, उससे कहीं अधिक बढ़ा-चढ़ाकर वे अपने शिक्षा संस्था की विशेषताओं का बखान करते हैं, और यही इन शिक्षालयों की सबसे बड़ी विशेषता भी बन गई है। हैरान करने वाली बात यह है कि इन विद्यालयों की बहुरंगी प्रवेश पत्रिका और स्कूल परिसर की साज-सज्जा, कार्टूनों के चित्रों आदि ताम-झाम के आकर्षण से अभिभावक बच नहीं पाते और अपने बच्चों को शिक्षा सम्पन्न बनाने के लिए हजारों-लाखों रुपये खर्च करने में तनिक भी नहीं हिचकिचाते। कई ऐसे भी अभिभावक होते हैं जो आर्थिक तंगी के बावजूद कर्ज लेकर बड़े स्कूल में अपने बच्चे का एडमिशन करवाते हैं।

क्या केवल रुपये खर्च करने मात्र से ही ज्ञान प्राप्त हो जाता है? क्या नामी विद्यालयों में प्रवेश पा जाने भर से विद्यार्थी का विकास हो जाता है? इन प्रश्नों पर गंभीरता से अभिभावकों के साथ ही समग्र समाज को चिंतन करना आवश्यक है। फिर, ज्ञानार्जन की श्रेष्ठ विधि कौन-सी है? यह भी बात मन में उठती है। वैसे वर्तमान पीढ़ी बाल्यवस्था के प्रति अधिक सचेत लगती है। चाहे वह शिक्षा का क्षेत्र हो या बच्चों के स्वास्थ्य का विषय। अपने बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य को लेकर अभिभावकों के इस चिंता का लाभ उठाकर ही व्यवसायी बुद्धि के शिक्षा के ठेकेदार और डॉक्टर्स अधिकाधिक धन बटोरने में लगे हैं। अभिभावकगण अपने बच्चों के विकास के लिए हर संभव प्रयत्न करते हैं फिर भी इच्छानुरूप सकारात्मक परिवर्तन दिखाई नहीं देता। छात्र तनावपूर्ण अवस्था में स्कूली जीवन गुजारता है और अभिभावक बालकों को सफल जीवन जीने योग्य सक्षम बनाने के लिए जी तोड़ मेहनत करते हैं। इतनी मेहनत कि कभी-कभी तो छात्र अभिभावक से परेशान हो जाते हैं और विद्यार्थी जीवन उसके लिए बोझिल हो जाता है। वहीं आए दिन समाचार पत्रों और टीवी चैनलों पर अनेक समाचार आते रहते हैं जिससे स्कूलों में हुए शोषण,दुष्कर्म,हत्या जैसी घटनाओं का पता चलता है। टीवी पर कई दिनों तक इस पर बहस का दौर चलता है कि मोटी फीस देकर भी बड़े-बड़े स्कूलों में छात्र-छात्राएं सुरक्षित क्यों नहीं? पर कोई इस बात पर विमर्श नहीं करता कि देश में शिक्षा का स्तर कैसा हो? शिक्षा के साथ संस्कार कैसे दिये जाएं? आदर्श समाज कैसे बनें? इसके लिए हमें क्या करना चाहिए?

NOTREDOM SCHOOL MAI ADDMISSION KE LIYE BACHCHE KO LEKER JATEआज माँटेसरी (नर्सरी)शिक्षा को प्राथमिकता देने के कारण प्रारंभ से ही छात्रों के ज्ञानेन्द्रियों को तीक्ष्ण बनाने पर जोर दिया जा रहा है। परंतु यदि मन ही चौकस, तीक्ष्ण, ग्रहणशील और प्रशिक्षित न हो तो ज्ञानेन्द्रियां ज्ञान को ग्रहण नहीं कर सकतीं। इसलिए प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति ज्ञानेन्द्रियों की अपेक्षा मन को प्रशिक्षित करने पर जोर देती थी। तभी तो हमारे पूर्वज प्रखर बुद्धिमान और ओजस्वी थे। उनकी मेधा शक्ति इतनी विकसित थी कि स्मरण, आकलन और ज्ञान के प्रकटीकरण में आज वे विश्वविख्यात हैं।  

यह समझना हमारे लिए अतिआवश्यक है कि केवल इमारत खड़ा कर देने से ही “शिक्षण” का कार्य शुरू नहीं हो जाता, न ही “शिक्षा” किसी विद्यालय का पर्याय हो सकता है। आज विद्यालय में बड़ी-बड़ी इमारतें हैं, कक्षाएं हैं, प्रयोगशालाएं हैं, परीक्षार्थी और परीक्षक भी हैं। परंतु विद्यार्जन का योग्य वातावरण नहीं है। शिक्षिकाएं सज-धजकर पूरे मेकअप के साथ विद्यालय में आती हैं। उनके परिधान में इतनी विविधता होती है कि सभी का ध्यान उनके पोषाक की ओर ही जाता है। यहां तक कि विद्यालय के वार्षिक सम्मेलन में आजकल विद्यार्थियों का फैशन शो रखा जा रहा है, मौके का फायदा उठाकर शिक्षक, विशेषकर शिक्षिकाएं फैशन शो में उतर रही हैं। स्कूलों में जिन गानों पर आजकल विद्यार्थी डांस करते हैं वह भी बेहद चिंताजनक है। यूं तो आजकल सिनेमा जगत के लगभग हर फिल्म में शराब, पार्टी तथा बेपरवाही के नाम पर लापरवाही माहौल को बढ़ावा देकर समाज को कलुषित करने का षड्यंत्र चल रहा है। और इस माहौल से हमारा समाज ही नहीं तो देश की शिक्षण संस्थाएं खूब प्रभावित हैं। आप भी निजी तौर पर कई स्कूल और महाविद्यालयों को जानते ही होंगे जहां इस तरह का वातावरण बनाया जाता है। फिर आप ही सोचिए कि, बाहरी दिखावे में व्यस्त तथा पाठ्यक्रम को पूर्ण करने में तनावग्रस्त शिक्षक-शिक्षिकाएं भला छात्रों को तनाव मुक्त कैसे बना सकते हैं? ऐसे समय में तनावरहित ज्ञानार्जन की पद्धति से अवगत होना अत्यावश्यक है।

school_buildingअभिभावकगण विज्ञापनों तथा करियर को लेकर बढ़ती प्रतिस्पर्धा के प्रभाव में बह जाते हैं। इसलिए वे अपने बच्चों को ट्यूशनस, डांस, तैराकी सभी तरह के प्रशिक्षण में व्यस्त कर देते हैं। उन्हें लगता है कि नाच-गाना, तैराकी और फैशन से उनके बच्चों का शारीरिक व मानसिक विकास होता है। परंतु वे इस बात को भूल जाते हैं कि शरीर, मन और बुद्धि की क्षमता का विकास तो पवित्र वातावरण में ही हो सकता है। इसलिए समाज में पवित्रता का वातावरण बनना आवश्यक है।

शिक्षा तो ज्ञान के वातावरण का नाम है, जहां पर आते ही सीखने की जिज्ञासा स्वतः प्रगट होती है। इसलिए जहां ज्ञानार्जन का वातावरण है उसे ही विद्यालय कहना चाहिए। वास्तव में शिक्षार्जन का योग्य वातावरण की निर्मिति करना आवश्यक है, क्योंकि उचित वातावरण में शिष्य पौधे की भांति विकास करता है। नियमित प्रार्थनाएं और पवित्र वातावरण बालकों की कल्पनाशीलता, तार्किकता और निर्णय क्षमता को विकसित करने के लिए सहायक होती हैं। इसके द्वारा ही मन को प्रशिक्षित किया जाता है। परंतु आज की शिक्षा पद्धति मन के प्रशिक्षण की ओर अधिक ध्यान नहीं देता। क्या ज्ञान को बाहर से भरा जा सकता है जैसा कि, आधुनिक शिक्षाविद्‌ सलाह देते हैं।

हमारा दर्शन शास्त्र कहता है, “ज्ञान हमारे अंदर ही है” और हमारी संस्कृति में इसी को महत्व दिया गया है। इस विधि में छात्र को ज्ञान अर्जित करने के लिए स्वयं को प्रयास करना होता है। उपयुक्त वातावरण और अनुशासन के पालन से ही छात्रों में अंतर्निहित ज्ञान प्रकट होता था। जिसका उपयोग वे जीवन के सभी क्षेत्रों में करते थे। इसलिए अनुशासन को इतना अधिक महत्व दिया जाता था। स्वामी विवेकानन्द ने शिक्षा को व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के उत्थान के लिए आवश्यक माना है। उन्होंने हर समस्या का निदान शिक्षा को बताया। स्वामीजी के अनुसार, शिक्षा का उद्देश्य मानव में निहित पूर्णता की अभिव्यक्ति है। इस दृष्टि से मनुष्य निर्माण ही शिक्षा का मुख्य उद्देश्य है।

प्राचीन शिक्षा विधि में विषय को याद करने और सीखने में इतना मानसिक तनाव नहीं झेलना पड़ता था क्योंकि विद्यार्थी परीक्षा में उत्तीर्ण होने के लिए नहीं वरन ज्ञानार्जन के लिए शिक्षा ग्रहण करते थे। इसलिए वे परीक्षा देने के लिए सदैव तत्पर रहते थे और परीक्षा देने के बाद भी उनका ज्ञान कम नहीं होता था। इसके विपरीत वर्तमान छात्र को परीक्षा देने के लिए विशेष तैयारी करनी पड़ती है, वे पाठों को रटते हैं और परीक्षक को अपनी उत्तर पुस्तिका थमाने के साथ ही वह ज्यादातर रटी-रटायी बातें भूल जाता है। आजकल एक कहावत खूब प्रचलित है- “इतिहास भूगोल बड़ी बेवफ़ा, रात में पढ़ो दिन में सफा।”

imagesआधुनिक शिक्षित मनुष्य का ज्ञान उसकी पुस्तकों में है और वह अपने नोट्‌स देखे बिना शायद ही किसी कथन को अधिकारपूर्वक बोल सकता है। जबकि प्राचीन शिक्षक चलते-फिरते पुस्तकालय थे और हर समय संदर्भ दे सकते थे, इसलिए उन्हें पंडित भी कहा जाता था। पश्चिम के बहाव में बहने वाले हमारे भारतीय समाज को ज्ञानार्जन की सही पद्धति की आवश्यकता है। व्याख्यान विधि का अधिकाधिक प्रयोग तो पश्चिमी देशों में होता है। जबकि प्राचीन शिक्षा पद्धति में शिक्षक द्वारा प्रश्नोत्तर विधि का खुलकर प्रयोग किया जाता था। शिक्षक और विद्यार्थी के मध्य अद्वितीय और आदर्श संबंध थे। शिक्षा की पवित्र पीठों में स्नेह, सौहार्द्र और निष्कपटता का वातावरण था। शिक्षक-विद्यार्थी परस्पर धर्म के सूत्र में बंधे होते थे। शिक्षक छात्र को पितृवत्त स्नेह देते थे और छात्र उनके प्रति गहन श्रद्धा रखते थे। भावनाओं का यह मधुर संगम इस धरती पर स्वर्ग से भी उत्तम परिस्थितियों को उपस्थित करता था। लेश मात्र भी वाणिज्य बुद्धि का इन संबंधों में स्थान नहीं था। गुरु पूर्ण ईमानदारी से व प्रेमपूर्वक अपना पाठ पढ़ाते थे और शिष्य भी उसे श्रद्धापूर्वक ग्रहण करते थे।

परंतु दुर्भाग्य से यह स्थिति बदल गई है। आधुनिकीकरण की आड़ में पश्चिमीकरण से बालक अकर्मण्य और सुविधाभोगी बनते जा रहा है। इंटरनेट, मोबाइल जैसी सुविधाएं जानकारी बढ़ाने, संग्रहित और सम्प्रेषित करने के लिए तो उपयुक्त तो है ही, किन्तु सोशल मीडिया का गुलाम हो जाना या उसी पर आश्रित हो जाना ठीक नहीं है। इंटरनेट ऐसी वस्तु है जहां विषअमृत रहे एक ही संगावाली बात है। विवेक बुद्धि जबतक सक्रिय है मन को सही दिशा में ले जाती है। लेकिन समाज और विद्यालय में योग्य वातावरण नहीं मिले तो इंद्रिय संयम और मन के प्रशिक्षण की सारी व्यवस्थाएं चौपट हो जाती हैं। इसलिए भारत को “भारत” बनाने के लिए हमें फिर से हमारे शिक्षा के सिद्धांतों पर विचार करना होगा एवं उचित शिक्षा-विधियों के द्वारा हमें भारतीय संस्कृति का पुनर्जागरण करना होगा। व्यवसायी बुद्धि से भरे शिक्षालयों के ठेकेदारों को इस बात पर चिंतन करना होगा। सभी शिक्षण संस्थाओं को अपने विद्यालयों में पवित्र वातावरण के निर्माण के लिए योजना बनानी होगी, जिससे कि छात्र अपने जीवन में भौतिक व आध्यात्मिक दृष्टि से पूर्णता की ओर अग्रसर हो सके।

संक्षेप में कहा जाए तो आज भारतीय शिक्षा पद्धति के अध्ययन व अनुसन्धान की आवश्यकता है, इस पर भारतीय शिक्षण मंडल कार्य कर रहा है। वहीं रामकृष्ण मिशन, विवेकानन्द केन्द्र, शारदा मठ, विद्याभारती जैसे संगठन अपने विद्यालयों के माध्यम से शिक्षा और संस्कार का अलख जा रहे हैं। विवेकानन्द केन्द्र ने असम, अरुणाचल, नागालैंड, अंदमान, तमिलनाडु और कर्णाटक राज्य में विवेकानन्द केन्द्र विद्यालय तथा आनंदालय के माध्यम “मनुष्य निर्माण और राष्ट्र पुनरुत्थान” के ध्येय के अनुरूप शैक्षिक वातावरण बनाया है। केन्द्र को इसमें अच्छी सफलता भी मिली है। आवश्यकता है कि देश की सभी शिक्षा संस्था/संस्थान अपने विद्यालयों तथा महाविद्यालयों में शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार की दिशा में गंभीरता से कार्य करें। देश की समग्र शिक्षा संस्थान यह ठान ले कि हम अपने विद्यालयों में भाषा, गणित, विज्ञान, इतिहास, भूगोल, पर्यावरण आदि विषयों के साथ ही चरित्र निर्माण पर जोर देंगे तो निश्चय ही समाज में परिवर्तन आएगा।  

                                                                                                       – लखेश्वर चंद्रवन्शी लखेश”, नागपुर

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