जनता की कृपा…


अरे ! नेताजी ! नमस्ते !!
जरा मेरी चप्पल तो देखिए ।
एकदम चकाचक है,
ईमानदारी की कमाई से खरीदी है ।
दूकानदार को बदले में,
पूरे सौ रुपये दिये हैं ।
ईमानदारी और श्रम ही
मुझे सुहाता है ।
बेईमानों का क्या है ?
झूठ बोलकर उन्हें सिर्फ
लूटना आता है ।
इस बात पर नेताजी पहले तो झल्लाये,
फिर बाद में
अचानक ही मुस्कुराये ।
और बोले, बेटा !
ये ईमानदारी का जमाना
नहीं है ।
यहाँ ईमानदारों का ठिकाना
नहीं है ।
मेरी ओर देखो और सोचो !
कि हम इतने अच्छे 
कैसे दिखते हैं ?
अच्छे-अच्छे  कपडे
और चप्पल हमें कहाँ
से मिलते हैं ?
हमने बहुत सोचा
अपना दिमाग लगाया ।
पर समझ में न आया,
तो नेताजी ने फिर
दोहराया – 
ये सफेद-सफेद उज्ज्वल कपडे
नेता बनने पर खरीदे हैं ।
रही बात चप्पलों की
तो ये जनता ने ही दिये हैं ।
जब चप्पलें टूट जाती हैं
या फिर
कूर्सी छूट जाती है,
तब हम जनता को लूटते नहीं हैं ।
सिर्फ भाषण दे देते हैं ।
भाषण के बदले बिन मांगे
ईनाम में जनता हमें चप्पलें
और जूते फेंककर देते हैं ।
नेता ने इस तरह अपने
रंग-बिरंगी चप्पलों के राज
को खोला ।
अपने बेईमानी के चोले और
उसके फायदे को विस्तार से
समझाते हुए बोला –
ईमानदारी करने से रुपये तो दूर,
चप्पल तक नहीं मिलते हैं ।
बेईमानी करके देख बच्चे !
चप्पलों के हार गले में
खिलते हैं ।

– लखेश्वर चंद्रवन्शी “लखेश”

 

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