पहले दाता शिष्य भया….

गुरु पूर्णिमा पर विशेष :

          भारतीय तत्व चिन्तन एवं साधना के विमल क्षेत्र में गुरु की प्रतिष्ठा अनिवार्य रूप से होती रही है। गुरु से विरत होकर कोई कार्य सम्पन्न नहीं किया जाता था । भारतीय विचारधारा के अनुरूप जीवन के प्रत्येक कार्य क्षेत्र में गुरु का संग होना आवश्यक समझा जाता है। बिना गुरु के ज्ञान पूर्ण नहीं होता था, ज्ञान की प्रामाणिकता सिद्ध नहीं होती है । हम किसी भी क्षेत्र में कितने भी योग्य क्यों न हो जायें लेकिन यदि हमारे सिर पर गुरु का हाथ न हो तो हमारा सारा ज्ञान अप्रामाणिक होता है, हमारे ज्ञान की पुष्टि नहीं होती मन में भ्रम बना रहता है । इसलिए गुरु का महत्व और भी व्यापक हो जाता है । शिशु के जन्मदाता, शिशु की सेवा करने वाली दाई, नाम रखने वाले पण्डित, शिक्षा देने वाले शिक्षक, विवाह सम्पन्न करने वाले पुरोहित, मंत्र देने वाला धार्मिक व्यक्ति तथा अंतिम संस्कार करने वाला सामाजिक व्यक्ति – ये सभी तो गुरु माने जाते हैं । इन सभी से श्रेष्ठ और महान् गुरु है जो जीव को भय-बन्धन से मुक्त कर दिव्य जीवन प्रदान करता है । इसी गुरु को सद्गुरु की उपाधि मिलती है । सद्गुरु के समान अधिकारी, मनुष्यों में तो कोई है ही नहीं, देव-वर्ग भी इस श्रेणी में नहीं आते । सदगुरु कबीर साहब ने गुरु को गोविन्द से भी अधिक महत्व दिया है ।

गुरु गोविन्द दोउ खडे, काके लागूँ पाँय ।

बलिहारी गुरु आपने, जिन गोविन्द दियो लखाय ।।

          सदगुरु कबीर की भाँति सहजो बाई भी गुरु की महिमा को प्रभु की महिमा से अधिक महत्ता सम्पन्न समझतीं हैं । वह अपने एक पद में कहती हैं – 

राम तजूँ पर गुरु न बिसारूँ,

गुरु के सम हरि कूँ न निहारूँ ।

          वह प्रभु का परित्याग कर सकती है किन्तु गुरु को भुला नहीं सकती । प्रभु और गुरु की तुलना करते हुए आगे कहती हैं । ईश्वर इस संसार में जन्म देकर उसको काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह इन पंच विकारों से ग्रस्त करता है परन्तु गुरु उन विकारों से विमुक्त कर देता है । ईश्वर कौटुम्बिक माया-ममता में जन्म देता है । किन्तु गुरु मायाबद्ध जीव को स्वच्छन्द कर देता है । ईश्वर ने विविध प्रकार के रोगों और भोगों को जन्म दिया है, गुरु उनका विनाश करके आत्म दर्शन करवाने में समर्थ होता है । मन सोचने पर तब और भी विवश हो जाता है जब वह कहती है :-

हरि ने मोसूँ आप छिपायो,
गुरु दीपक दे ताही दिखायो ।
फिर हरि बंध मुक्ति गति लाये,
गुरु ने सब ही भरम मिटाये ।
चरणदास पर तन मन वारूँ,
गुरु न तजूँ हरि कूँ तजि डारूँ ।।

          परमात्मा ने तो अपने आप को जीव मात्र से छिपा रखा है, धन्य है मेरे गुरु, जिन्होंने ज्ञान का दीपक देकर उस प्रसन्न स्वरूप का प्रत्यक्ष दर्शन करा दिया । ईश्वर ने जीव को उत्पत्ति, विकास और विनाश (सत, रज और तम) में उलझा रखा है। इस बंधन और मुक्ति के भ्रम को मिटाने वाला मेरे सदगुरु चरणदासजी साहब पर मैं तन, मन और प्राण न्यौछावर करने को तैयार हूँ । इस प्रकार भक्तिन सहजो बाई गुरु का त्याग नहीं कर सकती, चाहे भगवान उनसे छूट क्यों न जाये । 

क्या ऐसा सदगुरु हमें मिल सकता है ?

लगन कठिन मेरे भाई,
गुरु से लगन कठिन मेरे भाई ।
लगन लगे बिन काज न सरिहैं,
जीव परलय तर जाई ।

          गुरु से लगन लगाना बहुत कठिन है मन, वचन और कर्म से गुरु को चरणों में लौ लगाना कठिन है । यदि ऐसा न हो सका तो जीव जन्म-मरण के चक्र में फंसा ही रहता है । संत कबीर आगे कहते हैं –

मिरगा नाद शब्द सनेही, शब्द सुनन को जाई ।
सोई शब्द सुन प्राण देत है, तनिको न मन में डराई ।

          मृग नाद में मस्त होकर अपना प्राण दे देता है । परन्तु प्राण जाने के भय से वह स्वयं को नाद से विलग नहीं रख सकता । उसी प्रकार सती और पपीहा का उदाहरण देते हैं कि सती होने वाली नारी कभी अग्नि के भय से नहीं भागती । पपीहा प्यासा ही मरना पसंद करता है परन्तु स्वाति बूँद के सिवा किसी अन्य जल का वह पान नहीं करता । दो वीर यदि युद्ध में लडते हैं तो उन्हें केवल विजय के सिवा कुछ नहीं दिखता । वे हार के डर से युद्ध भूमि से पलायन नहीं करते । सदगुरु कहते हैं :-

छोडो अपनी तन की आशा, निर्भय होय गुन गाई ।
कहे कबीर ऐसे लौ लावे, सहज मिले गुरु आई ।।

          मृग, पपीहा, सती और योद्धा की तरह अपने मन की आशा छोड निर्भय होकर गुरु का गुण गाओ । ऐसा लौ, ऐसी तीव्र जिज्ञासा जब हमारे अंदर जागृत होगी तो स्वयं सदगुरु सहज ही हमें मिल जायेंगे ।

गुरु शिष्य मर्यादा

          हम गुरु की कृपा से चाहे कितने भी ज्ञानी क्यों न हो जायें परन्तु गुरु के सामने तुच्छ ही हैं । स्वयं को कभी भी गुरु से अधिक नहीं समझना चाहिए । जैसे हमारे जीवन में गुरु का महत्व है वैसे शिष्य के आचरण का समर्पण का भी महत्व है । सदगुरु कबीर की दृष्टि में शिष्य की महानता भी आवश्यक है । वे कहते हैं :-

पहले दाता शिष्य भया, तन मन अरपे शीश ।
दूजे दाता गुरु भया, जिन नाम दिया बख्शीश ।।

          तो शिष्य का भी महत्व है । उसके समर्पण का, प्रेम का ताकि गुरु उसे नाम का, ज्ञान का पुरस्कार दे सके । उसी प्रकार हमें, गुरु को हमसे दुख हो, ऐसा कृत्य नहीं करना चाहिए । यदि गुरु रूठे तो उन्हें तुरन्त मना लेना चाहिए ।

कबिरा ते नर अंध है, गुरु को समझे और ।
हरि रूठे गुरु शरण हैं, गुरु रूठे नहीं ठौर ।।

          संसार में आज गुरु बनाने की और शिष्य बनाने की होड-सी लगी है । इसमें आज योग्यता नहीं देखी जाती । पान-फूल, धोती-रुपए चढाकर कण्ठी धारण कर ली जाती है मन में प्रेम नहीं और जबरदस्ती जल्दी-जल्दी में नाम स्मरण किया जाता है । गुरुभक्ति में अनुशासन का भी महत्वपूर्ण स्थान है । जबरदस्ती से और स्वेच्छा से की गई भक्ति में अंतर है । प्रेमपूर्वक भक्ति अनुशासन के अन्तर्गत आती है जबकि जबरदस्ती का नाम-स्मरण (भक्ति) बंधन कहलाता है ।

जान गुरु, मन चेला 

          हम किसी भी शरीर को नहीं पूजते । जिसकी हम उपासना करते हैं, जिनके चरण का चरणामृत लेते हैं वे ज्ञान स्वरूप व ब्रह्मस्वरूप होते हैं । शिष्य को कभी भी अपने गुरु के प्रति अविश्वास या संदेह नहीं होना चाहिए । गुरु की निंदा व गुरु का विरोध प्रत्यक्ष तो दूर मन में भी नहीं लाना चाहिए ।

‘‘गुरु की निंदा सुने जो काना,
ताको नाही मिले भगवाना ।”
‘‘गुरु की करनी गुरु भरेगा,
                  चेला की करनी चेला ।।” (कबीर बानी) 

          अतएव गुरु की भक्ति ही केवल मन में हो । गुरु के प्रति प्रेम और श्रद्धा इतनी अधिक हो जाये जिससे कि हम गुरु के कृपा-पात्र बन जाएँ । आइये, हम परमात्मा से ऐसा निवेदन करें कि वे हमारे मन में भक्ति का ऐसा दीपक प्रकाशित करें जिससे अज्ञान का अंधकार दूर हो जाये और अहंकार का नाश हो जाये । पूर्ण समर्पण भाव से…..

मेरा मुझमें कुछ नहीं, जो कुछ है सो तोर ।
तेरा तुझको अर्पता, का लागत है मोर ।।

– लखेश्वर चंद्रवन्शी ‘लखेश’

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गुरुपुत्र फतेहसिंह, जोरावरसिंह

          भारतीय इतिहास में सिख गुरुओं के त्याग, तपस्या व बलिदान का एक महत्वपूर्ण अध्याय है । घटना उस काल की है जब भारत पर मुगल साम्राज्य था । औरंगजेब एक कट्टर मुसलमान था । इस्लाम स्वीकार कराने के लिए उसने हिन्दुओं को अनेक प्रकार के कष्ट दिये । वह सम्पूर्ण भारत को इस्लाम का अनुयायी बनाना चाहता था । अनेकों स्थानों पर मंदिरों को तोडकर मस्जिदें बनायी जा रही थीं । हिन्दुओं पर नाना प्रकार के कर लगाये गये । कोई भी हिन्दू शस्त्र धारण नहीं कर सकता था । घोडे पर सवारी करना भी हिन्दुओं के लिए वर्जित था । मुगल शासन भारतीय संस्कृति तथा धर्म को समाप्त कर देना चाहता था । गुरुगोविन्दसिंह जी के चार पुत्र थे- अजीत सिंह, जुझारसिंह, जोरावरसिंह और फतेहसिंह ।

          एक बार गुरु गोविन्दसिंह जी आनंदपुर में थे । मुगलों ने पहाडी नरेशों की सहायता से किले को चारों ओर से घेर लिया । मुगल सेना अनेक प्रयत्नों के बाद भी किले पर विजय पाने में असफल रही । हताश होकर औरंगजेब ने गुरुजी को संदेश भेजा । औरंगजेब ने कुरान की शपथ लेकर कहा कि यदि गुरुगोविन्द सिंह आनंदपुर का किला छोडकर चले जाते हैं तो उनसे युद्ध नहीं किया जायेगा । गुरुजी को औरंगजेब के कथन पर विश्वास नहीं था । फिर भी सिखों से सलाहकर गुरुजी घोडे से सिखों (सिख-सैनिकों) के साथ बाहर निकले । बाहर निकलते ही मुगल सेना ने उन पर आक्रमण कर दिया । सरसा नदी के किनारे भयंकर युद्ध हुआ । सिख सैनिक बहुत कम संख्या में थे । फिर भी उन्होंने मुगलों से डटकर मुकाबला किया और मुगल-सेना के हजारों सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया । गुरुजी युद्ध करते हुए चमकौर की ओर से बढने लगे । उस समय गुरुजी के दोनों बडे पुत्र अजीतसिंह तथा जुझारसिंह उनके साथ थे । दूसरे दिन मुगलों के साथ सिखों का भयंकर युद्ध हुआ । इस युद्ध में वीरता के साथ लडते हुए १८ वर्षीय अजीतसिंह और १५ वर्षीय जुझारसिंह वीरगति को प्राप्त हुए ।

         आनंदपुर छोडते समय ही गुरुगोविन्दसिंह जी का परिवार बिखर गया था । गुरुजी के दोनों छोटे पुत्र जोरावरसिंह तथा फतेहसिंह अपनी दादी, माता गुजरी के साथ आनंदपुर छोडकर आगे बढे । जंगलों, पहाडों को पार करते हुए वे एक नगर में पहुँचे । वहाँ कम्मो नामक पानी ढोने वाले एक गरीब मजदूर ने गुरुपुत्रों व माता गुजरी की प्रेमपूर्वक सेवा की । उसी कस्बे में गंगू नामक एक ब्राम्हण, जो कि गुरु गोविन्दसिंह के पास २२ वर्षों तक रसोइए का काम करता था, किसी कार्यवश आया था । गंगू जो कि मुगलों से मिला था । धन के लालच में उसने गुरुमाता व बालकों से विश्वासघात किया । एक कमरे में बाहर से दरवाजा बंद कर उन्हें कैद कर लिया तथा मुगल सैनिकों को इसकी उसने सूचना दे दी । मुगलों ने तुरंत आकर गुरुमाता तथा गुरु पुत्रों को पकडकर कारावास में डाल दिया । कारावास में रातभर माता गुजरी बालकों को सिख गुरुओं के त्याग तथा बलिदान की कथाएं सुनाती रहीं । दोनों बालकों ने दादी को आश्वासन दिया कि वे अपने पिता के नाम को ऊँचा करेंगे और किसी भी कीमत पर अपना धर्म नहीं छोडेंगे ।
         प्रात: ही सैनिक बच्चों को लेने आ पहुँचे । निर्भीक बालक तुरन्त खडे हो गये । दोनों बालकों ने दादी के चरण स्पर्श किये। दादी ने बालकों को सफलता का आशीर्वाद दिया। बालक मस्तक ऊँचा किये सीना तानकर सिपाहियों के साथ चल पडे । लोग बालकों की कोमलता तथा साहस को देखकर उनकी प्रशंसा करने लगे । गंगू आगे-आगे चल रहा था। अनेक स्त्रियां घरों से बाहर निकलकर गंगू को कोसने लगीं । बालकों के चेहरे पर एक विशेष प्रकार का तेज था, जो नगरवासियों को बरबस अपनी ओर सहज ही आकर्षित कर लेता था। बालक निर्भीकता से नवाब वजीर खान के दरबार में पहुँचे । दीवान के सामने बालकों ने सशक्त स्वर में जय घोष किया – जो बोले सो निहाल – सत श्री आकाल । वाहि गुरुजी का खालसा – वाहि गुरुजी की फतह ।।
         दरबार में उपस्थित सभी लोग इन साहसी बालकों की ओर देखने लगे । बालकों के शरीर पर केसरी वस्त्र, पगडी तथा कृपाण सुन्दर दिख रही थी । उनका नन्हा वीरवेश तथा सुन्दर चमकता चेहरा देखकर नवाब वजीर खान ने चतुरता से कहा – ‘‘बच्चों तुम बहुत सुन्दर दिखाई दे रहे हो । हम तुम्हें नवाबों के बच्चों जैसा रखना चाहते हैं । शर्त यह है कि तुम अपना धर्म त्यागकर इस्लाम कबूलकर लो । तुम्हें हमारी शर्त मंजूर है ?”

          दोनों बालक एक साथ बोल उठे – ‘हमें अपना धर्म प्राणों से भी प्यारा है । हम, उसे अंतिम सांस तक नहीं छोड सकते ।’
          नवाब ने बालकों को फिर समझाना चाहा – ‘‘बच्चों अभी भी समय है, अपनी जिन्दगी बर्बाद मत करो । यदि तुम इस्लाम कबूल कर लोगे तो तुम्हें मुँह माँगा इनाम दिया जायेगा । हमारी शर्त मान लो और शाही जिंदगी बसर करो ।”

          बालक निर्भयता से ऊँचे स्वर में बोले- ‘हम गुरुगोविन्दसिंह के पुत्र हैं । हमारे दादा गुरु तेगबहादुरजी धर्म रक्षा के लिए कुर्बान हो गये थे । हम उन्हीं के वंशज हैं । हम अपना धर्म कभी नहीं छोडेंगे । हमें अपना धर्म प्राणों से भी प्यारा है ।’
          उसी समय दीवान सुच्चानन्द उठे और बालकों से इस प्रकार पूछने लगे । ‘अच्छा बच्चों, यह बताओ कि यदि तुम्हें छोड दिया जाये तो तुम क्या करोगे ?’
          बालक जोरावरसिंह बोले -‘‘हम सैनिक एकत्र करेंगे और आपके अत्याचारों को समाप्त करने के लिए युद्ध करेंगे ।”
          ‘यदि तुम हार गये तो ?’ – दीवान ने कहा । ‘हार हमारे जीवन में नहीं है । हम सेना के साथ उस समय तक युद्ध करते रहेंगे । जब तक अत्याचार करने वाला शासन समाप्त नहीं हो जाता या हम युद्ध में वीरगति को प्राप्त नहीं हो जाते ।’ – जोरावरसिंह ने दृढता से उत्तर दिया, साहसपूर्ण उत्तर सुनकर नवाब वजीर खान बौखला गया । दूसरी ओर दरबार में उपस्थित सभी व्यक्ति बालकों की वीरता की सराहना करने लगे । नवाब ने क्रुद्ध होकर कहा ‘‘इन शैतानों को फौरन दीवार में चुनवा दिया जाये।”
          दिल्ली के सरकारी जल्लाद शिशाल बेग तथा विशाल बेग उस समय दरबार में ही उपस्थित थे । दोनों बालकों को उनके हवाले कर दिया गया । कारीगरों ने बालकों को बीच में खडा कर दीवार बनानी आरम्भ कर दी । नगरवासी चारों ओर से उमड पडे । काजी पास ही में खडे थे । उन्होंने एक बार फिर बच्चों को इस्लाम स्वीकार करने को कहा।
बालकों ने फिर साहसपूर्ण उत्तर दिया – ‘‘हम इस्लाम स्वीकार नहीं कर सकते । संसार की कोई भी शक्ति हमें अपने धर्म से नहीं डिगा सकती ।”
          दीवार शीघ्रता से ऊंची होती जा रही थी । नगरवासी नन्हें बालकों की वीरता देखकर आश्चर्य कर रहे थे । धीरे-धीरे दीवार बालकों के कान तक ऊंची हो गयी । बडे भाई जोरावरसिंह ने अंतिम बार अपने छोटे भाई फतेहसिंह की ओर देखा । जोरावर की आंखें भर आयीं । फतेहसिंह भाई की आंखों में आंसू देखकर विचलित हो उठा ।
‘‘क्यों वीरजी, आपकी आँखों में ये आंसू ? क्या आप बलिदान से डर रहे हैं ?”
           बडे भाई जोरावरसिंह के हृदय में यह वाक्य तीर की तरह लगा । फिर भी वे खिलखिलाकर हँस दिये और फिर कहा  ‘फतेह सिंह तू बहुत भोला है । मौत से मैं नहीं डरता बल्कि मौत मुझसे डरती है । इसी कारण तो वह पहले तेरी ओर बढ रही है । मुझे दुख केवल इस बात का है कि तू मेरे पश्चात संसार में आया और मुझसे पहले तुझे बलिदान होने का अवसर मिल रहा है । भाई मैं तो अपनी हार पर पछता रहा हूँ ।” बडे भाई के वीरतापूर्ण वचन सुनकर फतेहसिंह की चिंता जाती रही ।  

          दीवार तेजी से ऊँची होती जा रही थी । उधर सूर्य अस्त होने का समय भी समीप था । राजा-मिस्त्री जल्दी-जल्दी हाथ चलाने लगे । दोनों बालक आँख मूंदकर अपने आराध्य का स्मरण करने लगे । धीरे-धीरे दीवार बालकों की अपूर्व धर्मनिष्ठा को देखकर अपनी कायरता को कोसने लगी । अंत में दीवार ने उन महान वीर बालकों को अपने भीतर समा लिया । कुछ समय पश्चात दीवार गिरा दी गई । दोनों वीर बालक बेहोश हो चुके थे उस अत्याचारी शासन के आदेशानुसार उन बेहोश बालकों  की हत्या कर दी गई । जब दोनों बालकों  की हत्या हुई  तब बालक जोरावरसिंह की आयु मात्र ७ वर्ष, ११ महीने तथा फतेह सिंह की आयु ५ वर्ष, १० महीने थी। विश्व के इतिहास में छोटे बालकों की इस प्रकार निर्दयतापूर्वक हत्या की कोई दूसरी मिसाल नहीं है। दूसरी ओर बालकों द्वारा दिखाया गया अपूर्व साहस संसार के किसी भी देश के इतिहास में नहीं मिलता । धन्य है गुरुगोविन्दसिंह, धन्य गुरुगद्दी परम्परा, धन्य माता गुजरी, धन्य गुरु पुत्र और धन्य है हमारी पुण्यधरा। हमारे भीतर भी ऐसी ही धर्म के प्रति निष्ठा व राष्ट्र के प्रति समर्पण हो, तो गौरवशाली भारत निर्माण का स्वप्न दूर नहीं।

– लखेश्वर चंद्रवन्शी ‘लखेश’

महापराक्रमी श्री गुरु हरगोविंदसिंह जी

  5 जुलाई, 1595 में, अमृतसर में जन्मे सिक्खों के छठवें गुरु श्री हरगोविंदजी जब 11 वर्ष के थे। तब मुगल बादशाह द्वारा गुरु अर्जनदेवजी को केवल इसलिए यातनाएं दी गईं  कि उन्होंने इस्लाम धर्म कबूल नहीं किया और धर्मांधता के समक्ष झुके नहीं एवं इस्लाम के पैगम्बर की प्रशंसा में कुछ तथ्य पवित्र गुरु ग्रंथ साहिब में शामिल करने से इंकार कर दिया। इन सभी हृदय विदारक घटनाओं ने बालक गुरु हरगोविंद के मन पर बहुत गहरा असर किया। उन्होंने निश्चय किया कि इन अत्याचारी और अन्यायी मुगल शासकों को सबक सिखाना ही पड़ेगा।

 पिता के बलिदान के बाद जब गुरु हरगोविंदसिंहजी को गुरु गद्दी पर आसीन होना था, तब वे कमर में दो तलवारें लटकाकर आए और उन्होंने कहा कि हृदय में भक्ति और हाथ में तलवार होनी चाहिए, तभी हम इन अत्याचारियों का मुकाबला कर इनका सिर कुचल सकते हैं। उन्होंने दोनों तलवारें प्रतिज्ञा पूर्ति के लिए धारण की। वे सभी को संबोधित करते हुए यही कहते थे कि हृदय में अपने धर्म के प्रति भक्ति और उसकी रक्षार्थ हाथ में तलवार होनी चाहिए। सभी को उन्होंने शस्त्र धारण करने के लिए कहा।

गुरुजी ने कहा कि धर्म की रक्षा के लिए यदि तुम्हें अपने प्राणों की बलि भी देनी पड़े तो कदापि न डरें। क्योंकि धर्म की रक्षा करते हुए जो मारा जाता है वह हमेशा के लिए अमर हो जाता है। जब भी आप किसी को भेंट स्वरूप कुछ धन देते हैं तो वह न दें, उसकी बजाय घोड़ों और शस्त्रों को भेंट स्वरूप दें, क्योंकि यह भेंट महत्वपूर्ण मानी जाएगी। क्योंकि इन भेंट स्वरूप वस्तुओं से हम और अधिक ताकतवर बन शत्रुओं का विनाश कर उन्हें जड़ से मिटा पायेंगे। उनके इन शब्दों से सभी के हृदय में धर्म की रक्षार्थ एक लहर दौड़ गई। भक्ति और शक्ति का संचार होने लगा। अश्व एवं शस्त्र संग्रह और युद्ध अभ्यास नित्य प्रतिदिन होने लगे। इतना सब होने के पश्चात गुरुजी ने एक दिन पूर्व गुरुओं के परंपरागत फकीरी लिबास का त्यागकर राजसी वस्त्र धारण कर लिये।

उन्होंने अमृतसर में एक किले ‘लोहगढ़’ का निर्माण करवाया। गुरुजी ने हरिमंदिर के समक्ष एक बहुत बड़े चबूतरे का निर्माण करवाया और उस चबूतरे का नाम ‘अकाल तख्त’ रखा। गुरु हरगोविंदसिंहजी यहां पर सुबह एवं शाम को दरबार लगाने लगे। इस दरबार में धार्मिक प्रवचनों के स्थान पर वीरता के राग गाये जाते थे। इस वीर रस राग के कारण शिष्य समुदाय में निर्भयता के भाव उत्पन्न होने लगे थे। इससे गुरुजी की लोकप्रियता और शक्ति में प्रतिदिन वृद्धि होती जा रही थी। जन समुदाय में वे ‘सच्चे पातशाह’ के नाम से विख्यात होने लगे। जिससे एक ही अर्थ निकलता है कि दिल्ली का बादशाह झूठा और गुरुजीही सच्चे बादशाह हैं।

धीरे-धीरे अनेक वीर युवा उनकी सेवा के लिए जुटने लगे और दोआबा तथा पटियाला, नाभा, जींद, फरीदकोट, फिरोजपुर तथा लुधियाना जिले से करीब 500 युवाओं ने गुरुजी की सेवा में आकर उनसे निवेदन किया, कि हमारे पास आपकी सेवा में भेंट करने के लिए इस शरीर रूपी जीवन के अलावा और कुछ भी शेष नहीं है। युवाओं ने गुरुजी से कहा कि वेतन के रूप में हमें आपके धर्मोपदेश व आपका आशीर्वाद चाहिए। आपके आशीर्वाद से क्रूर और अत्याचारी शासकों के विरुद्ध संघर्ष में हम अपने प्राणों तक को न्यौछावर कर देंगे, लेकिन पीछे कभी नहीं हटेंगे। युवाओं की गुरुभक्ति देख हरगोविंदसिंहजी ने उन्हें आशीर्वाद दिया और अपनी सेना में भर्ती कर लिया। उन युवाओं को एक-एक घोड़ा और शस्त्र प्रदान किये। गुरुजी ने उनमें से 52 युवाओं को अपने अंगरक्षक के रूप में अंगीकृत किया। इनमें से बिधीचन्द, पिराना, जेठा, पेरा तथा लंगाहा को एक-एक सौ घुड़सवारों का प्रमुख नियुक्त किया।

गुरुजी के बढ़ते प्रभाव और लोकप्रियता की खबरें बादशाह जहांगीर तक पहुंच रही थीं। इन खबरों के कारण बादशाह गुरुजी के प्रति बहुत अधिक आक्रोशित हो उठा। बादशाह ने हरगोविंदजी के बढ़ते यश और प्रभाव का दमन करने के लिए कुछ योजनाएं बनाने की ओर कदम बढ़ाए और अपने दरबार के दो अधिकारियों बेग तथा वजीर खान को गुरुजी को गिरफ्तार कर लाने का आदेश दिया।

दोनों अधिकारी बादशाह का आदेश मानकर अमृतसर गुरुजी को गिरफ्तार करने के लिए पहुंचे। दोनों अधिकारी गुरुजी का सम्मान करते थे, इसलिए उन्होंने गुरुजी से प्रार्थनापूर्वक कहा कि बादशाह जहांगीर ने आपको दिल्ली बुलाया है। आप स्वयं दिल्ली चलें।

गुरुजी उनके मन की बात समझ गए थे। जब गुरुजी बादशाह के समक्ष उसके दरबार में पहुंचे तो जहांगीर ने उनके विरुद्ध आरोपों की झड़ियाँ लगा दीं। गुरुजी ने उसके आरोपों को बड़े ही शांति से सुना और बाद में उन आरोपों का खंडन भी किया। फिर दोनों (गुरुजी और बादशाह) में धर्म संबंधी बहुत-सी चर्चाएं हुईं। इन चर्चाओं के बाद बादशाह ने सभी आरोपों को वापस ले लिया। किन्तु इसके बाद भी बादशाह के दिमाग में कुछ न कुछ चल ही रहा था। बाद में बादशाह को शिकार पर जाने की सूझी। बादशाह जहांगीर को मालूम था कि गुरुजी को शिकार पर जाना बहुत पसंद है। इसलिए जहांगीर ने गुरुजी को शिकार पर चलने का निमंत्रण दिया। गुरुजी ने बादशाह का निमंत्रण स्वीकार किया और शिकार के लिए चल पड़े। जब वे शिकार पर निकले तभी एक शेर से उनका सामना हो गया। वह शेर बादशाह की तरफ ही लपका। बादशाह के साथ आए हुए सैनिकों ने शेर पर गोलियां और तीर चलाये किन्तु वे सारे तीर और गोलियां व्यर्थ ही गईं, वे सब शेर के आजू-बाजू   से निकल गए। यह सब देख बादशाह बहुत भयभीत हो गया। उसने दयापूर्ण दृष्टि से गुरुजी की ओर देखा। गुरुजी उसकी दयापूर्ण दृष्टि देख तुरंत अपने घोड़े से उतरे और अपनी तलवार और ढाल लेकर शेर के सामने आ गए और एक ही झटके में उन्होंने शेर को मार गिराया। उस वक्त बादशाह की किस्मत अच्छी थी कि उसके साथ गुरु हरगोविंदजी थे, जिन्होंने उसके प्राणों की रक्षा की, नहीं तो शेर बादशाह को मार डालता और उसके सैनिक कुछ कर भी नहीं पाते। बादशाह ने गुरुजी की वीरता अब तक सुन ही रखी थी, लेकिन अब उसने साक्षात देख भी ली। बादशाह सोचता ही रह गया कि इतनी कम उम्र में गुरुजी इतने बलशाली हैं। वह उनके वीरतापूर्ण साहस को निहारता ही रह गया।

गुरुजी में इतना बल और सामर्थ्य देख बादशाह झल्ला उठा। वह गुरुजी के प्रतिदिन बढ़ते बल और शक्ति से घबरा गया। उसने विचार किया कि और अधिक शक्ति अर्जित करने से पूर्व गुरुजी का कुछ न कुछ बंदोबस्त करना पड़ेगा।

बादशाह ने गुरुजी के पिता अर्जुनदेवजी को तो मार ही डाला था। लेकिन फिर भी उनकी (अर्जनदेवजी) हत्या से वह संतुष्ट नहीं हुआ था। उसने पिता (अर्जनदेवजी) के जुर्माने की 2  लाख की राशि अब बेटे (हरगोविंदजी) से वसूलने के आदेश अपने सैनिकों को दिये और इसी आदेश के चलते उसने गुरुजी को गिरफ्तार कर लिया एवं दूर ग्वालियर के किले में कैद कर लिया। समय को अपने पक्ष में न देखते हुए गुरुजी ने उस समय कोई प्रतिउत्तर नहीं दिया। इसमें एक बड़ा कारण यह भी था कि उस समय गुरुजी की आयु मात्र चौदह वर्ष ही थी । हरगोविंद को कैद करने के बाद बादशाह को लगा कि अब उनका प्रभाव और यश कम हो जायेगा, लेकिन हुआ उसके विपरीत ही। बादशाह ने जिस किले में गुरुजी को कैद कर रखा था वहां का माहौल पूर्ण रूप से परिवर्तित हो गया। उस किले के चारों तरफ का वातावरण गुरुमय हो गया था। एक प्रकार से यह कह सकते हैं कि वह किला एक तीर्थस्थल के रूप में जाना जाने लगा । गुरुजी को बादशाह ने जिस किले में बंदी बनाया था, उसी किले में उसने अलग-अलग राज्यों के करीबन 52 राजाओं को भी गिरफ्तार कर रखा था। उन राजाओं को जहांगीर ने इसलिए बंदी बना रखा था, क्योंकि उन्होंने बादशाह की अधीनता स्वीकार करने से इंकार कर दिया था। उन बंदियों की समान भावनाएं एवं उद्देश्य एक होने के कारण गुरुजी को भी उनसे मिलने का एक अच्छा अवसर प्राप्त हुआ। इन सभी से मिलने के बाद गुरुजी को बादशाह से टक्कर लेने की उनकी संकल्पना को और अधिक बल मिला। किले में कैद सभी राजा गुरुजी को अपने बीच देख बहुत प्रसन्न थे। गुरुजी के ज्ञान और आध्यात्मिक जीवन से वे बहुत ही प्रभावित थे। हर रोज हरगोविंदजी की दिनचर्या प्रभु कीर्तन से ही प्रारंभ होती थी और किले में प्रात: एवं सायं हरिकीर्तन होते थे।

          हरिकीर्तन से किले का कोना-कोना गूंजता था। हर क्षण गुरु हरगोविंदजी का यश और प्रभाव बढ़ता जा रहा था। किले के अंदर तो उनके प्रति श्रद्धा थी, साथ ही साथ किले के बाहर भी पूरे समाज में उनके प्रति सम्मान और श्रद्धा में वृद्धि होती जा रही थी। किले में कैद होने के कारण लोगों के जत्थे पैदल ही पंजाब से ग्वालियर उनके दर्शन की आस लेकर आते थे। लेकिन उन जत्थों को किले में प्रवेश नहीं था। किला जंगलों के बीच लगभग 300 फुट ऊँची पहाड़ियों पर बनाया गया था। किले की दीवार ही इतनी अधिक विशाल थी कि किसी को भी किले के अंदर का दृश्य दिखाई ही नहीं देता था और किले के चारों और सैनिकों का हमेशा कड़ा पहरा रहता था। गुरुजी के भक्त इस कारण उनके दर्शन तो नहीं कर पाते थे, लेकिन उसी विशाल दीवार को नमस्कार करके लौट जाते थे। उसी में वे अपने आपको धन्य समझ लेते थे। इस तरह लोगों का आना तब तक जारी रहा जब तक गुरुजी 1611 ई. में मुक्त नहीं हुए। फिर एक दिन ऐसा आया कि जब 52 कलीवाला चोला पहनकर गुरु हरगोविंदजी ने अपने साथ 52 राजाओं को भी रिहा करवाया। जब वे रिहा होकर अमृतसर गए, तो संयोगवश वह दिन दीपावली के त्यौहार का दिन था। लोगों ने गुरुजी के रिहा होने की खुशी में सभी तरफ दीपक प्रज्वलित किये और जमकर दीपावली का पर्व मनाया। लोगों को इस बात की भी प्रसन्नता थी कि अब नित्य ही उन्हें गुरुजी के दर्शन और उनके उपदेश सुनने को मिलेंगे। धीरे-धीरे समय के साथ-साथ गुरुजी ने अपनी सैनिक गतिविधियां बढ़ानी भी शुरू कर दीं।

 गुरुजी के पास करीब 800 घोड़े और बहुत अधिक संख्या में घुड़सवार भी एकत्र हो गये थे। अस्त्र-शस्त्र से लैस 60 जवान उनकी सेवा में हमेशा तत्पर रहते थे। जहांगीर की कैद से आजाद होने के बाद उन्होंने अपने आध्यात्मिक तथा राजसी प्रभुत्व को और अधिक बढ़ाया। उन्होंने बादशाहों के समान कलगी भी धारण करनी प्रारंभ कर दी। वे अपने प्रवास में पंजाब के साथ अलग-अलग प्रांतों में प्रचारार्थ गए। उन्होंने इस प्रवास के दौरान अलग-अलग जगह पर बहुत से गुरुद्वारों का निर्माण भी करवाया। बहुत से युवा भक्ति एवं शक्ति के मार्ग पर चलकर गुरुजी के संगठन से जुड़ने लगे। अमृतसर से वापसी के दौरान बिलासपुर के राजा ने हिमालय की तराई में स्थित एक भूखंड गुरुजी को भेंट किया। गुरुजी ने यहीं कीरतपुर नाम से अपने कार्य केंद्र का निर्माण करवाया। गुरुजी की पूरी जीवन-यात्रा विशेषतापूर्ण और सम्माननीय रही। उन्हें हर युद्ध में विजय ही प्राप्त हुई, पराजय की ओर उन्होंने कभी भी देखा ही नहीं। वे हमेशा सत्य का साथ देते थे और जहां अन्याय होता था उसका हमेशा दमन करते थे। जन साधारण में उनका नाम ‘सच्चा पातशाह’ के रूप में प्रतिष्ठित हो गया।

 उनके इसी स्वरूप को देखते हुए उनके भाई गुरुदासजी ने यह कहकर उनका वर्णन किया-

 ‘अरजन काहया पलटि कै मूरती हरगोविंद सवारी। 

दल भंजन गुर सूरमा वह जोधा बहू परोपकारी ।।’

 (इसका अर्थ यह है कि गुरु अर्जनदेवजी ने ही अपना शरीर बदलकर गुरु हरगोविंदजी के स्वरूप को संवारा। श्री हरगोविंदजी शत्रुओं के दल का विनाश करने वाले शूरवीर गुरु थे। वे एक महान योद्धा एवं प्रभावशाली परोपकारी महान महामानव थे। )   

गुरुजी ने बाद में कीरतपुर को अपना केंद्र स्थान बना लिया। अपने उत्तराधिकारी की खोज में उन्होंने हर जगह अपनी दृष्टि घुमानी प्रारंभ की तो उन्हें अपने दिवंगत पुत्र बाबा गुरदित्ताजी के छोटे पुत्र हरिरायजी उत्तराधिकारी के योग्य दिखे। सारी सिख संगत के समक्ष उन्होंने हरिरायजी को संबोधित करते हुए कहा कि बेटा अब हमारा अंतिम समय निकट आ गया है। अत: हम तुम्हें यह गुरुनानक देवजी की पवित्र गद्दी सौंपते हैं। तुम इसे ग्रहण कर सभी का नेतृत्व करो और साथ ही दुखी लोगों के दुख दूर करो और सभी को सत्य का रास्ता दिखाओ।

सन 1644 ई. में कीरतपुर में गुरु हरगोविंदजी अपनी जीवन लीला पूर्ण कर प्रभु ज्योति में समा गए। उन्होंने अपने शिष्यों को बहुत-सी ज्ञानपूर्ण बातें सिखाई। शिष्यों को नित्य भजन-पाठ के साथ-साथ धर्म की रक्षा हेतु अपने प्राण तक न्यौछावर करने की शिक्षा दी। गुरुजी ने शिष्यों के जीवन में एक प्रकार से नई क्रांति ला दी। गुरुजी लोक संग्रह शास्त्र के बड़े ज्ञाता थे। उनके प्रभावी और आकर्षक व्यक्तित्व के कारण सभी सम्मोहित हो जाया करता था। उनके सान्निध्य में एक विशेष प्रकार का जादू था, इस कारण जो भी उनके पास बैठता या बात करता वह उनसे प्रभावित हुए बिन न रहता। यही कारण है कि सम्पूर्ण भारतीय समाज ने उन्हें एक परोपकारी और महामानव की संज्ञा दी।

 – लखेश्वर चंद्रवंशी “लखेश” 

शांघाई में ‘माँ’ का अपमान

छोटे-छोटे बच्चे जो बचपन से ‘भारत माता की जय’ कहते हुए बडे होते हैं, वही बच्चे आज अपने से बडे युवाओं के इस अभद्र डांस का अंधानुकरण कर रहे हैं । जब ये बच्चे अपने विद्यालयों में ‘भारत माता की जय’ कहेंगे तो क्या डेंगू ,मलेरिया शब्द याद नहीं आयेंगे ? क्या डेंगू, मलेरिया और गुड गोबर यही भारत की पहचान है ? भारत का उपहास करने वाले इस गीत के रचनाकार संगीतकार, गायक, अभिनेता और इस फिल्म को पास करने वाले सेंसर बोर्ड के अधिकारियों को इस गीत में शब्द आपत्तिजनक न लगना घोर आश्चर्य की बात है और दिल्ली हाईकोर्ट की ओर से इसे हरी झंडी देना भी राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में जँचता नहीं है ।

         कभी सपने में भी किसी ने सोचा नहीं था कि  ‘भारत माता के जयघोष’ का प्रयोग कोई इतना अपमानजनक ढंग से करेगा । एक समय ‘जहाँ डाल-डाल पर सोने की चिड़िया , करती है बसेरा । वह भारत देश है मेरा’ ऐसे गीतों की रचना होती थी, जिसे सुनकर प्रत्येक भारतीय का हृदय गौरव से फूला नहीं समाता । वहीं आज ‘सोने की चिड़िया,  डेंगू मलेरिया, गुड भी है गोबर भी… भारत माता की जय’ जैसी शब्दावली के गीतों की रचना और उसके प्रस्तुति का तरीका देख मन पीडा से भर जाता है । ज्ञात हो कि हाल ही में रिलीज हुई फिल्म ‘शांघाई’ से  ‘भारत माता की जय’ गीत को हटाने संबंधी दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई थी । मुम्बई कांग्रेस के उपाध्यक्ष चरन सिंह  सप्रा ने सूचना और यूनियन मिनिस्टर अम्बिका सोनी को पत्र लिखकर बताया कि ‘शांघाई’ फिल्म का साँग ‘भारत माता की जय’ उस हर देशवासी का अपमान है जो भारत को अपनी माँ मानते हैं । इस गाने को सुनकर ऐसा लगता है कि इसमें कई विवादास्पद शब्दों का प्रयोग जानबूझकर किया गया है जिससे कि भारतवासियों के मन में देश के प्रति जो सम्मान की भावना है, को आघात पहुँचे और सारे विश्व की नजरों में भारत को नीचा दिखाएं ।

          सप्रा ने इस गाने पर शीघ्रतीशीघ्र बैन लगाने की मांग की थी और कहा था कि इसे फिल्म से हटा देना चाहिए और सेंसर बोर्ड के जिन सदस्यों ने इसे पास किया है उन पर कडी कार्रवाई करनी चाहिए । परन्तु न्यायाधीश विपिन संघी और राजीव शकधर की खंडपीठ ने इस याचिका पर फैसला सुनाते हुए कहा कि हमें इस गीत में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं लगा । लोकतंत्र में प्रत्येक व्यक्ति को अपने विचार रखने का अधिकार है कुछ विशेष परिस्थितियों को छोड दिया जाए तो किसी की भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को छीना नहीं जा सकता । इस गाने के कम्पोजर विशाल ददलानी ने खुशी जाहिर करते हुए कोर्ट को धन्यवाद दिया और इस तरह इस गाने से सम्बन्धित विवाद को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया ।

लेकिन उस रोज एक मुहल्ले में युवा लोग शराब पीकर इस गाने पर असभ्यता से थिरक रहे थे । तो इस गाने से जुडे वे तमाम लोगों की मानसिकता का आकलन करना और भी आवश्यक हो गया । छोटे-छोटे बच्चे जो बचपन से ‘भारत माता की जय’ कहते हुए बडे होते हैं, वही बच्चे आज अपने से बडे युवाओं के इस अभद्र डांस का अंधानुकरण कर रहे हैं । जब ये बच्चे अपने विद्यालयों में ‘भारत माता की जय’ कहेंगे तो क्या डेंगू ,मलेरिया शब्द याद नहीं आयेंगे ? क्या डेंगू, मलेरिया और गुड गोबर यही भारत की पहचान है ? भारत का उपहास करने वाले इस गीत के रचनाकार संगीतकार, गायक, अभिनेता और इस फिल्म को पास करने वाले सेंसर बोर्ड के अधिकारियों को इस गीत में शब्द आपत्तिजनक न लगना घोर आश्चर्य की बात है और दिल्ली हाईकोर्ट की ओर से इसे हरी झंडी देना भी राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में जँचता नहीं है ।

इस गीत की शब्दावली देखिए –

 ‘ताक धिना धिन धा… ओह-ओह ओह

ताक धिना धिन धा…  ओह ओह हा

ताक धिना धिन…मार लपड

फाड छपड छाट प्यारे

ना सुने बात कोई हाथ है और लात प्यारे

अपुन को भई ना… अब हैबिट लगे ला

अरे नाच मगन, काट मटन, रोज है खाना

भारत माता की भारत माता की

तुम जय बोलो जय भारत माता की जय ।

सोने की चिड़िया डेंगू मलेरिया

गुड भी है गोबर भी

भारत माता की जय…’

अब आप ही सोचिए कि विश्व का कौन-सा ऐसा देश है जहाँ के लोगों को डेंगू-मलेरिया नहीं होता ! सभी देशों में ऐसा होता है, फिर भारत में रहने वाले लोग ही भारत का उपहास करने लगे, ऐसा गीत बनाने लगे, गाने लगे तो हम अन्य देशों के द्वारा भारत के प्रति सम्मान की अपेक्षा कैसे रख सकते हैं ?

फूहड गाने के नाम पर इतनी बडी और गम्भीर गलती कोई भी साधारण व्यक्ति आसानी से समझ सकता है और लोगों में चर्चा भी शुरू हो गई है कि कैसा बेहुदा गीत है यह ? पर देश का प्रबुद्ध समाज, पत्रकार और नेता सभी वर्तमान में राष्ट्रपति चुनाव की गुत्थी में व्यस्त हैं । राजनीति में रुचि रखने वाले लोगों के पास इस पर चिन्तन करने का समय ही कहाँ है ? रही बात अन्ना हजारे और बाबा रामदेव की वे भी राष्ट्र पुनरुत्थान के स्वप्न को साकार करने के उपायों में व्यस्त हैं । अब जन-साधारण को विचार करना है कि ऐसे गीतों का विरोध कैसे करें ।

गलती से भी न हो ‘माँ’ का अपमान

एक मात्र हमारी मातृभूमि है जिसे हम माँ कहते हैं । ऐसी माँ जिसकी गोद में हम जन्में । यहीं पर पले-बढे, ज्ञान पाया और जीवन का आनंद लिया । पर जरा-सी कोई अव्यवस्था दिखी तो हम शुरू हो जाते हैं- ‘हर तरफ भ्रष्टाचार है, रेलवे में सफाई नहीं है, सडकें ठीक नहीं हैं, भेदभाव होता है ।’ उस समय हमें याद नहीं रहता कि विश्व में जितना शुभ कार्य सम्पन्न होता है, उसकी प्रेरणा तो भारत ही है । गणित, विज्ञान, कला-संस्कृति सब कुछ भारत ने ही विश्व को दिया । ऋषि  मुनि, देवी-देवता सभी ने हमारे देश में जन्म लिया । हमारी मातृभूमि ने संसार को अध्यात्म का दान दिया जिससे दुनिया के लोगों में आपसी प्रेम, अपनत्व और सौंदर्य का स्वामी विवेकानन्दजी का यह संदेश कितना मार्मिक है ! हमें अपनी मातृभूमि के हित में तो कार्य करना ही चाहिए लेकिन हम भौतिक सुख सम्पादन और मौज-मस्ती में डूबे रहते हैं । हम देश हित में कुछ अच्छा नहीं कर सकते तो कम से कम हमारे मन में अपने देश के प्रति गलती से भी गलत विचार न आये इसका हमें ध्यान रहे । अच्छा होगा कि हम इस गीत को न खुद गायें और जो लोग हमें गाते दिखे, उन्हें समझायें कि वे भी न गायें, क्योंकि माँ  के सम्मान में ही अपने जीवन की सार्थकता है । इसी में भारतमाता की जय है, शांघाई के गीत में नहीं ।  विस्तार हुआ । आज जो हमारे देश में भ्रष्टाचार, आतंकवाद, नक्सलवाद, भौतिकता का अंधानुकरण और अव्यवस्था दिखाई देती है तो क्या हम भारत को गाली देंगे ? वो देश जिसका कण-कण ईश्वर का प्रतीक माना जाता है, जहाँ देवता भी जन्म लेने के लिए अवसर की प्रतीक्षा करते हैं । उसके सम्बन्ध में हम अपमानास्पद चर्चा करते हैं, यह भारतपुत्रों के लिए लज्जास्पद है । ऐसी ही मानसिकता १८वीं शताब्दी में हमारे पूर्वजों की हो गई थी । आत्मग्लानि से भरे भारत को सम्बोधित करते हुए स्वामी विवेकानन्द ने कहा था- ‘ऐ मेरे स्वदेशवासियों, मेरे मित्रों, मेरे बच्चों ! राष्ट्रीय जीवनरूपी यह जहाज लाखों लोगों को जीवनरूपी समुद्र के पार करता रहा है । कई शताब्दियों से इसका यह कार्य चल रहा है और इसकी सहायता से लाखों आत्माएँ इस सागर के उस पार अमृतधारा में पहुँची हैं । पर आज शायद तुम्हारे ही दोष से इस पोत में कुछ खराबी हो गयी है, इसमें एक-दो छिद्र हो गये हैं । तो क्या तुम इसे कोसोगे ? संसार में जिसने तुम्हारा सबसे अधिक उपकार किया है, उसके विरुद्ध खडे होकर उस पर गाली बरसाना क्या तुम्हारे लिए उचित है ? यदि हमारे इस समाज में, इस राष्ट्रीय जीवनरूपी जहाज में छिद्र है, तो हम तो उसकी सन्तान हैं । आओ चलें, उन छिद्रों को बन्द कर दें- उसके लिए हँसते-हँसते अपने हृदय का रक्त बहा दें और यदि हम ऐसा न कर सकें तो हमारा मर जाना ही उचित है । हम अपना भेजा निकालकर उसकी डाट बनाएँगे और जहाज के उन छिद्रों में भर देंगे । पर उसकी कभी भर्त्सना  न करें ! इस समाज के विरुद्ध एक कडा शब्द तक न निकालो ।’

स्वामी विवेकानन्दजी का यह संदेश कितना मार्मिक है ! हमें अपनी मातृभूमि के हित में तो कार्य करना ही चाहिए लेकिन हम भौतिक सुख सम्पादन और मौज-मस्ती में डूबे रहते हैं । हम देश हित में कुछ अच्छा नहीं कर सकते तो कम से कम हमारे मन में अपने देश के प्रति गलती से भी गलत विचार न आये इसका हमें ध्यान रहे । अच्छा होगा कि हम इस गीत को न खुद गायें और जो लोग हमें गाते दिखे, उन्हें समझायें कि वे भी न गायें, क्योंकि माँ  के सम्मान में ही अपने जीवन की सार्थकता है । इसी में भारतमाता की जय है, शांघाई के गीत में नहीं ।  

– लखेश्वर चंद्रवंशी “लखेश”