शांघाई में ‘माँ’ का अपमान

छोटे-छोटे बच्चे जो बचपन से ‘भारत माता की जय’ कहते हुए बडे होते हैं, वही बच्चे आज अपने से बडे युवाओं के इस अभद्र डांस का अंधानुकरण कर रहे हैं । जब ये बच्चे अपने विद्यालयों में ‘भारत माता की जय’ कहेंगे तो क्या डेंगू ,मलेरिया शब्द याद नहीं आयेंगे ? क्या डेंगू, मलेरिया और गुड गोबर यही भारत की पहचान है ? भारत का उपहास करने वाले इस गीत के रचनाकार संगीतकार, गायक, अभिनेता और इस फिल्म को पास करने वाले सेंसर बोर्ड के अधिकारियों को इस गीत में शब्द आपत्तिजनक न लगना घोर आश्चर्य की बात है और दिल्ली हाईकोर्ट की ओर से इसे हरी झंडी देना भी राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में जँचता नहीं है ।

         कभी सपने में भी किसी ने सोचा नहीं था कि  ‘भारत माता के जयघोष’ का प्रयोग कोई इतना अपमानजनक ढंग से करेगा । एक समय ‘जहाँ डाल-डाल पर सोने की चिड़िया , करती है बसेरा । वह भारत देश है मेरा’ ऐसे गीतों की रचना होती थी, जिसे सुनकर प्रत्येक भारतीय का हृदय गौरव से फूला नहीं समाता । वहीं आज ‘सोने की चिड़िया,  डेंगू मलेरिया, गुड भी है गोबर भी… भारत माता की जय’ जैसी शब्दावली के गीतों की रचना और उसके प्रस्तुति का तरीका देख मन पीडा से भर जाता है । ज्ञात हो कि हाल ही में रिलीज हुई फिल्म ‘शांघाई’ से  ‘भारत माता की जय’ गीत को हटाने संबंधी दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई थी । मुम्बई कांग्रेस के उपाध्यक्ष चरन सिंह  सप्रा ने सूचना और यूनियन मिनिस्टर अम्बिका सोनी को पत्र लिखकर बताया कि ‘शांघाई’ फिल्म का साँग ‘भारत माता की जय’ उस हर देशवासी का अपमान है जो भारत को अपनी माँ मानते हैं । इस गाने को सुनकर ऐसा लगता है कि इसमें कई विवादास्पद शब्दों का प्रयोग जानबूझकर किया गया है जिससे कि भारतवासियों के मन में देश के प्रति जो सम्मान की भावना है, को आघात पहुँचे और सारे विश्व की नजरों में भारत को नीचा दिखाएं ।

          सप्रा ने इस गाने पर शीघ्रतीशीघ्र बैन लगाने की मांग की थी और कहा था कि इसे फिल्म से हटा देना चाहिए और सेंसर बोर्ड के जिन सदस्यों ने इसे पास किया है उन पर कडी कार्रवाई करनी चाहिए । परन्तु न्यायाधीश विपिन संघी और राजीव शकधर की खंडपीठ ने इस याचिका पर फैसला सुनाते हुए कहा कि हमें इस गीत में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं लगा । लोकतंत्र में प्रत्येक व्यक्ति को अपने विचार रखने का अधिकार है कुछ विशेष परिस्थितियों को छोड दिया जाए तो किसी की भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को छीना नहीं जा सकता । इस गाने के कम्पोजर विशाल ददलानी ने खुशी जाहिर करते हुए कोर्ट को धन्यवाद दिया और इस तरह इस गाने से सम्बन्धित विवाद को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया ।

लेकिन उस रोज एक मुहल्ले में युवा लोग शराब पीकर इस गाने पर असभ्यता से थिरक रहे थे । तो इस गाने से जुडे वे तमाम लोगों की मानसिकता का आकलन करना और भी आवश्यक हो गया । छोटे-छोटे बच्चे जो बचपन से ‘भारत माता की जय’ कहते हुए बडे होते हैं, वही बच्चे आज अपने से बडे युवाओं के इस अभद्र डांस का अंधानुकरण कर रहे हैं । जब ये बच्चे अपने विद्यालयों में ‘भारत माता की जय’ कहेंगे तो क्या डेंगू ,मलेरिया शब्द याद नहीं आयेंगे ? क्या डेंगू, मलेरिया और गुड गोबर यही भारत की पहचान है ? भारत का उपहास करने वाले इस गीत के रचनाकार संगीतकार, गायक, अभिनेता और इस फिल्म को पास करने वाले सेंसर बोर्ड के अधिकारियों को इस गीत में शब्द आपत्तिजनक न लगना घोर आश्चर्य की बात है और दिल्ली हाईकोर्ट की ओर से इसे हरी झंडी देना भी राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में जँचता नहीं है ।

इस गीत की शब्दावली देखिए –

 ‘ताक धिना धिन धा… ओह-ओह ओह

ताक धिना धिन धा…  ओह ओह हा

ताक धिना धिन…मार लपड

फाड छपड छाट प्यारे

ना सुने बात कोई हाथ है और लात प्यारे

अपुन को भई ना… अब हैबिट लगे ला

अरे नाच मगन, काट मटन, रोज है खाना

भारत माता की भारत माता की

तुम जय बोलो जय भारत माता की जय ।

सोने की चिड़िया डेंगू मलेरिया

गुड भी है गोबर भी

भारत माता की जय…’

अब आप ही सोचिए कि विश्व का कौन-सा ऐसा देश है जहाँ के लोगों को डेंगू-मलेरिया नहीं होता ! सभी देशों में ऐसा होता है, फिर भारत में रहने वाले लोग ही भारत का उपहास करने लगे, ऐसा गीत बनाने लगे, गाने लगे तो हम अन्य देशों के द्वारा भारत के प्रति सम्मान की अपेक्षा कैसे रख सकते हैं ?

फूहड गाने के नाम पर इतनी बडी और गम्भीर गलती कोई भी साधारण व्यक्ति आसानी से समझ सकता है और लोगों में चर्चा भी शुरू हो गई है कि कैसा बेहुदा गीत है यह ? पर देश का प्रबुद्ध समाज, पत्रकार और नेता सभी वर्तमान में राष्ट्रपति चुनाव की गुत्थी में व्यस्त हैं । राजनीति में रुचि रखने वाले लोगों के पास इस पर चिन्तन करने का समय ही कहाँ है ? रही बात अन्ना हजारे और बाबा रामदेव की वे भी राष्ट्र पुनरुत्थान के स्वप्न को साकार करने के उपायों में व्यस्त हैं । अब जन-साधारण को विचार करना है कि ऐसे गीतों का विरोध कैसे करें ।

गलती से भी न हो ‘माँ’ का अपमान

एक मात्र हमारी मातृभूमि है जिसे हम माँ कहते हैं । ऐसी माँ जिसकी गोद में हम जन्में । यहीं पर पले-बढे, ज्ञान पाया और जीवन का आनंद लिया । पर जरा-सी कोई अव्यवस्था दिखी तो हम शुरू हो जाते हैं- ‘हर तरफ भ्रष्टाचार है, रेलवे में सफाई नहीं है, सडकें ठीक नहीं हैं, भेदभाव होता है ।’ उस समय हमें याद नहीं रहता कि विश्व में जितना शुभ कार्य सम्पन्न होता है, उसकी प्रेरणा तो भारत ही है । गणित, विज्ञान, कला-संस्कृति सब कुछ भारत ने ही विश्व को दिया । ऋषि  मुनि, देवी-देवता सभी ने हमारे देश में जन्म लिया । हमारी मातृभूमि ने संसार को अध्यात्म का दान दिया जिससे दुनिया के लोगों में आपसी प्रेम, अपनत्व और सौंदर्य का स्वामी विवेकानन्दजी का यह संदेश कितना मार्मिक है ! हमें अपनी मातृभूमि के हित में तो कार्य करना ही चाहिए लेकिन हम भौतिक सुख सम्पादन और मौज-मस्ती में डूबे रहते हैं । हम देश हित में कुछ अच्छा नहीं कर सकते तो कम से कम हमारे मन में अपने देश के प्रति गलती से भी गलत विचार न आये इसका हमें ध्यान रहे । अच्छा होगा कि हम इस गीत को न खुद गायें और जो लोग हमें गाते दिखे, उन्हें समझायें कि वे भी न गायें, क्योंकि माँ  के सम्मान में ही अपने जीवन की सार्थकता है । इसी में भारतमाता की जय है, शांघाई के गीत में नहीं ।  विस्तार हुआ । आज जो हमारे देश में भ्रष्टाचार, आतंकवाद, नक्सलवाद, भौतिकता का अंधानुकरण और अव्यवस्था दिखाई देती है तो क्या हम भारत को गाली देंगे ? वो देश जिसका कण-कण ईश्वर का प्रतीक माना जाता है, जहाँ देवता भी जन्म लेने के लिए अवसर की प्रतीक्षा करते हैं । उसके सम्बन्ध में हम अपमानास्पद चर्चा करते हैं, यह भारतपुत्रों के लिए लज्जास्पद है । ऐसी ही मानसिकता १८वीं शताब्दी में हमारे पूर्वजों की हो गई थी । आत्मग्लानि से भरे भारत को सम्बोधित करते हुए स्वामी विवेकानन्द ने कहा था- ‘ऐ मेरे स्वदेशवासियों, मेरे मित्रों, मेरे बच्चों ! राष्ट्रीय जीवनरूपी यह जहाज लाखों लोगों को जीवनरूपी समुद्र के पार करता रहा है । कई शताब्दियों से इसका यह कार्य चल रहा है और इसकी सहायता से लाखों आत्माएँ इस सागर के उस पार अमृतधारा में पहुँची हैं । पर आज शायद तुम्हारे ही दोष से इस पोत में कुछ खराबी हो गयी है, इसमें एक-दो छिद्र हो गये हैं । तो क्या तुम इसे कोसोगे ? संसार में जिसने तुम्हारा सबसे अधिक उपकार किया है, उसके विरुद्ध खडे होकर उस पर गाली बरसाना क्या तुम्हारे लिए उचित है ? यदि हमारे इस समाज में, इस राष्ट्रीय जीवनरूपी जहाज में छिद्र है, तो हम तो उसकी सन्तान हैं । आओ चलें, उन छिद्रों को बन्द कर दें- उसके लिए हँसते-हँसते अपने हृदय का रक्त बहा दें और यदि हम ऐसा न कर सकें तो हमारा मर जाना ही उचित है । हम अपना भेजा निकालकर उसकी डाट बनाएँगे और जहाज के उन छिद्रों में भर देंगे । पर उसकी कभी भर्त्सना  न करें ! इस समाज के विरुद्ध एक कडा शब्द तक न निकालो ।’

स्वामी विवेकानन्दजी का यह संदेश कितना मार्मिक है ! हमें अपनी मातृभूमि के हित में तो कार्य करना ही चाहिए लेकिन हम भौतिक सुख सम्पादन और मौज-मस्ती में डूबे रहते हैं । हम देश हित में कुछ अच्छा नहीं कर सकते तो कम से कम हमारे मन में अपने देश के प्रति गलती से भी गलत विचार न आये इसका हमें ध्यान रहे । अच्छा होगा कि हम इस गीत को न खुद गायें और जो लोग हमें गाते दिखे, उन्हें समझायें कि वे भी न गायें, क्योंकि माँ  के सम्मान में ही अपने जीवन की सार्थकता है । इसी में भारतमाता की जय है, शांघाई के गीत में नहीं ।  

– लखेश्वर चंद्रवंशी “लखेश”

 

  

Advertisements

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s