महापराक्रमी श्री गुरु हरगोविंदसिंह जी

  5 जुलाई, 1595 में, अमृतसर में जन्मे सिक्खों के छठवें गुरु श्री हरगोविंदजी जब 11 वर्ष के थे। तब मुगल बादशाह द्वारा गुरु अर्जनदेवजी को केवल इसलिए यातनाएं दी गईं  कि उन्होंने इस्लाम धर्म कबूल नहीं किया और धर्मांधता के समक्ष झुके नहीं एवं इस्लाम के पैगम्बर की प्रशंसा में कुछ तथ्य पवित्र गुरु ग्रंथ साहिब में शामिल करने से इंकार कर दिया। इन सभी हृदय विदारक घटनाओं ने बालक गुरु हरगोविंद के मन पर बहुत गहरा असर किया। उन्होंने निश्चय किया कि इन अत्याचारी और अन्यायी मुगल शासकों को सबक सिखाना ही पड़ेगा।

 पिता के बलिदान के बाद जब गुरु हरगोविंदसिंहजी को गुरु गद्दी पर आसीन होना था, तब वे कमर में दो तलवारें लटकाकर आए और उन्होंने कहा कि हृदय में भक्ति और हाथ में तलवार होनी चाहिए, तभी हम इन अत्याचारियों का मुकाबला कर इनका सिर कुचल सकते हैं। उन्होंने दोनों तलवारें प्रतिज्ञा पूर्ति के लिए धारण की। वे सभी को संबोधित करते हुए यही कहते थे कि हृदय में अपने धर्म के प्रति भक्ति और उसकी रक्षार्थ हाथ में तलवार होनी चाहिए। सभी को उन्होंने शस्त्र धारण करने के लिए कहा।

गुरुजी ने कहा कि धर्म की रक्षा के लिए यदि तुम्हें अपने प्राणों की बलि भी देनी पड़े तो कदापि न डरें। क्योंकि धर्म की रक्षा करते हुए जो मारा जाता है वह हमेशा के लिए अमर हो जाता है। जब भी आप किसी को भेंट स्वरूप कुछ धन देते हैं तो वह न दें, उसकी बजाय घोड़ों और शस्त्रों को भेंट स्वरूप दें, क्योंकि यह भेंट महत्वपूर्ण मानी जाएगी। क्योंकि इन भेंट स्वरूप वस्तुओं से हम और अधिक ताकतवर बन शत्रुओं का विनाश कर उन्हें जड़ से मिटा पायेंगे। उनके इन शब्दों से सभी के हृदय में धर्म की रक्षार्थ एक लहर दौड़ गई। भक्ति और शक्ति का संचार होने लगा। अश्व एवं शस्त्र संग्रह और युद्ध अभ्यास नित्य प्रतिदिन होने लगे। इतना सब होने के पश्चात गुरुजी ने एक दिन पूर्व गुरुओं के परंपरागत फकीरी लिबास का त्यागकर राजसी वस्त्र धारण कर लिये।

उन्होंने अमृतसर में एक किले ‘लोहगढ़’ का निर्माण करवाया। गुरुजी ने हरिमंदिर के समक्ष एक बहुत बड़े चबूतरे का निर्माण करवाया और उस चबूतरे का नाम ‘अकाल तख्त’ रखा। गुरु हरगोविंदसिंहजी यहां पर सुबह एवं शाम को दरबार लगाने लगे। इस दरबार में धार्मिक प्रवचनों के स्थान पर वीरता के राग गाये जाते थे। इस वीर रस राग के कारण शिष्य समुदाय में निर्भयता के भाव उत्पन्न होने लगे थे। इससे गुरुजी की लोकप्रियता और शक्ति में प्रतिदिन वृद्धि होती जा रही थी। जन समुदाय में वे ‘सच्चे पातशाह’ के नाम से विख्यात होने लगे। जिससे एक ही अर्थ निकलता है कि दिल्ली का बादशाह झूठा और गुरुजीही सच्चे बादशाह हैं।

धीरे-धीरे अनेक वीर युवा उनकी सेवा के लिए जुटने लगे और दोआबा तथा पटियाला, नाभा, जींद, फरीदकोट, फिरोजपुर तथा लुधियाना जिले से करीब 500 युवाओं ने गुरुजी की सेवा में आकर उनसे निवेदन किया, कि हमारे पास आपकी सेवा में भेंट करने के लिए इस शरीर रूपी जीवन के अलावा और कुछ भी शेष नहीं है। युवाओं ने गुरुजी से कहा कि वेतन के रूप में हमें आपके धर्मोपदेश व आपका आशीर्वाद चाहिए। आपके आशीर्वाद से क्रूर और अत्याचारी शासकों के विरुद्ध संघर्ष में हम अपने प्राणों तक को न्यौछावर कर देंगे, लेकिन पीछे कभी नहीं हटेंगे। युवाओं की गुरुभक्ति देख हरगोविंदसिंहजी ने उन्हें आशीर्वाद दिया और अपनी सेना में भर्ती कर लिया। उन युवाओं को एक-एक घोड़ा और शस्त्र प्रदान किये। गुरुजी ने उनमें से 52 युवाओं को अपने अंगरक्षक के रूप में अंगीकृत किया। इनमें से बिधीचन्द, पिराना, जेठा, पेरा तथा लंगाहा को एक-एक सौ घुड़सवारों का प्रमुख नियुक्त किया।

गुरुजी के बढ़ते प्रभाव और लोकप्रियता की खबरें बादशाह जहांगीर तक पहुंच रही थीं। इन खबरों के कारण बादशाह गुरुजी के प्रति बहुत अधिक आक्रोशित हो उठा। बादशाह ने हरगोविंदजी के बढ़ते यश और प्रभाव का दमन करने के लिए कुछ योजनाएं बनाने की ओर कदम बढ़ाए और अपने दरबार के दो अधिकारियों बेग तथा वजीर खान को गुरुजी को गिरफ्तार कर लाने का आदेश दिया।

दोनों अधिकारी बादशाह का आदेश मानकर अमृतसर गुरुजी को गिरफ्तार करने के लिए पहुंचे। दोनों अधिकारी गुरुजी का सम्मान करते थे, इसलिए उन्होंने गुरुजी से प्रार्थनापूर्वक कहा कि बादशाह जहांगीर ने आपको दिल्ली बुलाया है। आप स्वयं दिल्ली चलें।

गुरुजी उनके मन की बात समझ गए थे। जब गुरुजी बादशाह के समक्ष उसके दरबार में पहुंचे तो जहांगीर ने उनके विरुद्ध आरोपों की झड़ियाँ लगा दीं। गुरुजी ने उसके आरोपों को बड़े ही शांति से सुना और बाद में उन आरोपों का खंडन भी किया। फिर दोनों (गुरुजी और बादशाह) में धर्म संबंधी बहुत-सी चर्चाएं हुईं। इन चर्चाओं के बाद बादशाह ने सभी आरोपों को वापस ले लिया। किन्तु इसके बाद भी बादशाह के दिमाग में कुछ न कुछ चल ही रहा था। बाद में बादशाह को शिकार पर जाने की सूझी। बादशाह जहांगीर को मालूम था कि गुरुजी को शिकार पर जाना बहुत पसंद है। इसलिए जहांगीर ने गुरुजी को शिकार पर चलने का निमंत्रण दिया। गुरुजी ने बादशाह का निमंत्रण स्वीकार किया और शिकार के लिए चल पड़े। जब वे शिकार पर निकले तभी एक शेर से उनका सामना हो गया। वह शेर बादशाह की तरफ ही लपका। बादशाह के साथ आए हुए सैनिकों ने शेर पर गोलियां और तीर चलाये किन्तु वे सारे तीर और गोलियां व्यर्थ ही गईं, वे सब शेर के आजू-बाजू   से निकल गए। यह सब देख बादशाह बहुत भयभीत हो गया। उसने दयापूर्ण दृष्टि से गुरुजी की ओर देखा। गुरुजी उसकी दयापूर्ण दृष्टि देख तुरंत अपने घोड़े से उतरे और अपनी तलवार और ढाल लेकर शेर के सामने आ गए और एक ही झटके में उन्होंने शेर को मार गिराया। उस वक्त बादशाह की किस्मत अच्छी थी कि उसके साथ गुरु हरगोविंदजी थे, जिन्होंने उसके प्राणों की रक्षा की, नहीं तो शेर बादशाह को मार डालता और उसके सैनिक कुछ कर भी नहीं पाते। बादशाह ने गुरुजी की वीरता अब तक सुन ही रखी थी, लेकिन अब उसने साक्षात देख भी ली। बादशाह सोचता ही रह गया कि इतनी कम उम्र में गुरुजी इतने बलशाली हैं। वह उनके वीरतापूर्ण साहस को निहारता ही रह गया।

गुरुजी में इतना बल और सामर्थ्य देख बादशाह झल्ला उठा। वह गुरुजी के प्रतिदिन बढ़ते बल और शक्ति से घबरा गया। उसने विचार किया कि और अधिक शक्ति अर्जित करने से पूर्व गुरुजी का कुछ न कुछ बंदोबस्त करना पड़ेगा।

बादशाह ने गुरुजी के पिता अर्जुनदेवजी को तो मार ही डाला था। लेकिन फिर भी उनकी (अर्जनदेवजी) हत्या से वह संतुष्ट नहीं हुआ था। उसने पिता (अर्जनदेवजी) के जुर्माने की 2  लाख की राशि अब बेटे (हरगोविंदजी) से वसूलने के आदेश अपने सैनिकों को दिये और इसी आदेश के चलते उसने गुरुजी को गिरफ्तार कर लिया एवं दूर ग्वालियर के किले में कैद कर लिया। समय को अपने पक्ष में न देखते हुए गुरुजी ने उस समय कोई प्रतिउत्तर नहीं दिया। इसमें एक बड़ा कारण यह भी था कि उस समय गुरुजी की आयु मात्र चौदह वर्ष ही थी । हरगोविंद को कैद करने के बाद बादशाह को लगा कि अब उनका प्रभाव और यश कम हो जायेगा, लेकिन हुआ उसके विपरीत ही। बादशाह ने जिस किले में गुरुजी को कैद कर रखा था वहां का माहौल पूर्ण रूप से परिवर्तित हो गया। उस किले के चारों तरफ का वातावरण गुरुमय हो गया था। एक प्रकार से यह कह सकते हैं कि वह किला एक तीर्थस्थल के रूप में जाना जाने लगा । गुरुजी को बादशाह ने जिस किले में बंदी बनाया था, उसी किले में उसने अलग-अलग राज्यों के करीबन 52 राजाओं को भी गिरफ्तार कर रखा था। उन राजाओं को जहांगीर ने इसलिए बंदी बना रखा था, क्योंकि उन्होंने बादशाह की अधीनता स्वीकार करने से इंकार कर दिया था। उन बंदियों की समान भावनाएं एवं उद्देश्य एक होने के कारण गुरुजी को भी उनसे मिलने का एक अच्छा अवसर प्राप्त हुआ। इन सभी से मिलने के बाद गुरुजी को बादशाह से टक्कर लेने की उनकी संकल्पना को और अधिक बल मिला। किले में कैद सभी राजा गुरुजी को अपने बीच देख बहुत प्रसन्न थे। गुरुजी के ज्ञान और आध्यात्मिक जीवन से वे बहुत ही प्रभावित थे। हर रोज हरगोविंदजी की दिनचर्या प्रभु कीर्तन से ही प्रारंभ होती थी और किले में प्रात: एवं सायं हरिकीर्तन होते थे।

          हरिकीर्तन से किले का कोना-कोना गूंजता था। हर क्षण गुरु हरगोविंदजी का यश और प्रभाव बढ़ता जा रहा था। किले के अंदर तो उनके प्रति श्रद्धा थी, साथ ही साथ किले के बाहर भी पूरे समाज में उनके प्रति सम्मान और श्रद्धा में वृद्धि होती जा रही थी। किले में कैद होने के कारण लोगों के जत्थे पैदल ही पंजाब से ग्वालियर उनके दर्शन की आस लेकर आते थे। लेकिन उन जत्थों को किले में प्रवेश नहीं था। किला जंगलों के बीच लगभग 300 फुट ऊँची पहाड़ियों पर बनाया गया था। किले की दीवार ही इतनी अधिक विशाल थी कि किसी को भी किले के अंदर का दृश्य दिखाई ही नहीं देता था और किले के चारों और सैनिकों का हमेशा कड़ा पहरा रहता था। गुरुजी के भक्त इस कारण उनके दर्शन तो नहीं कर पाते थे, लेकिन उसी विशाल दीवार को नमस्कार करके लौट जाते थे। उसी में वे अपने आपको धन्य समझ लेते थे। इस तरह लोगों का आना तब तक जारी रहा जब तक गुरुजी 1611 ई. में मुक्त नहीं हुए। फिर एक दिन ऐसा आया कि जब 52 कलीवाला चोला पहनकर गुरु हरगोविंदजी ने अपने साथ 52 राजाओं को भी रिहा करवाया। जब वे रिहा होकर अमृतसर गए, तो संयोगवश वह दिन दीपावली के त्यौहार का दिन था। लोगों ने गुरुजी के रिहा होने की खुशी में सभी तरफ दीपक प्रज्वलित किये और जमकर दीपावली का पर्व मनाया। लोगों को इस बात की भी प्रसन्नता थी कि अब नित्य ही उन्हें गुरुजी के दर्शन और उनके उपदेश सुनने को मिलेंगे। धीरे-धीरे समय के साथ-साथ गुरुजी ने अपनी सैनिक गतिविधियां बढ़ानी भी शुरू कर दीं।

 गुरुजी के पास करीब 800 घोड़े और बहुत अधिक संख्या में घुड़सवार भी एकत्र हो गये थे। अस्त्र-शस्त्र से लैस 60 जवान उनकी सेवा में हमेशा तत्पर रहते थे। जहांगीर की कैद से आजाद होने के बाद उन्होंने अपने आध्यात्मिक तथा राजसी प्रभुत्व को और अधिक बढ़ाया। उन्होंने बादशाहों के समान कलगी भी धारण करनी प्रारंभ कर दी। वे अपने प्रवास में पंजाब के साथ अलग-अलग प्रांतों में प्रचारार्थ गए। उन्होंने इस प्रवास के दौरान अलग-अलग जगह पर बहुत से गुरुद्वारों का निर्माण भी करवाया। बहुत से युवा भक्ति एवं शक्ति के मार्ग पर चलकर गुरुजी के संगठन से जुड़ने लगे। अमृतसर से वापसी के दौरान बिलासपुर के राजा ने हिमालय की तराई में स्थित एक भूखंड गुरुजी को भेंट किया। गुरुजी ने यहीं कीरतपुर नाम से अपने कार्य केंद्र का निर्माण करवाया। गुरुजी की पूरी जीवन-यात्रा विशेषतापूर्ण और सम्माननीय रही। उन्हें हर युद्ध में विजय ही प्राप्त हुई, पराजय की ओर उन्होंने कभी भी देखा ही नहीं। वे हमेशा सत्य का साथ देते थे और जहां अन्याय होता था उसका हमेशा दमन करते थे। जन साधारण में उनका नाम ‘सच्चा पातशाह’ के रूप में प्रतिष्ठित हो गया।

 उनके इसी स्वरूप को देखते हुए उनके भाई गुरुदासजी ने यह कहकर उनका वर्णन किया-

 ‘अरजन काहया पलटि कै मूरती हरगोविंद सवारी। 

दल भंजन गुर सूरमा वह जोधा बहू परोपकारी ।।’

 (इसका अर्थ यह है कि गुरु अर्जनदेवजी ने ही अपना शरीर बदलकर गुरु हरगोविंदजी के स्वरूप को संवारा। श्री हरगोविंदजी शत्रुओं के दल का विनाश करने वाले शूरवीर गुरु थे। वे एक महान योद्धा एवं प्रभावशाली परोपकारी महान महामानव थे। )   

गुरुजी ने बाद में कीरतपुर को अपना केंद्र स्थान बना लिया। अपने उत्तराधिकारी की खोज में उन्होंने हर जगह अपनी दृष्टि घुमानी प्रारंभ की तो उन्हें अपने दिवंगत पुत्र बाबा गुरदित्ताजी के छोटे पुत्र हरिरायजी उत्तराधिकारी के योग्य दिखे। सारी सिख संगत के समक्ष उन्होंने हरिरायजी को संबोधित करते हुए कहा कि बेटा अब हमारा अंतिम समय निकट आ गया है। अत: हम तुम्हें यह गुरुनानक देवजी की पवित्र गद्दी सौंपते हैं। तुम इसे ग्रहण कर सभी का नेतृत्व करो और साथ ही दुखी लोगों के दुख दूर करो और सभी को सत्य का रास्ता दिखाओ।

सन 1644 ई. में कीरतपुर में गुरु हरगोविंदजी अपनी जीवन लीला पूर्ण कर प्रभु ज्योति में समा गए। उन्होंने अपने शिष्यों को बहुत-सी ज्ञानपूर्ण बातें सिखाई। शिष्यों को नित्य भजन-पाठ के साथ-साथ धर्म की रक्षा हेतु अपने प्राण तक न्यौछावर करने की शिक्षा दी। गुरुजी ने शिष्यों के जीवन में एक प्रकार से नई क्रांति ला दी। गुरुजी लोक संग्रह शास्त्र के बड़े ज्ञाता थे। उनके प्रभावी और आकर्षक व्यक्तित्व के कारण सभी सम्मोहित हो जाया करता था। उनके सान्निध्य में एक विशेष प्रकार का जादू था, इस कारण जो भी उनके पास बैठता या बात करता वह उनसे प्रभावित हुए बिन न रहता। यही कारण है कि सम्पूर्ण भारतीय समाज ने उन्हें एक परोपकारी और महामानव की संज्ञा दी।

 – लखेश्वर चंद्रवंशी “लखेश” 

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