पहले दाता शिष्य भया….

गुरु पूर्णिमा पर विशेष :

          भारतीय तत्व चिन्तन एवं साधना के विमल क्षेत्र में गुरु की प्रतिष्ठा अनिवार्य रूप से होती रही है। गुरु से विरत होकर कोई कार्य सम्पन्न नहीं किया जाता था । भारतीय विचारधारा के अनुरूप जीवन के प्रत्येक कार्य क्षेत्र में गुरु का संग होना आवश्यक समझा जाता है। बिना गुरु के ज्ञान पूर्ण नहीं होता था, ज्ञान की प्रामाणिकता सिद्ध नहीं होती है । हम किसी भी क्षेत्र में कितने भी योग्य क्यों न हो जायें लेकिन यदि हमारे सिर पर गुरु का हाथ न हो तो हमारा सारा ज्ञान अप्रामाणिक होता है, हमारे ज्ञान की पुष्टि नहीं होती मन में भ्रम बना रहता है । इसलिए गुरु का महत्व और भी व्यापक हो जाता है । शिशु के जन्मदाता, शिशु की सेवा करने वाली दाई, नाम रखने वाले पण्डित, शिक्षा देने वाले शिक्षक, विवाह सम्पन्न करने वाले पुरोहित, मंत्र देने वाला धार्मिक व्यक्ति तथा अंतिम संस्कार करने वाला सामाजिक व्यक्ति – ये सभी तो गुरु माने जाते हैं । इन सभी से श्रेष्ठ और महान् गुरु है जो जीव को भय-बन्धन से मुक्त कर दिव्य जीवन प्रदान करता है । इसी गुरु को सद्गुरु की उपाधि मिलती है । सद्गुरु के समान अधिकारी, मनुष्यों में तो कोई है ही नहीं, देव-वर्ग भी इस श्रेणी में नहीं आते । सदगुरु कबीर साहब ने गुरु को गोविन्द से भी अधिक महत्व दिया है ।

गुरु गोविन्द दोउ खडे, काके लागूँ पाँय ।

बलिहारी गुरु आपने, जिन गोविन्द दियो लखाय ।।

          सदगुरु कबीर की भाँति सहजो बाई भी गुरु की महिमा को प्रभु की महिमा से अधिक महत्ता सम्पन्न समझतीं हैं । वह अपने एक पद में कहती हैं – 

राम तजूँ पर गुरु न बिसारूँ,

गुरु के सम हरि कूँ न निहारूँ ।

          वह प्रभु का परित्याग कर सकती है किन्तु गुरु को भुला नहीं सकती । प्रभु और गुरु की तुलना करते हुए आगे कहती हैं । ईश्वर इस संसार में जन्म देकर उसको काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह इन पंच विकारों से ग्रस्त करता है परन्तु गुरु उन विकारों से विमुक्त कर देता है । ईश्वर कौटुम्बिक माया-ममता में जन्म देता है । किन्तु गुरु मायाबद्ध जीव को स्वच्छन्द कर देता है । ईश्वर ने विविध प्रकार के रोगों और भोगों को जन्म दिया है, गुरु उनका विनाश करके आत्म दर्शन करवाने में समर्थ होता है । मन सोचने पर तब और भी विवश हो जाता है जब वह कहती है :-

हरि ने मोसूँ आप छिपायो,
गुरु दीपक दे ताही दिखायो ।
फिर हरि बंध मुक्ति गति लाये,
गुरु ने सब ही भरम मिटाये ।
चरणदास पर तन मन वारूँ,
गुरु न तजूँ हरि कूँ तजि डारूँ ।।

          परमात्मा ने तो अपने आप को जीव मात्र से छिपा रखा है, धन्य है मेरे गुरु, जिन्होंने ज्ञान का दीपक देकर उस प्रसन्न स्वरूप का प्रत्यक्ष दर्शन करा दिया । ईश्वर ने जीव को उत्पत्ति, विकास और विनाश (सत, रज और तम) में उलझा रखा है। इस बंधन और मुक्ति के भ्रम को मिटाने वाला मेरे सदगुरु चरणदासजी साहब पर मैं तन, मन और प्राण न्यौछावर करने को तैयार हूँ । इस प्रकार भक्तिन सहजो बाई गुरु का त्याग नहीं कर सकती, चाहे भगवान उनसे छूट क्यों न जाये । 

क्या ऐसा सदगुरु हमें मिल सकता है ?

लगन कठिन मेरे भाई,
गुरु से लगन कठिन मेरे भाई ।
लगन लगे बिन काज न सरिहैं,
जीव परलय तर जाई ।

          गुरु से लगन लगाना बहुत कठिन है मन, वचन और कर्म से गुरु को चरणों में लौ लगाना कठिन है । यदि ऐसा न हो सका तो जीव जन्म-मरण के चक्र में फंसा ही रहता है । संत कबीर आगे कहते हैं –

मिरगा नाद शब्द सनेही, शब्द सुनन को जाई ।
सोई शब्द सुन प्राण देत है, तनिको न मन में डराई ।

          मृग नाद में मस्त होकर अपना प्राण दे देता है । परन्तु प्राण जाने के भय से वह स्वयं को नाद से विलग नहीं रख सकता । उसी प्रकार सती और पपीहा का उदाहरण देते हैं कि सती होने वाली नारी कभी अग्नि के भय से नहीं भागती । पपीहा प्यासा ही मरना पसंद करता है परन्तु स्वाति बूँद के सिवा किसी अन्य जल का वह पान नहीं करता । दो वीर यदि युद्ध में लडते हैं तो उन्हें केवल विजय के सिवा कुछ नहीं दिखता । वे हार के डर से युद्ध भूमि से पलायन नहीं करते । सदगुरु कहते हैं :-

छोडो अपनी तन की आशा, निर्भय होय गुन गाई ।
कहे कबीर ऐसे लौ लावे, सहज मिले गुरु आई ।।

          मृग, पपीहा, सती और योद्धा की तरह अपने मन की आशा छोड निर्भय होकर गुरु का गुण गाओ । ऐसा लौ, ऐसी तीव्र जिज्ञासा जब हमारे अंदर जागृत होगी तो स्वयं सदगुरु सहज ही हमें मिल जायेंगे ।

गुरु शिष्य मर्यादा

          हम गुरु की कृपा से चाहे कितने भी ज्ञानी क्यों न हो जायें परन्तु गुरु के सामने तुच्छ ही हैं । स्वयं को कभी भी गुरु से अधिक नहीं समझना चाहिए । जैसे हमारे जीवन में गुरु का महत्व है वैसे शिष्य के आचरण का समर्पण का भी महत्व है । सदगुरु कबीर की दृष्टि में शिष्य की महानता भी आवश्यक है । वे कहते हैं :-

पहले दाता शिष्य भया, तन मन अरपे शीश ।
दूजे दाता गुरु भया, जिन नाम दिया बख्शीश ।।

          तो शिष्य का भी महत्व है । उसके समर्पण का, प्रेम का ताकि गुरु उसे नाम का, ज्ञान का पुरस्कार दे सके । उसी प्रकार हमें, गुरु को हमसे दुख हो, ऐसा कृत्य नहीं करना चाहिए । यदि गुरु रूठे तो उन्हें तुरन्त मना लेना चाहिए ।

कबिरा ते नर अंध है, गुरु को समझे और ।
हरि रूठे गुरु शरण हैं, गुरु रूठे नहीं ठौर ।।

          संसार में आज गुरु बनाने की और शिष्य बनाने की होड-सी लगी है । इसमें आज योग्यता नहीं देखी जाती । पान-फूल, धोती-रुपए चढाकर कण्ठी धारण कर ली जाती है मन में प्रेम नहीं और जबरदस्ती जल्दी-जल्दी में नाम स्मरण किया जाता है । गुरुभक्ति में अनुशासन का भी महत्वपूर्ण स्थान है । जबरदस्ती से और स्वेच्छा से की गई भक्ति में अंतर है । प्रेमपूर्वक भक्ति अनुशासन के अन्तर्गत आती है जबकि जबरदस्ती का नाम-स्मरण (भक्ति) बंधन कहलाता है ।

जान गुरु, मन चेला 

          हम किसी भी शरीर को नहीं पूजते । जिसकी हम उपासना करते हैं, जिनके चरण का चरणामृत लेते हैं वे ज्ञान स्वरूप व ब्रह्मस्वरूप होते हैं । शिष्य को कभी भी अपने गुरु के प्रति अविश्वास या संदेह नहीं होना चाहिए । गुरु की निंदा व गुरु का विरोध प्रत्यक्ष तो दूर मन में भी नहीं लाना चाहिए ।

‘‘गुरु की निंदा सुने जो काना,
ताको नाही मिले भगवाना ।”
‘‘गुरु की करनी गुरु भरेगा,
                  चेला की करनी चेला ।।” (कबीर बानी) 

          अतएव गुरु की भक्ति ही केवल मन में हो । गुरु के प्रति प्रेम और श्रद्धा इतनी अधिक हो जाये जिससे कि हम गुरु के कृपा-पात्र बन जाएँ । आइये, हम परमात्मा से ऐसा निवेदन करें कि वे हमारे मन में भक्ति का ऐसा दीपक प्रकाशित करें जिससे अज्ञान का अंधकार दूर हो जाये और अहंकार का नाश हो जाये । पूर्ण समर्पण भाव से…..

मेरा मुझमें कुछ नहीं, जो कुछ है सो तोर ।
तेरा तुझको अर्पता, का लागत है मोर ।।

– लखेश्वर चंद्रवन्शी ‘लखेश’

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