आफ़ताब लगे हैं मुझे…

तुम्हारा यह नुरानी बदन, आफ़ताब लगे हैं मुझे |

लालीलब, खुशबूवाली  तू खिलता गुलाब लगे हैं मुझे ||

तेरे चेहरे से अक्सर पढ़ता हूँ तहरीरें,

तुम्हारा ये चेहरा, किताब लगे हैं मुझे ||

तुम्हें देखते ही एक सवाल जेहन में आता है,

तुझसे क्या पूछूं,  तुम्हारी हर नजर जवाब लगे हैं मुझे ||

कई अर्से से तुम्हें यहाँ- वहां ढूंढ़ रहा हूँ,

पर तुमसे मुलाकात, ख़्वाब सा लगे हैं मुझे ||

तुम्हें खोजूं कैसे, कहीं तुम्हारा निशां नहीं मिलता,

आवाज दूँ किसे जब, वह भी खामोश लगे हैं मुझे ||    

– लखेश्वर चंद्रवंशी ‘लखेश’

 
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