भारत जागो ! विश्व जगाओ !!

(प्रथम दृश्य )
(युवक सोया है…..माता-पिता बात कर रहे हैं) 
मां : ५ बज गए हैं, पर ये लड़का अभी तक सोया है | न जाने आज की पीढ़ी को क्या हो गया है, सूरज उगने के बाद ही लोग उठाते हैं !!
पिताजी : अपने सपनों में खोया होगा | वैसे भी…..खैर, उठ जायेगा फिर बात करेंगे | (युवक करवट बदलता है…माता-पिता मंच से जाते …युवक स्वप्न में….)
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(सूनसान इलाका – अजीब – सा सन्नाटा, अचानक अजीब तरह की विचित्र प्रकार की आवाजें, हवा के तेज झोकों का, पानी व विचित्र प्रकार की जानवरों की आवाजें) 
युवक : (गाता हुआ – अपनी ही धुन में जा रहा है…) 
जिन्न : ही ही ही ऽऽऽ हा हा हा 
युवक : (डरकर काँपते हुए) अरे बाप रे…..कौन है? …. कौन है….. यहाँ ? (इधर-उधर देखता है)
जिन्न : (पुन:) हा हा हा ऽऽऽ
युवक : ये कैसी भयंकर आवाज है ? … (ठहरकर……रोते हुए) अब क्या करूँ?… कहाँ जाऊँ ?
 जिन्न : खामोश … (भयंकर आवाज में) 
(फिर सन्नाटा कहीं से कोई आवाज नहीं)
युवक : (डरता हुआ) जय हनुमान ज्ञान गुन सागर | जय कपीश तिहुं लोक उजागर ||
रामदुत अतुलित बलिधामा | अंजनी पुत्र पवन सूत नामा….||
जय बजरंग बली …….(इधर-उधर देखता है | किसी को पास न देखकर कहता है ) भाग गया – भाग गया…. (कूदने लगता है) अब यहाँ कोई नहीं | (अपनी दोनों भुजा उठाकर) अरे, तू तो अभी जवान है…..बलवान है, तुझे कोई नहीं डरा सकता, तू वीर है…. (चलता है)
जिन्न : ही ही ही ऽऽऽ …. हा ऽऽऽ…….
युवक : फिर वही आवाज ऽऽऽ बचाले भगवान…. बचाले…. 
(कोई उसे अदृश्य व्यक्ति पकड़ लेता है, वह अपने आप को छुड़ाने का प्रयत्न करता है…)
अरे.. छोड़ो मुझे  छोड़ो……
जिन्न : ही ही ही ऽऽऽ हा ऽऽऽ……
युवक : मुझे छोड़ो दो … मुझे छोड़ो दो….. (जिन्न उसे छोड़ देता है ) 
कौन हो तुम ? तुम मुझे दिखाई क्यों नहीं देते ? 
जिन्न : (हँसता है) मैं जिन्न हूँ … हा हा हा 
युवक : मुझे जाने दो प्लीज ! मेरे घर भाई-बहन हैं, माँ-बाप हैं… मुझे छोड़ दो प्लीज !
जिन्न : आप मेरे आका हो और मैं आपका गुलाम । 
युवक : नहीं …. मैं किसी का आका-वाका नहीं। मैं तो … पूरा का पूरा फाका हूँ। 
जिन्न : आप मेरे आका हैं इसलिए मैं आपको कोई नुकसान नहीं पहुँचाऊँगा। 
युवक : अच्छा .. तो ठीक है। मैं तुम्हारा आका हूँ और तुम मेरे गुलाम ! तो तुम मेरी क्या मदद करोगे ?
जिन्न : मैं कुछ भी कर सकता हूँ। चाहूँ तो एक मिनट में तुम्हें नागपुर से कश्मीर पहुंचा दूँ। मर्जी हो आपकी तो एक क्षण में महल बना दूँ। 
युवक : अब समझा कि तुम सब कुछ कर सकते हो। 
जिन्न : हाँ … जरूर
युवक : तो तुम मुझे एक महल बना के दिखा सकते हो।
जिन्न : हाँ – हाँ, गिली-गिली छू-छू….. ये लो… 
युवक : वा! क्या सुंदर महल बनाया है। अब मैं इस नगर का सबसे बड़ा आदमी बन गया हूँ। 
जिन्न : आका ! मुझे और काम चाहिए। 
युवक : तो ठीक है मुझे आइसक्रीम खिला दो। 
जिन्न : गिली-गिली छू – छू….. ये लीजिए। (युवक आइसक्रीम खाने लगता है।)
 जिन्न : आका ! मुझे और काम दो ! मैं खाली नहीं रह सकता। मुझे ऐसा काम दो जिससे मुझे मुक्ति मिल जाए। 
युवक : अरे, मुझे आइसक्रीम तो खाने दीजिए। (रुककर) अच्छा कोई महान कार्य ( सोचता हुआ) क्या हो सकता है ? हाँ याद आया ! तुम इस देश का पुनरूत्थान कर दो । 
जिन्न : पुनरूत्थान … यानि ।
युवक : मेरे कहने का मतलब इस देश को पहले की तरह खुशहाल बना दो । धर्म, संस्कृति, ज्ञान-विज्ञान, धन-धान्य से परिपूर्ण कर दो । जाति-पाति, भेदभाव, आतंकवाद, भोगवाद, सबको मिटाकर एक सुंदर भारत बना दो । मेरा भारत- एक अखंड भारत, न हो पाकिस्तान … न बांग्लादेश … हो एक अकेला भारत देश।
जिन्न : नहीं … मैं ये काम नहीं कर सकता !
युवक : क्यों नहीं कर सकते ? 
जिन्न : क्योंकि जिन्होंने इसकी स्वतंत्रता, इसकी अखंडता के लिए प्रयास किया, जिन्होंने इस महान राष्ट्र के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया। वे सब इस दुनिया से ऊपर चले गए और जो लोग भारत की एकता और अखंडता के लिए कार्य कर रहे हैं, उनकी आज कौन सुनता है ? 
युवक : तो क्या भारत का पुन: उत्थान नहीं हो सकता ?
जिन्न : हो सकता है यदि हमारे पूर्वज फिर से यहाँ आयें ! काश अभी कोई चाणक्य होता ! पर अब क्या ? न चंद्रगुप्त, न सावरकर, न सुभाष । न कोई शिवाजी, न प्रताप और न कोई समर्थ रामदास । 
युवक : अरे हताश क्यों होते हो भई ! तुम्हारे लिए ये कोई कठिन कार्य तो नहीं ! तुम ऊपर से उन्हें यहाँ ला दो !
जिन्न : स्वर्ग कोई मकान की छत तो नहीं है जो उन्हें उठाकर यहाँ लाऊँ ।
युवक : अभी-अभी तो तुम बड़ी डींगे हाँक रहे थे कि मैं सबकुछ कर सकता हूँ ! अब क्या..सारी होशियारी निकल गई ।
जिन्न : मैं उन्हें ला तो नहीं सकता…. परंतु तुम्हें स्वर्ग में जरूर ले जा सकता हूँ । 
युवक : कुछ भी बकते हो ? ऐसा कभी नहीं हो सकता । क्योंकि तुम मुझे दिखाई नहीं देते ; तो मुझे अपने साथ कैसे ले जा सकते हो ? पहले मेरे सामने प्रकट हो, तब तो बात बने । 
जिन्न : जो हुक्म मेरे आका… (तेज हवा के झोकों की आवाज …….जिन्न प्रकट होते ही) ही हा हा हा ऽऽऽ
युवक : तो चलें….
जिन्न : हाँ – हाँ – चलिए (हाथ पकड़कर दो राउंड) 
 (दृश्य – २) 
 (स्वर्ग का दृश्य….. पारिजात का वृक्ष, सुगंधित वातावरण – एक नर्तकी का प्रवेश…………..नर्तकी का नृत्य देखता है……………जिन्न अदृश्य हो जाता है…..नर्तकी भी नाचते हुए अदृश्य हो जाती है।)
युवक : कितना सुंदर स्वर्ग है ….. सुगंधित वातावरण ….. ऐसा लगता है मानों भगवान ने अपने हृदय का सारा प्रेम यही भर दिया है। मैंने अपने पुराणों में पढ़ा था कि हमारा देश भी ऐसा ही था । सब लोग मिल-जुलकर रहते थे । समृद्ध, सुखी मेरी मातृभूमि !
(टहलता हुआ……एक स्त्री तलवार लेकर खड़ी है।) 
युवक : आप कौन हैं ?
स्त्री : (तलवार खींचकर) ‘‘मैं झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई हूँ।” 
युवक : वही १८५७ वाली जिसने अपनी चमचमाती तलवार से गोरों के होश उड़ा दिये थे । (प्रणाम करता है) और कौन-कौन हैं यहाँ पर ?
लक्ष्मीबाई : जिन्होंने अपनी मातृभूमि के लिए, दीन-दुखियों के कल्याण के लिए अपना सारा ‘जीवन’ दे दिया, वे सारे लोग यहाँ रहते हैं। 
युवक : मुझे सबसे मिलना है !
लक्ष्मीबाई  : ठीक है यहाँ से सीधे चले जाओ। कई महापुरुषों से आपकी भेंट होगी। 
युवक : अच्छा तो मिलते हैं। नमस्कार  (जाता है।)
मेरा रंग दे बसंती चोला, मेरा रंग दे…….।।घृ.।। 
जिस चोले को पहन शिवाजी, खेले अपनी जान पे। 
जिसे पहन झाँसी की रानी, मिट गईं अपनी आन पे । 
आज उसी को पहन के निकला ऽऽऽ -२ 
हम मस्तों का चोला ।। 
(भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव का गाते हुए प्रवेश।…बीच में यह भी नाचने लगता है। तीनों आश्चर्य से) 
भगतसिंह : भाई ! तुम कौन हो ? यहाँ नये लगते हो !
युवक : मैं….. मैं….मेरा मतलब मेरा नाम रघु है। और मैं आप लोगों से मिलने आया हूँ। 
राजगुरु : ओ ऽऽऽ ! तो कई वर्षों के बाद हमारे देश की जनता को हमारी याद आ रही है। 
सुखदेव : अरे, हम तो १५ अगस्त और २६ जनवरी में याद किये जाने वाले औपचारिक नमूने बनकर रह गये हैं) 
भगतसिंह : अरे छोड़ा न यार ! जो लोग प्रभु श्रीराम के अवतार को भी झूठ कहते हैं वो भला हमें क्या याद करेंगे। सब बकवास है, दिखावा है आजादी का पर्व, विभाजित भारत का पर्व…. क्या इसी भारत के लिए हमने अपना बलिदान दिया था। 
राजगुरु : अरे, सारे आतंकवाद की जड़ तो भारत का विभाजन ही है। अब कौन हमारे सपनों को साकार करेगा। कौन बनाएगा भारत की अखंडता । सब लोग झूठे हैं -२
युवक : आप लोगों का मार्गदर्शन मिले तो मैं अवश्य ही आप के स्वप्न को साकार करने का प्रयास करूँगा। आप मेरा मार्गदर्शन करें। 
भगतसिंह : जाओ भई जाओ ! पहले हमने बहुत समझाया था, पर किसी ने नहीं माना, अब कौन हमारा सुनेगा ?
(तीनों चले जाते हैं….युवक कुछ सोचने लगता है…. बापू का आगमन)
बापू : रघुपति राघव राजा राम। पतित पावन सीता राम। 
ईश्वर अल्लाह तेरे नाम । सबको सम्मति दे भगवान ।।
युवक : बापू ऽऽऽ (सीधे चरणों में गिर जाता है) 
बापू : (उसे उठाते हुए) बोलो बेटा ! कहाँ से आये हो ?
युवक : मैं … मैं.. तो इंडिया से आया हूँ । 
बापू : लगता है हमारे देश ने बहुत तरक्की कर ली है। 
युवक : आपको कैसे मालूम हुआ ?
बापू : क्योंकि जो भी भारतीय यहाँ आता है तो कहता है मैं भारत से आया हूँ, मैं हिंदुस्थान से आया हूँ। तुम पहले व्यक्ति हो जो कह रहे हो कि मैं इंडिया से आया हूँ। 
युवक : तरक्की तो हुई है बापू ! अधर्म की, स्वार्थ की, भ्रष्टाचार की, तुष्टीकरण के नीति की। अब आपके नाम की माला जपने वाले लोग ही आपके आराध्य श्रीराम के अवतार पर प्रश्न चिन्ह लगाने लगे हैं। 
गांधीजी : क्या कह रहे हो ? मैंने तो ऐसा स्वप्न में भी नहीं सोचा था। 
युवक : आपने भारत-विभाजन के बारे में भी स्वप्न में नहीं सोचा था। पर भारत खंडित हुआ ना। 
बापू : काश मैंने सावरकर की बात मान ली होती तो यह विभाजन टल सकता था। अब तो समस्या ही समस्या है। पाकिस्तान, बांग्लादेश और चीन तीनों की बुरी नजर अब हमारी मातृभूति पर है। यदि सारा भारत संगठित न हुआ तो अनर्थ हो जाएगा। अनर्थ हो जाएगा… (कहते हुए निकल जाते हैं।)
युवक : अब उपाय क्या है ? राष्ट्र को जगतगुरु बनाने के लिए मुझे क्या करना होगा ? कौन बताएगा मुझे ? कौन करेगा मेरा पथ दर्शन?
स्वामी विवेकानन्द : हम करे राष्ट्र आराधन …. आराधन।
तन से , मन से, धन से, तन मन धन जीवन से 
हम करे राष्ट्र आराधन – आराधन।।
युवक : (प्रणाम करता है) आज पुन: भारत को जगाना है, मेरा मार्गदर्शन करें। 
स्वामीजी : भारत को जानो । भारत की आत्मा को पहचानो । ‘धर्म’  ही भारत की आत्मा है। केवल इसी के सहारे राष्ट्र जाग सकता है। उपेक्षित समाज, गरीब, उत्पीड़ित समाज से प्रेम करो, उनकी की उन्नति के लिए अपना सारा जीवन लगा दो। 
युवक : ये सब तो ठीक है परंतु हमारा युवा वर्ग भोगवाद विदेशी सभ्यता के पीछे पागल है उन्हें कैसे समझाया जाये ? (दर्शकों की ओर देखकर)
स्वामीजी : विदेशी सभ्यता के पीछे दौड़नेवालों यदि तुम अपनी सांस्कृतिक धरोवर को भूला दोगे। यदि धर्म को भूला दोगे तो तुम चूराचूर हो जाओगे। हे मेरे पुत्रों ! मेरे स्वदेशवासियों बन्धुओं !! हमें देरी हो रही है। उठो ! जागो !! उतिष्ठत् ! जागृत !!  हम बहुत रो चुके हैं। हजारों वर्षों से दूसरों के आक्रमणों को झेल रहे हैं। अब वह काल आ गया है कि हम पूर्ण समर्पित भाव से अपने आप को राष्ट्र कार्य के लिए अर्पित कर दें। “बल”  हाँ केवल बल शक्ति की उपासना करो, पूर्ण पवित्रता का भाव अपने हृदय में धारण करो । अपने आप पर विश्वास, ईश्वर पर विश्वास, यही महानता का रहस्य है। वीर्यवान, शक्तिमान बनो । क्योंकि शक्तिहीन मनुष्य कभी धर्म की रक्षा नहीं कर सकता। भगवान  बुद्ध की करुणा, चाणक्य की नीति, प्रभु राम का आदर्श और श्री कृष्ण सा नेतृत्व का गुण विकसित करो। 
समस्त कार्य अपने कंधों पर ले लो और जान लो कि तुम ही अपने भाग्य के विधाता हो ! जितनी शक्ति व सहायता चाहिए वो सब तुम्हारे भीतर है। क्योंकि तुम ईश्वर के अंश हो । ऋषि-मुनियों की संतान हो। राणा-शिवा के वंशज हो। अपने आप को पहचानो और भारतमाता…. जिसने हमें खाने के लिए अन्न, पहनने के लिए सुंदर-सुंदर कपड़े, रहने के लिए आलिशान मकान दिये हैं । उसकी पूजा करो। तभी इस राष्ट्र का पुनरूत्थान होगा। ‘वंदे मातरम्’ के जयघोष से सारे वातावरण को राष्ट्रप्रेम से भर दो। भारत का पुनरूत्थान निश्चित है। उतिष्ठत ! जागृत !! ………… उतिष्ठत ! जागृत !! 
( स्वामीजी चले जाते हैं | युवक हड़बड़ाकर उठता है |)
युवक : स्वामीजी…स्वामीजी |
मां : अरे, इसे क्या हुआ ! ( मंच पर मां का आगमन ) कौनसे स्वामीजी आ गए तुम्हारे पास | (रूककर….)  सपने से बाहर आओ , कॉलेज जाना है ना ?
युवक : मां !  अपने यहाँ विवेकानन्दजी की पुस्तक है क्या ?
मां : ओ…तो तुम्हारे स्वामीजी का मतलब विवेकानन्द है ना ? चलो आज कुछ तो अच्छा हुआ |
युवक : हाँ, विवेकानन्दजी सपने में आये थे |
मां : सपने में तो ठीक है…हकीकत में अब कुछ करेगा या सपने में ही खोया रहेगा | (युवक अंगड़ाई लेता है….आलस्य का प्रदर्शन)
मां : हे भगवान ! इसके आलस्य को कई तो मिटाए….(तभी बेल के बजने कि आवाज आती है)
मां : कौन है ! इतनी सुबह…..आती हूँ | ( द्वार खोलती है )
कार्यकर्ता : नमस्कार | मैं विवेकानन्द केन्द्र से आया हूँ | स्वामी विवेकानन्द की १५०वीं जयन्ती के अवसर पर उनके विचारों को जनमानस तक पहुँचाने के लिए हम कार्य कर रहे है | इसलिए स्वामी विवेकानन्दजी के जीवन तथा सन्देश पर आधारित पुस्तकों को हम घर-घर पहुंचा रहे हैं | आप भी साहित्य खरीदिये |
मां : (साहित्य हाथ में लेते हुए) रघु …..जल्दी आओ | देखो विवेकानन्द केन्द्र के कार्यकर्ता आये हैं स्वामीजी की पुस्तकें लेकर | (रघु का प्रवेश…वह कार्यकर्ता को नमस्कार करता है) 
मां : (कार्यकर्ता की ओर देखकर) आज ही स्वामीजी की पुस्तक खरीदने का विचार था | (रघु की ओर देखकर) आज इसके सपने में स्वामीजी आये थे |
कार्यकर्ता : अरे वा ! ये तो अच्छी बात है |
रघु :   (साहित्य की सहयोग राशी देते हुए)  मैं भी स्वामीजी की १५० वीं जयन्ती पर आपके साथ काम करना चाहता हूँ | 
कार्यकर्ता : जरुर….यही तो आज की आवश्यकता है | २०० वीं जयन्ती का तो कुछ पता नहीं हम रहेंगे की नहीं ! पर सार्ध शती मनाने का सौभाग्य हमें मिला है | और आप तो हमारे साथ आओ….अपने मित्रों को भी लाओ, क्योंकि ये अवसर ना मिलेगा दोबारा |….(कुछ सोचते हुए…) स्वामीजी के बताये मार्ग पर चलकर ही भारत का उत्थान होगा और इसी में विश्व का कल्याण है | इस सार्ध शती समारोह का सन्देश पता है आपको ? (रघु प्रतिक्रिया में ना कहकर सिर हिलाता है)
कार्यकर्ता : भारत जागो ! विश्व जगाओ !!…तो बोलो……(सब मिलकर कहते हैं)
भारत जागो ! विश्व जगाओ !!
– लखेश्वर चंद्रवन्शी “लखेश”
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मात-पिता से बड़ा न कोय || (प्रसंग नाट्य)

 

 

 

(प्रात:काल का सुन्दर वातावरण, भगवान श्रीगणेश अपने हाथों में पुष्प लिए भगवान शिवशंकर की आराधना कर रहे हैं..|)
गणेश :  ब्रम्हमुरारिसुरार्चितलिंगम निर्मलभासित शोभितलिंगम|
 जन्मजदु:ख विनाशकलिंग तत् प्रणमामि सदाशिवलिंगम् ।।
            देवमुनिप्रवरार्चितलिंग कामदहं करूणाकरलिंगम।
            रावणदर्पविनाशनालिंग तत्प्रणमामि सदाशिवलिंगम।।
(उसी समय अपने हाथों में भाला लिए, अपने वाहन मोर पर सवार हुए भगवान कार्तिकेय का आगमन हाता है ; श्रीगणेश को पूजा में रत देखकर वे कुछ देर प्रतीक्षा करते हैं…., कुछ समय बाद दोनों भाई शिवलिंग को प्रणाम करते हैं… अपने बड़े भाई को सामने देख भगवान गणेश प्रसन्न हो जाते हैं।)
गणेश : (हाथ जोड़कर) प्रणाम भ्राताश्री।
कार्तिक : प्रसन्न  रहो, गणेश प्रसन्न रहो। 
गणेश : कहिए भैया ! आज यहाँ आपका कैसे आना हुआ ?
कार्तिक : गणेश आज मैं बहुत प्रसन्न हूँ और मुझे गर्व है कि मैं देवताओं  का सेनापति हूँ। मैंने अपने बाहुबल से बड़े-बड़े राक्षसों को परास्त कर दिया। 
गणेश :  आपका पराक्रम सचमुच प्रशंसनीय है। आप निश्चय ही सर्वश्रेष्ठ योद्धा हैं भैया !
कार्तिक : सो तो है गणेश ! मुझे गर्व तो इस बात का भी है कि जिस गणेश की पूजा सारे संसार में सबसे पहले होती है वह भी मुझे हाथ जोड़कर प्रणाम करता है। 
गणेश : क्यों नहीं आप मुझसे बड़े हैं तो मेरा कर्तव्य है कि मैं आपको प्रणाम करूँ !
कार्तिक : तुम कुछ भी कह लो गणेश मैं तुमसे बड़ा हूँ आयु में और शक्ति में भी। 
गणेश : आप  शक्तिशाली और पराक्रमी होने के साथ ही मुझसे आयु में बड़े अवश्य हैं । परंतु बुद्धि का हमारे जीवन में विशेष महत्व है।          बुद्धि विहिन बल किस काम का ? बुद्धि व विवेक के अभाव में मानव का जीवन पशु- तुल्य बन जाता है, इसलिए बल के साथ ही बुद्धि का होना अनिवार्य है और मैं बुद्धि का देवता हूँ, सो मैं भी कुछ कम नहीं। मैं भी आप ही की तरह महान हूँ। …. एक बात और पूछना चाहता हूँ बड़े भैया ! क्या आप बिना बुद्धि के युद्ध में विजयी हो जाते हैं ?
कार्तिक : परंतु गणेश ! केवल बुद्धि के होने से काम नहीं चलता । उसके लिए बल की भी आवश्यकता होती है। सो तो मैं बलवान हूँ और जो वीर होते हैं उसके सामने (दर्शकों की ओर हाथ फिराकर) सारा संसार शीष झुकाता है। 
गणेश : (चिढाते हुए) हाँ ऽ हाँ ऽ पता है लोग वीरों से डरकर ही तो शीष झुकाते हैं। परंतु आपको भी ज्ञात होगा कि बुद्धिमान और ज्ञानी को तो लोग बड़े आदर व प्रेम से प्रणाम करते हैं । डरकर नहीं । समझे । 
कार्तिक : (चिल्लाकर) गणेश ! … तुम अपनी मर्यादा का उल्लंघन कर रहे हो । 
गणेश : नहीं … नहीं… भ्राता ! मैं तो वही कह रहा हूँ जो सत्य है । यदि मैं गलत कह रहा हूँ तो चलो, माताश्री और पिताश्री से पूछ लेते हैं। 
कार्तिक : ठीक है….. चलो…..
(दोनों चले जाते हैं) (मंच का दो चक्कर लगाते हैं) 
                                                                              (दूसरा दृश्य) 
(भगवान शिव शिलाखंड पर बैठे हैं साथ में माता पार्वती बैठी हैं । समीप ही नंदी और कुछ शिवभक्त भूत-गण खड़े हैं हाथ जोड़कर सभी – ऊँ नम: शिवाय….५)…………. (गणेश व कार्तिक को देखकर सभी राक्षस शिवभक्त प्रणाम करते हैं | भगवान शिव ध्यान में मग्न हैं | माता पार्वती दोनों बालकों को देख प्रसन्न हो जाती हैं)
कार्तिक व गणेश : प्रणाम माताश्री ! प्रणाम पिताश्री !!
                           (भगवान शिवजी का ध्यान नहीं टूटता) 
पार्वती : कहो ! दोनों भाई एक साथ ! आश्चर्य ! कैसे आना हुआ ?
कार्तिक : (तपाक से) माताश्री देखिए ना ! गणेश कहता है मैं उससे बड़ा नहीं हूँ। 
माता : क्यों गणेश क्या कार्तिकेय सही कह रहा है ? 
गणेश : नहीं माँ, मैं भी तो यही कह रहा हूँ कि भैया मुझसे बड़े हैं । परंतु आयु में किसी के बड़े होने से क्या वह सचमुच दुनिया में सबसे बड़ा हो जाता है ? (कुछ सोच कर…) यह कहता है कि जो वीर है जिसके पास बल है वही बड़ा है । परंतु मैं भी तो बुद्धि का देवता हूँ बिना बुद्धि के वीरता कोई काम की नहीं होती !
शिवजी : (आँखें खोलकर) अरे बच्चों ! तुम दोनों कब आए ? (दोनों प्रणाम करते हैं) तनिक हमें भी बताओ माँ-बेटों में किस बात पर चर्चा हो रही है । 
दोनों : पिताश्री … (इतना कहकर दोनों रुक जाते हैं)
पार्वती : स्वामी ! गणेश कहता है बुद्धि का देवता होने के नाते वह दुनिया में सबसे बड़ा है और कार्तिक कहता है कि वह देवताओं का सेनापति है इसलिए वह सबसे बड़ा है । अब आप ही बताइये स्वामी! इन दोनों में से कौन सर्वश्रेष्ठ है ?
शिवजी : (मुस्कुराते हैं) बड़ा गंभीर प्रश्न है देवी !!(उसी समय देवऋषि नारद का प्रवेश)
नारद : नारायण, श्रीमन नारायण, श्रीमन नारायण नारायण नारायण ! (झुककर) प्रणाम महादेव ! प्रणाम ! माता पार्वती । 
दोनों भाई : प्रणाम देवर्षि !
नारद : प्रणाम, श्रीगणेश, प्रणाम कार्तिकेय ! 
शिवजी : बड़े अच्छे समय में आये हो नारद । दोनों भाइयों में संसार में अपनी श्रेष्ठता के लिए वाद-विवाद हो रहा है । अब तुम ही कोई      ऐसा उपाय बताओ कि जिससे इनमें ये कौन श्रेष्ठ है ? यह सिद्ध हो जाए और यह वाद-विवाद सदा-सदा के लिए समाप्त हो जाए। 
नारद : नारायण ! नारायण ! जहाँ देवादि देव महादेव और ममतामयी पार्वती मैया हैं वहाँ नारद जैसा छोटे भक्त का क्या काम ? आपसे   चतुर मैं कैसे हो सकता हूँ भगवन ! 
पार्वती : बातें बनाना तो कोई तुमसे सीखे नारद ! बड़े चतुर हो ।
नारद : वो तो मैं हूं ही ! सब आपकी ही तो कृपा है माता ! (थोड़ा सोचकर) हाँ .. एक उपाय है ! तुम दोनों में से जो पृथ्वी की परिक्रमा करके सबसे पहले यहाँ आएगा वही संसार में सबसे बड़ा होगा। 
कार्तिक : वा देवर्षि वाह ! क्या उपाय खोज निकाला है मैं अभी प्रस्थान करता हूँ मैं ही सबसे श्रेष्ठ बनूंगा। (कार्तिक माता-पिता व नारदजी को प्रणाम कर अपने वाहन मोर पर बैठकर जाते हैं)
नारद : गणेश जी ! आप अपने छोटे से मूषक वाहन पर बैठकर कब लौटकर आयेंगे ? आपकी गति पर मेरी मति को संदेह है गणेश जी !
गणेश : निश्चिंत रहिए देवर्षि !
(गणेश प्रणाम करते हैं और अपने चूहे पर बैठकर शिव-पार्वती के चारों ओर प्रदक्षिणा करते हैं।कार्तिकेय बहुत तेजी से जा रहा है बीच में माता  लक्ष्मी टोकती हैं|)
लक्ष्मी : अरे कार्तिकेय ! इतनी तेजी से कहाँ जा रहे हो ? तनिक रुको तो !
कार्तिक : प्रणाम माता ! मेरे पास समय नहीं है बाद में आऊँगा !
 
                                                               (तीसरा दृश्य) 
शिवजी : गणेश,  तुम बहुत चतुर हो और बुद्धिमान भी ! तुम ही इस जगत में श्रेष्ठ हो !(कार्तिक को यह बात दूर से सुनाई देती है।)
कार्तिक : पिताश्री ! आप ये क्या कह रहे हैं ? 
शिवजी : हाँ ! कार्तिक तुम तुरंत कैलाश लौट आओ । अपने आस-पास देखो गणेश के वाहन मूषक के पैरों के चिन्ह । तुम्हारे परिक्रमा से पहले ही वह सात बार पृथ्वी का भ्रमण कर चुके हैं। 
कार्तिक : (आश्चर्य से) जैसी आपकी आज्ञा !
(कार्तिक तुरंत कैलाश पहुँचते हैं) 
कार्तिक : यह कैसे हुआ पिताश्री ?
नारद : वो तो गणेश ही बतायेंगे !
गणेश : देखिए भैया ! इस संसार में हम माता और पिता के माध्यम से ही आते हैं । वही हमारा पालन-पोषण करते हैं । सारे विश्व से हमारा परिचय भी माता-पिता से ही होता है । भगवान शिव और माता पार्वती जगत में सबसे बड़े हैं और माता-पिता बड़े होने के कारण मैंने उनके चारों ओर परिक्रमा की, वो भी सात बार ! इसलिए मैंने तो संसार की परिक्रमा ही कर ली न !
शिवजी : हाँ ! इस जगत में माता-पिता व गुरु से बढ़कर कोई नहीं और गणेश ने  इस बात को सिद्ध कर दिया । गणेश आज से तुम ही अखिल विश्व में सबसे बड़े कहलाओगे ! देवताओं में तुम्हारी सबसे पहले पूजा होगी । 
कार्तिक : मैं तो बदनाम हो गया पिताश्री । मुझे कौन संसार में पूजेगा । मेरी यह हार सर्वविदित हो गई है । अब मैं किस काम का ? मेरा हृदय व्यथित है पिताश्री मैं जा रहा हूँ । 
माता : अरे कार्तिकेय ! तुम तो बड़े हो ही । जो देवताओं में बड़े हैं उनके तुम बड़े भाई हो ! इसी में तुम्हारा गौरव है । 
कार्तिक : अरे हाँ ! मैं तो भूल ही गया ! गणेश जी चलो मुझे प्रणाम करो ! आखिर मैं तुम्हारा बड़ा भाई हूँ। 
गणेश :  प्रणाम बड़े भ्राता !
कार्तिक : प्रणाम ! तुम ही बड़े हो।
(दोनों हृदय से हृदय मिलाकर गले लगते हैं। देव- दानव सब फूलों की वर्षा करते हैं |)
नंदी : भगवान शिवशंकर की …जय
                        माता पार्वती की …जय 
                               भगवान श्री गणेश की … जय
                                      भगवान कार्तिक की …. जय
                                                        देवर्षि नारद की …जय
नारद : नारायण, नारायण – २…| 
          देखी ! आप सभी ने शिव लीला ! भई, गणेश व कार्तिक ने तो हमें बहुत बड़ी सीख दी है। यह सत्य है कि माता-पिता ही सबसे बड़े              हैं और जो अपने माता-पिता की सेवा करता है, पूजा करता है वही सर्वश्रेष्ठ है । माता-पिता ही प्रथम गुरु हैं और गुरु से बड़ा कोई नहीं होता । आप भी अपने माता-पिता व बड़ों की तन- मन-धन और वचन से सेवा कीजिए। उन्हें वृद्धाश्रम में मत डालिए … मैं तो चला …. (रुककर…) एक बात तो और मैं बताना भूल गया बल और बुद्धि दोनों ही हमारे लिए अति आवश्यक है । सूर्यनमस्कार करके बलवान बनिए, स्वाध्याय करके बुद्धिमान होइए और हम सबकी माता भारतमाता की सेवा करके आप आदर्श पुत्र बनिए, भगवान श्रीहरि विष्णु आपका कल्याण करें….| मैं तो चला, अब यहाँ मेरा क्या काम, नारायण-नारायण -२ !!
– लखेश्वर चंद्रवन्शी       

 

 

 

 

 

 

 

कटघरे में हिन्दी !!

यॉर ऑनर !
ये जो व्यक्ति मेरे सामने
कटघरे में खड़ा है।
पांच वर्षों से मेरे पीछे पड़ा है। 
जहाँ भी जाता हूँ, मेरे पीछे लग जाता है।
बार-बार, एक ही बात दोहराता है।
हिन्दी बोलना सीख जा…
नमस्ते बोलना सीख जा…
इसकी हरकतों से हम अपना सिर पीट रहे हैं।
हम तो खुद बैल हैं, यॉर ऑनर।
जो इस आधुनिकता की मजबूरी में
अंग्रेजी की गाड़ी खींच रहे हैं।
लोग कहते हैं –
अंग्रेजी सीख जाओ
इसमें बहुत फायदा है।
हिन्दी में कौन-सा कद है,
कौन-सा कायदा है ?
और ये कहता है –
 तुम बड़े बेवकूफ हो
एम.ए. कर चुके हो।
नमस्ते कहना आता नहीं
हैलो, हाय कर रहे हो।।
अब भी समय है, सुधर जाओ।
अपने अंग्रेजी के पागलपन से 
जरा बाहर आओ।
और क्या कहूँ यॉर ऑनर,
इसकी हरकतों से कॉलेज के 
मित्रों का खून खौल रहा है।
विद्यार्थियों का क्या कहें,
शिक्षकों का भी बचा-कूचा
अंग्रेजी सिंहासन डोल रहा है।
कानून इसे सख्त से सख्त सजा सुनाये। 
इस आधुनिक युग में अंग्रेजी की
परिभाषा बतलाये।
आय ऑप्जेक्शन मिलॉड,
मेरे काबिल दोस्त मेरे मुवक्किल
पर बेवजह आरोप लगा रहे हैं।
कानून क्या किसी साधु का भभूत है
हिन्दी अच्छी भाषा नहीं है
इसका इनके पास क्या सबूत है?
विश्व का हर विद्वान,
हिन्दी भाषा की उच्चता को 
अच्छे से जानता है।
जब संसार हिन्दी को जानता है
तो कानून हिन्दी को मानता है…
ऑर्डर-ऑर्डर
हिंदी के अपार समर्थक जी आप अपने
सफाई में कुछ कहेंगे ।
या इस अंग्रेज के औलाद के लगाये 
आरोपों को चुपचाप सहेंगे ।
जज साहब, 
सभी आरोपों को सुनकर 
मैं अपना मुँह खोलता हूँ ।
हिन्दी और अंग्रेजी की वर्तमान स्थिति
को बराबर तौलता हूँ।
हिन्दी भाषा भारत के लिए उज्ज्वल किताब है।
जिसमें विद्यमान 
हमारे पूर्वजों की गौरवगाथा,
वीरता और त्याग है। 
हमारे पूर्वज बड़े ही विवेकशील व बुद्धिमानी थे।
संस्कृत व हिन्दी के महाज्ञानी थे। 
हम हिन्दुस्तानी अब उन आदर्शों को भूल रहे हैं।
राष्ट्रभाषा भूलकर 
हम आत्मिक शांति ढूंढ रहे हैं।
लेकिन इस कानून की दहलीज पर मेरा एक सवाल है ?
जिसका हमारे मन में मचता रोज बवाल है।
कि, स्वदेशी कहाँ है ? जज साहब, 
आज स्वदेशी कहां है ?
अब क्या बात है कि स्वदेशीमन के लोग
कहीं पर नजर आते नहीं है ?
स्वदेशी तो बापू अपनाते थे
हम लोग अपनाते नहीं है ।।
हमारी सदियों से आदत है कि
हर मोड़ पर हम परायों को अपनाते हैं,
इसलिए हम हिन्दू सहिष्णु कहलाते हैं।
यह माना कि दूसरों को अपनाना चाहिए,
पर इसका मतलब यह तो नहीं,
कि खुद के भाई को भूल जाना चाहिए।
कई ऐसे लोग हैं जो
अंग्रेजी सीखकर केवल खुद को
बड़े होशियार समझते हैं।
हिन्दी को तुच्छ जानकर
बड़े अहंकार से जीते हैं।
मैं तो कहता हूँ कि 
तुमसे अच्छे तो वे शराबी हैं
जो रोज देशी पीते हैं,
मर-मर कर जीते हैं…
फिर ऐसा जीना भी क्या जीना है ?
इस पीने की होड़ ने ही
वास्तव में, समाज का सुख छीना है।
गर्व करना है तो अपनी  भाषा पर,
अपनी संस्कृति पर गर्व करें ।
अपने सुमधुर वाणी से सबकी पीड़ा हरें।
हिन्दी तो हमें भी आती है, पर क्या करें ?
विश्व में अंग्रेजी का ही ज्यादा चलन है।
उनको ही दुनिया करती नमन है।
जो पिछड़े हैं, जो कम होशियार हैं
उनके द्वारा ही हिन्दी बोली जाती है ।
हम विद्वान हैं, हमारा मान घट जाएगा
इसलिए हमें हिन्दी बोलने में शर्म आती है।।
ऐसी हमारी धारणा बन गई है ।
अंग्रेज हमारे देश से तो चले गए
पर मन में हमारे अपनी अंग्रेजियत जोड़ गए।
अब हमने उसे अपने दिल में बसा लिया। 
अपनी निज भाषा को दिल से भगा दिया।
हमारे कपडे, वस्तु, विचार सब कुछ विदेशी हो रहे हैं।
स्वतंत्र भारत के वासी हम फिर से गुलाम हो रहे हैं।
ये कैसा देश है जज साहब !
जहाँ अंग्रेजी हर मोड़ पर हिन्दी को अंगूठा दिखाती है। 
यहाँ दुर्वासा के श्राप से अहिल्या पत्थर हो जाती है। 
फिर राम आते हैं, अहिल्या को 
पत्थर से पुन: नारी बनते हैं। 
लेकिन इस हिन्दी रूपी अहिल्या के लिए 
अब राम नहीं है।
हमें लगता है कि, व्यवहार में हिन्दी का काम नहीं है।
आज खेल, मंत्रालय, अदालत, चर्चा, स्कूल-कॉलेज, सभा
सभी में अंग्रेजों की भाषा है।
फिर इस राष्ट्र में हिन्दी की क्या परिभाषा है ?
हमें लगता है कि हिन्दी के अस्तित्व को
नकारना हमारा अधिकार है।
तो फिर इसमें हिन्दी का कौन-सा कद है,
कौन-सा आकार है ?
ये कैसा कानून है जज साहब !
जहाँ हमारी राष्ट्रभाषा, हमारे ही कारण 
खतरे में पड़े।
और कानून एक बेकसूर हिन्दुस्तानी
को कटघरे में लाकर खड़ा करे।
केवल अपने व्यावासिक लाभ के लिए 
हिन्दी के सरलीकरण के नाम पर
आज भाषा को विकृत बना दिया गया है ।
अब हिन्दी का हिन्ग्लिशिकरण करना फैशन बन गया है।
न जाने भारत के बुद्धिजीवी पत्रकारों की बुद्धि 
कहाँ गुम गया है ?
हमारी बेबसी और दिखावेपन ने हिन्दी 
की दुर्दशा कर दी है। 
इसलिए मैं फैसला चाहता हूँ,यॉर ऑनर !
मैं फैसला चाहता हूँ…
आर्डर-आर्डर 
तमाम बातें और मौका-ए-वारदात को 
मद्देनजर रखते हुए अदालत ये फैसला सुनाती है।
रुक जाइये, यॉर ऑनर।
एक बात और सुन लीजिए !
फिर अपना फैसला दीजिए !
यदि आप अंग्रेजी के पक्ष में  
फैसला सुनाएंगे। 
तो भारत माँ को आप 
अपना कौन-सा मुँह दिखायेंगे ?
मैं ये जो भी कह रहा हूँ
ये मेरी सफाई नहीं 
राष्ट्रभाषा के अस्तित्व की कहानी है।
एक ग्लास पानी है,
मैं पीना चाहता हूँ।
बोल-बोल कर थक गया हूँ
एक बार फिर ताकत से जीना चाहता हूँ।
अंत में, मैं यही कहूँगा,यॉर ऑनर !
कि, हमारे पूर्वज हजारों वर्षों तक
हमारी भाषा और हमारी संस्कृति की रक्षा करें।
और हम कुछ ही वर्षों में विदेशी भाषा का सहारा लेकर
निज संस्कृति का ह्रास करें।
ये कैसा न्याय है ?
हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी आज इस
आधुनिक और दिखावे के युग में
खुद को कैसे संभाले ?
कानून पहले इसका हल निकाले।
जब तक इस केस का फैसला हमारे पक्ष में नहीं हो जाएगा।
जब तक समुचा भारत भाषा के प्रकाश से
आलोकित नहीं हो जाएगा।
तब तक ये ‘लखेश्वर चंद्रवन्शी’ 
आप के अदालत में बार-बार आएगा।
बार-बार आएगा… ||
बार-बार आएगा… ||
– लखेश्वर चंद्रवन्शी ‘लखेश’          

तेजस्विता

जिसके मुखमंडल पर आभा,
ललाट पर सूरज की लाली है ।
है जिसके कजरारे नैना,
जिसमें सूरा-सी प्याली है ।।

काली घटा सम केश हैं जिसके,
जहां श्रृंगार के तारे झलकते हैं ।
अधर लगे जैसे लाल गुलाब,
और पल्कें मयूर पाँख सम फबते हैं ।।

उठाये जब वह पल्कें अपनी,
तो चेहरे का तेज दुगुना हो जाता है ।
है तेज आखों में पवित्रता की,
उसे देख मन निर्मल हो जाता है ।।

दृढ़ निश्चयी है वह,
भय से दूर है उसका अडिग मन ।
हाल चाल से लगे वीरांगना,
स्वस्थ सुगठित है उसका तन ।।

लेश मात्र भी नहीं अहंकार उसमें,
निज संस्कृति की वह अर्पिता ।
अगणित गुणों से युक्त,
ऐसी है मेरी तेजस्विता ।।

– लखेश्वर चंद्रवन्शी