तेजस्विता

जिसके मुखमंडल पर आभा,
ललाट पर सूरज की लाली है ।
है जिसके कजरारे नैना,
जिसमें सूरा-सी प्याली है ।।

काली घटा सम केश हैं जिसके,
जहां श्रृंगार के तारे झलकते हैं ।
अधर लगे जैसे लाल गुलाब,
और पल्कें मयूर पाँख सम फबते हैं ।।

उठाये जब वह पल्कें अपनी,
तो चेहरे का तेज दुगुना हो जाता है ।
है तेज आखों में पवित्रता की,
उसे देख मन निर्मल हो जाता है ।।

दृढ़ निश्चयी है वह,
भय से दूर है उसका अडिग मन ।
हाल चाल से लगे वीरांगना,
स्वस्थ सुगठित है उसका तन ।।

लेश मात्र भी नहीं अहंकार उसमें,
निज संस्कृति की वह अर्पिता ।
अगणित गुणों से युक्त,
ऐसी है मेरी तेजस्विता ।।

– लखेश्वर चंद्रवन्शी

 

 

 

Advertisements

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s