मात-पिता से बड़ा न कोय || (प्रसंग नाट्य)

 

 

 

(प्रात:काल का सुन्दर वातावरण, भगवान श्रीगणेश अपने हाथों में पुष्प लिए भगवान शिवशंकर की आराधना कर रहे हैं..|)
गणेश :  ब्रम्हमुरारिसुरार्चितलिंगम निर्मलभासित शोभितलिंगम|
 जन्मजदु:ख विनाशकलिंग तत् प्रणमामि सदाशिवलिंगम् ।।
            देवमुनिप्रवरार्चितलिंग कामदहं करूणाकरलिंगम।
            रावणदर्पविनाशनालिंग तत्प्रणमामि सदाशिवलिंगम।।
(उसी समय अपने हाथों में भाला लिए, अपने वाहन मोर पर सवार हुए भगवान कार्तिकेय का आगमन हाता है ; श्रीगणेश को पूजा में रत देखकर वे कुछ देर प्रतीक्षा करते हैं…., कुछ समय बाद दोनों भाई शिवलिंग को प्रणाम करते हैं… अपने बड़े भाई को सामने देख भगवान गणेश प्रसन्न हो जाते हैं।)
गणेश : (हाथ जोड़कर) प्रणाम भ्राताश्री।
कार्तिक : प्रसन्न  रहो, गणेश प्रसन्न रहो। 
गणेश : कहिए भैया ! आज यहाँ आपका कैसे आना हुआ ?
कार्तिक : गणेश आज मैं बहुत प्रसन्न हूँ और मुझे गर्व है कि मैं देवताओं  का सेनापति हूँ। मैंने अपने बाहुबल से बड़े-बड़े राक्षसों को परास्त कर दिया। 
गणेश :  आपका पराक्रम सचमुच प्रशंसनीय है। आप निश्चय ही सर्वश्रेष्ठ योद्धा हैं भैया !
कार्तिक : सो तो है गणेश ! मुझे गर्व तो इस बात का भी है कि जिस गणेश की पूजा सारे संसार में सबसे पहले होती है वह भी मुझे हाथ जोड़कर प्रणाम करता है। 
गणेश : क्यों नहीं आप मुझसे बड़े हैं तो मेरा कर्तव्य है कि मैं आपको प्रणाम करूँ !
कार्तिक : तुम कुछ भी कह लो गणेश मैं तुमसे बड़ा हूँ आयु में और शक्ति में भी। 
गणेश : आप  शक्तिशाली और पराक्रमी होने के साथ ही मुझसे आयु में बड़े अवश्य हैं । परंतु बुद्धि का हमारे जीवन में विशेष महत्व है।          बुद्धि विहिन बल किस काम का ? बुद्धि व विवेक के अभाव में मानव का जीवन पशु- तुल्य बन जाता है, इसलिए बल के साथ ही बुद्धि का होना अनिवार्य है और मैं बुद्धि का देवता हूँ, सो मैं भी कुछ कम नहीं। मैं भी आप ही की तरह महान हूँ। …. एक बात और पूछना चाहता हूँ बड़े भैया ! क्या आप बिना बुद्धि के युद्ध में विजयी हो जाते हैं ?
कार्तिक : परंतु गणेश ! केवल बुद्धि के होने से काम नहीं चलता । उसके लिए बल की भी आवश्यकता होती है। सो तो मैं बलवान हूँ और जो वीर होते हैं उसके सामने (दर्शकों की ओर हाथ फिराकर) सारा संसार शीष झुकाता है। 
गणेश : (चिढाते हुए) हाँ ऽ हाँ ऽ पता है लोग वीरों से डरकर ही तो शीष झुकाते हैं। परंतु आपको भी ज्ञात होगा कि बुद्धिमान और ज्ञानी को तो लोग बड़े आदर व प्रेम से प्रणाम करते हैं । डरकर नहीं । समझे । 
कार्तिक : (चिल्लाकर) गणेश ! … तुम अपनी मर्यादा का उल्लंघन कर रहे हो । 
गणेश : नहीं … नहीं… भ्राता ! मैं तो वही कह रहा हूँ जो सत्य है । यदि मैं गलत कह रहा हूँ तो चलो, माताश्री और पिताश्री से पूछ लेते हैं। 
कार्तिक : ठीक है….. चलो…..
(दोनों चले जाते हैं) (मंच का दो चक्कर लगाते हैं) 
                                                                              (दूसरा दृश्य) 
(भगवान शिव शिलाखंड पर बैठे हैं साथ में माता पार्वती बैठी हैं । समीप ही नंदी और कुछ शिवभक्त भूत-गण खड़े हैं हाथ जोड़कर सभी – ऊँ नम: शिवाय….५)…………. (गणेश व कार्तिक को देखकर सभी राक्षस शिवभक्त प्रणाम करते हैं | भगवान शिव ध्यान में मग्न हैं | माता पार्वती दोनों बालकों को देख प्रसन्न हो जाती हैं)
कार्तिक व गणेश : प्रणाम माताश्री ! प्रणाम पिताश्री !!
                           (भगवान शिवजी का ध्यान नहीं टूटता) 
पार्वती : कहो ! दोनों भाई एक साथ ! आश्चर्य ! कैसे आना हुआ ?
कार्तिक : (तपाक से) माताश्री देखिए ना ! गणेश कहता है मैं उससे बड़ा नहीं हूँ। 
माता : क्यों गणेश क्या कार्तिकेय सही कह रहा है ? 
गणेश : नहीं माँ, मैं भी तो यही कह रहा हूँ कि भैया मुझसे बड़े हैं । परंतु आयु में किसी के बड़े होने से क्या वह सचमुच दुनिया में सबसे बड़ा हो जाता है ? (कुछ सोच कर…) यह कहता है कि जो वीर है जिसके पास बल है वही बड़ा है । परंतु मैं भी तो बुद्धि का देवता हूँ बिना बुद्धि के वीरता कोई काम की नहीं होती !
शिवजी : (आँखें खोलकर) अरे बच्चों ! तुम दोनों कब आए ? (दोनों प्रणाम करते हैं) तनिक हमें भी बताओ माँ-बेटों में किस बात पर चर्चा हो रही है । 
दोनों : पिताश्री … (इतना कहकर दोनों रुक जाते हैं)
पार्वती : स्वामी ! गणेश कहता है बुद्धि का देवता होने के नाते वह दुनिया में सबसे बड़ा है और कार्तिक कहता है कि वह देवताओं का सेनापति है इसलिए वह सबसे बड़ा है । अब आप ही बताइये स्वामी! इन दोनों में से कौन सर्वश्रेष्ठ है ?
शिवजी : (मुस्कुराते हैं) बड़ा गंभीर प्रश्न है देवी !!(उसी समय देवऋषि नारद का प्रवेश)
नारद : नारायण, श्रीमन नारायण, श्रीमन नारायण नारायण नारायण ! (झुककर) प्रणाम महादेव ! प्रणाम ! माता पार्वती । 
दोनों भाई : प्रणाम देवर्षि !
नारद : प्रणाम, श्रीगणेश, प्रणाम कार्तिकेय ! 
शिवजी : बड़े अच्छे समय में आये हो नारद । दोनों भाइयों में संसार में अपनी श्रेष्ठता के लिए वाद-विवाद हो रहा है । अब तुम ही कोई      ऐसा उपाय बताओ कि जिससे इनमें ये कौन श्रेष्ठ है ? यह सिद्ध हो जाए और यह वाद-विवाद सदा-सदा के लिए समाप्त हो जाए। 
नारद : नारायण ! नारायण ! जहाँ देवादि देव महादेव और ममतामयी पार्वती मैया हैं वहाँ नारद जैसा छोटे भक्त का क्या काम ? आपसे   चतुर मैं कैसे हो सकता हूँ भगवन ! 
पार्वती : बातें बनाना तो कोई तुमसे सीखे नारद ! बड़े चतुर हो ।
नारद : वो तो मैं हूं ही ! सब आपकी ही तो कृपा है माता ! (थोड़ा सोचकर) हाँ .. एक उपाय है ! तुम दोनों में से जो पृथ्वी की परिक्रमा करके सबसे पहले यहाँ आएगा वही संसार में सबसे बड़ा होगा। 
कार्तिक : वा देवर्षि वाह ! क्या उपाय खोज निकाला है मैं अभी प्रस्थान करता हूँ मैं ही सबसे श्रेष्ठ बनूंगा। (कार्तिक माता-पिता व नारदजी को प्रणाम कर अपने वाहन मोर पर बैठकर जाते हैं)
नारद : गणेश जी ! आप अपने छोटे से मूषक वाहन पर बैठकर कब लौटकर आयेंगे ? आपकी गति पर मेरी मति को संदेह है गणेश जी !
गणेश : निश्चिंत रहिए देवर्षि !
(गणेश प्रणाम करते हैं और अपने चूहे पर बैठकर शिव-पार्वती के चारों ओर प्रदक्षिणा करते हैं।कार्तिकेय बहुत तेजी से जा रहा है बीच में माता  लक्ष्मी टोकती हैं|)
लक्ष्मी : अरे कार्तिकेय ! इतनी तेजी से कहाँ जा रहे हो ? तनिक रुको तो !
कार्तिक : प्रणाम माता ! मेरे पास समय नहीं है बाद में आऊँगा !
 
                                                               (तीसरा दृश्य) 
शिवजी : गणेश,  तुम बहुत चतुर हो और बुद्धिमान भी ! तुम ही इस जगत में श्रेष्ठ हो !(कार्तिक को यह बात दूर से सुनाई देती है।)
कार्तिक : पिताश्री ! आप ये क्या कह रहे हैं ? 
शिवजी : हाँ ! कार्तिक तुम तुरंत कैलाश लौट आओ । अपने आस-पास देखो गणेश के वाहन मूषक के पैरों के चिन्ह । तुम्हारे परिक्रमा से पहले ही वह सात बार पृथ्वी का भ्रमण कर चुके हैं। 
कार्तिक : (आश्चर्य से) जैसी आपकी आज्ञा !
(कार्तिक तुरंत कैलाश पहुँचते हैं) 
कार्तिक : यह कैसे हुआ पिताश्री ?
नारद : वो तो गणेश ही बतायेंगे !
गणेश : देखिए भैया ! इस संसार में हम माता और पिता के माध्यम से ही आते हैं । वही हमारा पालन-पोषण करते हैं । सारे विश्व से हमारा परिचय भी माता-पिता से ही होता है । भगवान शिव और माता पार्वती जगत में सबसे बड़े हैं और माता-पिता बड़े होने के कारण मैंने उनके चारों ओर परिक्रमा की, वो भी सात बार ! इसलिए मैंने तो संसार की परिक्रमा ही कर ली न !
शिवजी : हाँ ! इस जगत में माता-पिता व गुरु से बढ़कर कोई नहीं और गणेश ने  इस बात को सिद्ध कर दिया । गणेश आज से तुम ही अखिल विश्व में सबसे बड़े कहलाओगे ! देवताओं में तुम्हारी सबसे पहले पूजा होगी । 
कार्तिक : मैं तो बदनाम हो गया पिताश्री । मुझे कौन संसार में पूजेगा । मेरी यह हार सर्वविदित हो गई है । अब मैं किस काम का ? मेरा हृदय व्यथित है पिताश्री मैं जा रहा हूँ । 
माता : अरे कार्तिकेय ! तुम तो बड़े हो ही । जो देवताओं में बड़े हैं उनके तुम बड़े भाई हो ! इसी में तुम्हारा गौरव है । 
कार्तिक : अरे हाँ ! मैं तो भूल ही गया ! गणेश जी चलो मुझे प्रणाम करो ! आखिर मैं तुम्हारा बड़ा भाई हूँ। 
गणेश :  प्रणाम बड़े भ्राता !
कार्तिक : प्रणाम ! तुम ही बड़े हो।
(दोनों हृदय से हृदय मिलाकर गले लगते हैं। देव- दानव सब फूलों की वर्षा करते हैं |)
नंदी : भगवान शिवशंकर की …जय
                        माता पार्वती की …जय 
                               भगवान श्री गणेश की … जय
                                      भगवान कार्तिक की …. जय
                                                        देवर्षि नारद की …जय
नारद : नारायण, नारायण – २…| 
          देखी ! आप सभी ने शिव लीला ! भई, गणेश व कार्तिक ने तो हमें बहुत बड़ी सीख दी है। यह सत्य है कि माता-पिता ही सबसे बड़े              हैं और जो अपने माता-पिता की सेवा करता है, पूजा करता है वही सर्वश्रेष्ठ है । माता-पिता ही प्रथम गुरु हैं और गुरु से बड़ा कोई नहीं होता । आप भी अपने माता-पिता व बड़ों की तन- मन-धन और वचन से सेवा कीजिए। उन्हें वृद्धाश्रम में मत डालिए … मैं तो चला …. (रुककर…) एक बात तो और मैं बताना भूल गया बल और बुद्धि दोनों ही हमारे लिए अति आवश्यक है । सूर्यनमस्कार करके बलवान बनिए, स्वाध्याय करके बुद्धिमान होइए और हम सबकी माता भारतमाता की सेवा करके आप आदर्श पुत्र बनिए, भगवान श्रीहरि विष्णु आपका कल्याण करें….| मैं तो चला, अब यहाँ मेरा क्या काम, नारायण-नारायण -२ !!
– लखेश्वर चंद्रवन्शी       

 

 

 

 

 

 

 

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