भारत जागो ! विश्व जगाओ !!

(प्रथम दृश्य )
(युवक सोया है…..माता-पिता बात कर रहे हैं) 
मां : ५ बज गए हैं, पर ये लड़का अभी तक सोया है | न जाने आज की पीढ़ी को क्या हो गया है, सूरज उगने के बाद ही लोग उठाते हैं !!
पिताजी : अपने सपनों में खोया होगा | वैसे भी…..खैर, उठ जायेगा फिर बात करेंगे | (युवक करवट बदलता है…माता-पिता मंच से जाते …युवक स्वप्न में….)
……………………………………………………………………………………………………………………………………………………..
(सूनसान इलाका – अजीब – सा सन्नाटा, अचानक अजीब तरह की विचित्र प्रकार की आवाजें, हवा के तेज झोकों का, पानी व विचित्र प्रकार की जानवरों की आवाजें) 
युवक : (गाता हुआ – अपनी ही धुन में जा रहा है…) 
जिन्न : ही ही ही ऽऽऽ हा हा हा 
युवक : (डरकर काँपते हुए) अरे बाप रे…..कौन है? …. कौन है….. यहाँ ? (इधर-उधर देखता है)
जिन्न : (पुन:) हा हा हा ऽऽऽ
युवक : ये कैसी भयंकर आवाज है ? … (ठहरकर……रोते हुए) अब क्या करूँ?… कहाँ जाऊँ ?
 जिन्न : खामोश … (भयंकर आवाज में) 
(फिर सन्नाटा कहीं से कोई आवाज नहीं)
युवक : (डरता हुआ) जय हनुमान ज्ञान गुन सागर | जय कपीश तिहुं लोक उजागर ||
रामदुत अतुलित बलिधामा | अंजनी पुत्र पवन सूत नामा….||
जय बजरंग बली …….(इधर-उधर देखता है | किसी को पास न देखकर कहता है ) भाग गया – भाग गया…. (कूदने लगता है) अब यहाँ कोई नहीं | (अपनी दोनों भुजा उठाकर) अरे, तू तो अभी जवान है…..बलवान है, तुझे कोई नहीं डरा सकता, तू वीर है…. (चलता है)
जिन्न : ही ही ही ऽऽऽ …. हा ऽऽऽ…….
युवक : फिर वही आवाज ऽऽऽ बचाले भगवान…. बचाले…. 
(कोई उसे अदृश्य व्यक्ति पकड़ लेता है, वह अपने आप को छुड़ाने का प्रयत्न करता है…)
अरे.. छोड़ो मुझे  छोड़ो……
जिन्न : ही ही ही ऽऽऽ हा ऽऽऽ……
युवक : मुझे छोड़ो दो … मुझे छोड़ो दो….. (जिन्न उसे छोड़ देता है ) 
कौन हो तुम ? तुम मुझे दिखाई क्यों नहीं देते ? 
जिन्न : (हँसता है) मैं जिन्न हूँ … हा हा हा 
युवक : मुझे जाने दो प्लीज ! मेरे घर भाई-बहन हैं, माँ-बाप हैं… मुझे छोड़ दो प्लीज !
जिन्न : आप मेरे आका हो और मैं आपका गुलाम । 
युवक : नहीं …. मैं किसी का आका-वाका नहीं। मैं तो … पूरा का पूरा फाका हूँ। 
जिन्न : आप मेरे आका हैं इसलिए मैं आपको कोई नुकसान नहीं पहुँचाऊँगा। 
युवक : अच्छा .. तो ठीक है। मैं तुम्हारा आका हूँ और तुम मेरे गुलाम ! तो तुम मेरी क्या मदद करोगे ?
जिन्न : मैं कुछ भी कर सकता हूँ। चाहूँ तो एक मिनट में तुम्हें नागपुर से कश्मीर पहुंचा दूँ। मर्जी हो आपकी तो एक क्षण में महल बना दूँ। 
युवक : अब समझा कि तुम सब कुछ कर सकते हो। 
जिन्न : हाँ … जरूर
युवक : तो तुम मुझे एक महल बना के दिखा सकते हो।
जिन्न : हाँ – हाँ, गिली-गिली छू-छू….. ये लो… 
युवक : वा! क्या सुंदर महल बनाया है। अब मैं इस नगर का सबसे बड़ा आदमी बन गया हूँ। 
जिन्न : आका ! मुझे और काम चाहिए। 
युवक : तो ठीक है मुझे आइसक्रीम खिला दो। 
जिन्न : गिली-गिली छू – छू….. ये लीजिए। (युवक आइसक्रीम खाने लगता है।)
 जिन्न : आका ! मुझे और काम दो ! मैं खाली नहीं रह सकता। मुझे ऐसा काम दो जिससे मुझे मुक्ति मिल जाए। 
युवक : अरे, मुझे आइसक्रीम तो खाने दीजिए। (रुककर) अच्छा कोई महान कार्य ( सोचता हुआ) क्या हो सकता है ? हाँ याद आया ! तुम इस देश का पुनरूत्थान कर दो । 
जिन्न : पुनरूत्थान … यानि ।
युवक : मेरे कहने का मतलब इस देश को पहले की तरह खुशहाल बना दो । धर्म, संस्कृति, ज्ञान-विज्ञान, धन-धान्य से परिपूर्ण कर दो । जाति-पाति, भेदभाव, आतंकवाद, भोगवाद, सबको मिटाकर एक सुंदर भारत बना दो । मेरा भारत- एक अखंड भारत, न हो पाकिस्तान … न बांग्लादेश … हो एक अकेला भारत देश।
जिन्न : नहीं … मैं ये काम नहीं कर सकता !
युवक : क्यों नहीं कर सकते ? 
जिन्न : क्योंकि जिन्होंने इसकी स्वतंत्रता, इसकी अखंडता के लिए प्रयास किया, जिन्होंने इस महान राष्ट्र के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया। वे सब इस दुनिया से ऊपर चले गए और जो लोग भारत की एकता और अखंडता के लिए कार्य कर रहे हैं, उनकी आज कौन सुनता है ? 
युवक : तो क्या भारत का पुन: उत्थान नहीं हो सकता ?
जिन्न : हो सकता है यदि हमारे पूर्वज फिर से यहाँ आयें ! काश अभी कोई चाणक्य होता ! पर अब क्या ? न चंद्रगुप्त, न सावरकर, न सुभाष । न कोई शिवाजी, न प्रताप और न कोई समर्थ रामदास । 
युवक : अरे हताश क्यों होते हो भई ! तुम्हारे लिए ये कोई कठिन कार्य तो नहीं ! तुम ऊपर से उन्हें यहाँ ला दो !
जिन्न : स्वर्ग कोई मकान की छत तो नहीं है जो उन्हें उठाकर यहाँ लाऊँ ।
युवक : अभी-अभी तो तुम बड़ी डींगे हाँक रहे थे कि मैं सबकुछ कर सकता हूँ ! अब क्या..सारी होशियारी निकल गई ।
जिन्न : मैं उन्हें ला तो नहीं सकता…. परंतु तुम्हें स्वर्ग में जरूर ले जा सकता हूँ । 
युवक : कुछ भी बकते हो ? ऐसा कभी नहीं हो सकता । क्योंकि तुम मुझे दिखाई नहीं देते ; तो मुझे अपने साथ कैसे ले जा सकते हो ? पहले मेरे सामने प्रकट हो, तब तो बात बने । 
जिन्न : जो हुक्म मेरे आका… (तेज हवा के झोकों की आवाज …….जिन्न प्रकट होते ही) ही हा हा हा ऽऽऽ
युवक : तो चलें….
जिन्न : हाँ – हाँ – चलिए (हाथ पकड़कर दो राउंड) 
 (दृश्य – २) 
 (स्वर्ग का दृश्य….. पारिजात का वृक्ष, सुगंधित वातावरण – एक नर्तकी का प्रवेश…………..नर्तकी का नृत्य देखता है……………जिन्न अदृश्य हो जाता है…..नर्तकी भी नाचते हुए अदृश्य हो जाती है।)
युवक : कितना सुंदर स्वर्ग है ….. सुगंधित वातावरण ….. ऐसा लगता है मानों भगवान ने अपने हृदय का सारा प्रेम यही भर दिया है। मैंने अपने पुराणों में पढ़ा था कि हमारा देश भी ऐसा ही था । सब लोग मिल-जुलकर रहते थे । समृद्ध, सुखी मेरी मातृभूमि !
(टहलता हुआ……एक स्त्री तलवार लेकर खड़ी है।) 
युवक : आप कौन हैं ?
स्त्री : (तलवार खींचकर) ‘‘मैं झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई हूँ।” 
युवक : वही १८५७ वाली जिसने अपनी चमचमाती तलवार से गोरों के होश उड़ा दिये थे । (प्रणाम करता है) और कौन-कौन हैं यहाँ पर ?
लक्ष्मीबाई : जिन्होंने अपनी मातृभूमि के लिए, दीन-दुखियों के कल्याण के लिए अपना सारा ‘जीवन’ दे दिया, वे सारे लोग यहाँ रहते हैं। 
युवक : मुझे सबसे मिलना है !
लक्ष्मीबाई  : ठीक है यहाँ से सीधे चले जाओ। कई महापुरुषों से आपकी भेंट होगी। 
युवक : अच्छा तो मिलते हैं। नमस्कार  (जाता है।)
मेरा रंग दे बसंती चोला, मेरा रंग दे…….।।घृ.।। 
जिस चोले को पहन शिवाजी, खेले अपनी जान पे। 
जिसे पहन झाँसी की रानी, मिट गईं अपनी आन पे । 
आज उसी को पहन के निकला ऽऽऽ -२ 
हम मस्तों का चोला ।। 
(भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव का गाते हुए प्रवेश।…बीच में यह भी नाचने लगता है। तीनों आश्चर्य से) 
भगतसिंह : भाई ! तुम कौन हो ? यहाँ नये लगते हो !
युवक : मैं….. मैं….मेरा मतलब मेरा नाम रघु है। और मैं आप लोगों से मिलने आया हूँ। 
राजगुरु : ओ ऽऽऽ ! तो कई वर्षों के बाद हमारे देश की जनता को हमारी याद आ रही है। 
सुखदेव : अरे, हम तो १५ अगस्त और २६ जनवरी में याद किये जाने वाले औपचारिक नमूने बनकर रह गये हैं) 
भगतसिंह : अरे छोड़ा न यार ! जो लोग प्रभु श्रीराम के अवतार को भी झूठ कहते हैं वो भला हमें क्या याद करेंगे। सब बकवास है, दिखावा है आजादी का पर्व, विभाजित भारत का पर्व…. क्या इसी भारत के लिए हमने अपना बलिदान दिया था। 
राजगुरु : अरे, सारे आतंकवाद की जड़ तो भारत का विभाजन ही है। अब कौन हमारे सपनों को साकार करेगा। कौन बनाएगा भारत की अखंडता । सब लोग झूठे हैं -२
युवक : आप लोगों का मार्गदर्शन मिले तो मैं अवश्य ही आप के स्वप्न को साकार करने का प्रयास करूँगा। आप मेरा मार्गदर्शन करें। 
भगतसिंह : जाओ भई जाओ ! पहले हमने बहुत समझाया था, पर किसी ने नहीं माना, अब कौन हमारा सुनेगा ?
(तीनों चले जाते हैं….युवक कुछ सोचने लगता है…. बापू का आगमन)
बापू : रघुपति राघव राजा राम। पतित पावन सीता राम। 
ईश्वर अल्लाह तेरे नाम । सबको सम्मति दे भगवान ।।
युवक : बापू ऽऽऽ (सीधे चरणों में गिर जाता है) 
बापू : (उसे उठाते हुए) बोलो बेटा ! कहाँ से आये हो ?
युवक : मैं … मैं.. तो इंडिया से आया हूँ । 
बापू : लगता है हमारे देश ने बहुत तरक्की कर ली है। 
युवक : आपको कैसे मालूम हुआ ?
बापू : क्योंकि जो भी भारतीय यहाँ आता है तो कहता है मैं भारत से आया हूँ, मैं हिंदुस्थान से आया हूँ। तुम पहले व्यक्ति हो जो कह रहे हो कि मैं इंडिया से आया हूँ। 
युवक : तरक्की तो हुई है बापू ! अधर्म की, स्वार्थ की, भ्रष्टाचार की, तुष्टीकरण के नीति की। अब आपके नाम की माला जपने वाले लोग ही आपके आराध्य श्रीराम के अवतार पर प्रश्न चिन्ह लगाने लगे हैं। 
गांधीजी : क्या कह रहे हो ? मैंने तो ऐसा स्वप्न में भी नहीं सोचा था। 
युवक : आपने भारत-विभाजन के बारे में भी स्वप्न में नहीं सोचा था। पर भारत खंडित हुआ ना। 
बापू : काश मैंने सावरकर की बात मान ली होती तो यह विभाजन टल सकता था। अब तो समस्या ही समस्या है। पाकिस्तान, बांग्लादेश और चीन तीनों की बुरी नजर अब हमारी मातृभूति पर है। यदि सारा भारत संगठित न हुआ तो अनर्थ हो जाएगा। अनर्थ हो जाएगा… (कहते हुए निकल जाते हैं।)
युवक : अब उपाय क्या है ? राष्ट्र को जगतगुरु बनाने के लिए मुझे क्या करना होगा ? कौन बताएगा मुझे ? कौन करेगा मेरा पथ दर्शन?
स्वामी विवेकानन्द : हम करे राष्ट्र आराधन …. आराधन।
तन से , मन से, धन से, तन मन धन जीवन से 
हम करे राष्ट्र आराधन – आराधन।।
युवक : (प्रणाम करता है) आज पुन: भारत को जगाना है, मेरा मार्गदर्शन करें। 
स्वामीजी : भारत को जानो । भारत की आत्मा को पहचानो । ‘धर्म’  ही भारत की आत्मा है। केवल इसी के सहारे राष्ट्र जाग सकता है। उपेक्षित समाज, गरीब, उत्पीड़ित समाज से प्रेम करो, उनकी की उन्नति के लिए अपना सारा जीवन लगा दो। 
युवक : ये सब तो ठीक है परंतु हमारा युवा वर्ग भोगवाद विदेशी सभ्यता के पीछे पागल है उन्हें कैसे समझाया जाये ? (दर्शकों की ओर देखकर)
स्वामीजी : विदेशी सभ्यता के पीछे दौड़नेवालों यदि तुम अपनी सांस्कृतिक धरोवर को भूला दोगे। यदि धर्म को भूला दोगे तो तुम चूराचूर हो जाओगे। हे मेरे पुत्रों ! मेरे स्वदेशवासियों बन्धुओं !! हमें देरी हो रही है। उठो ! जागो !! उतिष्ठत् ! जागृत !!  हम बहुत रो चुके हैं। हजारों वर्षों से दूसरों के आक्रमणों को झेल रहे हैं। अब वह काल आ गया है कि हम पूर्ण समर्पित भाव से अपने आप को राष्ट्र कार्य के लिए अर्पित कर दें। “बल”  हाँ केवल बल शक्ति की उपासना करो, पूर्ण पवित्रता का भाव अपने हृदय में धारण करो । अपने आप पर विश्वास, ईश्वर पर विश्वास, यही महानता का रहस्य है। वीर्यवान, शक्तिमान बनो । क्योंकि शक्तिहीन मनुष्य कभी धर्म की रक्षा नहीं कर सकता। भगवान  बुद्ध की करुणा, चाणक्य की नीति, प्रभु राम का आदर्श और श्री कृष्ण सा नेतृत्व का गुण विकसित करो। 
समस्त कार्य अपने कंधों पर ले लो और जान लो कि तुम ही अपने भाग्य के विधाता हो ! जितनी शक्ति व सहायता चाहिए वो सब तुम्हारे भीतर है। क्योंकि तुम ईश्वर के अंश हो । ऋषि-मुनियों की संतान हो। राणा-शिवा के वंशज हो। अपने आप को पहचानो और भारतमाता…. जिसने हमें खाने के लिए अन्न, पहनने के लिए सुंदर-सुंदर कपड़े, रहने के लिए आलिशान मकान दिये हैं । उसकी पूजा करो। तभी इस राष्ट्र का पुनरूत्थान होगा। ‘वंदे मातरम्’ के जयघोष से सारे वातावरण को राष्ट्रप्रेम से भर दो। भारत का पुनरूत्थान निश्चित है। उतिष्ठत ! जागृत !! ………… उतिष्ठत ! जागृत !! 
( स्वामीजी चले जाते हैं | युवक हड़बड़ाकर उठता है |)
युवक : स्वामीजी…स्वामीजी |
मां : अरे, इसे क्या हुआ ! ( मंच पर मां का आगमन ) कौनसे स्वामीजी आ गए तुम्हारे पास | (रूककर….)  सपने से बाहर आओ , कॉलेज जाना है ना ?
युवक : मां !  अपने यहाँ विवेकानन्दजी की पुस्तक है क्या ?
मां : ओ…तो तुम्हारे स्वामीजी का मतलब विवेकानन्द है ना ? चलो आज कुछ तो अच्छा हुआ |
युवक : हाँ, विवेकानन्दजी सपने में आये थे |
मां : सपने में तो ठीक है…हकीकत में अब कुछ करेगा या सपने में ही खोया रहेगा | (युवक अंगड़ाई लेता है….आलस्य का प्रदर्शन)
मां : हे भगवान ! इसके आलस्य को कई तो मिटाए….(तभी बेल के बजने कि आवाज आती है)
मां : कौन है ! इतनी सुबह…..आती हूँ | ( द्वार खोलती है )
कार्यकर्ता : नमस्कार | मैं विवेकानन्द केन्द्र से आया हूँ | स्वामी विवेकानन्द की १५०वीं जयन्ती के अवसर पर उनके विचारों को जनमानस तक पहुँचाने के लिए हम कार्य कर रहे है | इसलिए स्वामी विवेकानन्दजी के जीवन तथा सन्देश पर आधारित पुस्तकों को हम घर-घर पहुंचा रहे हैं | आप भी साहित्य खरीदिये |
मां : (साहित्य हाथ में लेते हुए) रघु …..जल्दी आओ | देखो विवेकानन्द केन्द्र के कार्यकर्ता आये हैं स्वामीजी की पुस्तकें लेकर | (रघु का प्रवेश…वह कार्यकर्ता को नमस्कार करता है) 
मां : (कार्यकर्ता की ओर देखकर) आज ही स्वामीजी की पुस्तक खरीदने का विचार था | (रघु की ओर देखकर) आज इसके सपने में स्वामीजी आये थे |
कार्यकर्ता : अरे वा ! ये तो अच्छी बात है |
रघु :   (साहित्य की सहयोग राशी देते हुए)  मैं भी स्वामीजी की १५० वीं जयन्ती पर आपके साथ काम करना चाहता हूँ | 
कार्यकर्ता : जरुर….यही तो आज की आवश्यकता है | २०० वीं जयन्ती का तो कुछ पता नहीं हम रहेंगे की नहीं ! पर सार्ध शती मनाने का सौभाग्य हमें मिला है | और आप तो हमारे साथ आओ….अपने मित्रों को भी लाओ, क्योंकि ये अवसर ना मिलेगा दोबारा |….(कुछ सोचते हुए…) स्वामीजी के बताये मार्ग पर चलकर ही भारत का उत्थान होगा और इसी में विश्व का कल्याण है | इस सार्ध शती समारोह का सन्देश पता है आपको ? (रघु प्रतिक्रिया में ना कहकर सिर हिलाता है)
कार्यकर्ता : भारत जागो ! विश्व जगाओ !!…तो बोलो……(सब मिलकर कहते हैं)
भारत जागो ! विश्व जगाओ !!
– लखेश्वर चंद्रवन्शी “लखेश”
Advertisements

2 thoughts on “भारत जागो ! विश्व जगाओ !!

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s