संवेदना आवश्यक है, परंतु यह जागृति का लक्षण नहीं !

628x471 copyसारे देश में आक्रोश है, यह जानते हुए भी इस दौरान दिल्ली, सागर, जबलपुर तथा नागपुर आदि स्थानों पर बलात्कार की घटनाएं घटीं ! इतना आक्रोश होने के बावजूद भी ऐसे कुकर्म की घटनाओं का दौर थम नहीं रहा बल्कि दिन-प्रतिदिन बढ़ते ही रहा है। हम देश के कानून तथा सुरक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ करने की मांग को लेकर आंदोलन व सभाएं करते हैं, चर्चाओं की श्रृंखला चलाते हैं और इसी से हमें लगता है कि देश में जागृति आ रही है। इन आक्रोशों के आवरण में कहीं हम मूल सुधार की संकल्पना की अनदेखी तो नहीं कर रहे ? इस बात का हमें विवेकपूर्ण तरीके से अवलोकन करना होगा।

आंदोलन के लिए जनता का एकत्रीकरण होना, सामूहिक प्रदर्शन द्वारा अन्याय के विरुद्ध आक्रोश प्रकट करना या प्रबुद्धजनों के बीच विमर्श के कार्यक्रमों का चलना, इसे समाज के जागृति का लक्षण नहीं समझा जा सकता। क्योंकि दु:ख, पीड़ा और संवेदना यह मानव जीवन का स्वाभाविक अंग है जो दु:ख के समय सहजता से अभिव्यक्त हो जाते हैं। इसलिए हृदय विदारक घटनाओं को देखकर या सुनकर मनुष्य की आंखों से अश्रु बहने लगते हैं और अन्याय के विरुद्ध आक्रोश के विरोधी स्वर मुखर हो उठते हैं। इसका मतलब मनुष्य में जागृति आ गई ऐसा समझ लेना उचित नहीं क्योंकि ये सभी क्रियाएं सहज संवेदना का द्योतक हैं, जागृति का लक्षण नहीं ! जागृत समाज तो विवेकी तथा चरित्रवान मनुष्यों का समूह होता है जो किसी भी परिस्थिति में बुराइयों को समाज में पनपने ही नहीं देता। परंतु हमारे देश में अपराधों की श्रृंखला चल पड़ी है इसलिए इसे जागृत समाज नहीं कहा जा सकता। 

Protest in Kolkataहाल ही दिल्ली में एक युवती के साथ हुए सामूहिक दुराचार की हृदय विदारक घटना ने सारे भारत को हिलाकर रख दिया। दिवंगत दामिनी पर हुए इस अमानवीय अत्याचार के खिलाफ दिल्ली सहित देशभर में भारी मात्रा में विरोध प्रगट किया गया। कई सभाएं हुईं, आंदोलन हुए, रैलियां निकाली गई और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में लगातार इस विषय पर विमर्श चलता रहा। सभी के द्वारा दानवी वृत्तिवाले उन छह पापियों को कठोर से कठोर दंड व फांसी की सजा देने की मांग की जाने लगी। इस दानवी घटना को अंजाम देने वाले कुकर्मियों को दंड देने की कार्रवाई सरकारी यंत्रणाओं के माध्यम से चल रही है। 

सारे देश में आक्रोश है, यह जानते हुए भी इस दौरान दिल्ली, सागर, जबलपुर तथा नागपुर आदि स्थानों पर बलात्कार की घटनाएं घटीं! इतना आक्रोश होने के बावजूद भी ऐसे कुकर्म की घटनाओं का दौर थम नहीं रहा बल्कि दिन-प्रतिदिन बढ़ते ही रहा है। हम देश के कानून तथा सुरक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ करने की मांग को लेकर आंदोलन व सभाएं करते हैं, चर्चाओं की श्रृंखला चलाते हैं और इसी से हमें लगता है कि देश में जागृति आ रही है। इन आक्रोशों के आवरण में कहीं हम मूल सुधार की संकल्पना की अनदेखी तो नहीं कर रहे ? इस बात का हमें विवेकपूर्ण तरीके से अवलोकन करना होगा। घटना के कारणों, उन कारणों की परिणति तथा उसके परिणाम के साथ ही उससे उत्पन्न समस्याओं के समाधान पर बड़ी गम्भीरता से विचार करना चाहिए।

देश का दुर्भाग्य  

इस देश का दुर्भाग्य है कि पिछले कुछ सदी से हमारा समाज गुलामी की मानसिकता में जी रहा है। हमारी संस्कृति ने बताया कि नारी परिवार व समाज की अस्मिता है। इसलिए हमारे पूर्वजों ने उसे संभालकर रखने तथा उसके संरक्षण के लिए कुछ विशेष नियम भी बताए हैं। इन नियमों के अंतर्गत संध्याकाल में परिवार के सभी लोग मिलकर संध्या आरती करें, साथ में भोजन तथा कुछ जीवन मूल्यपरक कुछ बातें हों आदि। परंतु हमारे समृद्ध व प्रबुद्ध समाज ने स्वच्छंदता के नाम पर इन नियमों की धज्जियां उड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ीं। विशेषकर पढ़े-लिखे लोग जो नारी सशक्तिकरण और नारी स्वतंत्रता का ढोल पीटते हैं, ने स्वतंत्रता के नाम पर भारत की अस्मिता नारी शक्ति को सरेआम तमाशा और मनोरंजन का साधना बना दिया। मॉडलिंग, एक्टिंग और डांसिंग के नाम पर अस्मिता को सरेआम बेचा जाने लगा। प्रदर्शन के नाम पर लोकलुभावन बनने की होड़ लग गई  और मशहूर होने के भ्रामक चाह ने नारी की तरफ देखने की पुरुष दृष्टि को कामुक बना दिया। हमारे बुद्धिजीवियों ने देश के विकास के लिए बहुत सी योजनाएं तो बनाईं, परंतु नारी की ओर देखने की पुरुष की दृष्टि पर कभी चिन्तननहीं किया। यही कारण है कि आज के फिल्मों के गीत, कहानी और व्यवसाय जगत में भारत की नारी की अस्मिता की बोली लगाई जाने लगी। ऐसी विडंबनाओं के चलते अब नारी को पवित्रता की दृष्टि से देखनेवाला समाज का निर्माण कैसे होगा ? यह प्रश्न मन को सालता है। 

नारी भी समझे स्वयं को

नारी ! तू है कौन ? यह प्रश्न किसी पुरुष द्वारा पूछा जाना निश्चित ही विवादास्पद हो सकता है, परंतु एक युवती के लिए, यह प्रश्न बहुत मायने रखता है। इसलिए प्रत्येक नारी अपने आप से पूछे कि ‘नारी ! तू है कौन ?’ इस प्रश्न के उत्तर में ही नारी के अस्तित्व का महत्व छिपा है कि क्या नारी कोई मॉडल है, मनोरंजन का साधन है या फिर संस्कारों को पोषित करनेवाली संवर्धिनी ? मूल्यांकन तो स्वत: नारी को ही करना होगा। 

वर्तमानकाल में भारत में नारी उत्थान की अवधारणा की उल्टी धारा बह रही है। नारी-पुरुष के बीच में तुलना करते हुए पुरुष के समान उसके अधिकारों की बातें की जाती हैं। परंतु स्त्री को राजनीति, नौकरी और उद्योग जगत में अधिकार मिल जाने भर से क्या नारी जाति का उत्थान हो जाएगा ? नारी उत्थान का मापदण्ड आखिर क्या होना चाहिए ? इस पर तो नारी समाज को स्वयं ही सोचना होगा। 

भारतीय राजनीति, समाजनीति, अर्थनीति, न्याय व्यवस्था आदि सभी क्षेत्रों में उसकी सहभागिता बढ़े इसके लिए आवश्यक शिक्षा की व्यवस्था सुलभता से हो; यह सर्वथा उचित है। ऐसा होना भी चाहिए क्योंकि उसकी शिक्षा से परिवार व समाज का हित है। वास्तव में भारत में जो कुछ संस्कार बचे हैं उसमें सबसे बड़ा योगदान तो नारी का ही है। यदि पुरुषों की तरह सभी नारी धूम्रपान या शराब पीने लगे, तो समाज का क्या होगा ? फिर तो पूरे समाज से नैतिकता के सारे आदर्श ही समाप्त हो जायेंगे। यह स्त्री ही है, जिसके कारण समाज में जीवन मूल्य तथा संस्कारों के बीज सुरक्षित हैं। इन जीवन मूल्यों व संस्कारों की वजह से भारत का सारा जग सम्मान करता है। नारी जब संस्कारों का संवर्धन करने में अग्रसर है, तो निश्चय ही उसका स्थान सर्वोपरि है। इसलिए नारी जाति का गौरव अपने-आप में अधिक है।   

लेकिन संस्कारों की रक्षा व संवर्धन पर गौरवान्वित होने के बजाय केवल सुंदर दिखने के क्षणिक सुख और तथाकथित पुरस्कारों पर आज नारी समाज गर्व करता है। एक समय था जब नारी सीता, सावित्री और दमयन्ती को अपना आदर्श मानती थीं। अब वे आदर्श बदल गए हैं। ज्ञान, गुण और चरित्र से तीनों देवताओं को बालक बनाकर रखने वाली अहिल्या नारी ही थी, रावण जैसे महादानव को पतिव्रता के व्रत से परास्त करनेवाली सीता भी नारी ही थी, अंग्रेजों के खिलाफ दुर्गा की तरह रणक्षेत्र में लड़नेवाली लक्ष्मी बाई नारी ही थी। फिर इन महान आदर्शों की अवहेलना क्यों ? क्यों कोई युवा युवती को फुसलाकर उसका शील हरण करता है ? क्यों कोई नारी राजनीति के शातिर नेताओं के जाल में फंस जाती है ? क्यों कोई नारी टीवी के रीयालिटी शो के अधीन हो जाती है ? यह सारे सवाल नारी समाज द्वारा स्वयं से पूछना चाहिए। 

maa_durgaनारी तो दुर्गा का ही रूप है। वह जननी है। यदि वह शिशु को जन्म दे सकती है, तो वह महिषासूर का वध भी कर सकती है। इसलिए अपने भीतर शक्ति को जगाना नारी समाज के लिए आवश्यक है। अपनी सुरक्षा के लिए आवश्यक युद्ध के तरीके, कराटे, तायकोंडो, बॉक्सिंग आदि तो सीखना ही चाहिए ताकि कोई भेड़िया उस पर आक्रमण करने से पहले 100 बार सोचे। परंतु सबसे ज्यादा जरुरी है स्त्री-पुरुष के बीच व्याप्त मतभेद को मिटाना। हमारे देश में तो शिव-शक्ति के संयुक्त रूप जिसे अर्धनारीनटेश्वर कहते हैं, की पूजा होती है। जब शिव-शक्ति ने अपने जीवन में समन्वय का इतना बड़ा आदर्श हमारे सामने प्रस्तुत किया है तो फिर हम दोनों में परस्पर तुलना क्यों करते हैं ?  स्त्री यदि शक्ति है तो पुरुष भी शिव है। दोनों का ही अपना महत्व है। आवश्यकता है कि पुरुष व नारी दोनों के द्वारा अपनी-अपनी पवित्रता का जतन करते हुए एक-दूसरे के सम्मान की रक्षा करनी होगी। जब तक इस समन्वयात्मक दृष्टिकोण का विकास नहीं होगा तब तक ऐसे अपराधों का दौर समाप्त नहीं होगा, चाहे हम कितना भी आंदोलन कर लें या कैंडल मार्च निकाल लें। 

पवित्रता की दृष्टि हो विकसित 

स्त्री जाति को स्वयं के प्रति सकारात्मक दृष्टि रखने मात्र से समाज में परिवर्तन नहीं आ सकता है। इसके लिए पुरुषों को भी अपने में नारी विषयक दृष्टिकोण में बदलाव लाना होगा। आज राह चलती युवतियों व महिलाओं पर अभद्र टिप्पणी करते हुए पुरुष मंडली को सर्वत्र देखा जा सकता है। जिस देश में केवल देवी ही नहीं वरन भूमि, नदी और गाय को भी माँ के रूप में पूजा जाता है, उस देश में मातृशक्ति के प्रति गलत भावना लज्जास्पद है। अत: हमारे समाज में नारी के प्रति पवित्रता की दृष्टि विकसित करना आवश्यक है। इसी से आदर्श समाज की रचना हो सकती है।

सख्त कानून समय की मांग

Employment-News-High-Court-logoऐसे जघन्य अपराधों पर अंकुश लगाने के लिए सख्त कानून आज समय की मांग है और अपराधियों को दंड तो मिलना ही चाहिए। साथ ही उन कानूनों का ईमानदारी से पालन होना भी उतना ही आवश्यक है। हम देखते हैं कि शपथ लेकर भी मंत्री, वर्दीधारी और वकील सर्वाधिक भ्रष्टाचार में लिप्त रहते हैं और अपराधियों को पनाह देते हैं। फिर कानून बनाने भर से काम नहीं चलेगा। इसका पालन करने वाले मनुष्यों का निर्माण भी ज्यादा जरूरी है। जब घर-परिवार, शिक्षा, राजनीति, मीडिया, कानून व्यवस्था आदि समाज के सभी स्तरों पर आदर्श मनुष्यों के निर्माण पर जोर दिया जायेगा और सारी योजनाएं इसके लिए बनने लगेंगी, तब समझा जा सकेगा कि कानून सार्थक हो रहा है और समाज में जागृति आ रही है। 

– लखेश्वर चंद्रवंशी, 

नागपुर   

 

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स्तब्ध अमेरिका, चिन्तित समाज

America_Trasadiक्रिसमस की तैयारी में जुटा अमेरिकी समाज सहित संसार के तमाम देश तब स्तब्ध रह गए जब 14 दिसम्बर को न्यूटाउन के सैंडी हुक एलिमेंटरी स्कूल में एक सिरफिरे युवक ने 20 बच्चों सहित 27 लोगों को गोलियों से छलनी कर दिया। स्कूल में हुई इस गोलाबारी को अब तक के इतिहास में सबसे घातक हमलों में गिना जा रहा है। दुनिया के सबसे सभ्य और शक्तिशाली समझे जानेवाले अमेरिकी समाज में ऐसी घटना का घटित होना बहुत ही चिन्ताजनक है। 

एक ओर जहां अमेरिका की शक्ति-सम्पन्नता से संसार की जनता प्रभावित है तो दूसरी ओर इस तरह की घटनाएं सबको हैरान करती है कि क्यों एक व्यक्ति पाशविक मानसिकता का परिचय देते हुए निर्दोष, विशेषकर मासूम बच्चों को बेरहमी से मौत के घाट उतार देता है। इस त्रासदी पूर्ण घटना के बाद व्हाइट हाउस के प्रेस कक्ष में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की आंखों में भी आंसू आ गए। उन्होंने कहा, इस घटना से हमारा दिल टूट गया। इस तरह की त्रासदियों को रोकने के लिए भविष्य में अर्थपूर्ण कार्यवाई करने के लिए बिना राजनीति के एकजुट होना चाहिए। 

इससे पहले 2007 में वर्जिनिया में हुए हमले में 32 लोग मारे गए थे। पिछले दो दशकों में बंदूक सम्बंधी ढीले कानूनों के कारण अमेरिका में 100 से ज्यादा लोगों की मौत शिक्षण संस्थानों में हो चुकी है। जबकि ओरेगन के शॉपिंग मॉल, विस्कॉन्सिन के गुरुद्वारे, एयुरोरा फिल्म थियेटर की या फिर शिकागो की एक सड़क की घटना हो, इस सभी घटनाओं में निर्दोष लोग मारे गए हैं। इस प्रकार आए दिन अमेरिकी समाज में इस तरह की घटनाएं तेजी से बढ़ रही है। फिर भी बंदूक रखने को मूलभूत अधिकार के रूप में मान्यता मिलने तथा शस्त्र उद्योग से जुडी लॉबी के चलते अमेरिका में बंदूक संस्कृति पर रोक लगाने का साहस कोई जुटा नहीं पा रहा है। ऐसे में अमेरिकी समाज प्रशासन तथा वहां की सरकार को इस चुनौती का प्रत्युत्तर ढूंढना होगा।

सैंडी हुक  स्कूल में अंधाधुंध गोली चलाकर 27 लोगों को मारने वाला हमलावर एडम लांजा कोई कुख्यात अपराधी नहीं था। उसके पड़ोसियों के अनुसार वह शर्मीले स्वभाव का 20 वर्षीय युवक था। और ज्यादातर लोगों को उसके बारे में अधिक जानकारी नहीं थी। वह किसी से ज्यादा घुलता-मिलता भी नहीं था। वहां की पुलिस अब इस बात का पता लगाने की कोशिश कर रही है कि एडम कहीं पर्सनैलिटी डिसऑर्डर का शिकार तो नहीं था। 

ज्ञात हो कि एडम के माता-पिता का तलाक हो गया था। उसके पिता पीटर लांज़ा स्टैमफोर्ड चले गए थे जहां उन्होंने बाद में दूसरी शादी कर ली थी। जबकि एडम की मां नैन्सी अपने पारिवारिक घर में ही एडम के साथ रहती थीं। बताया जाता है कि वह भी सैंडी स्कूल में अध्यापक थीं। स्कूल में तबाही मचाने से पहले एडम ने अपनी मां की गोली मारकर हत्या कर दी। एडम की परवरिश और पारिवारिक ताने-बाने में निश्चित रूप से इस घटना के तार जुड़े हो सकते हैं। 

एडम जैसी पारिवारिक स्थितियां भी अमेरिका में बहुतायत में हैं जो कि बहुत चिन्ताजनक है। ऐसे लोगों के पास घातक हथियार भी मौजूद हैं, तो ऐसी घटना का होना स्वाभाविक है। पर सवाल उठता है कि इस तरह की जघन्य अपराधों पर अंकुश लगाने के लिए राजनीतिक तत्परता क्यों नहीं दिखाई जाती ? निर्दोष लोगों की जान से कीमती क्या हथियार लॉबीस्टों के हित हैं ? ऐसे में अमेरिकी सांसदों के लिए यह उचित समय है कि वे शस्त्र कानून में संशोधन कर ऐसे अपराधों को होने से रोके। पर ऐसी त्रासदीपूर्ण घटनाओं के लिए क्या केवल हथियारों की खुली छूट जिम्मेदार है या वहां के समाज की प्रवृत्ति ?

परिवारिक वातावरण का अभाव, तलाक की वजह से स्वजनों के बीच मनमुटाव और बढ़ता भोगवाद ऐसी घटनाओं के लिए कारणीभूत है। इसलिए परिवार संस्कृति की स्थापना, जीवनभर स्वजनों के साथ रहना और आपसी सद्भाव को बढ़ावा देकर इसके विकास पर ध्यान देना, अमेरिकी समाज के लिए आवश्यक है। ऐसे में देखना होगा कि आज के समय में ज्यादा आसान शस्त्र कानून में बदलाव करना है कि संस्कृति में परंतु चिल्ड्रेन डिचेंस फंड के प्रमुख मैरियन राइट एडलमैन ने ऐसे जनसंहारों को रोकने के लिए राजनीतिक एकजुटता पर शंका जाहिर की है, जो की चिन्ताजनक है। लेकिन यह वर्ष जाते-जाते अमेरिकी समाज को ऐसा घाव दे गया जिसका दर्द लंबे समय तक उसे सालता रहेगा।  

– लखेश्वर चंद्रवंशी, 

नागपुर 

चुनौती अनेक समाधान एक

श्री संत गजानन महाराज शेगांव संस्थान के व्यवस्थापकीय विश्वस्त तथा स्वामी विवेकानन्द सार्ध शती समारोह समिति, महाराष्ट्र राज्य के अध्यक्ष श्रद्धेय श्री शिवशंकर भाऊ पाटिल के साथ संवाद पर आधारित लेख ।

अपने अस्तित्व से धर्म नहीं है वरन् धर्म के कारण हमारा अस्तित्व है। धर्म है तो हम हैं। इसलिए सारी समस्याओं का उत्तर केवल धर्म की संस्थापना है। धर्मप्रणीत राष्ट्र के रूप में ही भारत का गौरव है।

       bhau copyश्रद्धेय श्री शिवशंकर भाऊ पाटिल महाराष्ट्र राज्य का ऐसा नाम है जिसका उच्चारण करते ही मन श्रद्धा से नत हो जाता है। सामान्य ग्रामवासियों से लेकर महानगरों का प्रबुद्ध समाज उन्हें हृदय से मानता है। इस श्रद्धामय उपलब्धि के कारणों को समझें तो एक कुशल प्रबन्धक के रूप में तो वे जग विख्यात हैं ही, परंतु अपनी प्रत्येक कृति को ईश्वरीय कार्य के रूप में पूर्णता तक ले जाने की अद्भुत प्रतिभा के वे धनी भी हैं। मैंने उन्हें पहली बार 2008 में देखा था और गत सप्ताह 28 नवम्बर को उनका दर्शन कर पाया। इस अल्प भेंट में उनके विचारों से भी अवगत होने का भाग्य प्राप्त हुआ। अपने 4 मिनट के अल्प संवाद में उनके प्रत्येक शब्द मन में अमिट छाप छोड़ते चले गए। उन्होंने जो भी कहा उसमें वर्षों की तपस्या और सामाजिक कार्यों के प्रति उनके चिन्तन तथा अनुभूति का ओज प्रतिविम्बित हो रहा था। उनके विचारों की माला मेरे मन, बुद्धि और हृदय में सदा के लिए अंकित हो गई। उनके सान्निध्य से प्राप्त विचारों को देशवासियों तक पहुंचाना समय की मांग है।     

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