चुनौती अनेक समाधान एक

श्री संत गजानन महाराज शेगांव संस्थान के व्यवस्थापकीय विश्वस्त तथा स्वामी विवेकानन्द सार्ध शती समारोह समिति, महाराष्ट्र राज्य के अध्यक्ष श्रद्धेय श्री शिवशंकर भाऊ पाटिल के साथ संवाद पर आधारित लेख ।

अपने अस्तित्व से धर्म नहीं है वरन् धर्म के कारण हमारा अस्तित्व है। धर्म है तो हम हैं। इसलिए सारी समस्याओं का उत्तर केवल धर्म की संस्थापना है। धर्मप्रणीत राष्ट्र के रूप में ही भारत का गौरव है।

       bhau copyश्रद्धेय श्री शिवशंकर भाऊ पाटिल महाराष्ट्र राज्य का ऐसा नाम है जिसका उच्चारण करते ही मन श्रद्धा से नत हो जाता है। सामान्य ग्रामवासियों से लेकर महानगरों का प्रबुद्ध समाज उन्हें हृदय से मानता है। इस श्रद्धामय उपलब्धि के कारणों को समझें तो एक कुशल प्रबन्धक के रूप में तो वे जग विख्यात हैं ही, परंतु अपनी प्रत्येक कृति को ईश्वरीय कार्य के रूप में पूर्णता तक ले जाने की अद्भुत प्रतिभा के वे धनी भी हैं। मैंने उन्हें पहली बार 2008 में देखा था और गत सप्ताह 28 नवम्बर को उनका दर्शन कर पाया। इस अल्प भेंट में उनके विचारों से भी अवगत होने का भाग्य प्राप्त हुआ। अपने 4 मिनट के अल्प संवाद में उनके प्रत्येक शब्द मन में अमिट छाप छोड़ते चले गए। उन्होंने जो भी कहा उसमें वर्षों की तपस्या और सामाजिक कार्यों के प्रति उनके चिन्तन तथा अनुभूति का ओज प्रतिविम्बित हो रहा था। उनके विचारों की माला मेरे मन, बुद्धि और हृदय में सदा के लिए अंकित हो गई। उनके सान्निध्य से प्राप्त विचारों को देशवासियों तक पहुंचाना समय की मांग है।     

भारत की आत्मा

     श्रद्धेय शिवशंकर भाऊ ने स्वामी विवेकानन्द के विचारों के महत्व को प्रतिपादित करते हुए कहा कि धर्म भारत का प्राण है। धर्माधारित सामाजिक रचना से ही समाज में एकात्मता और समरसता की पुनर्स्थापना की जा सकती है। इसके लिए समाज के प्रत्येक व्यक्ति को त्याग एवं सेवा को आचरणीय बनाना होगा। बिना त्याग एवं सेवा के धर्म की स्थापना कैसे हो सकती है ?
आज सभी जगह विकासवादी बातें चलती हैं। लोग सरकारी नौकरी, उत्तम रोजगार और उच्चतम शिक्षा की इच्छा रखते हैं। सामाजिक जीवन में इसे ही विकास का मानक माना जाता है। परंतु केवल अच्छी नौकरी, उत्तम पदवी तथा पद प्राप्तकर लेने भर से क्या हमारा विकास हो जाता है ? नहीं ना ! फिर केवल भौतिक सुख-सुविधाओं की प्राप्ति के लिए इतनी छटपटाहट क्यों? लोग धन, पद और मोह से आसक्त होकर दूसरों का खून बहाने से भी नहीं चूकते। ऐसा क्यों ? क्योंकि हम भारतीय आत्मा को भूल गये हैं। इसलिए स्वामी विवेकानन्द ने स्मरण कराया कि ‘धर्म’ भारत की आत्मा है।
        राष्ट्रोत्थान के लिए धर्माधिष्ठित समाज की रचना करना आवश्यक है। त्याग और सेवा के आधार पर ही इसकी स्थापना हो सकती है। इसलिए तो स्वार्थी मनुष्यों को स्वामी विवेकानन्द ने फटकारते हुए कहा था कि ‘जब तक लाखों लोग भूखे और अज्ञानी हैं, तब तक मैं उस प्रत्येक व्यक्ति को गद्दार मानता हूँ जो समाज के बल पर शिक्षित बना और अब उनकी ओर ध्यान नहीं देता।’

ये सुधरे तो बात बनें

     भारत में धर्माधारित समाज के निर्माण में मुख्यत: तीन क्षेत्रों में सुधर की आवश्यकता है,- 1. टी.वी., 2. शिक्षा प्रणाली और 3. राजकीय प्रणाली।

1. टी.वी (दूरदर्शन): आज की व्यस्तता भरे दिनचर्या में सामाजिक कार्य, स्वाध्याय, भजन-पूजन आदि शुभकार्यों के लिए समय निकालना बहुत कठिन है, ऐसी बातें प्राय: हम हर किसी के मुंह से सुनते हैं। पर टी.वी. सीरियलों के सामने 3-4 घंटे व्यतीत करना घर की गृहिणीयां, छात्र-छात्राओं के लिए आम बात है। तात्पर्य यह है कि टी.वी. के सामने बैठकर देश के करोड़ों परिवार अपने जीवन के महत्वपूर्ण और कभी लौटकर वापस न आनेवाले समय को नष्ट करते हैं। टी.वी. देखना ही नहीं चाहिए, ऐसा हम नहीं कहते। पर क्या और उसे कितनी देर देखें, इस पर विवेकपूर्ण विचार करना चाहिए। टी.वी. सीरियलों में अधिकांश धारावाहिक निरर्थक तथा मनोरंजन के नाम पर अश्लीलता परोसते हैं। वहीं फिल्मों में दिखाये जाने वाले संवाद, चित्र, अभिनय एवं नृत्य सारी मर्यादाओं को ताक पर रखकर अभद्रता, अश्लीलता व विवेकहीनता का प्रदर्शन करते हैं। फिल्मों के गीत संगीत तो माँ सरस्वती का अपमान ही बन चुके हैं। समाज का हर वर्ग इन फिल्मी गानों से इस तरह जुडा है कि उनको ये गाने सुनने ही पड़ते हैं। हाँ, कुछ धारावाहिक तो आदर्श के मानक पर सही बैठते हैं। दूरदर्शन में दिखाये जाने वाले उपनिषद गंगा, सब टी.वी. के लापतागंज, चिड़िया घर, आर.के. लक्ष्मण की दुनिया, तारक मेहता का उल्टा चश्मा जैसे कुछ एक धारावाहिक समाजोन्मुखी है। फिर भी टी.वी के सामने दिन में कितना समय गुजारना है, इस पर विवेकपूर्ण विचार करना चाहिए।
2. शिक्षा प्रणाली : शिक्षा के क्षेत्र में यदि भारत की गणना करें तो हम पायेंगे कि स्वतंत्रता के पश्चात साक्षरता अभियान में हम काफी हद तक सफल हुए। पर अक्षर ज्ञान प्राप्त करना ही शिक्षा का मूल उद्देश्य नहीं। छात्र का रटकर परीक्षा में उत्तीर्ण होना, प्रतियोगिताओं में अन्यों को पछाड़कर अग्र क्रमांक प्राप्त करना, विविध कलाओं में अपना स्थान निश्चित करना, इसे ही आज शिक्षा के रूप में देखा जा रहा है। प्रतियोगिताओं की दृष्टि से जिस विद्यालय का नाम अधिक आदर से लिया जाता है, जिस स्कूल के विद्यार्थी बोर्ड परीक्षा में मेरिट में आते हैं, जिस पाठशाला की बिल्डिंग तथा परिसर आकर्षित करने वाला होता है। अभिभावक वहीं पर अपने बच्चों के प्रवेश के लिए जोर लगाते हैं। कतार में घंटों खड़े रहते हैं, डोनेशन के नाम पर मोटी राशि स्कूल प्रबंधन को देते हैं। यहां तक कि स्कूल के हिसाब से अभिभावक की हैसियत को परखा जाता है। यही कारण है कि अभिभावक अपने बच्चे को बड़े से बड़े विद्यालय में भर्ती कराने के लिए तत्पर रहता है।
     दूसरी ओर विद्यालय प्रबंधन अभिभावकों और शिक्षा विभाग को आकर्षित करने के लिए सारे प्रयोग करते हैं। स्कूल की बिल्डिंग चमकाते हैं। स्केटिंग, डांस, संगीत, वादन, अभिव्यक्ति, कौशल, कराटे आदि अनेक आकर्षणों से युक्त बहुरंगी स्कूल पत्रक तैयार करते हैं। अब शिक्षक का अपने विषय में ज्ञाता होने भर से काम नहीं चलता। उसकी पहुंच बड़े लोगों यथा राजनीति से जुड़े लोग, पत्रकार, कलाकार आदि से होना बहुत जरूरी है। साथ ही उसकी पर्सनैलिटी आकर्षक हो, वह देखने में सुंदर भी हो। इतना ही नहीं तो वह पैसा वाला होना चाहिए ताकि शिक्षक बनने के लिए स्कूल प्रबंधक को लाखों रुपयों की घूस दे सके। शिक्षा के क्षेत्र में इस अनैतिकता, ऐसा भ्रष्टाचार देखने को मिलेगा भारतीय मनीषियों ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा। पर यह शिक्षा के आद्य गुरुओं का अपमान ही तो है। swami-vivekananda-DM70_l
     अत: शिक्षा प्रणाली में दिखाने के स्थान पर वास्तविक ज्ञान को प्रतिष्ठित करना होगा। भारतीय इतिहास, विज्ञान, दर्शन शास्त्र, गणित के साथ ही भाषाज्ञान को गम्भीर्यता से पढ़ाया जाना चाहिए। आयु तथा स्तरानुकूल पाठ्यक्रम की रचना होना आवश्यक है जिससे ज्ञानार्जन प्रक्रिया रुचिकर हो सके और सबसे बड़ी बात स्वामी विवेकानन्द ने जिस पर अधिक जोर दिया है, वह है चरित्रनिर्माण। उन्होंने कहा था कि ‘केवल जानकारी का वह ढेर शिक्षा नहीं कहला सकता जिसे दिमागों में ठूंस-ठूंसकर भर दिया जाता है और जो बिना आत्मसात हुए जीवनभर उपद्रव मचाता है। वास्तव में वही शिक्षा है जिससे कि हमारा जीवन निर्माण व चारित्रिक गठन हो सके और हम मनुष्य बन सकें।’
     स्वामीजी ने कहा, ‘यदि गरीब लोग शिक्षा के निकट नहीं आ सकते, तो शिक्षा को ही उनके लिए खेतों पर, उनकी फैक्ट्री में तथा सर्वत्र ले जाना होगा।’ इस दृष्टि से शिक्षा प्रणाली तथा व्यवस्थापन में सुधार करना आवश्यक है। ताकि शिक्षा के साथ संस्कार को चरितार्थ किया जा सके।

3. राजकीय प्रणाली : भारत की राजनीति आज स्वार्थ की राजनीति के रूप में देखी जाने लगी है। राष्ट्र धर्म को भुलाकर चुनावों में जीत हासिल करने के लिए जीवन व्यतीत करने वाले राजनेताओं की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं। विभिन्न घोटालों, भ्रष्टाचारों, चारित्रिक उन्मादों में उलझे राजकीय प्रणाली से भारतीय श्रद्धा और विश्वास प्राय: समाज होता जा रहा है। अत: जनमानस के श्रद्धा-भक्ति को विस्तार मिले, उनका धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक तथा शैक्षणिक विकास हो, इसलिए राजनेताओं में देशहित की भावना को प्रस्थापित करना आवश्यक है।

संस्कारों की अनदेखी क्यों ?
    भारतीय परिवार संसार में सर्वाधिक आदर्श के रूप में माना जाता है। क्योंकि पारिवारिक दायित्व बोध, आपसी समन्वय तथा समाजसापेक्ष होने के कारण इसका अधिक महत्व है। पर आज बुजुर्गों तथा वर्तमान पीढ़ी में वैचारिक समन्वय साधना अत्यंत कठिन हो गया है। इसके साथ ही जानबूझकर या अनजाने में अभिभावक बच्चों के सामने गलती करते हैं। पूरा परिवार घर पर रहता है और ऑफिस से बॉस का फोन आए कि ऑफिस आ जाओ, तो परिवार का मुखिया बताता है कि मेरी तबीयत खराब है जबकि वह पूर्णत: स्वस्थ रहता है पिता को पता नहीं कि उनका यह झूठ बच्चे को झूठ बोलना सिखाता है। 

     वास्तव में बच्चे जैसा सुनते हैं, वैसा बोलते हैं जैसा देखते हैं, वैसा करते हैं। इसलिए भाषणबाजी को छोड़कर परिवार के बड़े लोग तथा समाज के प्रतिष्ठित नागरिकों का दायित्व है कि वे जो बोलते हैं वह पूर्णत: सत्य व विवेकपूर्ण हो और जैसी कथनी है वैसी उनकी करनी भी हो।
अत: अपने शुद्ध आचरण से नई पीढ़ी को संस्कारवान बनाने का दायित्व वर्तमान पीढ़ी को निभाना आवश्यक है।

इस मानसिकता को बदलना होगा

     समाज के गणमान्य नागरिक अक्सर कहते हैं कि हमें धर्म की रक्षा करनी होगी। श्रद्धेय श्री शिवशंकर भाऊ ने कहा कि इस मानसिकता को बदलना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि अपने अस्तित्व से धर्म नहीं है वरन् धर्म के कारण हमारा अस्तित्व है। धर्म है तो हम हैं। हमारे राष्ट्र के सम्मुख अनगिनत चुनौतियां हैं, उस पर धर्म के माध्यम से ही विजय प्राप्त की जा सकती है। इसलिए सारी समस्याओं का उत्तर केवल धर्म की संस्थापना है। धर्मप्रणीत राष्ट्र के रूप में ही भारत का गौरव है। धर्म की अवधारणा को समझते हुए जब हम कार्य करेंगे तो विश्व का कल्याण होगा। स्वामी विवेकानन्द के विचारों को जन-जन तक पहुँचाकर ही हम समाज को जाग्रत कर सकते हैं। इसलिए स्वामीजी की इस सार्ध शती के अवसर पर हम सभी को संकल्प लेकर कार्य करना होगा।
3744016781_c41309e1ff त्याग एवं सेवा के अपने जीवन में चरितार्थ करने वाले श्री संत गजानन महाराज शेगांव संस्थान के व्यवस्थापकीय विश्वस्त तथा स्वामी विवेकानन्द सार्ध शती समारोह समिति, महाराष्ट्र राज्य के अध्यक्ष श्रद्धेय शिवशंकर भाऊ पाटिल ने अपने संवाद का समापन करते हुए कहा कि मैं कोई बड़े विचारक या वक्ता नहीं हूं। मैंने जो भी विषय आपके समक्ष रखे ये कोई पढ़ी-पढ़ाई बातें नहीं वरन् सेवकों के सेवाकार्यों तथा उनके अनुभव से इसे जाना है। मैंने तो अपनी बातें दासों का दास के रूप में आपके समक्ष रखीं।
    ऐसे विनम्र, मृदुभाषी, सहज, सरल और आदर्श हैं अपने स्वामी विवेकानन्द सार्ध शती समारोह समिति, महाराष्ट्र राज्य के अध्यक्ष श्रद्धेय श्री शिवशंकर भाऊ पाटिल।

– लखेश्वर चंद्रवन्शी,
सम्पादक : भारत वाणी
प्रचार-प्रसार प्रमुख
स्वामी विवेकानन्द सार्ध शती समारोह समिति, विदर्भ प्रदेश,
नागपुर

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