भाग्यशाली भारत

12jan418म बड़े भाग्यशाली हैं कि हमें अपने जीवनकाल में स्वामी विवेकानन्द की 150वीं जयंती मनाने का अवसर मिल रहा है। स्वामी विवेकानन्द को युवाशक्ति के महानायक के रूप में आज सारी दुनिया जानती है।स्वामीजी को अपने हृदय में बसाकर, उनके शक्तिदायी विचारों से प्रेरणा पाकर लाखों देशभक्तों ने भारत की स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व
न्योछावर किया।

         युवाशक्ति के ऐसे महान आदर्श स्वामी विवेकानन्द के बारे में विश्वकवि रविन्द्रनाथ ठाकूर कहा करते थे- ‘यदि भारत को जानना हो, तो विवेकानन्द का अध्ययन कीजिए। उनमें सबकुछ सकारात्मक है, नकारात्मक कुछ भी नहीं।’ स्वामीजी को जाने बिना, उनके विचारों का अध्ययन किए बिना भारत को समझना असंभव है। इसलिए आज उनके विचारों को देश के कोने-कोने में सभी स्तर के, सभी आयु वर्ग के लोगों तक पहुंचाना आवश्यक है। 

वर्तमान में भारत आर्थिक, सामरिक, वैज्ञानिक तथा ज्ञान के क्षेत्र में विश्व का सिरमौर बन रहा है, यह अच्छा संकेत है। इसलिए सारा संसार भारत की ओर बड़ी आशा और विश्वास के साथ देख रहा है। परन्तु भारत की अस्मिता का प्रतीक मातृशक्ति की आज सर्वत्र अवमानना की जा रही है। चरित्रहीनता, भ्रष्टाचार और संवेदनहीनता से जूझता हुआ हमारा भारतीय समाज भोगवादी संस्कृति का आदी हो चुका है। भारत के हित में विचार करनेवाले, समाज की उन्नति के संबंध में चिंतन करनेवाले लोगों की कमी नहीं है अपने देश में। फिर भी आज देश की व्यवस्था में राष्ट्रभक्तों का अभाव दिखता है। यही कारण है कि संपूर्ण देश में एक असंतोष की भावना दिखाई देती है। सरकारी यंत्रणाओं के प्रति जनमानस का विश्वास प्राय: लुप्त होता जा रहा है। ऐसे में समाज किस पर विश्वास करें, सरकार पर, अपने परिवार पर या फिर मीडिया पर ?

इतिहास साक्षी है जब-जब भारत में ऐसी विकृत परिस्थितियां निर्माण हुई हैं, तब-तब भारतीय समाज ने अपने पूर्वजों के विचारों का अनुसरण किया है और अपने समाज की समस्त समस्याओं को दूर करने सफलता पाई है।

वर्तमान समय में भारत को पुन: जागृत करने की आवश्यकता है। इसके लिए भारत की युवाशक्ति को आगे आना होगा। स्वामी विवेकानन्द ने कहा था- ‘मेरा विश्वास आधुनिक पीढ़ी में है, युवा पीढ़ी में है। इन्हीं में से मेरे कार्यकर्ता निकलेंगे जो सिंह की भांति समस्त समस्या का समाधान कर देंगे।’ स्वामी विवेकानन्द के इसी आह्वान से प्रेरित होकर स्वतंत्रता से पूर्व क्रांतिकारियों ने तथा स्वतंत्रता के पश्चात लाखों देशभक्तों तथा वीर सैनिकों ने भारत की रक्षा तथा उत्थान के लिए अपना जीवन अर्पित कर दिया। 1962 में भारत-चीन युद्ध में भारत के पराजय की पीड़ा और आत्मग्लानि को समाप्त करने में स्वामी विवेकानन्द की शताब्दी वर्ष 1963 ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसकी परिणिति के रूप में विवेकानन्द शिलास्मारक तथा विवेकानन्द केन्द्र की स्थापना हुई। आज विवेकानन्द केंद्र के माध्यम से स्वामीजी के विचारों को देशभर में क्रियान्वित करने की गति में वृद्धि हुई है। स्वामी विवेकानन्द की सार्ध शती के अवसर पर इस कार्य को और अधिक गतिमान बनाया जाए, ताकि स्वामी विवेकानन्दजी के राष्ट्र पुनरुत्थान के स्वप्न को शीघ्रातिशीघ्र साकार किया जा सके। इसके लिए हम सभी को पूर्ण समर्पित भाव से संगठित होकर कार्य करना होगा।

महाविद्यालयीन तथा गृहस्थ युवाओं, घर को संस्कारों से संवर्धित करनेवाली नारीशक्ति, संपूर्ण भारत के जीवन को पोषित करनेवाले हमारे अन्नदाता किसान भाइयों तथा खेतों, कारखानों तथा सर्वत्र मजदूरी करनेवाले श्रमिकों, वन-संस्कृति का जतन करनेवाले वनवासी भगिनी-बंधुओं में पुन: आत्मविश्वास, आत्मसम्मान तथा आत्मबोध भाव के जागरण के लिए हम सभी को मिलकर प्रयास करना होगा। देश का शिक्षित, प्रबुद्ध तथा समृद्ध समाज को दीन-दलितों, अशिक्षितों तथा असहाय लोगों के उत्थान के लिए आगे आना होगा। स्वामीजी ने तो कहा ही है कि – ‘मैं उस प्रत्येक व्यक्ति को गद्दार मानता हूं जो समाज के बल पर शिक्षित हुआ और अब वह उनकी ओर तनिक भी ध्यान नहीं देता।’ हमें राष्ट्र को आर्थिक, सामाजिक, वैज्ञानिक तथा सामरिक दृष्टि से सबल बनाना होगा। पर इसे सार्थक करने के लिए स्वामीजी ने धर्म का आश्रय लेने को कहा है। वे धर्म को भारत की आत्मा कहते थे और त्याग व सेवा के माध्यम से ही भारत का उत्थान होगा, इस बात को बड़ी दृढ़ता से सबके सामने रखते थे। 

12jan453स्वामीजी ऐसे युवाओं पर विश्वास रखते थे जो वीर्यवान, तेजस्वी, श्रीसंपन्न, निष्कपट तथा प्रामाणिकता से युक्त हो। जिनका हृदय नचिकेता की तरह श्रद्धा से परिपूर्ण हो। स्वामीजी ने कहा है कि ‘यह देश अवश्य गिर गया है पर निश्चय ही उठेगा और ऐसा उठेगा जिसे देखकर सारी दुनिया दंग रह जाएगी।’ उन्होंने भारत के युवाओं को आह्वान किया कि,- ‘हे नवयुवकों ! यह सोने का समय नहीं है। हम बहुत रो चुके, अब हमें और नहीं रोना है। आनेवाली पचासों पीढियां तुम्हें निहार रही हैं। भारत का भविष्य अब तुम पर ही निर्भर है। उठो, जागो और समस्त दायित्व अपने कंधों पर ले लो। और जान लो कि तुम ही अपने भाग्य के विधाता हो। जितनी शक्ति और सहायता चाहिए वह सब तुम्हारे भीतर है। अत: अपना भविष्य स्वयं गढ़ों।’

स्वामी विवेकानन्दजी के इन शक्तिदायी विचारों को चरितार्थ करते हुए; आइये, स्वामीजी की इस 150वीं जयंती पर अपने भारतीय समाज का उत्थान कर विश्व के कल्याण में भागीदार बनें और जैसा कि संत तुकाराम महाराज ने कहा है- “याची देहि याची डोळा”…अर्थात इसी जन्म में, इन्हीं आंखों से अपने कार्य से भारत का उत्थान होता देखें। बाट निहारती भारत मां…

वन्दे मातरम्

– लखेश्वर चन्द्रवंशी

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