प्रह्लाद के आदर्श बिन होली ?

प्रह्लाद के आदर्श बिन होली ?
प्रह्लाद के आदर्श बिन होली ?

होली का महापर्व आज मनोरंजन, नशा और मजाक बन कर रह गया है। होली के अवसर पर फाग गाने वाले लोग प्राय: लुप्त होते जा रहे हैं। डीजे की कर्कश आवाज पर थिरकने वाले तथा कटे-फटे कपड़े पहनकर, बेढंग फैशन पर गर्व करने वाला युवा समाज रंग से रंग तो जाता है परंतु होली के पर्व के मर्म को समझने की इच्छा उसके मन में कभी नहीं आती। इस युवा पीढ़ी में त्योहारों को लेकर उत्साह तो है और उसको वे अभिव्यक्त भी करते हैं, परंतु अभिव्यक्ति का माध्यम क्या है, उसकी दिशा कौन-सी हो सकती है ? होली क्यों मनाते हैं और इसे कैसे मनाना चाहिए? कौन बताए?      

होली का पर्व है और बाल-गोपाल सहित युवा तथा बुजुर्गों में भी होली को लेकर बहुत उत्साह है। पहले होली के एक माह पूर्व ही इस पर्व को अधिक उत्साह व उमंग से किस प्रकार मनाया जा सकता है इसका नियोजन होता था। इस अवसर पर गांव में खेल प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता। लोग इन स्पर्धाओं में बड़े उत्साह से सहभागी होते। तरह-तरह के पकवान बनाये जाते, सारा गांव स्वादिष्ट व्यंजनों की खुशबू से भर जाता। रंग-गुलाल के रंगीन दृश्य से वातावरण मनोहारी हो जाता। परंतु आज आधुनिक युग के प्रवाह में ये सभी आनंद देने वाले क्षण धीरे-धीरे समाप्त होते जा रहे हैं।

होली का महापर्व आज मनोरंजन, नशा और मजाक बन कर रह गया है। होली के अवसर पर फाग गाने वाले लोग प्राय: लुप्त होते जा रहे हैं। डीजे की कर्कश आवाज पर थिरकने वाले तथा कटे-फटे कपड़े पहनकर, बेढंग फैशन पर गर्व करने वाला युवा समाज रंग से रंग तो जाता है परंतु होली के पर्व के मर्म को समझने की इच्छा उसके मन में कभी नहीं आती। इस युवा पीढ़ी में त्योहारों को लेकर उत्साह तो है और उसको वे अभिव्यक्त भी करते हैं, परंतु अभिव्यक्ति का माध्यम क्या है, उसकी दिशा कौन-सी हो सकती है ? होली क्यों मनाते हैं और इसे कैसे मनाना चाहिए ? कौन बताए ? मस्ती की पाठशाला कहकर होली के रंग-गुलाल में रंगे लोगों के फूहड़ नाच-गानों को मीडिया में प्रदर्शित किया जाता है और होलिका दहन की कहानी बता दी जाती है। इससे क्या होगा ? होली में लोग शराब आदि का नशा करना क्या छोड़ देंगे ? क्या लोग नशे में धूत होकर गाली गलौच करना बंद कर देंगे ? ऐसे अनेक प्रश्न मन को आहत करते हैं।

होली का त्योहार तो हरिभक्त प्रह्लाद को स्मरण करने का पर्व है। हिरण्यकश्यपु के घर जन्म लेने वाले बालक प्रह्लाद की भक्ति को आत्मीयता से हम कितने भारतीय स्मरण करते हैं ? हिरण्यकश्यपु द्वारा दिए गए भयंकर यातनाओं से तनिक भी भयभीत न होने वाले बालक प्रह्लाद ने भगवान की ऐसी भक्ति की कि भगवान विष्णु इस बाल भक्त से मिलने के लिए आतुर हो गए और बैकुंठ छोड़ उन्हें भारत भूमि में अवतरित होना पड़ा। प्रह्लाद ऐसा महान भक्त, जो न आग में जला, न पानी में डूबा, न तलवार की धार ने उसे कुछ नुकसान पहुंचाया। परंतु हमने तो प्रह्लाद को ही भूला दिया।

आज हमारे देश में ईश्वर के अस्तित्व को नकारने वाले अनेकों विधर्मी मिलते हैं और अपने धार्मिक होने का दावा ठोकने वालों की भी कमी नहीं है। कथा, प्रवचन और सत्संग-भागवत के आयोजनों में भारी संख्या में लोगों की उपस्थिति भी देखने को मिलती है। फिर भी धर्माधारित जीवन जीने वाले लोग कम ही दिखाई देते हैं। एक तरफ धार्मिक कार्यक्रमों में लोगों की भारी भीड़ तो दूसरी ओर धर्माधारित जीवन जीने वालों की कमी ! बहुत विरोधाभासी स्थिति है। कारण हम अपने धर्म, कर्तव्य और दायित्व को पहचान नहीं पाये। भक्त प्रह्लाद का जीवन धर्म, कर्तव्य और दायित्व बोध का आदर्श प्रस्तुत करता है। वह प्रह्लाद जिसके पिता स्वयं राजा थे और जो श्री हरि विष्णु के प्रबल विरोधी थे। विष्णु का नाम लेने वाले की जो प्राण हर लेते थे। इस भयानक और त्रासदी युक्त वातावरण में प्रह्लाद ने बड़ी निर्भयता से भगवान विष्णु के नाम का प्रचार किया और अपनी भक्ति से भगवत् धर्म का विस्तार किया। जिसकी परिणति के रूप में आज होली पर्व मनाते हैं।

परंतु मात्र पर्व मनाने से कार्य पूर्ण नहीं हो जाता, हमें तो ऐसे प्रह्लादों को खोज निकालना होगा जो ईश्वरीय कार्य को अपना ध्येय बना ले। यदि हम प्रह्लाद के बीज बन पाएं तो निश्चय ही निर्भिक और आदर्श पीढ़ी का निर्माण कर सकेंगे, जिससे कि धर्म की पुन:स्थापना हो सकेगी।

– लखेश्वर चंद्रवन्शी,

सम्पादक : भारत वाणी

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