स्वराज्य का सुराज्य होना ही रामराज्य है

स्वराज्य का सुराज्य होना ही रामराज्य है
स्वराज्य का सुराज्य होना ही रामराज्य है

घोर निराशा के युग में श्रीराम का जन्म और उसके बाद रामराज्य की स्थापना तक का उनका संघर्षमय जीवन भारत वर्ष को बहुत कुछ सिखाता है। श्रीराम का जीवन तप, क्षमा, शील, नीतिमान, सेवा, भक्ति, मर्यादा, वीरता और न जाने कितने महान गुणों से युक्त था। प्रभु श्रीराम की ही तरह उनके सूर्यवंशी परिवार में माता जानकी, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, उनके पिता और उनकी तीनों माताएं तथा उनके सेनानायकों में महावीर हनुमान, सुग्रीव, विभीषण, जांबवन्त, अंगद, नल और नील जैसे उदात्त चरित्र से हमें प्रेरणा मिलती है। सदैव धर्म और मर्यादा का पालन करनेवाला महान युग था रामराज्य।

भ्रष्टाचार से त्रस्त जनता, सत्ता के मद में धुन्द शासकीय अधिकारी, विवादों के भार से दबे न्यायालय, प्रचण्ड देरी के कारण न्याय के प्रति निराश जनसामान्य। एक ओर धन सम्पन्न लोग तो दूसरी ओर घोर विपन्नावस्था का शिकार समाज। ऐसी विकट अवस्था में भी देश के सक्षम लोगों में समाज के प्रति संवेदनहीनता के चलते कहीं कोई आशा की किरण दिखाई नहीं देती। परन्तु व्यवस्था परिवर्तन का स्वप्न देखनेवाले बुद्धिजीवियों की भी कमी नहीं है इस देश में ! अनगिनत संस्थाएं और संगठन में कार्यरत लाखों कार्यकर्ता अपनी-अपनी पद्धति से इस स्वप्न को आकार देने में लगे हैं। इसके बावजूद समाज में परिवर्तन दिखाई नहीं देता। इसका क्या कारण है ?

आज देश में बलात्कार, चारित्रिकहीनता, भ्रष्टाचार और बेइमानी की घटना आम हो चली है, और हमारे यहां अपराधी बड़े  अपराध करके भी मुक्त होकर समाज में निर्भयता से घूमते हुए नजर आते हैं। पुलिस, वकिल, मंत्री और न्यायपालिका से जुड़े अनेक अधिकारियों से उनकी साठगांठ रहती है। इसलिए सभी बुद्धिजीवी प्रभावी एवं निष्पक्ष कानून तथा न्याय व्यवस्था की मांग कर रहे हैं। पर केवल कानून बना देने भर से काम नहीं चलेगा। इसके लिए समाज के मन तथा दृष्टि में परिवर्तन लाना होगा। यह कार्य कठिन अवश्य है पर असंभव नहीं है। त्रेता युग में भी समाज की स्थिति कुछ ऐसी ही थी, जिसे देखकर स्वयं प्रभु श्रीराम भी इतने विचलित हुए कि विषाद (Depression) से भर गए। उनके गुरु वशिष्ठ ने ऐसे निराश श्रीरामचन्द्र को योग की शिक्षा दी जिसे योगवाशिष्ठ के रूप में जाना जाता है।

घोर निराशा के युग में श्रीराम का जन्म और उसके बाद रामराज्य की स्थापना तक का उनका संघर्षमय जीवन भारतवर्ष को बहुत कुछ सिखाता है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के जीवन के अनेक पहलू हैं। श्रीराम ने जहां एक ओर केवट, शबरी और जटायु को आत्मीयता से स्वीकार कर उनपर स्नेह की वर्षा की, वहीं दूसरी ओर वानर, भालू तथा वनवासियों को एकत्रित किया। उन्होंने वानर सेना को अधर्म के विनाश के लिए तैयार किया और उनके द्वारा धर्म की पताका को अभ्रस्पर्शी बनाया। इतना ही नहीं तो श्रीराम का जीवन तप, क्षमा, शील, नीतिमान, सेवा, भक्ति, मर्यादा, वीरता और न जाने कितने महान गुणों से युक्त था। प्रभु श्रीराम की ही तरह उनके सूर्यवंशी परिवार में माता जानकी, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, उनके पिता और उनकी तीनों माताएं तथा उनके सेनानायकों में महावीर हनुमान, सुग्रीव, विभीषण, जांबवन्त, अंगद, नल और नील जैसे उदात्त चरित्र से हमें प्रेरणा मिलती है। सदैव धर्म और मर्यादा का पालन करनेवाला महान युग था रामराज्य। इस बात को रेखांकित करने के लिए गोस्वामी तुलसीदासजी ने रामचरितमानस के उत्तरकांड में रामराज्य के आदर्श समाज का सुंदर वर्णन किया है। उन्होंने लिखा है-

नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना।।
सब निर्भय धर्मरत पुनी। नर अरु नारि चतुर सब गुनी।।
सब गुनन्य सब पंडित ग्यानी। सब कृतग्य नहिं कपट सयानी।।
सब उदार सब पर-उपकारी। विप्र चरन सेवक नरनारी।।

व्यवस्था के समूल रूपान्तरण का यह यशस्वी प्रयोग वर्तमान में सर्वाधिक प्रासंगिक है। दो दशक पूर्व कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था कि भारत केवल कर्ज मुक्त ही नहीं अपितु अन्य गरीब देशों को आर्थिक सहायता देने की स्थिति में पहुंचेगा। जब हम विकासशील देशों की सूची से बाहर आने का स्वप्न भी नहीं देख सकते थे। तब एक ऋषि ने स्वप्न देखा कि सन् 2020 तक भारत विश्व में सर्वोत्तम देशों की श्रेणी में आ जायेगा। यही स्वप्नद्रष्टा डॉ. कलाम आज हमारे देश के युवाओं के आदर्श हैं।

राम को जाने बिना इस स्वप्न की पूर्ति भारत में सम्भव नहीं है। स्वराज्य व सुराज्य के लिए सत्य के आधार पर आन्दोलन के प्रणेता महात्मा गांधी भी रामराज्य को ही विकास का आदर्श रूप मानते थे। स्वतन्त्र भारत के लिए उनकी आर्थिक विकास की योजना रामराज्य के लक्ष्य प्राप्ति हेतु ही थी। रामराज्य सदैव धर्माधिष्ठित अर्थव्यवस्था का आदर्श, आधुनिक अर्थशास्त्रीय भाषा में मॉडल रहा है। उसी आधार पर बहुजन हिताय ही नहीं, सर्वजन हिताय ऐसी समाज रचना का आदर्श सबके सामने रखा जा सकता है। अत: आज आवश्यकता है कि रामराज्य की अर्थव्यवस्था का विश्लेषणात्मक अध्ययन किया जाए। विकास के सर्वांगीण लक्ष्य के साथ ही सर्वतोमुखी विकास भी आवश्यक है। विकास के नाम पर आधुनिकीकरण व आधुनिकता के नाम पर पाश्चात्यीकरण, गत 65 वर्षों से यही अपने देश में अमेरिकानीत विकास का लक्ष्य रहा है।

आज जब सारे विश्व के साथ ही हम भारतवासी भी विश्व में भारत के सर्वोत्तम बन पाने के प्रति आशावान हैं तब हमें चाहिए कि विकास के परिमाण को, संदर्भ को हम शुद्ध भारतीय पद्धति से निर्धारित करें। पर्याप्त विदेशी मुद्रा भण्डार, अत्याधुनिक सड़कें एवं सर्वव्यापी संचार व्यवस्था के विकास से जाग्रत विश्वासमय वातावरण हमें बनाना होगा। सर्वग्रासी भ्रष्ट व्यवस्था तथा सांस्कृतिक पतन की चुनौतियों को हमें प्रत्युत्तर देना है। श्रीराम, माता सीता, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न और महाबलि हनुमान का आदर्श सदैव भारत ने अपने सम्मुख रखा। वर्तमान में इन महान आदर्शों की अवहेलना हुई है, इसलिए ये सारी समस्याएं हैं। यदि हम रामराज्य के सिद्धान्तों को आधार मानकर योजना बना पाएं तो वह एक अनुकरणीय उपलब्धि होगी।

 

    – लखेश्वर चंद्रवंशी ‘लखेश’

       सम्पादक : भारत वाणी,

       नागपुर 

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