मृत्यु के साए में भी आशा का आश्वासन देता ‘कृष्णचरित’

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कृष्ण का जन्म भी मृत्यु के साए में, डर के भंवर में तथा आशा के अमर आश्वासन में हुआ। और आज भी भारतीय समाज कृष्ण को हर घर में बाल रूप में अवतरित है, ऐसा अनुभव करता है। यही कारण है कि व्यक्ति जिस जाति, सम्प्रदाय, प्रदेश या भाषा बोलनेवाला हो, वह अपने बच्चे को एक बार कृष्ण के रूप में अवश्य सजाता है। अपने जन्म से ही अपनी जन्मदात्री को चिरकाल का विरह देनेवाले कृष्ण आज भी कितनी माताओं के मन में स्थिर हैं!

कृष्ण चरित्र सबको लुभाता है। महर्षि वेदव्यास की प्रतिभा ने महाभारत में जो महान चरित्र का चित्रण किया है उनमें प्रमुख स्थान भगवान श्रीकृष्ण का है। ऐसा लगता है कि बाकी सब चरित्र उनका सहारा लेकर खड़े हैं। कृष्ण के पास ऐसा सुन्दर दैवीय गुण जिसे हम संस्कृति कहते हैं। वे अपने पौरुष के साथ जिए, मृत्यु व विरह की वेदनाएं झेली।

कृष्ण-चरित कोई एक ग्रन्थ की निर्मिती नहीं है। अनेक ग्रन्थों, काव्यों एवं नर-नारी के जीवन से यह साकार हुआ है। आज भी जीवन के सभी अंगों को स्पर्श करता हुआ, व्यक्ति-व्यक्ति के सुख-दु:खों का स्पंदन स्वत: अनुभव करके उनको कृतार्थ करता हुआ कृष्ण जीवन्त है। इसलिए श्रीकृष्ण हमें सबसे नजदीक और अपने लगते हैं।

कृष्ण का जन्म भी मृत्यु के साए में, डर के भंवर में तथा आशा के अमर आश्वासन में हुआ। और आज भी भारतीय समाज कृष्ण को हर घर में बाल रूप में अवतरित है, ऐसा अनुभव करता है। यही कारण है कि व्यक्ति जिस जाति, सम्प्रदाय, प्रदेश या भाषा बोलनेवाला हो, वह अपने बच्चे को एक बार कृष्ण के रूप में अवश्य सजाता है। अपने जन्म से ही अपनी जन्मदात्री को चिरकाल का विरह देनेवाले कृष्ण आज भी कितनी माताओं के मन में स्थिर हैं! उसने यशोदा के मन को उत्साहित किया। घुटनों के बल चले, बाल हठ किया, बालसुलभ शैतानियां की, डांट खाई, मार पड़ी, सजा मिली, इस कारण कभी-कभी मौत और जिन्दगी के बीच झूलते हुए मां को वेदनाएं भी सहनी पड़ी। परन्तु यशोदा इस प्यारे से कृष्ण से सदा सुख का अनुभव करती रही।

उनके ग्वाले मित्र, उनके खेल, उनकी चोरी, गोपियों के साथ स्नेह, क्या नहीं था उस यौवनोन्मुख कृष्ण में ?  एक तरफ कंस व शिशुपाल उससे दुश्मनी रखते थे तो ग्वाल और गोपियां उस पर प्राण न्योछावर करते थे। गायें उसके वात्सल्य स्पर्श से सुख का अनुभव करती थीं, वहां दूध-दही की नदियां बहा करती थी।

उनकी मुरली तारुण्य के उद्रेकों को आह्वान देती थी। परन्तु उस संगीत में ऐसा जादू था कि गोपियां उस वादक की ही दिवानी हो गईं। उनका यौवनोन्माद उन तक ही सीमित था, उसका सार्वत्रिक स्वैराचार में परिवर्तन नहीं हुआ था। समुद्र में ज्वार उठता है और फिर वे लहरें प्रेरणा से ही पीछे हो जाती हैं वैसा ही यह आकर्षण था। कृष्ण से निकलकर वापस कृष्ण में ही समा जाता था। अत्यन्त मृदु, परन्तु उतना ही दृढ़ स्नेह था उनका। इस प्रीति का सर्वोत्कृष्ट प्रतीक थी- राधा।

भारतीय संस्कृति में कभी-कभी लालित्य का अनुभव होता है। राधा-कृष्ण की प्रीति का वसंत एक बार ही आया परन्तु भारत के जनमानस में वह चिर स्मरणीय हो गया। राधा-कृष्ण की प्रीति के कारण भारतीय प्रेम-कथा में कोमलता आई, वह कभी मुरझाई नहीं। प्रीति की परिपूर्णता के लिए चिर तारुण्य अपेक्षित होता है। यही दिखाने हेतु इस आदर्श प्रेमी ने खुद को विरह में बांध लिया। भगवान राम के समान कृष्ण ने कभी राधा के लिए विलाप नहीं किया। ऐसा यह नाजुक, अति कोमल, प्रेमाविष्कार उन्होंने अपने हृदय के अंतरतम में सदा के लिए छिपा दिया।

राम तो मर्यादा पुरुषोत्तम थे पर कृष्ण तो सभी बातों में सीमा पार करने वाले थे। वे प्रत्येक कर्म में परिपूर्णता लाए, हर चीज में अमर्याद सौन्दर्य व चैतन्य का जागरण किया, झंझावतों जैसा उनका जीवन था। बचपन के खेलों में पटुत्व था, वे जी-जान से खेलते थे। चोरी को भी उन्होंने रमणीयत्व प्रदान किया। उनमें गजब का हास्य-भाव था। कृष्ण पूर्ण जीवन में मस्तमौला नहीं होते तो गीता में इतनी गम्भीरता नहीं आती।

कृष्ण की प्रकृति कलासक्त थी। परन्तु उनकी कलासक्ति भी प्रीति जैसे ही जमीन पर पांव मजबूत करके खड़ी रही। उन्होंने हाथ में वीणा नहीं ली, परन्तु बांसुरी ली। उस लकड़ी के टुकडे में ऐसा चैतन्य भरा कि आज भी वह मन को लुभाती है। ग्वालों का वह एक साधारण वाद्य, परन्तु कृष्ण ने उसे जीवन्त किया। बिल्कुल साधारण-सी दिखनेवाली चीज को चिरंतन कला-मूल्य देने का सामर्थ्य श्रीकृष्ण में ही था।

कलाकार का कला में समाहित होने का गुण भी श्रीकृष्ण में इतना ओतप्रोत था कि वे एक भूमिका से दूसरी भूमिका में सहज प्रवेश करते हैं। उस भूमिका में वे तन्मय तो होते ही थे परन्तु पहलेवालों को भी वे भूल जाते थे। देवकी को मातृपद देकर उसे छोड़ दिया। वही परिस्थिति नंद-यशोदा-गोप-गोपियों के साथ भी घटित हुईं। कंस-वध के पश्चात् वे मथुरा में भी नहीं रहे। मथुरा छोड़कर द्वारका चले गए। अप्रतिम योद्धा की कीर्ति का विसर्जन उन्होंने महाभारत युद्ध में हाथ में शस्त्र न लेने की प्रतिज्ञा लेकर किया व खुद दार्शनिक की भूमिका में रहे। इस भूमिका को ग्रहण करते ही उनके ध्यान में यादवों की उन्मतता आई, तो यादवों का भी नाश किया। इस अनासक्त योगेश्वर को समाधि लेनी चाहिए थी। परन्तु उनकी मृत्यु भी साधारण मानव जैसे वन में व्याघ्र के बाण से हुई। पुत्र, बाल-सखा, भाई वादक, योद्धा, राजा, राजनीतिज्ञ, वक्ता, दार्शनिक इन सब भूमिकाओं में अपरम्पार ख्याति प्राप्त करने के पश्चात भी अपनी मृत्यु साधारण मानव जैसी होने में श्रीकृष्ण ने धन्यता मानी।

कृष्ण का जीवन सामान्य व्यक्ति जैसा ही था- यह सत्य है, लेकिन उससे भी परे जाकर सामान्य व्यक्ति की नियति में नमक जैसा अपना गुण देने में वे निपुण थे। छोटे बच्चे, पशु-पक्षी, अशिक्षित, छोटे-बड़े, स्त्री-पुरुष सभी को उन्होंने समभाव से स्वीकार किया। वे उनमें से ही एक बनकर रहे परन्तु जब उनको छोड़ना आवश्यक हुआ तो उनको ऐसा छोड़ा कि कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने गृहस्थाश्रम में प्रवेश किया तो पूरी तरह गृहस्थ का जीवन जीया।

आसक्ति व विरक्ति दोनों की परमावधि उन्होंने प्राप्त की। मेघ जिस प्रकार रिक्त होते हैं वैसे ही वे रिक्त हुए। परन्तु फिर भी कृष्ण का जीवन इतना उदात्त है कि उनकी महिमा का वर्णन करते बड़े-बड़े विद्वान करते नहीं अघाते। इसलिए रसखान ने ठीक ही कहा है-

सेस गनेस महेस दिनेस, सुरेसहु जाहि निरंतर गावै।

जाहि अनादि अनंत अखण्ड, अछेद अभेद सुबेद बतावैं॥

नारद से सुक व्यास रहे, पचिहारे तू पुनि पार न पावैं।

ताहि अहीर की छोहरियाँ, छछिया भरि छाछ पै नाच नचावैं॥ 

– लखेश्वर चंद्रवंशी, नागपुर 

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