महिला उत्पीड़न समस्या के समाधान की खोज में : एक चिंतन

महिला उत्पीड़न
महिला उत्पीड़न

हमारे बुद्धिजीवियों ने देश के विकास के लिए बहुत सी योजनाएं तो बनाईं, परंतु नारी की ओर देखने की पुरुष की दृष्टि पर कभी चिन्तन नहीं किया। यही कारण है कि आज के फिल्मों के गीत, कहानी और व्यवसाय जगत में भारत की नारी की अस्मिता की बोली लगाई जाने लगी है। ऐसी विडंबनाओं के चलते अब नारी को पवित्रता की दृष्टि से देखनेवाला समाज का निर्माण कैसे होगा?

– लखेश्वर चंद्रवंशी

हाल ही में तहलका पत्रिका के संस्थापक और मुख्य सम्पादक तरुण तेजपाल पर, बेटी की उम्र की सहयोगी महिला पत्रकार ने उत्पीड़न का आरोप लगाया है। इस खबर के फैलाते ही चारों तरफ महिलाओं की सुरक्षा को लेकर गहन मंथन का कार्यक्रम चल पड़ा है। कोई भारतीय परम्परा को ही दोषी बता रहा है, तो कोई कानून व्यवस्था पर ऊँगली उठा रहा है; कोई पुरुषों की मानसिकता को जिम्मेदार ठहरा रहा है तो कोई नारी की कमजोरी को इसके लिए दोषी मान रहा है। नारी अस्मिता की रक्षा पर चिंतन करने के बजाय दोष किसका, इसपर मंथन चल रहा है। यह चिंताजनक बात है। ऐसे में भारतीय समाज में महिला विषयक दृष्टिकोण पर विचार करना होगा।

हम जानते हैं कि हमारे देश में, प्रत्येक परिवार में माँ का सर्वोच्च स्थान होता है। प्राचीन काल से ही मातृशक्ति का विशेष महत्व रहा है। पुराणों में माँ को प्रथम गुरु की संज्ञा दी गई है। हमारी संस्कृति में मनुष्य के पोषण में सहयोग प्रदान करनेवाली प्रत्येक तत्व को “माँ” की उपाधि दी गई है। यही कारण है कि आज भी हम नदी, भूमि, गाय और वनों को माँ कहकर उसकी पूजा करते हैं। नारी जननी होती है, वह बालक का पोषण करती है; इसलिए वह सदा वन्दनीय है। भारतीय परम्परा में यही नारी विषयक दृष्टिकोण रहा है, जो हर काल में आदर्श है। लेकिन आज देश के विभिन्न स्थानों पर आए दिन महिला उत्पीड़न की घटनाओं की खबर सुनाई देती है। जिसके कारण भारतीय विचारों के विरोधियों को हमारी संस्कृति और परम्परा का मखौल उड़ाने का मौका मिल जाता है। और हम समझने लगते हैं कि हमारे देश में सदैव ही महिलाओं की उपेक्षा की जाती है।

यह सच है कि इतिहास में महिलाओं की शिक्षा सम्बंधी पुख्ता तथ्य हमारे समक्ष नहीं है। साथ ही यह भी सत्य है कि इतिहास के बहुत से स्वर्णिम अध्याय को हमसे दूर रखा गया, या फिर देश की जनता ने कभी इस सम्बन्ध में जानकारी इकठ्ठा करने की कोशिश नहीं की। इसके बावजूद भी नारी के प्रति भारतीय दृष्टिकोण सकारात्मक और विकासोन्मुख ही रहा है। महात्मा जोतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले, रमाबाई रानडे, स्वामी दयानन्द सरस्वती, महर्षि कर्वे, स्वामी विवेकानन्द, भगिनी निवेदिता, महात्मा गांधी आदि महात्माओं ने नारी उत्थान के लिए उनकी शिक्षा को महत्वपूर्ण माना। शिक्षा को मौलिक अधिकार व आधार बतानेवाले इन महात्माओं ने ऐसा कभी नहीं सोचा होगा कि भविष्य में नारी को उत्पीड़न का शिकार होना पड़ेगा। शिक्षित समाज आज सामाजिक अपराधों से ग्रस्त है। इसलिए हम कह सकते हैं कि शिक्षा के मानक अपने मूल उद्देश्य से भटक गया है। शिक्षार्जन से प्राप्त प्रतिभा का उपयोग समाज हित में करने के बजाय स्वार्थ साधना के लिए किया जा रहा है, जिसकी कोई मर्यादा नहीं दिखती।

शिक्षार्जन के बदलते मानक

शिक्षा का मुख्य उद्देश्य ‘विद्यार्जन’ है। विद्या के बल पर जीवन की समस्त कठिनाइयों को पार कर अपने लक्ष्य की प्राप्ति का भाव इसमें निहित है।

श्रीविष्णुपुराण में कहा गया है कि – सा विद्या या विमुक्तये अर्थात वह जो (अज्ञान से) मुक्ति प्रदान करे वह विद्या है। नारी शिक्षा के सन्दर्भ में भी यही संकल्पना रही है। परन्तु आज शिक्षार्जन के मायने बदल गए हैं। शिक्षा का उद्देश्य ज्ञानार्जन के बदले अर्थार्जन हो गया है। अधिकाधिक धन संग्रहित करनेवाला मनुष्य ही अधिक सुखी हो सकता है। इस सोच ने जीवन के प्रति मनुष्य का दृष्टिकोण बदल दिया। भौतिक सुख-सुविधाओं को प्राप्त करने की होड़ सी मच गई है। इसके लिए भ्रष्टाचार, दुराचार, व्याभिचार चाहे जो करना पड़े, मनुष्य तैयार है। यही कारण है कि समाज में नैतिकता का पतन हो रहा है।

महिलाओं के सन्दर्भ में देखा जाए तो हमारे देश की युवतियां शिक्षा के क्षेत्र में दिन प्रतिदिन विकास कर रहीं हैं। आज विद्यालय और महाविद्यालयों में सबसे ज्यादा महिलाएं शिक्षक की भूमिका में हैं। यहीं नहीं तो अभियांत्रिकी, वैद्यकीय और विज्ञान के क्षेत्र में भी महिलाओं की सहभागिता बढ़ी है, जो बहुत ही प्रशंसनीय है। वहीँ दूसरी ओर नौकरी के नाम पर महिलाओं का शोषण का प्रमाण भी बढ़ा है। नौकरी सम्बंधी नारी उत्पीड़न की घटनाओं में अधिकतर जहां महिलाओं की बढ़ती हुई अर्थार्जन की आकांक्षा को जिम्मेदार होती हैं, वहीँ दूसरी ओर कामुक पुरुषों द्वारा महिलाओं को इस पाप कर्म के लिए मज़बूर किया जाता है। दोनों ही स्थितियों में नारी की ही हार होती है। तो फिर स्त्री अस्मिता की रक्षा कैसे हो?

दूसरी ओर हमारे समाज में रेव पार्टियों का चलन बढ़ रहा है, जहां आचरण में किसी प्रकार की सामान्य बंदिशों या बंधनों की कोई गुंजाइश नहीं है। होटलों, फार्म हाउसों, म्युजिक सेंटरों, बारों…से लेकर अब तो नामी विवाह भवनों और यहां तक कि धीरे-धीरे कुछ घरों में जहां बड़े परिवार नहीं हैं; ऐसी स्वच्छंद पार्टियों का चलन हो गया है। पिछले वर्ष बंगलुरु, हैदराबाद, नागपुर, मुम्बई जैसे नगरों में पुलिसिया छापे में, नशे में धुत सैंकड़ों युवक-युवतियों को रेव पार्टियों में आपत्तिजनक स्थिति में पकड़ा गया। आज हर छोटे-बड़े नगरों, महानगरों और कसबों में आधी रात ऐसे लोग मिल जाएंगे जिसे पुलिस भी हाथ लगाना उचित नहीं मानती और उसकी सलाह यह होती है कि आप उधर की बजाय दूसरे रास्तों से जाइए, क्योंकि पता नहीं कौन कोकिन, एलसीडी के नशे में आपके साथ क्या कर दे। उन्मुक्तताओं का यह चलन पुरानी मान्यताओं, कानून और सामाजिक बंदिशों को ध्वंस करने के लिए आतुर है। इस भयावह उन्मुक्तता को रोकने में कानून की भी अपनी सीमाएं हैं, फिर उपाय क्या ?

नारी समाज की अस्मिता

हमारी संस्कृति के अनुसार नारी परिवार व समाज की अस्मिता है। इसलिए हमारे पूर्वजों ने उसे संभालकर रखने तथा उसके संरक्षण के लिए कुछ विशेष नियम भी बताए। इन नियमों के अंतर्गत संध्याकाल में परिवार के सभी लोग मिलकर संध्या आरती करें, साथ में भोजन तथा कुछ जीवन मूल्यपरक कुछ बातें हों आदि। परंतु हमारे समृद्ध व प्रबुद्ध समाज ने स्वच्छंदता के नाम पर इन नियमों की धज्जियां उड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ीं। विशेषकर पढ़े-लिखे लोग जो नारी सशक्तिकरण और नारी स्वतंत्रता का ढोल पीटते हैं, ने स्वतंत्रता के नाम पर भारत की अस्मिता नारी शक्ति को सरेआम तमाशा और मनोरंजन का साधना बना दिया। मॉडलिंग, एक्टिंग और डांसिंग के नाम पर नारी अस्मिता को सरेआम बेचा जाने लगा। प्रदर्शन के नाम पर लोकलुभावन बनने की होड़ लग गई और मशहूर होने के भ्रामक चाह ने नारी की तरफ देखने की पुरुषों की दृष्टि को कामुक बना दिया। हमारे बुद्धिजीवियों ने देश के विकास के लिए बहुत सी योजनाएं तो बनाईं, परंतु नारी की ओर देखने की पुरुष की दृष्टि पर कभी चिन्तन नहीं किया। यही कारण है कि आज के फिल्मों के गीत, कहानी और व्यवसाय जगत में भारत की नारी की अस्मिता की बोली लगाई जाने लगी है। ऐसी विडंबनाओं के चलते अब नारी को पवित्रता की दृष्टि से देखनेवाला समाज का निर्माण कैसे होगा?

क्या नारी कोई मॉडल है, मनोरंजन का साधन है या फिर संस्कारों को पोषित करनेवाली संवर्धिनी? मूल्यांकन तो स्वत: नारी को ही करना होगा।

वर्तमान में भारत में नारी उत्थान की अवधारणा की उल्टी धारा बह रही है। नारी-पुरुष के बीच में तुलना करते हुए पुरुष के समान उसके अधिकारों की बातें की जाती हैं। परंतु स्त्री को राजनीति, नौकरी और उद्योग जगत में अधिकार मिल जानेभर से क्या नारी जाति का उत्थान हो जाएगा? नारी उत्थान का मापदण्ड आखिर क्या होना चाहिए? इस पर तो नारी समाज को स्वयं ही सोचना होगा। देश की राजनीति, समाजनीति, अर्थनीति, न्याय व्यवस्था आदि सभी क्षेत्रों में उसकी सहभागिता बढ़े, इसके लिए आवश्यक शिक्षा की व्यवस्था सुलभता से हो; यह सर्वथा उचित है। ऐसा होना भी चाहिए क्योंकि उसकी शिक्षा पर परिवार व समाज का हित है। वास्तव में भारत में जो कुछ संस्कार बचे हैं उसमें सबसे बड़ा योगदान तो नारी का ही है।

यदि पुरुषों की तरह सभी नारी धूम्रपान या शराब पीने लगे, तो समाज का क्या होगा? फिर तो पूरे समाज से नैतिकता के सारे आदर्श ही समाप्त हो जाएंगे। यह स्त्री ही है, जिसके कारण समाज में जीवन मूल्य तथा संस्कारों के बीज सुरक्षित हैं। इन जीवन मूल्यों व संस्कारों की वजह से भारत का सारा जग सम्मान करता है। नारी जब संस्कारों का संवर्धन करने में अग्रसर है, तो निश्चय ही उसका स्थान सर्वोपरि है। इसलिए नारी जाति का गौरव अपने-आप में अधिक है।

लेकिन संस्कारों की रक्षा व संवर्धन पर गौरवान्वित होने के बजाय केवल सुंदर दिखने के क्षणिक सुख और तथाकथित पुरस्कारों पर आज नारी समाज गर्व करता है। एक समय था जब नारी सीता, सावित्री और दमयन्ती को अपना आदर्श मानती थीं। अब वे आदर्श बदल गए हैं। ज्ञान, गुण और चरित्र से तीनों देवताओं को बालक बनाकर रखनेवाली अहिल्या नारी ही थी, रावण जैसे महादानव को पतिव्रता के व्रत से परास्त करनेवाली सीता भी नारी ही थी, अंग्रेजों के खिलाफ दुर्गा की तरह रणक्षेत्र में लड़नेवाली लक्ष्मीबाई नारी ही थी। फिर इन महान आदर्शों की अवहेलना क्यों? क्यों कोई युवक किसी युवती को फुसलाकर उसका शील हरण करता है? क्यों कोई नारी राजनीति के शातिर नेताओं के जाल में फंस जाती है? क्यों कोई नारी टीवी के रीयालिटी शो के अधीन हो जाती है? यह सारे सवाल नारी समाज द्वारा स्वयं से पूछा जाना चाहिए।

समन्वयात्मक दृष्टिकोण की आवश्यकता

हमारे देश में तो शिव-शक्ति के संयुक्त रूप जिसे अर्धनारीनटेश्वर कहते हैं, की पूजा होती है। जब शिव-शक्ति ने अपने जीवन में समन्वय का इतना बड़ा आदर्श हमारे सामने प्रस्तुत किया है तो फिर हम दोनों में परस्पर तुलना क्यों करते हैं?  स्त्री यदि शक्ति है तो पुरुष भी शिव है। दोनों का ही अपना महत्व है। आवश्यकता है कि पुरुष व नारी, दोनों के द्वारा अपनी-अपनी पवित्रता का जतन करते हुए एक-दूसरे के सम्मान की रक्षा करनी होगी। जबतक इस समन्वयात्मक दृष्टिकोण का विकास नहीं होगा तब तक ऐसे अपराधों का दौर समाप्त नहीं होगा। साथ ही युवतियों को भी अपनी सुरक्षा के लिए आवश्यक युद्ध के तरीके, कराटे, तायकोंडो, बॉक्सिंग आदि तो सीखना ही चाहिए ताकि कामांधों के पाप का ठीक से प्रत्युत्तर दे सके। परंतु सबसे ज्यादा जरुरी है स्त्री-पुरुष के बीच व्याप्त मतभेद को मिटाना, और ऐसे समाज की रचना करना जहां पवित्रता का पोषण हो, जहां शक्ति का सम्मान हो।

नागपुर

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बेहतर स्वास्थ्य के लिए जूझता युवा भारत

surya-namaskarभारतीय जीवन पद्धति में नैतिकता और चरित्र को सर्वोच्च माना गया है ईमानदारी और मेहनत को जीवनमूल्य मनानेवाला हमारा समाज धीरे-धीरे अपने जीवनमूल्यों से दूर होता जा रहा है  यही कारण है कि अपराध बढ़ रहा है और समाज में आपसी विश्वास की डोर दिन-प्रतिदिन कमजोर हो रहा है कमजोर समाज में स्वास्थ्य जीवन की कल्पना कैसे की जा सकती है?

– लखेश्वर चंद्रवंशी

युवाधन से समृद्ध भारत में जहां प्रतिभाओं की कमी नहीं है, वहीँ बेहतर स्वस्थ्य के लिए युवा भारत चिंतित है। बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षा, नौकरी व व्यवसाय में व्याप्त भ्रष्टाचार से युवा समाज त्रस्त है।  अस्थिर रोजगार और बढ़ती हुई आवश्यकताओं के चलते दबाव में जीनेवाले युवाओं में हृदय रोग का खतरा बढ़ गया है।

ऐसे में जीवनशैली व खान-पान की आदतों में बदलाव आज की जरूरत बन गई है। चिकित्सकों का कहना है कि युवाओं को समय रहते ही खानपान को लेकर सावधानी बरतने की आवश्यकता है, वरना अगले 10 वर्षों में देश की आबादी लगभग 20 फीसदी लोगों को हृदय से संबंधित बीमारी से ग्रसित होने की आशंका है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में एक हृदय ही है जिस पर सबसे ज्यादा बोझ पड़ता है। तनाव, थकान, प्रदूषण आदि कई वजहों से खून का आदान-प्रदान करनेवाले इस अति महत्वपूर्ण अंग को अपना काम करने में मुश्किल होती है।

डॉक्टरों की मानें तो युवाओं में हृदयाघात और हृदय संबंधी बीमारियों के बढ़ने का प्रमुख कारण धूम्रपान और मशालेदार एवं तली भुनी चीजों का अधिक मात्रा में सेवन करना है। इससे बचने के लिए रेशायुक्त भोजन करना चाहिए और व्यायाम को नियमित दिनचर्या का अंग बनाना अति आवश्यक है। पहले जहां 30 से 40 वर्ष तक के बीच हृदय की समस्याएं आंकी जाती थीं, आज यह 20 वर्ष से कम उम्र के लोगों में भी होने लगी है। ऐसे में हृदय की समस्याओं से बचने का एक ही उपाय है कि लोग खुद अपनी कुछ सामान्य जांच कराएं और हृदय संबंधी सामान्य समस्याओं को भी गंभीरता से लें।

विशेषज्ञों के अनुसार, अगले पांच से 10 सालों में भारतीय आबादी का करीब 20 प्रतिशत हिस्सा इससे प्रभावित होगा। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की रिपोर्ट के मुताबिक, 2020 तक भारत में मौतों और विकलांगता की सबसे बड़ा वजह हृदय से संबंधित रोग ही होंगे।

हृदय के साथ होनेवाली छेड़छाड़ का ही नतीजा है कि आज विश्वभर में हृदय रोगियों की संख्या बढ़ गई है। एक अनुमान के अनुसार, भारत में 10.2 करोड़ लोग इस बीमारी की चपेट में हैं। पूरी दुनिया में हर साल 1.73 करोड़ लोगों की मौत इस बीमारी की वजह से हो जाती है और यदि हालातों पर काबू नहीं किया गया तो 2020 तक हर तीसरे व्यक्ति की मौत हृदय रोग से होगी।

चिकित्सकों के मुताबिक जीवनशैली व खान-पान में बदलाव लाकर हृदय रोगों से छुटकारा पा सकते हैं। इससे बचने के लिए मसालेदार व अधिक तली भुनी चीजों से परहेज करना चाहिए।
आजकल लोग अधिकतर समय कार्यालय में सिर्फ बैठकर अपना काम करते हैं। इस स्थिति में शरीर निष्क्रिय जीवनशैली का आदी बन जाता है। आज के युवा कार्यालय में तो बैठे-बैठे कॉफी पीते हैं और फिर घर पर भी रात को देर तक टेलीविजन देखकर सुबह देर से जगते हैं और व्यायाम नहीं करते हैं। ऐसे में हृदय रोगों की आहट आना लाजमी है।

चिकित्सकों की मानें तो मधुमेह और हाइपरटेंशन के मरीजों को शुगर तथा रक्तचाप पर नियंत्रण रखना चाहिए। एक सप्ताह में कम से कम पांच दिन व्यायाम जरुरी है। तंबाकू का सेवन नहीं करना चाहिए। वसायुक्त भोजन का सेवन न करें साथ ही ताजे फल एवं सब्जियों का सेवन करना चाहिए। चिकनाई युक्त पदार्थ नहीं खाना चाहिए। चिकित्सक रचनात्मक और मनोरंजनात्मक कायरें में मन लगने की भी सलाह देते हैं।

विशेषज्ञ मानते हैं कि तनाव के कारण मस्तिष्क से जो रसायन स्रावित होते हैं वे हृदय की पूरी प्रणाली को खराब कर देते हैं। तनाव से उबरने के लिए योग का भी सहारा लिया जा सकता है। हृदय हमारे शरीर का ऐसा अंग है जो लगातार पंप करता है और पूरे शरीर में रक्त प्रवाह को संचालित करता है। प्रतिदिन कम से कम आधे घंटे तक व्यायाम करना हृदय के लिए अच्छा होता है।

उल्लेखनीय है कि भारतीय जीवन पद्धति में नैतिकता और चरित्र को सर्वोच्च माना गया है। ईमानदारी और मेहनत को जीवनमूल्य मनानेवाला हमारा समाज धीरे-धीरे अपने जीवनमूल्यों से दूर होता जा रहा है।  यही कारण है कि अपराध बढ़ रहा है और समाज में आपसी विश्वास की डोर दिन-प्रतिदिन कमजोर हो रहा है। कमजोर समाज में स्वास्थ्य जीवन की कल्पना कैसे की जा सकती है? स्वामी विवेकानन्द ने त्याग और सेवा को भारत का राष्ट्रीय आदर्श कहा था।  इन आदर्शों की अवहेलना कर समाज समृद्ध और तनाव मुक्त कैसे हो सकता है?

अनुसन्धान बताते हैं कि अपने स्वार्थ सिद्धि के चलते मनुष्य ने प्रकृति का शोषण किया है। सब्जियां, फल, अनाज, वायु यहां तक कि जल को भी प्रदूषित करने में मनुष्य आगे रहा। पाश्चात्य संस्कृति से अविवेकपूर्ण जीवन पद्धति को अंगीकार करने से स्वस्थ्य सम्बंधी शिकायतें बढ़ गई है। आज बहुतायत युवा सुबह जल्दी नहीं उठते। कई लोग तो दोपहर 12 बजे के बाद सो कर उठते हैं। फिर उत्साहयुक्त वातावरण कैसे बन सकेगा?

इस तनावयुक्त जीवन को उत्साहवर्धक बनाने के लिए प्रतिदिन प्रात: जल्दी उठकर, योग-प्राणायाम, सूर्यनमस्कार और प्रतिदिन सदसाहित्यों का परिवार में स्वाध्याय करने, और दिन में एक बार सामूहिक भोजन करने का संकल्प लेना चाहिए।  इसी से परिवार में स्वस्थ वातावरण का निर्माण हो सकता है।  अच्छे विचारों से ही आदर्श समाज की रचना होती है। अतः अपराधमुक्त, स्वास्थ्य समाज बनाने के लिए उत्तम दिनचर्या और उपयुक्त आहार की आवश्यकता है।

मोदी के शब्द प्रभाव से बड़ी दुर्घटना टली

मोदी के शब्द प्रभाव से बड़ी दुर्घटना टली
मोदी के शब्द प्रभाव से बड़ी दुर्घटना टली

यह सच है कि गत 27 अक्टूबर को नरेन्द्र मोदी की भव्य रैली के पूर्व, बिहार में पटना के रेलवे स्टेशन और रैली स्थल गांधी मैदान के आसपास कुल सात धमाके हुए जिसमें छह लोगों की मौत हो गई, जबकि 83 लोग घायल हो गए। भारतीय जनता पार्टी के बिहार इकाई के कार्यकर्ताओं ने धमाकों के बावजूद हुंकार रैली में आए लोगों को तितर-बितर नहीं होने दिया, और न ही किसी प्रकार के भय को रैली पर हावी होने दिया। यही कारण है कि मोदी के भाषण को सुनने के लिए लालायित लोग इन धमाकों के बीच बड़ी दृढ़ता से डटे रहे। मोदी को देखने के लिए पलकें बिछाए बिहार की जनता ने अपने धैर्य और अदभुत अनुशासन का परिचय दिया। धमाकों के बीच ऐसी भव्य रैली, वह भी बिना अफरातफरी के! सबकुछ अदभुत था! दुनिया देखती ही रह गई, और विरोधी पार्टियां हाथ मलते रह गए।

इधर नरेन्द्र मोदी ने अपने भाषण में बिहार की जनता के बीच ऐसा समा बांधा, जिसे कभी भूलाया नहीं जा सकता। मोदी ने अपने भाषण में हिन्दू-मुस्लिम एकता, ईमानदारी, भारतभक्ति आदि मुद्दों को केंद्र में रखकर केंद्र सरकार और विशेषकर नीतीश कुमार की जमकर खबर ली। और बिहार की जनता को विश्वास दिलाया कि भाजपा की सरकार आने पर देश व बिहार का विकास होगा। मोदी ने चाणक्य के मूलमंत्र ‘सबको जोड़ो’ का स्मरण कराते हुए कहा कि देश को फिर जोड़ने की राजनीति करनी होगी।

जनता बड़े ध्यान से भाषण सुन रही थी और टीवी पर रैली की भव्यता को देखते लोग सोच रहे थे कि भाषण के बाद पटना में क्या होगा? सभी के मन में शंका थी कि कहीं भगदड़ न मच जाए। पर मोदी पर गहन आस्था और विश्वास रखनेवाले लाखों बिहार निवासी जनता को नरेन्द्र मोदी के एक आह्वान ने बड़ी दुर्घटना को होने से टाल दिया। मोदी ने अपने भाषण की समाप्ति के दौरान कहा कि, “मेरी एक छोटी सी प्रार्थना है। आप यहां से जाएंगे। कोई जल्दबाजी नहीं करेगा। गांव तक सलामत जाएंगे। किसी कार्यकर्ता को नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए। शांति से जाओगे। जल्दबाजी नहीं करोगे, और दूसरी बात, हमें शांति और एकता को बनाए रखना है। किसी भी हाल में शांति पर चोट नहीं आनी चाहिए। हिंदुस्तान में कहीं भी शांति पर चोट नहीं आनी चाहिए। ये संकल्प लेकर जाइए।”

मोदी के इस आह्वान का ऐसा असर हुआ कि लोगों ने गहन अनुशासन और धैर्य का परिचय दिया और वे अपने घरों में सुरक्षित पहुंचे। इस हुंकार रैली में यदि नरेन्द्र मोदी द्वारा अपने भाषण में इन धमाकों का जिक्र किया जाता तो शायद भगदड़ मच जाती और इससे हजारों लोगों की जान चली जातीं। पर मोदी ने स्थिति को ध्यान में रखते हुए समयोचित अपने भाषण में कहीं भी इन धमाकों का जिक्र तक नहीं किया और अंत में उन्होंने रैली में आए लोगों को शांति से घर लौटने की अपील की, जिसकी सर्वत्र प्रशंसा की जा रही है।

इधर धमाकों को लेकर राजनीति तेज हो गई। केंद्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे के अनुसार केंद्र सरकार ने नरेंद्र मोदी की पटना रैली के दौरान हमले की आशंका पर बिहार को सतर्क किया था, परन्तु बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस बात से इंकार किया और कहा कि उन्हें केंद्र सरकार से रैली के दौरान किसी संभावित हमले के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली थी।

ज्ञात हो कि बिहार की राजधानी पटना में हुए इस सिलसिलेवार विस्फोटों में इंडियन मुजाहिदीन (आईएम) के संस्थापक सदस्यों में से एक यासीन भटकल के साथियों का हाथ माना जा रहा है। राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने पटना से लेकर रांची तक इसकी जांच शुरू कर दी है। धमाके की साजिश के आरोप में पकड़े गए एक संदिग्ध आतंकी मोहम्मद इम्तियाज अंसारी को स्थानिक न्यायालय ने न्यायिक हिरासत में भेज दिया है और ऐसा लगता है कि अतिशीघ्र अन्य अपराधियों को पकड़ लिया जाएगा।

पर चिंता की बात यह है कि पटना में इस प्रकार के आतंकी घटना को अंजाम देने की योजना क्यों बनाई गई ? ऐसा लगता है कि आतंकियों द्वारा मोदी की रैली को असफल बनाने के लिए समय, स्थान और तारीख निश्चित किया गया था। बिहार पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार यह रैली आतंकवादियों के निशाने पर थी। चरमपंथियों का मकसद रैली में भगदड़ मचाना था।

आतंकियों ने अपना काम किया और रैली में आए लोगों को क्षति पहुंचाकर रैली को असफल करने का प्रयास किया। पर मोदी के आह्वान ने आतंकियों के मनसूबे पर पानी फेर दिया। भारतीय जनता पार्टी की बिहार ईकाई द्वारा आयोजित इस रैली में 7 लाख से अधिक लोग सहभागी हुए थे। आयोजन की तैयारी को देखकर इसकी भव्यता का पहले से अनुमान लगाया जा रहा था। यही कारण है कि भाजपा कार्यकर्ताओं ने तैयारियों अपनी ओर से कोई कमी नहीं की। निश्चय ही भाजपा कार्यकर्ताओं की मेहनत और तैयारी ने इस हुंकार रैली को अधिक आकर्षक, भव्य और प्रशंसनीय बनाया।

 लखेश्वर चंद्रवंशी, नागपुर

बाबर गया पर बाबरीयत नहीं गई

akhilesh azamवर्तमान अखिलेश सरकार की हिन्दू विरोधी नीतियों को देखकर तो ऐसा ही प्रतीत होता है कि उत्तर प्रदेश की जनता कहीं बाबर के शासन के अधीन तो नहीं जी रही! पंचकोसी, चौरासी कोसी परिक्रमा और संकल्प सभा पर रोक लगाकर अखिलेश सरकार ने अपने बाबरीयत नीति को चिन्हित किया है।

 – लखेश्वर चंद्रवंशी

उत्तर प्रदेश की अखिलेश सरकार इसलिए सुर्ख़ियों में है कि वे बहुत सेकुलर हैं। इतने सेकुलर कि विश्व हिन्दू परिषद के आंदोलनों को विफल करने की शक्ति उनमें है, इस बात को साबित करने के लिए वे तमाम तरह के हतकंडे अपना रहे हैं। पहले पंचकोसी यात्रा, फिर चौरासी कोसी परिक्रमा और अब संकल्प सभा पर रोक लगाने का षड्यंत्र अखिलेश सरकार ने रचा। निश्चय ही सपा सरकार के इस कारनामे से भारत के तथाकथित सेकुलरों को राहत मिलेगी, और भारत की धर्मनिरपेक्षवादी जनता और अल्पसंख्यक समुदाय सपा की झोली में वोट डालेगी ऐसा अखिलेश सरकार को लग रहा होगा।

अखिलेश के इस राजनीतिक षड्यंत्र को सेकुलरिज्म का जामा पहनाकर उसे और अधिक महिमामंडित करने का कुचक्र मीडिया द्वारा चलाया जा रहा है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जारी किए जा रहे विमर्श के कार्यक्रमों में बार-बार बताया जा रहा है कि विश्व हिन्दू परिषद परिक्रमा, सभा और यात्राओं का आयोजन कर प्रदेश में शांति व्यवस्था को बिगाड़ने का काम कर रहा है। विहिप द्वारा चलाए जा रहे श्रीराम जन्मभूमि का आन्दोलन को महज चुनावी मुद्दा बताकर मीडिया द्वारा भारतीय आस्था को अर्थहीन साबित करने का काम शुरू है। यह देश मंदिर नहीं, विकास को महत्वपूर्ण मनाता है, इस बात को जोरशोर से बताना शुरू है। पर मीडिया इस बात को कैसे भूल जाती है कि कुम्भ मेला, चारधाम यात्रा, गणेश उत्सव, दुर्गापूजा, रामायण, भागवत जैसे आयोजन में जनता की सहभागिता दिनोदिन बढ़ती जा रही है। फिर भारतीय आस्था के महानतम केंद्र मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जन्मभूमि मंदिर का निर्माण का मुद्दा भारतीय जनमानस से कैसे दूर हो सकता है? यह सत्य है लोकतन्त्र में सबका विकास आवश्यक है पर आस्था को दरकिनार कर हम आगे नहीं बढ़ सकते, इस बात को हमें समझना होगा।

यह वही मीडिया है जो गणेश उत्सव, दुर्गापूजा, जन्माष्टमी के अवसर पर सुर्खियां बटोरते हैं, कुम्भ मेले के आयोजन का महाकवरेज दिखाकर उसे भारतीय संस्कृति के गौरवमय प्रतीक बताने से नहीं थकते। और यह वही अखिलेश सरकार है जो कुम्भ मेले के अवसर पर विश्वभर के लोगों के स्वागत में विज्ञापन देते नहीं अघाते थे। पर जब शरद पूर्णिमा के अवसर पर हजारों श्रद्धालु सरयू के जल को नमन करने आते हैं, उसपर महज शांति प्रक्रिया को बनाए रखने के प्रशासनिक दिखावे और अपने सेकुलर छवि को चमका कर अल्पसंख्यकों को संतुष्ट करने के लिए बंदी लगाने का खेल खेल रहे हैं।

उल्लखनीय है कि 1519 ई. में भारत पर आक्रमण कर लूटमार करनेवाले बाबर ने भारतीयों पर खूब अत्याचार किए। बाबरनामा के पृष्ठ संख्या 267 से ज्ञात होता है कि उसने काफिरों (हिन्दुओं) के सरों का एक स्तम्भ बनवाया था। ऐसे ही उसने चुनार के दुर्ग पर कब्जा कर हिन्दुओं के सरों का एक मीनार बनवाया। बाबर को न भारतीय जनता से कोई लगाव था और न भारत भूमि से। उसका एकमात्र लगाव था भारत की अपार सम्पत्ति से। इसके लिए उसने मजहबी उन्माद तथा जिहाद की भावना को उभारा था। बाबर के राज में गंगा स्नान पर पाबन्दी थी। उसके राज में मंदिर को तोड़कर उस स्थान पर मस्जिद बनाया गया। श्रीरामजन्मभूमि पर बाबरी मस्जिद उसी का एक उदाहरण है। बाबर ने कभी भी भारत की जनता के प्रति जरा भी उदारता या सहानुभूति नहीं दिखलाई। वह हिन्दुओं को “काफिर” कहकर ही सम्बोधित करता था।  

84 कोसी यात्रा
84 कोसी यात्रा

वर्तमान अखिलेश सरकार की हिन्दू विरोधी नीतियों को देखकर तो ऐसा ही प्रतीत होता है कि उत्तर प्रदेश की जनता कहीं बाबर के शासन के अधीन तो नहीं जी रही! पंचकोसी, चौरासी कोसी परिक्रमा और संकल्प सभा पर रोक लगाकर अखिलेश सरकार ने अपने बाबरीयत नीति को चिन्हित किया है। यहां तक कि मुजफ्फरनगर हिंसा में भी पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाते हुए सपा सरकार द्वारा भाजपा विधायकों को बंदी बनाया गया।

इससे पहले इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अखिलेश यादव सरकार द्वारा आतंकी हमलों में आरोपित लोगों के खिलाफ दायर मुकदमों को वापस लेने की पहल को ही ठप्प कर मुलायम सिंह यादव की ‘मुस्लिम हितैषी राजनीति’ को करारा झटका दिया है।

गौरतलब है कि अखिलेश सरकार ने ”अल्पसंख्यक” शब्द का बहाना न लेकर सीधे लिखित रूप में यह आदेश जारी किया था कि सभी योजनाओं का 20 प्रतिशत केवल मुसलमानों के लिए ही व्यय करें। शायद ही कोई ऐसा राज्य होगा जिसने बजट राशि का निर्धारित प्रतिशत केवल मुसलमानों पर व्यय करने का फैसला किया हो। लेकिन उनके मंत्रिमंडल के एक सदस्य आजम खां इतने से संतुष्ट नहीं हैं। उसने मांग की कि बजट का कम से कम 25 प्रतिशत केवल मुसलमानों के लिए सुनिश्चित किया जाए।

सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक नीतियों में हिन्दू हितों को दरकिनार करनेवाले अखिलेश सरकार रवैये को देखकर लगता है कि बाबर तो गया, पर बाबरीयत अब भी उत्तरप्रदेश में हुकूमत कर रहा है।    

नागपुर