बाबर गया पर बाबरीयत नहीं गई

akhilesh azamवर्तमान अखिलेश सरकार की हिन्दू विरोधी नीतियों को देखकर तो ऐसा ही प्रतीत होता है कि उत्तर प्रदेश की जनता कहीं बाबर के शासन के अधीन तो नहीं जी रही! पंचकोसी, चौरासी कोसी परिक्रमा और संकल्प सभा पर रोक लगाकर अखिलेश सरकार ने अपने बाबरीयत नीति को चिन्हित किया है।

 – लखेश्वर चंद्रवंशी

उत्तर प्रदेश की अखिलेश सरकार इसलिए सुर्ख़ियों में है कि वे बहुत सेकुलर हैं। इतने सेकुलर कि विश्व हिन्दू परिषद के आंदोलनों को विफल करने की शक्ति उनमें है, इस बात को साबित करने के लिए वे तमाम तरह के हतकंडे अपना रहे हैं। पहले पंचकोसी यात्रा, फिर चौरासी कोसी परिक्रमा और अब संकल्प सभा पर रोक लगाने का षड्यंत्र अखिलेश सरकार ने रचा। निश्चय ही सपा सरकार के इस कारनामे से भारत के तथाकथित सेकुलरों को राहत मिलेगी, और भारत की धर्मनिरपेक्षवादी जनता और अल्पसंख्यक समुदाय सपा की झोली में वोट डालेगी ऐसा अखिलेश सरकार को लग रहा होगा।

अखिलेश के इस राजनीतिक षड्यंत्र को सेकुलरिज्म का जामा पहनाकर उसे और अधिक महिमामंडित करने का कुचक्र मीडिया द्वारा चलाया जा रहा है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जारी किए जा रहे विमर्श के कार्यक्रमों में बार-बार बताया जा रहा है कि विश्व हिन्दू परिषद परिक्रमा, सभा और यात्राओं का आयोजन कर प्रदेश में शांति व्यवस्था को बिगाड़ने का काम कर रहा है। विहिप द्वारा चलाए जा रहे श्रीराम जन्मभूमि का आन्दोलन को महज चुनावी मुद्दा बताकर मीडिया द्वारा भारतीय आस्था को अर्थहीन साबित करने का काम शुरू है। यह देश मंदिर नहीं, विकास को महत्वपूर्ण मनाता है, इस बात को जोरशोर से बताना शुरू है। पर मीडिया इस बात को कैसे भूल जाती है कि कुम्भ मेला, चारधाम यात्रा, गणेश उत्सव, दुर्गापूजा, रामायण, भागवत जैसे आयोजन में जनता की सहभागिता दिनोदिन बढ़ती जा रही है। फिर भारतीय आस्था के महानतम केंद्र मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जन्मभूमि मंदिर का निर्माण का मुद्दा भारतीय जनमानस से कैसे दूर हो सकता है? यह सत्य है लोकतन्त्र में सबका विकास आवश्यक है पर आस्था को दरकिनार कर हम आगे नहीं बढ़ सकते, इस बात को हमें समझना होगा।

यह वही मीडिया है जो गणेश उत्सव, दुर्गापूजा, जन्माष्टमी के अवसर पर सुर्खियां बटोरते हैं, कुम्भ मेले के आयोजन का महाकवरेज दिखाकर उसे भारतीय संस्कृति के गौरवमय प्रतीक बताने से नहीं थकते। और यह वही अखिलेश सरकार है जो कुम्भ मेले के अवसर पर विश्वभर के लोगों के स्वागत में विज्ञापन देते नहीं अघाते थे। पर जब शरद पूर्णिमा के अवसर पर हजारों श्रद्धालु सरयू के जल को नमन करने आते हैं, उसपर महज शांति प्रक्रिया को बनाए रखने के प्रशासनिक दिखावे और अपने सेकुलर छवि को चमका कर अल्पसंख्यकों को संतुष्ट करने के लिए बंदी लगाने का खेल खेल रहे हैं।

उल्लखनीय है कि 1519 ई. में भारत पर आक्रमण कर लूटमार करनेवाले बाबर ने भारतीयों पर खूब अत्याचार किए। बाबरनामा के पृष्ठ संख्या 267 से ज्ञात होता है कि उसने काफिरों (हिन्दुओं) के सरों का एक स्तम्भ बनवाया था। ऐसे ही उसने चुनार के दुर्ग पर कब्जा कर हिन्दुओं के सरों का एक मीनार बनवाया। बाबर को न भारतीय जनता से कोई लगाव था और न भारत भूमि से। उसका एकमात्र लगाव था भारत की अपार सम्पत्ति से। इसके लिए उसने मजहबी उन्माद तथा जिहाद की भावना को उभारा था। बाबर के राज में गंगा स्नान पर पाबन्दी थी। उसके राज में मंदिर को तोड़कर उस स्थान पर मस्जिद बनाया गया। श्रीरामजन्मभूमि पर बाबरी मस्जिद उसी का एक उदाहरण है। बाबर ने कभी भी भारत की जनता के प्रति जरा भी उदारता या सहानुभूति नहीं दिखलाई। वह हिन्दुओं को “काफिर” कहकर ही सम्बोधित करता था।  

84 कोसी यात्रा
84 कोसी यात्रा

वर्तमान अखिलेश सरकार की हिन्दू विरोधी नीतियों को देखकर तो ऐसा ही प्रतीत होता है कि उत्तर प्रदेश की जनता कहीं बाबर के शासन के अधीन तो नहीं जी रही! पंचकोसी, चौरासी कोसी परिक्रमा और संकल्प सभा पर रोक लगाकर अखिलेश सरकार ने अपने बाबरीयत नीति को चिन्हित किया है। यहां तक कि मुजफ्फरनगर हिंसा में भी पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाते हुए सपा सरकार द्वारा भाजपा विधायकों को बंदी बनाया गया।

इससे पहले इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अखिलेश यादव सरकार द्वारा आतंकी हमलों में आरोपित लोगों के खिलाफ दायर मुकदमों को वापस लेने की पहल को ही ठप्प कर मुलायम सिंह यादव की ‘मुस्लिम हितैषी राजनीति’ को करारा झटका दिया है।

गौरतलब है कि अखिलेश सरकार ने ”अल्पसंख्यक” शब्द का बहाना न लेकर सीधे लिखित रूप में यह आदेश जारी किया था कि सभी योजनाओं का 20 प्रतिशत केवल मुसलमानों के लिए ही व्यय करें। शायद ही कोई ऐसा राज्य होगा जिसने बजट राशि का निर्धारित प्रतिशत केवल मुसलमानों पर व्यय करने का फैसला किया हो। लेकिन उनके मंत्रिमंडल के एक सदस्य आजम खां इतने से संतुष्ट नहीं हैं। उसने मांग की कि बजट का कम से कम 25 प्रतिशत केवल मुसलमानों के लिए सुनिश्चित किया जाए।

सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक नीतियों में हिन्दू हितों को दरकिनार करनेवाले अखिलेश सरकार रवैये को देखकर लगता है कि बाबर तो गया, पर बाबरीयत अब भी उत्तरप्रदेश में हुकूमत कर रहा है।    

नागपुर 

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