बेहतर स्वास्थ्य के लिए जूझता युवा भारत

surya-namaskarभारतीय जीवन पद्धति में नैतिकता और चरित्र को सर्वोच्च माना गया है ईमानदारी और मेहनत को जीवनमूल्य मनानेवाला हमारा समाज धीरे-धीरे अपने जीवनमूल्यों से दूर होता जा रहा है  यही कारण है कि अपराध बढ़ रहा है और समाज में आपसी विश्वास की डोर दिन-प्रतिदिन कमजोर हो रहा है कमजोर समाज में स्वास्थ्य जीवन की कल्पना कैसे की जा सकती है?

– लखेश्वर चंद्रवंशी

युवाधन से समृद्ध भारत में जहां प्रतिभाओं की कमी नहीं है, वहीँ बेहतर स्वस्थ्य के लिए युवा भारत चिंतित है। बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षा, नौकरी व व्यवसाय में व्याप्त भ्रष्टाचार से युवा समाज त्रस्त है।  अस्थिर रोजगार और बढ़ती हुई आवश्यकताओं के चलते दबाव में जीनेवाले युवाओं में हृदय रोग का खतरा बढ़ गया है।

ऐसे में जीवनशैली व खान-पान की आदतों में बदलाव आज की जरूरत बन गई है। चिकित्सकों का कहना है कि युवाओं को समय रहते ही खानपान को लेकर सावधानी बरतने की आवश्यकता है, वरना अगले 10 वर्षों में देश की आबादी लगभग 20 फीसदी लोगों को हृदय से संबंधित बीमारी से ग्रसित होने की आशंका है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में एक हृदय ही है जिस पर सबसे ज्यादा बोझ पड़ता है। तनाव, थकान, प्रदूषण आदि कई वजहों से खून का आदान-प्रदान करनेवाले इस अति महत्वपूर्ण अंग को अपना काम करने में मुश्किल होती है।

डॉक्टरों की मानें तो युवाओं में हृदयाघात और हृदय संबंधी बीमारियों के बढ़ने का प्रमुख कारण धूम्रपान और मशालेदार एवं तली भुनी चीजों का अधिक मात्रा में सेवन करना है। इससे बचने के लिए रेशायुक्त भोजन करना चाहिए और व्यायाम को नियमित दिनचर्या का अंग बनाना अति आवश्यक है। पहले जहां 30 से 40 वर्ष तक के बीच हृदय की समस्याएं आंकी जाती थीं, आज यह 20 वर्ष से कम उम्र के लोगों में भी होने लगी है। ऐसे में हृदय की समस्याओं से बचने का एक ही उपाय है कि लोग खुद अपनी कुछ सामान्य जांच कराएं और हृदय संबंधी सामान्य समस्याओं को भी गंभीरता से लें।

विशेषज्ञों के अनुसार, अगले पांच से 10 सालों में भारतीय आबादी का करीब 20 प्रतिशत हिस्सा इससे प्रभावित होगा। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की रिपोर्ट के मुताबिक, 2020 तक भारत में मौतों और विकलांगता की सबसे बड़ा वजह हृदय से संबंधित रोग ही होंगे।

हृदय के साथ होनेवाली छेड़छाड़ का ही नतीजा है कि आज विश्वभर में हृदय रोगियों की संख्या बढ़ गई है। एक अनुमान के अनुसार, भारत में 10.2 करोड़ लोग इस बीमारी की चपेट में हैं। पूरी दुनिया में हर साल 1.73 करोड़ लोगों की मौत इस बीमारी की वजह से हो जाती है और यदि हालातों पर काबू नहीं किया गया तो 2020 तक हर तीसरे व्यक्ति की मौत हृदय रोग से होगी।

चिकित्सकों के मुताबिक जीवनशैली व खान-पान में बदलाव लाकर हृदय रोगों से छुटकारा पा सकते हैं। इससे बचने के लिए मसालेदार व अधिक तली भुनी चीजों से परहेज करना चाहिए।
आजकल लोग अधिकतर समय कार्यालय में सिर्फ बैठकर अपना काम करते हैं। इस स्थिति में शरीर निष्क्रिय जीवनशैली का आदी बन जाता है। आज के युवा कार्यालय में तो बैठे-बैठे कॉफी पीते हैं और फिर घर पर भी रात को देर तक टेलीविजन देखकर सुबह देर से जगते हैं और व्यायाम नहीं करते हैं। ऐसे में हृदय रोगों की आहट आना लाजमी है।

चिकित्सकों की मानें तो मधुमेह और हाइपरटेंशन के मरीजों को शुगर तथा रक्तचाप पर नियंत्रण रखना चाहिए। एक सप्ताह में कम से कम पांच दिन व्यायाम जरुरी है। तंबाकू का सेवन नहीं करना चाहिए। वसायुक्त भोजन का सेवन न करें साथ ही ताजे फल एवं सब्जियों का सेवन करना चाहिए। चिकनाई युक्त पदार्थ नहीं खाना चाहिए। चिकित्सक रचनात्मक और मनोरंजनात्मक कायरें में मन लगने की भी सलाह देते हैं।

विशेषज्ञ मानते हैं कि तनाव के कारण मस्तिष्क से जो रसायन स्रावित होते हैं वे हृदय की पूरी प्रणाली को खराब कर देते हैं। तनाव से उबरने के लिए योग का भी सहारा लिया जा सकता है। हृदय हमारे शरीर का ऐसा अंग है जो लगातार पंप करता है और पूरे शरीर में रक्त प्रवाह को संचालित करता है। प्रतिदिन कम से कम आधे घंटे तक व्यायाम करना हृदय के लिए अच्छा होता है।

उल्लेखनीय है कि भारतीय जीवन पद्धति में नैतिकता और चरित्र को सर्वोच्च माना गया है। ईमानदारी और मेहनत को जीवनमूल्य मनानेवाला हमारा समाज धीरे-धीरे अपने जीवनमूल्यों से दूर होता जा रहा है।  यही कारण है कि अपराध बढ़ रहा है और समाज में आपसी विश्वास की डोर दिन-प्रतिदिन कमजोर हो रहा है। कमजोर समाज में स्वास्थ्य जीवन की कल्पना कैसे की जा सकती है? स्वामी विवेकानन्द ने त्याग और सेवा को भारत का राष्ट्रीय आदर्श कहा था।  इन आदर्शों की अवहेलना कर समाज समृद्ध और तनाव मुक्त कैसे हो सकता है?

अनुसन्धान बताते हैं कि अपने स्वार्थ सिद्धि के चलते मनुष्य ने प्रकृति का शोषण किया है। सब्जियां, फल, अनाज, वायु यहां तक कि जल को भी प्रदूषित करने में मनुष्य आगे रहा। पाश्चात्य संस्कृति से अविवेकपूर्ण जीवन पद्धति को अंगीकार करने से स्वस्थ्य सम्बंधी शिकायतें बढ़ गई है। आज बहुतायत युवा सुबह जल्दी नहीं उठते। कई लोग तो दोपहर 12 बजे के बाद सो कर उठते हैं। फिर उत्साहयुक्त वातावरण कैसे बन सकेगा?

इस तनावयुक्त जीवन को उत्साहवर्धक बनाने के लिए प्रतिदिन प्रात: जल्दी उठकर, योग-प्राणायाम, सूर्यनमस्कार और प्रतिदिन सदसाहित्यों का परिवार में स्वाध्याय करने, और दिन में एक बार सामूहिक भोजन करने का संकल्प लेना चाहिए।  इसी से परिवार में स्वस्थ वातावरण का निर्माण हो सकता है।  अच्छे विचारों से ही आदर्श समाज की रचना होती है। अतः अपराधमुक्त, स्वास्थ्य समाज बनाने के लिए उत्तम दिनचर्या और उपयुक्त आहार की आवश्यकता है।

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