महिला उत्पीड़न समस्या के समाधान की खोज में : एक चिंतन

महिला उत्पीड़न
महिला उत्पीड़न

हमारे बुद्धिजीवियों ने देश के विकास के लिए बहुत सी योजनाएं तो बनाईं, परंतु नारी की ओर देखने की पुरुष की दृष्टि पर कभी चिन्तन नहीं किया। यही कारण है कि आज के फिल्मों के गीत, कहानी और व्यवसाय जगत में भारत की नारी की अस्मिता की बोली लगाई जाने लगी है। ऐसी विडंबनाओं के चलते अब नारी को पवित्रता की दृष्टि से देखनेवाला समाज का निर्माण कैसे होगा?

– लखेश्वर चंद्रवंशी

हाल ही में तहलका पत्रिका के संस्थापक और मुख्य सम्पादक तरुण तेजपाल पर, बेटी की उम्र की सहयोगी महिला पत्रकार ने उत्पीड़न का आरोप लगाया है। इस खबर के फैलाते ही चारों तरफ महिलाओं की सुरक्षा को लेकर गहन मंथन का कार्यक्रम चल पड़ा है। कोई भारतीय परम्परा को ही दोषी बता रहा है, तो कोई कानून व्यवस्था पर ऊँगली उठा रहा है; कोई पुरुषों की मानसिकता को जिम्मेदार ठहरा रहा है तो कोई नारी की कमजोरी को इसके लिए दोषी मान रहा है। नारी अस्मिता की रक्षा पर चिंतन करने के बजाय दोष किसका, इसपर मंथन चल रहा है। यह चिंताजनक बात है। ऐसे में भारतीय समाज में महिला विषयक दृष्टिकोण पर विचार करना होगा।

हम जानते हैं कि हमारे देश में, प्रत्येक परिवार में माँ का सर्वोच्च स्थान होता है। प्राचीन काल से ही मातृशक्ति का विशेष महत्व रहा है। पुराणों में माँ को प्रथम गुरु की संज्ञा दी गई है। हमारी संस्कृति में मनुष्य के पोषण में सहयोग प्रदान करनेवाली प्रत्येक तत्व को “माँ” की उपाधि दी गई है। यही कारण है कि आज भी हम नदी, भूमि, गाय और वनों को माँ कहकर उसकी पूजा करते हैं। नारी जननी होती है, वह बालक का पोषण करती है; इसलिए वह सदा वन्दनीय है। भारतीय परम्परा में यही नारी विषयक दृष्टिकोण रहा है, जो हर काल में आदर्श है। लेकिन आज देश के विभिन्न स्थानों पर आए दिन महिला उत्पीड़न की घटनाओं की खबर सुनाई देती है। जिसके कारण भारतीय विचारों के विरोधियों को हमारी संस्कृति और परम्परा का मखौल उड़ाने का मौका मिल जाता है। और हम समझने लगते हैं कि हमारे देश में सदैव ही महिलाओं की उपेक्षा की जाती है।

यह सच है कि इतिहास में महिलाओं की शिक्षा सम्बंधी पुख्ता तथ्य हमारे समक्ष नहीं है। साथ ही यह भी सत्य है कि इतिहास के बहुत से स्वर्णिम अध्याय को हमसे दूर रखा गया, या फिर देश की जनता ने कभी इस सम्बन्ध में जानकारी इकठ्ठा करने की कोशिश नहीं की। इसके बावजूद भी नारी के प्रति भारतीय दृष्टिकोण सकारात्मक और विकासोन्मुख ही रहा है। महात्मा जोतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले, रमाबाई रानडे, स्वामी दयानन्द सरस्वती, महर्षि कर्वे, स्वामी विवेकानन्द, भगिनी निवेदिता, महात्मा गांधी आदि महात्माओं ने नारी उत्थान के लिए उनकी शिक्षा को महत्वपूर्ण माना। शिक्षा को मौलिक अधिकार व आधार बतानेवाले इन महात्माओं ने ऐसा कभी नहीं सोचा होगा कि भविष्य में नारी को उत्पीड़न का शिकार होना पड़ेगा। शिक्षित समाज आज सामाजिक अपराधों से ग्रस्त है। इसलिए हम कह सकते हैं कि शिक्षा के मानक अपने मूल उद्देश्य से भटक गया है। शिक्षार्जन से प्राप्त प्रतिभा का उपयोग समाज हित में करने के बजाय स्वार्थ साधना के लिए किया जा रहा है, जिसकी कोई मर्यादा नहीं दिखती।

शिक्षार्जन के बदलते मानक

शिक्षा का मुख्य उद्देश्य ‘विद्यार्जन’ है। विद्या के बल पर जीवन की समस्त कठिनाइयों को पार कर अपने लक्ष्य की प्राप्ति का भाव इसमें निहित है।

श्रीविष्णुपुराण में कहा गया है कि – सा विद्या या विमुक्तये अर्थात वह जो (अज्ञान से) मुक्ति प्रदान करे वह विद्या है। नारी शिक्षा के सन्दर्भ में भी यही संकल्पना रही है। परन्तु आज शिक्षार्जन के मायने बदल गए हैं। शिक्षा का उद्देश्य ज्ञानार्जन के बदले अर्थार्जन हो गया है। अधिकाधिक धन संग्रहित करनेवाला मनुष्य ही अधिक सुखी हो सकता है। इस सोच ने जीवन के प्रति मनुष्य का दृष्टिकोण बदल दिया। भौतिक सुख-सुविधाओं को प्राप्त करने की होड़ सी मच गई है। इसके लिए भ्रष्टाचार, दुराचार, व्याभिचार चाहे जो करना पड़े, मनुष्य तैयार है। यही कारण है कि समाज में नैतिकता का पतन हो रहा है।

महिलाओं के सन्दर्भ में देखा जाए तो हमारे देश की युवतियां शिक्षा के क्षेत्र में दिन प्रतिदिन विकास कर रहीं हैं। आज विद्यालय और महाविद्यालयों में सबसे ज्यादा महिलाएं शिक्षक की भूमिका में हैं। यहीं नहीं तो अभियांत्रिकी, वैद्यकीय और विज्ञान के क्षेत्र में भी महिलाओं की सहभागिता बढ़ी है, जो बहुत ही प्रशंसनीय है। वहीँ दूसरी ओर नौकरी के नाम पर महिलाओं का शोषण का प्रमाण भी बढ़ा है। नौकरी सम्बंधी नारी उत्पीड़न की घटनाओं में अधिकतर जहां महिलाओं की बढ़ती हुई अर्थार्जन की आकांक्षा को जिम्मेदार होती हैं, वहीँ दूसरी ओर कामुक पुरुषों द्वारा महिलाओं को इस पाप कर्म के लिए मज़बूर किया जाता है। दोनों ही स्थितियों में नारी की ही हार होती है। तो फिर स्त्री अस्मिता की रक्षा कैसे हो?

दूसरी ओर हमारे समाज में रेव पार्टियों का चलन बढ़ रहा है, जहां आचरण में किसी प्रकार की सामान्य बंदिशों या बंधनों की कोई गुंजाइश नहीं है। होटलों, फार्म हाउसों, म्युजिक सेंटरों, बारों…से लेकर अब तो नामी विवाह भवनों और यहां तक कि धीरे-धीरे कुछ घरों में जहां बड़े परिवार नहीं हैं; ऐसी स्वच्छंद पार्टियों का चलन हो गया है। पिछले वर्ष बंगलुरु, हैदराबाद, नागपुर, मुम्बई जैसे नगरों में पुलिसिया छापे में, नशे में धुत सैंकड़ों युवक-युवतियों को रेव पार्टियों में आपत्तिजनक स्थिति में पकड़ा गया। आज हर छोटे-बड़े नगरों, महानगरों और कसबों में आधी रात ऐसे लोग मिल जाएंगे जिसे पुलिस भी हाथ लगाना उचित नहीं मानती और उसकी सलाह यह होती है कि आप उधर की बजाय दूसरे रास्तों से जाइए, क्योंकि पता नहीं कौन कोकिन, एलसीडी के नशे में आपके साथ क्या कर दे। उन्मुक्तताओं का यह चलन पुरानी मान्यताओं, कानून और सामाजिक बंदिशों को ध्वंस करने के लिए आतुर है। इस भयावह उन्मुक्तता को रोकने में कानून की भी अपनी सीमाएं हैं, फिर उपाय क्या ?

नारी समाज की अस्मिता

हमारी संस्कृति के अनुसार नारी परिवार व समाज की अस्मिता है। इसलिए हमारे पूर्वजों ने उसे संभालकर रखने तथा उसके संरक्षण के लिए कुछ विशेष नियम भी बताए। इन नियमों के अंतर्गत संध्याकाल में परिवार के सभी लोग मिलकर संध्या आरती करें, साथ में भोजन तथा कुछ जीवन मूल्यपरक कुछ बातें हों आदि। परंतु हमारे समृद्ध व प्रबुद्ध समाज ने स्वच्छंदता के नाम पर इन नियमों की धज्जियां उड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ीं। विशेषकर पढ़े-लिखे लोग जो नारी सशक्तिकरण और नारी स्वतंत्रता का ढोल पीटते हैं, ने स्वतंत्रता के नाम पर भारत की अस्मिता नारी शक्ति को सरेआम तमाशा और मनोरंजन का साधना बना दिया। मॉडलिंग, एक्टिंग और डांसिंग के नाम पर नारी अस्मिता को सरेआम बेचा जाने लगा। प्रदर्शन के नाम पर लोकलुभावन बनने की होड़ लग गई और मशहूर होने के भ्रामक चाह ने नारी की तरफ देखने की पुरुषों की दृष्टि को कामुक बना दिया। हमारे बुद्धिजीवियों ने देश के विकास के लिए बहुत सी योजनाएं तो बनाईं, परंतु नारी की ओर देखने की पुरुष की दृष्टि पर कभी चिन्तन नहीं किया। यही कारण है कि आज के फिल्मों के गीत, कहानी और व्यवसाय जगत में भारत की नारी की अस्मिता की बोली लगाई जाने लगी है। ऐसी विडंबनाओं के चलते अब नारी को पवित्रता की दृष्टि से देखनेवाला समाज का निर्माण कैसे होगा?

क्या नारी कोई मॉडल है, मनोरंजन का साधन है या फिर संस्कारों को पोषित करनेवाली संवर्धिनी? मूल्यांकन तो स्वत: नारी को ही करना होगा।

वर्तमान में भारत में नारी उत्थान की अवधारणा की उल्टी धारा बह रही है। नारी-पुरुष के बीच में तुलना करते हुए पुरुष के समान उसके अधिकारों की बातें की जाती हैं। परंतु स्त्री को राजनीति, नौकरी और उद्योग जगत में अधिकार मिल जानेभर से क्या नारी जाति का उत्थान हो जाएगा? नारी उत्थान का मापदण्ड आखिर क्या होना चाहिए? इस पर तो नारी समाज को स्वयं ही सोचना होगा। देश की राजनीति, समाजनीति, अर्थनीति, न्याय व्यवस्था आदि सभी क्षेत्रों में उसकी सहभागिता बढ़े, इसके लिए आवश्यक शिक्षा की व्यवस्था सुलभता से हो; यह सर्वथा उचित है। ऐसा होना भी चाहिए क्योंकि उसकी शिक्षा पर परिवार व समाज का हित है। वास्तव में भारत में जो कुछ संस्कार बचे हैं उसमें सबसे बड़ा योगदान तो नारी का ही है।

यदि पुरुषों की तरह सभी नारी धूम्रपान या शराब पीने लगे, तो समाज का क्या होगा? फिर तो पूरे समाज से नैतिकता के सारे आदर्श ही समाप्त हो जाएंगे। यह स्त्री ही है, जिसके कारण समाज में जीवन मूल्य तथा संस्कारों के बीज सुरक्षित हैं। इन जीवन मूल्यों व संस्कारों की वजह से भारत का सारा जग सम्मान करता है। नारी जब संस्कारों का संवर्धन करने में अग्रसर है, तो निश्चय ही उसका स्थान सर्वोपरि है। इसलिए नारी जाति का गौरव अपने-आप में अधिक है।

लेकिन संस्कारों की रक्षा व संवर्धन पर गौरवान्वित होने के बजाय केवल सुंदर दिखने के क्षणिक सुख और तथाकथित पुरस्कारों पर आज नारी समाज गर्व करता है। एक समय था जब नारी सीता, सावित्री और दमयन्ती को अपना आदर्श मानती थीं। अब वे आदर्श बदल गए हैं। ज्ञान, गुण और चरित्र से तीनों देवताओं को बालक बनाकर रखनेवाली अहिल्या नारी ही थी, रावण जैसे महादानव को पतिव्रता के व्रत से परास्त करनेवाली सीता भी नारी ही थी, अंग्रेजों के खिलाफ दुर्गा की तरह रणक्षेत्र में लड़नेवाली लक्ष्मीबाई नारी ही थी। फिर इन महान आदर्शों की अवहेलना क्यों? क्यों कोई युवक किसी युवती को फुसलाकर उसका शील हरण करता है? क्यों कोई नारी राजनीति के शातिर नेताओं के जाल में फंस जाती है? क्यों कोई नारी टीवी के रीयालिटी शो के अधीन हो जाती है? यह सारे सवाल नारी समाज द्वारा स्वयं से पूछा जाना चाहिए।

समन्वयात्मक दृष्टिकोण की आवश्यकता

हमारे देश में तो शिव-शक्ति के संयुक्त रूप जिसे अर्धनारीनटेश्वर कहते हैं, की पूजा होती है। जब शिव-शक्ति ने अपने जीवन में समन्वय का इतना बड़ा आदर्श हमारे सामने प्रस्तुत किया है तो फिर हम दोनों में परस्पर तुलना क्यों करते हैं?  स्त्री यदि शक्ति है तो पुरुष भी शिव है। दोनों का ही अपना महत्व है। आवश्यकता है कि पुरुष व नारी, दोनों के द्वारा अपनी-अपनी पवित्रता का जतन करते हुए एक-दूसरे के सम्मान की रक्षा करनी होगी। जबतक इस समन्वयात्मक दृष्टिकोण का विकास नहीं होगा तब तक ऐसे अपराधों का दौर समाप्त नहीं होगा। साथ ही युवतियों को भी अपनी सुरक्षा के लिए आवश्यक युद्ध के तरीके, कराटे, तायकोंडो, बॉक्सिंग आदि तो सीखना ही चाहिए ताकि कामांधों के पाप का ठीक से प्रत्युत्तर दे सके। परंतु सबसे ज्यादा जरुरी है स्त्री-पुरुष के बीच व्याप्त मतभेद को मिटाना, और ऐसे समाज की रचना करना जहां पवित्रता का पोषण हो, जहां शक्ति का सम्मान हो।

नागपुर

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