संसार को विनाश से बचा सकता है यह सन्देश

स्वामी विवेकानन्द
स्वामी विवेकानन्द

(11 सितम्बर, विश्वबंधुत्व/ हिन्दू दिग्विजय दिन पर विशेष)

यदि कोई ऐसा स्वप्न देखे कि अन्यान्य सारे धर्म नष्ट हो जाएंगे और केवल उसका धर्म ही जीवित रहेगा, तो उसपर मैं अपने हृदय के अन्त: स्थल दया करता हूं और उसे स्पष्ट बता देता हूं कि शीघ्र ही सारे प्रतिरोधों के बावजूद,प्रत्येक धर्म की पताका पर यह स्वर्णअक्षरों में लिखा होगा- युद्ध नहीं,सहायता’, ‘विनाश नहीं, सृजन’, ‘कलह नहीं, शांतिऔरमतभेद नहीं, मिलन!

– लखेश्वर चंद्रवंशी ‘लखेश’

अपने ओजस्वी वाणी से भारत की महिमा को विश्वपटल पर आलोकित करनेवाले स्वामी विवेकानन्द का सन्देश समूची मानवता की अनमोल धरोहर है। दुनियाभर के महान ज्ञानी, विज्ञानी, चिंतकों, कलाकारों और विशेषकर युवाओं के हृदय को स्वामीजी के शक्तिदायी विचार आंदोलित करते रहे हैं। फिर भी आज भारत सहित विश्व के बहुसंख्यक लोग स्वामीजी के संदेशों से अवगत नहीं हैं। अमेरिकी लेखिका एलिनोर स्टार्क अपने पुस्तक “The Gift Unopened : A new American Revolution” में लिखती हैं कि क्रिस्टोफर कोलम्बस ने अमेरिका की भूमि का आविष्कार किया, परन्तु स्वामी विवेकानन्द ने अमेरिका की आत्मा का आविष्कार किया।’’

लेखिका के अनुसार, स्वामी विवेकानन्द की सबसे बड़ी देन वेदान्त है, जो अमेरिकनों की अपूर्णता को दूर कर देगा। परन्तु दुर्भाग्य यह है कि वह ‘Gift’ (भेंट) अब भी‘Unopened’ (अनखुली) ही रह गई। यह अनमोल ‘Gift’ क्या है ?इस बात पर सम्पूर्ण विश्व को विचार करना होगा, विशेषतः भारत को। शिकागो में हुए विश्वधर्म सम्मलेनमें स्वामीजी द्वारा दिए गए सन्देश को सही परिप्रेक्ष्य में समझकर उसे जनमानस तक पहुंचना होगा।

स्वामी विवेकानन्द का वह भाषण भारत का सम्मान बढ़ाया

अंग्रेजों के अधीन दुखी, आत्मग्लानि से भरे भारतीयों के हृदय में आत्मगौरव को पुनः प्रतिष्ठित करनेवाला स्वामी विवेकानन्द का वह भाषण आज भी संसार में अपनी विशेषताओं के लिए चर्चित है। यह छोटा सा भाषण 11 सितंबर, 1893 को अमेरिका के शिकागो में विश्व धर्म सम्मेलन के पहले दिन हुआ था। स्वामी विवेकानन्द का जब कभी उल्लेख होता है तब इस भाषण की चर्चा अवश्य्होती है।

स्वामी विवेकानन्द का भाषण

अमेरिका के बहनों और भाइयों…

आपके इस स्नेहपूर्ण और जोरदार स्वागत से मेरा हृदय अपार हर्ष से भर गया है। मैं आपको दुनिया की सबसे प्राचीन संत परंपरा की तरफ से धन्यवाद देता हूं। मैं आपको सभी धर्मों की जननी की तरफ से धन्यवाद देता हूं और सभी जाति, संप्रदाय के लाखों, करोड़ों हिन्दुओं की तरफ से आपका आभार व्यक्त करता हूं। मेरा धन्यवाद कुछ उन वक्ताओं को भी है जिन्होंने इस मंच से यह कहा कि दुनिया में सहनशीलता का विचार सुदूर पूरब के देशों से फैला है।

मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूं, जिसने दुनिया को सहनशीलता और सार्वभौमिक स्वीकृति का पाठ पढ़ाया है। हम सिर्फ सार्वभौमिक सहनशीलता में ही विश्वास नहीं रखते, बल्कि हम विश्व के सभी धर्मों को सत्य के रूप में स्वीकार करते हैं। मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे देश से हूं, जिसने इस धरती के सभी देशों और धर्मों के परेशान और सताए गए लोगों को शरण दी है। मुझे यह बताते हुए गर्व हो रहा है कि हमने अपने हृदय में उन इजराइलियों की पवित्र स्मृतियां संजोकर रखी हैं, जिनके धर्म स्थलों को रोमन हमलावरों ने तोड़-तोड़कर खंडहर बना दिया था और तब उन्होंने दक्षिण भारत में शरण ली थी। मुझे इस बात का गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूं, जिसने महान पारसी धर्म के लोगों को शरण दी और अभी भी उन्हें पाल-पोस रहा है।

भाइयों,

मैं आपको एक श्लोक की कुछ पंक्तियां सुनाना चाहूंगा जिसे मैंने बचपन से स्मरण किया और दोहराया है और जो रोज करोड़ों लोगों द्वारा हर दिन दोहराया जाता है; जिस तरह अलग-अलग स्रोतों से निकली विभिन्न नदियां अंत में समुद्र में जाकर मिलती हैं, उसी तरह मनुष्य अपनी इच्छा के अनुरूप अलग-अलग मार्ग चुनता है। वे देखने में भले ही सीधे या टेढ़े-मेढ़े लगें, पर सभी भगवान तक ही जाते हैं। वर्तमान सम्मेलन जो कि आज तक की सबसे पवित्र सभाओं में से है, गीता में बताए गए इस सिद्धांत का प्रमाण है जो भी मुझ तक आता अहि, चाहे वह कैसा भी हो, मैं उस तक पहुंचता हूं। लोग चाहे कोई भी रास्ता चुनें, आखिर में मुझ तक ही पहुंचते हैं।

सांप्रदायिकता, कट्टरता और इसके भयानक वंशज हठधमिर्ता लंबे समय से पृथ्वी को अपने शिकंजों में जकड़े हुए हैं। इन्होंने पृथ्वी को हिंसा से भर दिया है। कितनी बार ही यह धरती खून से लाल हुई है। कितनी ही सभ्यताओं का विनाश हुआ है और न जाने कितने देश नष्ट हुए हैं। अगर ये भयानक राक्षस नहीं होते तो आज मानव समाज कहीं ज्यादा उन्नत होता, लेकिन अब उनका समय पूरा हो चुका है। मुझे पूरी उम्मीद है कि आज इस सम्मेलन का शंखनाद सभी हठधर्मिताओं, हर तरह के क्लेश, चाहे वे तलवार से हों या कलम से और सभी मनुष्यों के बीच की दुर्भावनाओं का विनाश करेगा।

स्वामीजी के इस सन्देश का मर्म

विश्वधर्म महासभा में स्वामी विवेकानन्द द्वारा दिए गए विश्वबंधुत्व के सन्देश का जिस प्रकार विश्व ने स्वागत किया, उससे यह स्पष्ट हो गया कि आवश्यकता है और इसलिए भारत को अपने दायित्व के प्रति सचेत होना होगा। कोलंबस के अमेरिका की खोज की 400वीं शताब्दी मनाने के उपलक्ष्य में विश्वधर्म महासभा का आयोजन किया गया था। इस धर्म महासभा के आयोजन का मूल उद्देश्य केवल ईसाई धर्म का वर्चस्व सिद्ध करना था। इस प्रकार की निषेधक (Exclusive) एवं दुराग्रही विचारधारा केवल स्वयं के मत को सही सत्य मानती है। ऐसी धारणा बनने पर दूसरे मतों के प्रति द्वेष निर्माण होता है। इसी हठधर्मिता के कारण ही उसके अनुयायी जोर-जबरदस्ती से मतांतरण में लग जाते हैं। केवल हमारा ही मत सर्वश्रेष्ठ है बाकी सब गलत’, ईसाई और मुस्लिमों की ऐसी कट्टरता ही मानव इतिहास में रक्तपात और हत्याआं के लिए कारणीभूत है, इस बात से स्वामी विवेकानन्द अवगत थे।

अमेरिका निवासी बहनों तथा भाइयों”, – स्वामी विवेकानन्द के प्रसिद्ध एवं प्रथम उदबोधन का यह प्रथम वाक्य, जिसने वहां के श्रोताओं के हृदय में मानों एक अदभुत विद्युत तरंगों को प्रवाहित कर दिया। यह केवल उद्बोधन की मात्र एक शैली नहीं थी,अपितु स्वामीजी के उन शब्दों में भारत की महान आध्यात्मिक शक्तियां ही मुखरित हुर्इं। यही कारण है कि भारत में 5000 वर्षों के इतिहास से भी कहीं अधिक समय से विश्वबंधुत्व को अंगीकृत कर, उसका जतन भी किया। इसी कारण स्वामी विवेकानन्दजी कहते हैं मुझे ऐसे देश का धर्मावलम्बी होने का गौरव है, जिसने संसार को सहिष्णुतातथा सभी धर्मों को मान्यता प्रदानकरने की शिक्षा दी है। मुझे एक ऐसे देश का व्यक्ति होने का अभिमान है, जिसने इस पृथ्वी की समस्त पीड़ित और शरणागत जातियों तथा विभिन्न धर्मों के बहिष्कृत मतावलम्बियों को आश्रय दिया है।

हिंदुओं की इसी वैश्विक विचारधारा के कारण, जिस ईश्वर की मैं पूजा करता हूं, ‘केवल वही एकमात्र ईश्वर हैऐसा उन्होंने कभी नहीं कहा, अपितु वे कहते हैं कि विश्व में केवल ईश्वरही है। वही एक ईश्वर अनेक रूपों में प्रगट हुआ है।

इसलिए हमारा ही ईश्वर सत्य है और दूसरों का ईश्वर झूठ है, ऐसा हम नहीं कहते। हम अन्यों के देवताओं को भी ईश्वर कहते हैं। यह हमारा सर्वसमावेशक चिंतन है। कट्टर विचारधारा कहती है- केवल यही’, सर्वसमावेशक चिंतन कहता है – यह भी। सर्वसमावेशक चिंतन के कारण हिंदुओं ने दूसरों की मान्यताओं को नष्ट करने का प्रयास कभी नहीं किया। विश्वबंधुत्व की स्थापना के लिए सभी मान्यताओं व मताबलम्बियों द्वारा इस यह भीको स्वीकार करना आवश्यक है। सृष्टि के प्रति एकात्मभाव से जुड़ने की वजह से ही हिन्दू इस यह भीको मनाता है। सृष्टि को उस एककी ही अभिव्यक्ति मानकर हिन्दू सबका आदर करते हैं, उसे स्वीकार करते हैं और इसलिए उनके द्वारा अनेकता का भी आदर होता है। इसी कारण मनुष्यात्मा पापी नहीं, अपितु अमर्त्य है, पूर्ण है। यही भारत का संदेश है जो उसे विश्व को देना है।

अमेरिका का वह श्रोता समाज जो केवल हठधर्मिता का दावा ही सुनते आया था,उन्होंने प्रथमतः स्वामी विवेकानन्द के द्वारा धार्मिक एकता का संदेश सुना। विश्व धर्म सम्मलेन के अंतिम दिनों में स्वामी विवेकानन्द ने धार्मिक कट्टरवादियों तो चेतावनी देते हुए कहा था- ‘…किन्तु, यदि यहां कोई यह आशा कर रहा कि यह एकता किसी एक धर्म की विजय और बाकी सब धर्मों के विनाश से सिद्ध होगी, तो उनसे मेरा कहना है किभाई, तुम्हारी यह आशा असंभव है।’ …इस सर्वधर्म महासभा ने जगत के समक्ष यदि कुछ प्रदर्शित किया है, तो वह यह है कि – शुद्धता, पवित्रता और दयाशीलता किसी सम्प्रदाय विशेष की एकान्तिक सम्पत्ति नहीं है, एवं प्रत्येक धर्म ने श्रेष्ठ एवं अतिशय उन्नत-चरित्र के स्त्री-पुरुषों को जन्म दिया है। अब इन प्रत्यक्ष प्रमाणों के बावजूद भी यदि कोई ऐसा स्वप्न देखे कि अन्यान्य सारे धर्म नष्ट हो जाएंगे और केवल उसका धर्म ही जीवित रहेगा, तो उसपर मैं अपने हृदय के अन्त: स्थल दया करता हूं और उसे स्पष्ट बता देता हूं कि शीघ्र ही सारे प्रतिरोधों के बावजूद, प्रत्येक धर्म की पताका पर यह स्वर्णअक्षरों में लिखा होगा- युद्ध नहीं, सहायता’, ‘विनाश नहीं,सृजन’, ‘कलह नहीं, शांतिऔर मतभेद नहीं, मिलन!

पहली बार स्वामी विवेकानन्द के रूप में पश्चिमात्य श्रोता समाज ने विश्वबंधुत्व का संदेश उचित समय पर सही परिप्रेक्ष्य में समझा। इस सन्देश की अनदेखी से दो बार विश्वयुद्ध हो गया। आज भी विश्व के अनेक देशों में साम्प्रदायिक तनाव, व्यापारिक स्वार्थ सिद्धि के लिए बैरभाव और अपनी भूमि विस्तार के लिए अन्य देशों की जमीन पर अधिकार ज़माने की दुष्ट प्रवृत्तियों ने जन्म लिया है। इस प्रवृत्ति ने आतंकवाद, धर्मांतरण, लव जिहाद और विस्तारवाद को जन्म दिया है। केवल बाहरी दिखावेवाली एकता द्वारा विश्व बंधुत्व के सूत्र में नहीं बंध सकता, इसके लिए दुनिया के तमाम देशों को अन्य देशों और समुदायों के हितों, अधिकारों और भावना का सम्मान बड़ी आत्मीयता से होगा। बनावटी एकता मानवीय मूल्यों को नष्ट करती है। किन्तु एकात्मता विविध समुदायों की विशेषताओं को बनाए रखते हुए बंधुत्व के सूत्र में बांधती है। इसलिए इस दिन का संदेश उनके लिए भी है जो हठधर्मी है और मतांतरण के माध्यम से विविध जनजाति समुदायों की मान्यताओं और संस्कृति को करते हैं।

अपने दर्शनों और सर्वसमावेशक दृष्टि के कारण ही नियति ने भारत को बंधुत्व स्थापित करने के लिए चुना है। परंतु इस दायित्व को निभाने के लिए उन्हें इस धार्मिक एकात्मभाव को समझना होगा। स्वामी विवेकानन्द ने विश्व धर्म महासभा के माध्यम से हमें हिन्दू धर्म का यही एकात्मभाव का सन्देश दिया है।

स्वामी विवेकानन्द के अधरों से जो शब्द उच्चरित हुए वे केवल उनके स्वयं के अनुभवजनीत नहीं थे, न उन्होंने अपने गुरुदेव की कथा सुनाने के निमित्त ही इस अवसर का उपयोग किया। इन दोनों के स्थान पर भारत की धार्मिक चेतना सम्पूर्ण अतीत द्वारा निर्धारित उनके समग्र देशवासियों का संदेश ही उनके माध्यम से मुखर हुआ था। अतः इस विश्वबंधुत्व दिन के उपलक्ष्य में हमें विश्वधर्म महासभा में स्वामी विवेकानन्दजी द्वारा दिए गए संदेश का स्वाध्याय करना चाहिए। केवल प्रथम दिवस के विश्व प्रसिद्ध व्याख्यान का ही नहीं अपितु हिन्दू धर्म पर निबंधका भी अध्ययन आवश्यक है, और उसके अनुसार कार्य करने में ही इस दिन के स्मरण की सार्थकता है।

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‘नमामि गंगे’ अतीत, वर्तमान और सरकारी योजनाएं

गंगा मैया
गंगा मैया

गंगा की दुर्दशा के लिए गंगा को प्रदूषित करनेवाले जितने जिम्मेदार हैं,उससे कहीं ज्यादा वे लोग भी जिम्मेदार हैं जिनपर गंगा को प्रदूषण मुक्त करने का दायित्व दिया गया था। यदि अधिकारी, मंत्री और कर्मचारी सही तरीके से ईमानदारी से अपना दायित्व पूर्ण करते, तो आज गंगा को प्रदुषण मुक्त बनाया जा सकता था। आज आवश्यकता है कि गंगा की निर्मलता के लिए चलाए जानेवाले अभियानों को केवल चर्चा और विवाद का मुद्दा न बनाया जाए, वरन इस मिशन को गंगापुत्र होने के नाते सरकार, समाज और देशवासियों को अंगीकृत करना होगा।

– लखेश्वर चंद्रवंशी लखेश

गंगाभारत की पहचान है। संसार के करोड़ों लोग गंगा के दर्शन के लिए भारत आते हैं। प्रत्येक भारतवासी के मन में गंगा के प्रति अदभुत आस्था है, इसकी अनुभूति आप किसी भी भारतीय से सहजता से प्राप्त कर सकेंगे। गंगा को मैयाकहकर उसे मोक्षदायिनी के रूप में प्रतिदिन स्मरण करनेवाला हमारा समाज जीवन में कम से कम एक बार गंगा के तट पर जाकर उसके दर्शन की अभिलाषा लिए जीता है। इतना ही नहीं तो मृत्यु पूर्व गंगा जल का पान करने की कामना प्रत्येक के मन में होती है। आखिर कौन-सी शक्ति है गंगा में, जिसने अनंत काल से सबके हृदय को आस्था और विश्वास से ओतप्रोत कर रखा है?

गंगा का उदगम

भागीरथी और अलकनंदा
भागीरथी और अलकनंदा

हिमालय पर्वत की दक्षिण श्रेणियां गंगा का उदगम स्थल है। प्रवाह के प्रारंभिक चरण में दो नदियां अलकनन्दा व भागीरथी प्रवाहित होती हैं। भागीरथी गोमुख स्थान से 25 किमी स्थित गंगोत्री हिमनद से निकलती है। भागीरथी व अलकनन्दा देव प्रयाग में संगम करती है, और यहीं से वह गंगा के रूप में पहचानी जाती है। उल्लेखनीय है कि चार धामों में गंगा के कई रूप और नाम हैं। गंगोत्री में गंगा को भागीरथी के नाम से जाना जाता है,केदारनाथ में मंदाकिनी और बद्रीनाथ में अलकनन्दा। भारत के विशाल मैदानी क्षेत्रों से होकर बहती हुई गंगा बंगाल की खाड़ी में बहुत सी शाखाओं में विभाजित होकर मिलती है। इनमें से एक शाखा का नाम हुगली नदी भी है जो कोलकाता के पास बहती है,दूसरी शाखा पद्मा नदी बांग्लादेश में प्रवेश करती है। इस नदी की पूरी लंबाई लगभग 2507 किलोमीटर है।

गंगा का सदियों पुराना धार्मिक पहलू है जो करोड़ों भारतीयों की आस्था के मूल में विद्यमान है। हिन्दू मान्यता के अनुसार, यह पवित्र नदी भगवान शंकर की जटाओं से निकली है और इसे स्वर्ग से धरती पर लाने के लिए राजा भागीरथ ने कठोर तप किया था। इसमें स्नान करने से जीवन पवित्र होता है तथा अस्थियां विसर्जित करने से मोक्ष मिलता है। पूरी दुनिया में शायद ही कोई ऐसी नदी होगी जिसके सन्दर्भ में जनमानस तथा धर्मग्रंथों में इस प्रकार की मान्यताएं तथा विश्वास निहित हों। गंगा स्नान के लिए विशेष तिथियां तथा कुम्भ मेला जैसे महान पर्व के साथ ही स्थान तथा शुभ मुहर्त भी निर्धारित हैं। इसी आस्था के कारण आज भी लाखों तीर्थ यात्री और विदेशी नागरिक इस पवित्र नदी पर स्नान करने के लिए, बिन बुलाए आते हैं और सारे प्रदूषण के बावजूद स्नान करते हैं। तांबा/पीतल के पात्र में पवित्र जल, अपने-अपने घर ले जाते हैं और पूजा-पाठ में उसका उपयोग करते हैं। यह आस्था, गंगा में लाखों लोगों के स्नान तथा अस्थियों के विसर्जन के बाद भी कम नहीं होती।

आज भी करोड़ों भारतीयों के मन में यह विश्वास है कि गंगाजल में कीटाणु नहीं पनपते और वह सालों साल खराब नहीं होता, और यह सत्य भी है। इसी क्रम में भूवैज्ञानिकों की मान्यता है कि गंगा का जल कभी खराब नहीं होने की विलक्षण क्षमता के पीछे उसके गंगोत्री (उदगम) के निकट मिलनेवाली मसूरी अपनति संरचना (मसौरी सिंक्लिनल स्ट्रक्चर) है, जिसमें रेडियोएक्टिव खनिज मिलता है। गंगाजल में यह रेडियो एक्टिव पदार्थ अल्प मात्र में होने के कारण, वह मनुष्यों के लिए नुकसानदेह नहीं है। प्रकृति नियंत्रित तथा उदगम स्थल पर उपलब्ध ऐसी विलक्षण विशेषता संसार की किसी अन्य नदी को प्राप्त नहीं है। यह विलक्षणता गंगा के महत्त्व को और भी बढ़ा देता है। नेशनल इन्वायरमेंटल इंजीनियरिंग आफ रिसर्च इंस्टीट्यूट (नीरी), नागपुर के नदी विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर टी.के.घोष की रिपोर्ट इस सन्दर्भ में उल्लेखनीय है।

गंगा किनारे जीवन

भारत को नदियों का देश भी कहा जाता है। जहां जल वहां जीवनइस तर्ज पर देश के तमाम बड़े-छोटे शहर और गांव नदी किनारे बसे हैं। गंगा, यमुना, नर्मदा,महानदी, ब्रह्मपुत्र, कृष्णा, गोदावरी, कावेरी आदि नदी के तट पर ही भारतीय समाज का विकास हुआ है। इस दृष्टि से देखा जाए तो गंगा भारत की प्रमुख बड़ी नदी है, जिसमें से अनेक छोटी-बड़ी नदियां निकली हैं और अनेकों नदियां विलीन होती हैं। गंगा में उत्तर की ओर से आकर मिलनेवाली प्रमुख सहायक नदियों में यमुना,रामगंगा, करनाली (घाघरा), ताप्ती, गंडक, कोसी और काक्षी हैं तथा दक्षिण के पठार से आकर इसमें मिलनेवाली प्रमुख नदियां चंबल, सोन, बेतवा, केन आदि प्रमुख हैं।

गंगा किनारे जीवन
गंगा किनारे जीवन

गंगा के मैदान और तट पर हजारों गांव और सैंकड़ों नगर बसे हैं, जिनमें वाराणसी,हरिद्वार और प्रयाग (इलाहाबाद) मुख्य हैं। इसके अतिरिक्त रूड़की, सहारनपुर,मेरठ, अलीगढ़, कानपुर, बरेली, लखनऊ, पटना, भागलपुर,राजशाही, मुर्शिदाबाद, बर्दवान (वर्द्धमान), कोलकाता, हावड़ा आदि उल्लेखनीय हैं। उल्लेखनीय है कि गंगा तट पर 1 लाख से अधिक जनसंख्या वाले 29 शहर, 50 हजार से 1 लाख की आबादी वाले 23 शहर तथा 50 हजार तक की आबादीवाले 48 कस्बों का समावेश है। उल्लेखनीय है कि भारत में प्रति वर्ग किलोमीटर औसतन जनसंख्या 312 है, वहीं गंगा के तटवर्ती क्षेत्रों में 520 है। गंगा में मिलनेवाली यमुना के किनारे भी दिल्ली, आगरा, मथुरा आदि बड़े शहर हैं। ये नगर भारत की जनसंख्या, व्यापार तथा उद्योग को दृष्टि से सबसे घने बसे हुए इलाक़ों में गिने जाते हैं।

गंगाअर्थव्यवस्था का मेरुदंड

कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था का प्राण है। इस दृष्टि से गंगा उत्तर भारत के सभी राज्यों के अर्थव्यवस्था का मेरुदंड है। हम जानते हैं कि कृषि एवं नगरीय जनजीवन, दोनों ही पानी पर निर्भर होता है।

कृषि : गंगा के तटवर्ती क्षेत्रों और मैदानों में उगाई जानेवाली मुख्य फसलों में मुख्यतः धान, गन्ना, दाल, तिलहन, आलू एवं गेहूं हैं। यह भारत की कृषि आज का महत्त्वपूर्ण स्रोत है। गंगा के तटीय क्षेत्रों में दलदल एवं झीलों की वजह से यहां मिर्च,सरसों, तिल और जूट की अच्छी फ़सल होती है।

पर्यटन : गंगा धार्मिक यात्राओं और पर्यटन के लिए सर्वाधिक आर्थिक स्रोत है। इसके तट पर प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर कई पर्यटन स्थल हैं जो राष्ट्रीय आय को बढ़ाने में सहायक है। गंगा तट के तीन बड़े शहर हरिद्वार, प्रयाग (इलाहाबाद) और वाराणसी (काशी), यह तीर्थ स्थलों में विशेष महत्त्व रखते हैं। इस कारण यहां श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या निरंतर बनी रहती है और धार्मिक पर्यटन में महत्त्वपूर्ण योगदान करती है।

गंगा पर्यटन
गंगा पर्यटन

ग्रीष्म ऋतू में जब पहाड़ों से बर्फ पिघलती है, तब नदी में पानी की मात्रा व बहाव अच्छा होता है। इस समय उत्तराखंड में ऋषिकेश-बद्रीनाथ मार्ग पर कौडियाला से ऋषिकेश के मध्य रैफ्टिंग, क्याकिंग व कैनोइंग के शिविरों का आयोजन किया जाता है। यह विचारणीय है कि भारत में आनेवाले विदेशी सैलानियों की औसत संख्या 0.1 प्रतिशत है,जबकि चीन में 3%, फ्रांस में 8% है। गंगा और उसके तटों को सुन्दर और रमणीय बनाने के साथ ही, रैफ्टिंग शिविरों की दृष्टि से इसे विकसित किया जाए तो आज भी यह साहसिक खेलों और पर्यटन का मुख्य आधार बन सकता है।

गंगा : भारतीय आस्था का आधार
गंगा : भारतीय आस्था का आधार

व्यापार और उद्योग : गंगा के तटों पर अनेक प्रसिद्ध मेलों का आयोजन होता है,और अनेक प्रसिद्ध मंदिर बने हैं। अनेक पर्वों और उत्सवों का गंगा से सीधा संबंध है,जिसमें मकर संक्राति, कुंभ और गंगा दशहरा के अवसर पर गंगा स्नान व दर्शन महत्त्वपूर्ण समझा जाता है। 12 वर्षों में होनेवाले महाकुम्भ (तीर्थराज प्रयाग) और 6 वर्षों में होनेवाले अर्ध कुम्भ (हरिद्वार) में देश-विदेश से लगभग 5 करोड़ यात्री शामिल होते हैं। इसके अतिरिक्त वर्षभर लाखों यात्री गंगा दर्शन के लिए विविध अवसरों पर आते हैं। ये यात्री अथवा पर्यटक आसपास के प्रसिद्द स्थलों में भ्रमण करते हैं और स्मृति स्वरूप वस्तुओं को अपने घर ले जाते हैं। इस दौरान यात्रियों के भोजन, आवास, वाहन और विविध वस्तुओं की बिक्री करनेवाले व्यापारियों और उनसे जुड़े नागरिकों को लाभ कमाने का अवसर मिलता है।

गंगा नदी में मत्स्य उद्योग भी बहुत ज़ोरों पर चलता है। इसमें लगभग 375 मत्स्य प्रजातियां पाई जाती हैं। गंगा में डालफिन की दो प्रजातियां पाई जाती हैं, जिन्हें गंगा डालफिन और इरावदी डालफिन के नाम से जाना जाता है। बंगाल की खाड़ी में गंगा के मिलन स्थल को सुंदरवन के नाम से जाना जाता है जो विश्व की बहुत-सी प्रसिद्ध वनस्पतियों और बंगाल टाइगर के गृहक्षेत्र के रूप में विख्यात है।

नरेंद्र मोदी और नमामि गंगा योजना

गंगा के अध्यात्मिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आर्थिक महत्त्व को ध्यान में रखकर देश के नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गंगा के लिए अलग मंत्रालय का गठन किया। गंगा को अविरल और निर्मल बनाने की व्यापक योजना बनाने के लिए सरकार गंगा मंथन कार्यक्रम भी आयोजित कर चुकी है। मोदी सरकार ने चुनावी वादे को पूरा करते हुए गंगा को अविरल और निर्मल बनाने के लिए नमामि गंगेमिशन शुरू करने की घोषणा की है। मोदी सरकार ने अपने बजट में इसके लिए 2,037 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है। केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने मोदी सरकार का पहला आम बजट 2014-15 पेश करते हुए कहा कि गंगा के संरक्षण और सुधार पर अब तक काफी धनराशि खर्च हो चुकी है लेकिन वांछित परिणाम नहीं निकले हैं।

मिशन नमामि गंगेऔर चुनौतियां

22 सितंबर, 2008 को गंगा को राष्ट्रीय धरोहर घोषित करते हुए भारत सरकार ने इसे राष्ट्रीय नदी की संज्ञा दी। पर हमारे इस राष्ट्रीय नदी गंगा के उदगम स्थल से लेकर कदम-कदम पर उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश बिहार और बंगाल के कल-कारखानों का कचरा,गंदा पानी तथा अनुपचारित अपशिष्ट नदी में बेशर्मी एवं देश के कानूनों को ठेंगा दिखाते हुए चौबीसों घंटे उंडेला जाता है। इस कारण गंगा और उसकी सहायक नदियां तेजी से गटर या गंदे नाले में तब्दील होती जा रही हैं।

गंगा को प्रदूषित करनेवाले औद्योगिक इकाइयों में सबसे ज्यादा संख्या टेनरियों (चमड़ा प्रसंस्करण कारखानों) और बूचड़खानों की है। गंगा के किनारे 444 चमड़ा कारखानें हैं, जिनमें 442 अकेले उत्तर प्रदेश में हैं। इनमें ज्यादातर कानपुर में केंद्रित हैं। कानपुर में ही गंगा किनारे आधे दर्जन से अधिक बूचड़खाने भी हैं जिनकी गंदगी सीधे गंगा में जाती है। कानपुर की टेनरियों से 22.1 एमएलडी (मिलियन लीटर प्रतिदिन) खतरनाक कचरा और गंदा पानी निकलता है। ऐसे अनेक कारखानों और उद्योगों के रासायनिक अवशेष गंगा के प्रदुषण के लिए काफी हद तक जिम्मेदार हैं। चमड़ा साफ करनेवाले, लुगदी,कागज उद्योग, पेट्रोकेमिकल, रासायनिक खाद, रबड़ और ऐसे कई कारखानों की गंदगी गंगा में बहाए जाने के कारण औद्योगिक कचरा तेजी से बढ़ रहा है और उसका जहर नदी के बहुत से भाग में मछलियों को खत्म कर रहा है।

गंगा को दूषित करनेवाले कारण
गंगा को दूषित करनेवाले कारण

गंगा किनारे सैंकड़ों शहर हैं, इन शहरों से प्रतिदिन लाखों टन मल और गंदगी गंगा में बहाया जा रहा है। ज्ञात हो कि उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में गंगा तट पर 1 लाख से अधिक आबादी वाले 29 बड़े शहरों से ही 1340 एमएलडी अपशिष्ट में बहाया जाता है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के अनुसार गंगा में प्रतिदिन 5044 एमएलडी (मिलियन लीटर प्रतिदिन) अपशिष्ट छोड़ा जाता है। राष्ट्रीय नदी संरक्षण निदेशालय (NRCD) के अनुसार, गंगा के प्रदुषण में शहरी अपशिष्टों का 75 प्रतिशत और औद्योगिक कारखानों से निकलने वाली गन्दगी का 25 प्रतिशत भाग शामिल है।

ग्लोबल वार्मिंग का खतरा

ग्लेशियरों की सेहत की जांच करनेवाले हिम वैज्ञानिकों के अनुसार पिछले कुछ वर्षों से हिमालय के अलग-अलग स्थानों में ग्लेशियर्स अलग-अलग गति से सिकुड़ रहे हैं तथा उनकी पानी देने की क्षमता लगातार कम हो रही है। यह सब गंगा और यमुना जैसी बड़ी नदियों को पानी देनेवाले ग्लेशियरों के साथ भी हो रहा है जिसके कारण इन नदियों के ग्रीष्मकालीन प्रवाह में कमी दिखाई दे रही है। उल्लेखनीय है कि इंटर गवर्नमेन्टल पैनल ऑन क्लाईमेट चेंज की चौथी आकलन रिपोर्ट में कहा गया है कि पूरी दुनिया के ग्लेशियरों की तुलना में हिमालय के ग्लेशियरों के पिघलने की गति सर्वाधिक है। उपर्युक्त रिपोर्ट के अनुसार यदि यही गति आगे भी बरकरार रही तो संभावना है कि सन 2035 तक (उसके पहले भी) हिमालय के ग्लेशियरों का नामोनिशान मिट जाए।

ज्ञात हो कि हिमालय के भूविज्ञान से जुड़े विभिन्न पक्षों पर देहरादून स्थित वाडिया संस्थान काम कर रहा है। इस संस्थान में हिमालयीन ग्लेशियर विज्ञान (हिमालयन ग्लेशियोलॉजी) पर नया अनुसंधान केन्द्र खोला गया है। इस केन्द्र ने हिमालय के इको-सिस्टम के स्थायित्व के लिए बेहतर प्रबंध व्यवस्था तथा मार्गदर्शिका विकसित की है। अनुसंधान केन्द्र ने इस व्यवस्था तथा मार्गदर्शिका पर संबंधित राज्य सरकारों से विचार विमर्श किया है।

गंगा एक्शन प्लान और परिणाम

गंगा की सफाई के लिए सन 1985 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने गंगा एक्शन प्लान’ (जी.ए.पी.) बनाया, जिसे सरकारी शब्दावली में फेज वन अर्थात प्रथम चरण कहा गया। केन्द्र सरकार की इस योजना का उद्देश्य गंगा के जल की गुणवत्ता में सुधार करना था। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए जो रोडमैप बनाया गया था,उनमें सीवेज की गंदगी को रोककर उसकी दिशा बदलना, सीवेज की सफाई के लिए उपचार प्लांट लगाना तथा कम लागत वाली स्वच्छता व्यवस्था स्थापित करने के साथ ही गंगा में दाह-संस्कार को हतोत्साहित करना था।

सरकार ने गंगा सफाई परियोजना के दूसरे चरण में गंगा की प्रमुख सहायक नदियों जैसे यमुना, गोमती, दामोदर और महानन्दा को साफ-सफाई के दायरे में शामिल किया। दिसम्बर, 1996 में राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना बनी और गंगा सफाई प्लान को उसमें सम्मिलित किया गया। इस योजना पर लगभग 837.40 करोड़ खर्च किए गए तथा हर दिन सीवर के 1025 मिलियन लीटर पानी को साफ करने की क्षमता विकसित करने का लक्ष्य रखा गया था। पर लक्ष्य के अनुरूप न काम नहीं हुआ, इसलिए इसका वांछित परिणाम नहीं मिला। इस पर अब तक दो हजार करोड़ रुपए से अधिक खर्च हो गए,लेकिन इतना पैसा खर्च होने और सत्ताईस सालों की कोशिश के बाद भी गंगा पहले से अधिक प्रदूषित है। इतनी बड़ी रकम खर्च करने के बाद भी गंगा एक्शन प्लान बुरी तरह नाकाम रहा।

गंगा एक्शन प्लान के तहत लगाए गए कई बड़े सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट आज बेकार पड़े हैं। केंद्र सरकार ने प्लांट तो स्थापित कर दिए, लेकिन रख-रखाव और संचालन खर्च के कारण शहरी प्राधिकरण उन्हें चला नहीं पाए। राज्य सरकारों और शहरी प्राधिकरणों की उदासीनता की वजह से पैसा बर्बाद हो गया। यहां तक कि गंगा एक्शन प्लान पर खर्च पैसे का कोई व्यवस्थित हिसाब-किताब तक नहीं रखा गया। वर्ष 2000 में पेश अपनी रिपोर्ट में सीएजी के अनुसार, गंगा एक्शन प्लान के तहत शुरू किए गए पैंतालीस सीवेज ट्रीटमेंट प्लांटों में से उन्नीस ने कोई काम नहीं किया। सीएजी ने इसका कारण संयंत्रों को बिजली न मिल पानी, तकनीकी खामियों को दूर न किया जाना और राज्य सरकारों द्वारा फंड न देना बताया था। जाहिर है जब तक राज्य सरकारें खुद उत्साह नहीं दिखाएंगी, तब तक गंगा एक्शन प्लान के नतीजे सकारात्मक नहीं आ सकते।

कौन जिम्मेदार ?

गंगा की इस दुर्दशा के लिए गंगा को प्रदूषित करनेवाले जितने जिम्मेदार हैं, उससे कहीं ज्यादा वे लोग भी जिम्मेदार हैं जिनपर गंगा को प्रदूषण मुक्त करने का दायित्व दिया गया था। यदि अधिकारी, मंत्री और कर्मचारी सही तरीके से ईमानदारी से अपना दायित्व पूर्ण करते, तो आज गंगा को प्रदुषण मुक्त बनाया जा सकता था। आज आवश्यकता है कि गंगा की निर्मलता के लिए चलाए जानेवाले अभियानों को केवल चर्चा और विवाद का मुद्दा न बनाया जाए। बहुत सारे आन्दोलन हो गए, भाषण हो गए, अब इसे मिशन के रूप में गंगापुत्र होने के नाते सरकार, समाज और देशवासियों को अंगीकृत करना होगा। मोदी सरकार ने जो नमामि गंगेमिशन की पूर्ति का संकल्प अपने सामने रखा है, उसपर देशवासियों का विश्वास है। हम सभी की आस्था और विश्वास मोदी सरकार के मिशन नमामि गंगेसे जुड़ा है। इसका मुख्य कारण यह भी है कि यूपीए सरकार ने 1985 से 2007 तक जितनी राशि (2000 करोड़) गंगा की सफाई के लिए आबंटित किए थे, जबकि मोदी सरकार ने अपने पहले बजट में ही उससे अधिक राशि (2037 करोड़) इस कार्य के लिए प्रदान किया है। मोदी सरकार के इस निर्णय की सर्वत्र प्रशंसा हो रही है। अब प्रतीक्षा है उस दिन की, जब हम गंगा मैया के वास्तविक निर्मल जलधारा के दर्शन कर सकेंगे।