संसार को विनाश से बचा सकता है यह सन्देश

स्वामी विवेकानन्द
स्वामी विवेकानन्द

(11 सितम्बर, विश्वबंधुत्व/ हिन्दू दिग्विजय दिन पर विशेष)

यदि कोई ऐसा स्वप्न देखे कि अन्यान्य सारे धर्म नष्ट हो जाएंगे और केवल उसका धर्म ही जीवित रहेगा, तो उसपर मैं अपने हृदय के अन्त: स्थल दया करता हूं और उसे स्पष्ट बता देता हूं कि शीघ्र ही सारे प्रतिरोधों के बावजूद,प्रत्येक धर्म की पताका पर यह स्वर्णअक्षरों में लिखा होगा- युद्ध नहीं,सहायता’, ‘विनाश नहीं, सृजन’, ‘कलह नहीं, शांतिऔरमतभेद नहीं, मिलन!

– लखेश्वर चंद्रवंशी ‘लखेश’

अपने ओजस्वी वाणी से भारत की महिमा को विश्वपटल पर आलोकित करनेवाले स्वामी विवेकानन्द का सन्देश समूची मानवता की अनमोल धरोहर है। दुनियाभर के महान ज्ञानी, विज्ञानी, चिंतकों, कलाकारों और विशेषकर युवाओं के हृदय को स्वामीजी के शक्तिदायी विचार आंदोलित करते रहे हैं। फिर भी आज भारत सहित विश्व के बहुसंख्यक लोग स्वामीजी के संदेशों से अवगत नहीं हैं। अमेरिकी लेखिका एलिनोर स्टार्क अपने पुस्तक “The Gift Unopened : A new American Revolution” में लिखती हैं कि क्रिस्टोफर कोलम्बस ने अमेरिका की भूमि का आविष्कार किया, परन्तु स्वामी विवेकानन्द ने अमेरिका की आत्मा का आविष्कार किया।’’

लेखिका के अनुसार, स्वामी विवेकानन्द की सबसे बड़ी देन वेदान्त है, जो अमेरिकनों की अपूर्णता को दूर कर देगा। परन्तु दुर्भाग्य यह है कि वह ‘Gift’ (भेंट) अब भी‘Unopened’ (अनखुली) ही रह गई। यह अनमोल ‘Gift’ क्या है ?इस बात पर सम्पूर्ण विश्व को विचार करना होगा, विशेषतः भारत को। शिकागो में हुए विश्वधर्म सम्मलेनमें स्वामीजी द्वारा दिए गए सन्देश को सही परिप्रेक्ष्य में समझकर उसे जनमानस तक पहुंचना होगा।

स्वामी विवेकानन्द का वह भाषण भारत का सम्मान बढ़ाया

अंग्रेजों के अधीन दुखी, आत्मग्लानि से भरे भारतीयों के हृदय में आत्मगौरव को पुनः प्रतिष्ठित करनेवाला स्वामी विवेकानन्द का वह भाषण आज भी संसार में अपनी विशेषताओं के लिए चर्चित है। यह छोटा सा भाषण 11 सितंबर, 1893 को अमेरिका के शिकागो में विश्व धर्म सम्मेलन के पहले दिन हुआ था। स्वामी विवेकानन्द का जब कभी उल्लेख होता है तब इस भाषण की चर्चा अवश्य्होती है।

स्वामी विवेकानन्द का भाषण

अमेरिका के बहनों और भाइयों…

आपके इस स्नेहपूर्ण और जोरदार स्वागत से मेरा हृदय अपार हर्ष से भर गया है। मैं आपको दुनिया की सबसे प्राचीन संत परंपरा की तरफ से धन्यवाद देता हूं। मैं आपको सभी धर्मों की जननी की तरफ से धन्यवाद देता हूं और सभी जाति, संप्रदाय के लाखों, करोड़ों हिन्दुओं की तरफ से आपका आभार व्यक्त करता हूं। मेरा धन्यवाद कुछ उन वक्ताओं को भी है जिन्होंने इस मंच से यह कहा कि दुनिया में सहनशीलता का विचार सुदूर पूरब के देशों से फैला है।

मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूं, जिसने दुनिया को सहनशीलता और सार्वभौमिक स्वीकृति का पाठ पढ़ाया है। हम सिर्फ सार्वभौमिक सहनशीलता में ही विश्वास नहीं रखते, बल्कि हम विश्व के सभी धर्मों को सत्य के रूप में स्वीकार करते हैं। मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे देश से हूं, जिसने इस धरती के सभी देशों और धर्मों के परेशान और सताए गए लोगों को शरण दी है। मुझे यह बताते हुए गर्व हो रहा है कि हमने अपने हृदय में उन इजराइलियों की पवित्र स्मृतियां संजोकर रखी हैं, जिनके धर्म स्थलों को रोमन हमलावरों ने तोड़-तोड़कर खंडहर बना दिया था और तब उन्होंने दक्षिण भारत में शरण ली थी। मुझे इस बात का गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूं, जिसने महान पारसी धर्म के लोगों को शरण दी और अभी भी उन्हें पाल-पोस रहा है।

भाइयों,

मैं आपको एक श्लोक की कुछ पंक्तियां सुनाना चाहूंगा जिसे मैंने बचपन से स्मरण किया और दोहराया है और जो रोज करोड़ों लोगों द्वारा हर दिन दोहराया जाता है; जिस तरह अलग-अलग स्रोतों से निकली विभिन्न नदियां अंत में समुद्र में जाकर मिलती हैं, उसी तरह मनुष्य अपनी इच्छा के अनुरूप अलग-अलग मार्ग चुनता है। वे देखने में भले ही सीधे या टेढ़े-मेढ़े लगें, पर सभी भगवान तक ही जाते हैं। वर्तमान सम्मेलन जो कि आज तक की सबसे पवित्र सभाओं में से है, गीता में बताए गए इस सिद्धांत का प्रमाण है जो भी मुझ तक आता अहि, चाहे वह कैसा भी हो, मैं उस तक पहुंचता हूं। लोग चाहे कोई भी रास्ता चुनें, आखिर में मुझ तक ही पहुंचते हैं।

सांप्रदायिकता, कट्टरता और इसके भयानक वंशज हठधमिर्ता लंबे समय से पृथ्वी को अपने शिकंजों में जकड़े हुए हैं। इन्होंने पृथ्वी को हिंसा से भर दिया है। कितनी बार ही यह धरती खून से लाल हुई है। कितनी ही सभ्यताओं का विनाश हुआ है और न जाने कितने देश नष्ट हुए हैं। अगर ये भयानक राक्षस नहीं होते तो आज मानव समाज कहीं ज्यादा उन्नत होता, लेकिन अब उनका समय पूरा हो चुका है। मुझे पूरी उम्मीद है कि आज इस सम्मेलन का शंखनाद सभी हठधर्मिताओं, हर तरह के क्लेश, चाहे वे तलवार से हों या कलम से और सभी मनुष्यों के बीच की दुर्भावनाओं का विनाश करेगा।

स्वामीजी के इस सन्देश का मर्म

विश्वधर्म महासभा में स्वामी विवेकानन्द द्वारा दिए गए विश्वबंधुत्व के सन्देश का जिस प्रकार विश्व ने स्वागत किया, उससे यह स्पष्ट हो गया कि आवश्यकता है और इसलिए भारत को अपने दायित्व के प्रति सचेत होना होगा। कोलंबस के अमेरिका की खोज की 400वीं शताब्दी मनाने के उपलक्ष्य में विश्वधर्म महासभा का आयोजन किया गया था। इस धर्म महासभा के आयोजन का मूल उद्देश्य केवल ईसाई धर्म का वर्चस्व सिद्ध करना था। इस प्रकार की निषेधक (Exclusive) एवं दुराग्रही विचारधारा केवल स्वयं के मत को सही सत्य मानती है। ऐसी धारणा बनने पर दूसरे मतों के प्रति द्वेष निर्माण होता है। इसी हठधर्मिता के कारण ही उसके अनुयायी जोर-जबरदस्ती से मतांतरण में लग जाते हैं। केवल हमारा ही मत सर्वश्रेष्ठ है बाकी सब गलत’, ईसाई और मुस्लिमों की ऐसी कट्टरता ही मानव इतिहास में रक्तपात और हत्याआं के लिए कारणीभूत है, इस बात से स्वामी विवेकानन्द अवगत थे।

अमेरिका निवासी बहनों तथा भाइयों”, – स्वामी विवेकानन्द के प्रसिद्ध एवं प्रथम उदबोधन का यह प्रथम वाक्य, जिसने वहां के श्रोताओं के हृदय में मानों एक अदभुत विद्युत तरंगों को प्रवाहित कर दिया। यह केवल उद्बोधन की मात्र एक शैली नहीं थी,अपितु स्वामीजी के उन शब्दों में भारत की महान आध्यात्मिक शक्तियां ही मुखरित हुर्इं। यही कारण है कि भारत में 5000 वर्षों के इतिहास से भी कहीं अधिक समय से विश्वबंधुत्व को अंगीकृत कर, उसका जतन भी किया। इसी कारण स्वामी विवेकानन्दजी कहते हैं मुझे ऐसे देश का धर्मावलम्बी होने का गौरव है, जिसने संसार को सहिष्णुतातथा सभी धर्मों को मान्यता प्रदानकरने की शिक्षा दी है। मुझे एक ऐसे देश का व्यक्ति होने का अभिमान है, जिसने इस पृथ्वी की समस्त पीड़ित और शरणागत जातियों तथा विभिन्न धर्मों के बहिष्कृत मतावलम्बियों को आश्रय दिया है।

हिंदुओं की इसी वैश्विक विचारधारा के कारण, जिस ईश्वर की मैं पूजा करता हूं, ‘केवल वही एकमात्र ईश्वर हैऐसा उन्होंने कभी नहीं कहा, अपितु वे कहते हैं कि विश्व में केवल ईश्वरही है। वही एक ईश्वर अनेक रूपों में प्रगट हुआ है।

इसलिए हमारा ही ईश्वर सत्य है और दूसरों का ईश्वर झूठ है, ऐसा हम नहीं कहते। हम अन्यों के देवताओं को भी ईश्वर कहते हैं। यह हमारा सर्वसमावेशक चिंतन है। कट्टर विचारधारा कहती है- केवल यही’, सर्वसमावेशक चिंतन कहता है – यह भी। सर्वसमावेशक चिंतन के कारण हिंदुओं ने दूसरों की मान्यताओं को नष्ट करने का प्रयास कभी नहीं किया। विश्वबंधुत्व की स्थापना के लिए सभी मान्यताओं व मताबलम्बियों द्वारा इस यह भीको स्वीकार करना आवश्यक है। सृष्टि के प्रति एकात्मभाव से जुड़ने की वजह से ही हिन्दू इस यह भीको मनाता है। सृष्टि को उस एककी ही अभिव्यक्ति मानकर हिन्दू सबका आदर करते हैं, उसे स्वीकार करते हैं और इसलिए उनके द्वारा अनेकता का भी आदर होता है। इसी कारण मनुष्यात्मा पापी नहीं, अपितु अमर्त्य है, पूर्ण है। यही भारत का संदेश है जो उसे विश्व को देना है।

अमेरिका का वह श्रोता समाज जो केवल हठधर्मिता का दावा ही सुनते आया था,उन्होंने प्रथमतः स्वामी विवेकानन्द के द्वारा धार्मिक एकता का संदेश सुना। विश्व धर्म सम्मलेन के अंतिम दिनों में स्वामी विवेकानन्द ने धार्मिक कट्टरवादियों तो चेतावनी देते हुए कहा था- ‘…किन्तु, यदि यहां कोई यह आशा कर रहा कि यह एकता किसी एक धर्म की विजय और बाकी सब धर्मों के विनाश से सिद्ध होगी, तो उनसे मेरा कहना है किभाई, तुम्हारी यह आशा असंभव है।’ …इस सर्वधर्म महासभा ने जगत के समक्ष यदि कुछ प्रदर्शित किया है, तो वह यह है कि – शुद्धता, पवित्रता और दयाशीलता किसी सम्प्रदाय विशेष की एकान्तिक सम्पत्ति नहीं है, एवं प्रत्येक धर्म ने श्रेष्ठ एवं अतिशय उन्नत-चरित्र के स्त्री-पुरुषों को जन्म दिया है। अब इन प्रत्यक्ष प्रमाणों के बावजूद भी यदि कोई ऐसा स्वप्न देखे कि अन्यान्य सारे धर्म नष्ट हो जाएंगे और केवल उसका धर्म ही जीवित रहेगा, तो उसपर मैं अपने हृदय के अन्त: स्थल दया करता हूं और उसे स्पष्ट बता देता हूं कि शीघ्र ही सारे प्रतिरोधों के बावजूद, प्रत्येक धर्म की पताका पर यह स्वर्णअक्षरों में लिखा होगा- युद्ध नहीं, सहायता’, ‘विनाश नहीं,सृजन’, ‘कलह नहीं, शांतिऔर मतभेद नहीं, मिलन!

पहली बार स्वामी विवेकानन्द के रूप में पश्चिमात्य श्रोता समाज ने विश्वबंधुत्व का संदेश उचित समय पर सही परिप्रेक्ष्य में समझा। इस सन्देश की अनदेखी से दो बार विश्वयुद्ध हो गया। आज भी विश्व के अनेक देशों में साम्प्रदायिक तनाव, व्यापारिक स्वार्थ सिद्धि के लिए बैरभाव और अपनी भूमि विस्तार के लिए अन्य देशों की जमीन पर अधिकार ज़माने की दुष्ट प्रवृत्तियों ने जन्म लिया है। इस प्रवृत्ति ने आतंकवाद, धर्मांतरण, लव जिहाद और विस्तारवाद को जन्म दिया है। केवल बाहरी दिखावेवाली एकता द्वारा विश्व बंधुत्व के सूत्र में नहीं बंध सकता, इसके लिए दुनिया के तमाम देशों को अन्य देशों और समुदायों के हितों, अधिकारों और भावना का सम्मान बड़ी आत्मीयता से होगा। बनावटी एकता मानवीय मूल्यों को नष्ट करती है। किन्तु एकात्मता विविध समुदायों की विशेषताओं को बनाए रखते हुए बंधुत्व के सूत्र में बांधती है। इसलिए इस दिन का संदेश उनके लिए भी है जो हठधर्मी है और मतांतरण के माध्यम से विविध जनजाति समुदायों की मान्यताओं और संस्कृति को करते हैं।

अपने दर्शनों और सर्वसमावेशक दृष्टि के कारण ही नियति ने भारत को बंधुत्व स्थापित करने के लिए चुना है। परंतु इस दायित्व को निभाने के लिए उन्हें इस धार्मिक एकात्मभाव को समझना होगा। स्वामी विवेकानन्द ने विश्व धर्म महासभा के माध्यम से हमें हिन्दू धर्म का यही एकात्मभाव का सन्देश दिया है।

स्वामी विवेकानन्द के अधरों से जो शब्द उच्चरित हुए वे केवल उनके स्वयं के अनुभवजनीत नहीं थे, न उन्होंने अपने गुरुदेव की कथा सुनाने के निमित्त ही इस अवसर का उपयोग किया। इन दोनों के स्थान पर भारत की धार्मिक चेतना सम्पूर्ण अतीत द्वारा निर्धारित उनके समग्र देशवासियों का संदेश ही उनके माध्यम से मुखर हुआ था। अतः इस विश्वबंधुत्व दिन के उपलक्ष्य में हमें विश्वधर्म महासभा में स्वामी विवेकानन्दजी द्वारा दिए गए संदेश का स्वाध्याय करना चाहिए। केवल प्रथम दिवस के विश्व प्रसिद्ध व्याख्यान का ही नहीं अपितु हिन्दू धर्म पर निबंधका भी अध्ययन आवश्यक है, और उसके अनुसार कार्य करने में ही इस दिन के स्मरण की सार्थकता है।

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