‘एक जीवन-एक ध्येय’ के प्रणेता – ‘एकनाथजी’

‘एक जीवन-एक ध्येय’ के प्रणेता - ‘एकनाथजी’
‘एक जीवन-एक ध्येय’ के प्रणेता – ‘एकनाथजी’

(माननीय एकनाथजी जन्म शती पर विशेष)

स्वामी विवेकानन्द के विचारों को अपना आदर्श बनाकर उसके अनुरूप जीवन जीनेवाले श्री एकनाथजी रानडे कार्य आज बेहद प्रासंगिक है। वर्तमान वर्ष एकनाथजी के जन्म शती (19 नवम्बर, 2014 से 19 नवम्बर, 2015) के रूप में विवेकानन्द केन्द्र के द्वारा मनाया जा रहा है। ऐसे में श्री एकनाथजी का कार्य भारतीय समाज के लिए कितना महत्वपूर्ण है, इस पर चिंतन किए जाने की आवश्यकता है।

– लखेश्वर चंद्रवंशी ‘लखेश’

एकनाथजी का नाम लेते ही स्वामी विवेकानन्दजी सहज याद आते हैं, और जब स्वामी विवेकानन्द की बात होती है तो आंखों के सामने उभरता है कन्याकुमारी स्थित, भव्य विवेकानन्द शिलास्मारक का दृश्य। ऐसा क्यों? इसका उत्तर है, स्वामीजी, एकनाथजी और विवेकानन्द शिलास्मारक तीनों का ध्येय एक है। तीनों एक-दूसरे से जुड़े हैं, तीनों की भव्यता एक ही ध्येय की पूर्ति के लिए प्रेरित करती है-‘मनुष्य निर्माण और राष्ट्र पुनरुत्थान’। एकनाथजी ने स्वामीजी के विचारों को समाज जीवन में चरितार्थ करने के लिए पूरा जीवन खपा दिया। एक कुशल संगठक के रूप में उनकी योजनाएं, गतिविधियां, अध्ययन, सम्पर्क और सभी प्रकार के प्रयत्न उसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए समर्पित था।

एक जीवन-एक ध्येय
एक जीवन-एक ध्येय

एक जीवन-एक ध्येय

स्वामी विवेकानन्दजी ने कहा था, “मस्तिष्क को उच्च विचारों से, उच्च आदर्शों से भर दो। उन्हें दिन-रात अपने सामने रखो और तब उसमें से महान् कार्य निष्पन्न होगा।…उस आदर्श के बारे में हम अधिक से अधिक श्रवण करें ताकि वह हमारे अन्त:करण में, हमारे मस्तिष्क में,हमारे रगों में समा जाए। यहां तक कि रक्त की प्रत्येक बूंद में चैतन्य भर दें और शरीर के प्रत्येक रोम में समा जाए। हम हर क्षण उसी का चिन्तन करें। अन्त:करण की परिपूर्णता में से ही वाणी मुखरित होती है और अन्तःकरण की परिपूर्णता के पश्चात् ही हाथ भी कार्य करते हैं।”  स्वामीजी के इस विचार एकनाथजी ने मानों अपने जीवन का अंग ही बना लिया था।

विवेकानन्द शिलास्मारक के निर्माण का दायित्व जब उनके कंधे था, वे उसकी पूर्ति के लिए दिन-रात लगे रहते, उसी का स्वप्न वे देखते। अपने एक मित्र डॉ. सुजीत धर के साथ जब वे एक शाम कन्याकुमारी के समुद्र तट पर टहल रहे थे, तब उन्होंने उनसे पूछा, “सुजीत, तुम्हें वहां क्या दिखाई दे रहा है? सुजीत धर ने बताया, “मुझे सामने शिला खंड दिखाई दे रहा है।” तब एकनाथजी ने कहा कि मुझे इस सागर के मध्य शिला पर भव्य स्मारक दिखाई दे रहा है।

एकनाथजी यह बात उस समय बोल रहे थे, जब शिला स्मारक के निर्माण को लेकर देश में अनुकूल परिस्थिति नहीं थी। एक तरफ जहां भारत-चीन के युद्ध में भारत को पराजय का मुख देखना पड़ा था, वहीं दूसरी ओर देश में अकाल की स्थिति थी। देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू राजनीतिक मज़बूरी के चलते विवेकानन्द शिलास्मारक के निर्माण को लेकर स्पष्ट नहीं थे। केन्द्रीय सांस्कृतिक मंत्री हुमायूँ कबीर प्राकृतिक सुन्दरता के लिए स्मारक के निर्माण को सही नहीं बता रहे थे। वहीं इसाई समुदाय के दबाव में तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री भक्तवत्सलम ने यहां तक कह दिया कि मेरे जीते जी कन्याकुमारी में विवेकानन्द शिलास्मारक कभी नहीं बनेगा।

एकनाथजी हर समस्या के मूल में जाकर उसके समाधान का विचार करते थे, यह उनके स्वभाव की विशेषता थी। वे विपरीत परिस्थितियों के आगे कभी नहीं झुकते थे, वरन हर चुनौती को अवसर के रूप में परिणत करने में वे प्रवीण थे। राजनीतिक परिस्थिति को स्मारक निर्माण के लिए अनुकूल बनाने के लिए उन्होंने 323 सांसदों के हस्ताक्षर मात्र 3 दिनों में प्राप्त कर उसे प्रधानमंत्री के कार्यालय पर पहुंचा दिया और स्पष्ट किया कि विवेकानन्द शिलासमारक के निर्माण के लिए सभी राजनीतिक दल और सांसदों का समर्थन प्राप्त है। इसलिए स्मारक के निर्माण के लिए त्वरित अनुमति देना चाहिए। एकनाथजी के इस कुशलता का परिणाम ही था कि स्मारक के निर्माण का कार्य तेजी से आगे बढ़ा। उन्होंने स्मारक के निर्माण के लिए उस अकाल के समय 1 रुपये का कूपन बनाकर देशभर के सामान्य जनता से लगभग 80 लाख का धन संग्रह किया। देश के सभी राज्यों मुख्यमंत्री, सभी राजनीतिक दलों के सांसदों से सहयोग राशि ली। विरोधियों को भी अपना सहयोगी बनाने में एकनाथजी माहिर थे। एकनाथजी के कठोर परिश्रम, कुशल योजना, प्रखर नेतृत्व और संगठन कौशल से महज 6 वर्षों में सागर के मध्य भव्य शिलास्मारक का निर्माण हुआ।

लक्ष्य के अनुरूप निर्माण
लक्ष्य के अनुरूप निर्माण

लक्ष्य के अनुरूप निर्माण  

स्वामी विवेकानन्द ने बिखरी हुई आध्यात्मिक शक्तियों को संगठित करने के लिए ‘ॐ’ के मंदिर की स्थापना की कल्पना की थी। इसलिए एकनाथजी ने विवेकानन्द शिला स्मारक के तल पर ॐ का मंदिर बनाया। शिला स्मारक में स्वामीजी की प्रतिमा का आकर, स्वरूप और धातु को लेकर भी वे बहुत स्पष्ट थे। उनका कहना था कि स्वामीजी ने भले ही इस शिला पर ध्यान किया था, लेकिन इस स्थान पर स्वामीजी की ऐसी मूर्ति स्थापित हो जो देशवासियों को उदात्त कार्य के लिए प्रेरित करती हो। अतः उन्होंने स्वामी विवेकानन्द की खड़ी प्रतिमा वहां स्थापित की जो कार्य सिद्धि के लिए तत्परता का आह्वान की दृष्टि प्रदान करती है।

विवेकानन्द शिला स्मारक, कन्याकुमारी
विवेकानन्द शिला स्मारक, कन्याकुमारी

कार्यकर्ता की खोज  

मात्र शिला स्मारक के निर्माण से ही लक्ष्य प्राप्त नहीं हो जाता। एकनाथजी कभी एक कार्य को पूरा करके संतुष्ट नहीं होते थे। उनके मन में विवेकानन्द शिलास्मारक के निर्माण के साथ ही स्वामी विवेकानन्द के स्वप्न के अनुरूप कार्य करनेवाले कार्यकर्ताओं के निर्माण की भी योजना थी। एकनाथजी ने इसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए 1972 में विवेकानन्द केन्द्र की स्थापना की। इसका मुख्य कार्यालय कन्याकुमारी के विवेकानन्दपुरम में है। आज देशभर में 882 शाखाएं हैं। विवेकानन्द केन्द्र ने ‘विवेकानन्द केन्द्र विद्यालय (VKV)  के माध्यम से शिक्षा जगत में आदर्श स्थापित किया है। आज अरुणाचल में 34, असम में 18, नागालैंड में 1, अंदमान-निकोबार में 9, तमिलनाडु में 3 और कर्नाटक में 1 ऐसे कुल 66 विद्यालय हैं। विवेकानन्द केन्द्र की कार्यपद्धति योग वर्ग, संस्कार वर्ग और स्वाध्याय वर्ग के माध्यम से बालकों, युवाओं और बड़ों में समाज के प्रति कर्तव्य बोध को जागृत किया जाता है।

स्वामी विवेकानन्द के सन्देश को विश्व पटल पर रखने और उन संदेशों से वैश्विक हित के लिए चिंतन की दृष्टि से एकनाथजी ने विवेकानन्द इंटरनैशनल फाउन्डेशन की कल्पना रखी थी। 2009 में इस फाउंडेशन की स्थापना नई दिल्ली स्थित चाणक्यपुरी में की गई।

स्वामी विवेकानन्द कहा करते थे कि, “मेरा विश्वास आधुनिक पीढ़ी में है, युवा पीढ़ी में है। इसी में से मेरे कार्यकर्ता निकालेंगे, जो सिंह की तरह हर समस्या का समाधान कर देंगे।” स्वामी विवेकानन्द ने कहा था, – “मनुष्य, केवल मनुष्य भर चाहिए। आवश्यकता है – वीर्यवान,तेजस्वी, दृढ़ विश्वासी और निष्कपट नवयुवकों की। बाकी सब अपने आप हो जाएगा।” उन्होंने कहा था, “सिंह के पुरुष से युक्त, परमात्मा के प्रति अटूट निष्ठा से सम्पन्न, पवित्रता की भावना से उद्दीप्त सहस्रों नर-नारी, देश के एक कोने से दूसरे कोने में जाकर सामाजिक समरसता, बंधुता और मुक्ति का सन्देश देंगे।”

‘स्वामीजी के सपनों के युवाओं’ की खोज में एकनाथजी हमेशा लगे रहते थे। कार्यकर्ता की खोज में वे बेहद सकारात्मक दृष्टि रखते थे। वे कहते थे कि हमारी नजर में समाज में दो ही तरह के लोग हैं, 1) जो कार्यकर्ता हैं और 2) जो कार्यकर्ता होनेवाले हैं। उनका कहना था कि स्वामी विवेकानन्द पर मात्र श्रद्धा रखने से काम नहीं चलेगा, वरन स्वामीजी के द्वारा रखे गए महान लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अपना जीवन का हर क्षण न्योछावर करना होगा। वे देश के युवाओं से जब भी मिलते तो उनको आहवान करते थे कि स्वामीजी के स्वप्न के युवा बनों, राष्ट्र पुनरुत्थान के लिए अपना जीवन उत्सर्ग कर दो। एकनाथजी के आह्वान से अनेक युवाओं ने अपना करियर, नौकरी और प्राप्त डिग्री के महत्त्व को एक ओर रखकर अपना जीवन ‘जीवनव्रती’ के रूप में विवेकानन्द केन्द्र को समर्पित कर दिया। आज भी सैकड़ों जीवनव्रती, हजारों कार्यकर्ता के कार्य और लाखों शुभचिंतकों के सहयोग से विवेकानन्द केंद्र अनेक सेवा प्रकल्पों से सामाजिक पुनरुत्थान की दिशा में कार्यरत है।

वर्तमान वर्ष माननीय एकनाथजी जन्म शती
वर्तमान वर्ष माननीय एकनाथजी जन्म शती

वर्तमान वर्ष माननीय एकनाथजी जन्म शती

19 नवम्बर, 1914 को विदर्भ के अमरावती जिले के एक छोटे से गांव टिमटाला में जन्में एकनाथजी की जन्म शती इस वर्ष देशभर में मनाई जाएगी। 9 नवम्बर, 2014 को भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने ‘माननीय एकनाथजी रानडे जन्म शती पर्व’ का उदघाटन किया।

उल्लेखनीय है कि इस जन्मशती पर्व का उपक्रम युवा केन्द्रित है।‘सफल युवा – युवा भारत’ इस नाम से यह उपक्रम देशभर चलाया जा रहा है। इस उपक्रम के चार चरण – युवा सम्पर्क, युवा संग्रह, युवा प्रशिक्षण और युवा सेवा। इन चार चरणों के माध्यम से 1 लाख युवाओं को कौशल विकास (स्किल डेवलपमेंट) का प्रशिक्षण दिया जाएगा। सफल जीवन सार्थक कैसे बनें, इस बात पर जोर दिया जाएगा।

श्री एकनाथजी रानडे एक कुशल संगठक के साथ ही कार्य को समयबद्ध और परफेक्शन से पूर्ण करनेवाले व्यक्तित्व के रूप में जाने जाते हैं। एकनाथजी की जीवनी और विवेकानन्द शिलास्मारक की गाथा को अधिकाधिक महाविद्यालयीन छात्र-छात्राओं तक पहुंचाने के लिए सम्पूर्ण देश में हजारों युवा सम्मलेन, सैंकड़ो युवा प्रेरणा शिविर तथा कार्यशालाओं का आयोजन किया जा रहा है। ‘शिव भावे जीव सेवा’ इस सन्देश को चरितार्थ करने के लिए जनजातियों और वंचितों के लिए सेवा प्रकल्प शुरू करने की योजना है।

Advertisements

‘हिंदुत्व’ के प्रगटीकरण का महान आदर्श – ‘महात्मा गांधी’

‘हिंदुत्व’ के प्रगटीकरण का महान आदर्श – ‘महात्मा गांधी’
‘हिंदुत्व’ के प्रगटीकरण का महान आदर्श – ‘महात्मा गांधी’

(2 अक्तूबर, जयन्ती पर विशेष)

सत्य ही ईश्वर है। सत्य सर्वदा स्वावलंबी होता है और बल तो उसके स्वभाव में ही होता है। समाज को न्याय के पथ पर चलने की प्रेरणा देनेवाले मोहनदास करमचंद गांधी के महानता के पीछे कौनसा दर्शनशास्त्र काम कर रहा था, यह चिंतन का विषय है।

– लखेश्वर चंद्रवंशी ‘लखेश’

यूं तो महात्मा गांधी समूचे दुनिया में विख्यात हैं। विख्यात इसलिए नहीं कि उनके पास बहुत बड़ी सम्पत्ति थी अथवा शारीरिक दृष्टि से वे बलशाली थे या फिर उनके पीछे कोई बड़ा राजनयिक पद। पर आज की दुनिया के बड़े पदों पर बैठे राजनेताओं से लेकर सामान्य जनता के बीच वे आदरणीय है इसलिए कि, वे संसार के सभी मनुष्यों, प्राणियों और प्रकृति से बहुत प्रेम करते थे। उनकी विचारधारा मानवता का संवाहक है। वे सत्य, शांति, अहिंसा, स्वदेशी के आग्रही हैं जो अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करने को प्रेरित करते हैं। वे कहते थे कि सत्य ही ईश्वर है। सत्य सर्वदा स्वावलंबी होता है और बल तो उसके स्वभाव में ही होता है। समाज को न्याय के पथ पर चलने की प्रेरणा देनेवाले मोहनदास करमचंद गांधी के महानता के पीछे कौनसा दर्शनशास्त्र काम कर रहा था, यह चिंतन का विषय है।

2 अक्तूबर, 1869 में गुजरात के तटीय शहर पोरबंदर में जन्में महात्मा गांधी स्वयं को सनातनी हिन्दू मानते थे, और इसपर गौरव का अनुभव करते थे। हिन्दू, हिंदुत्व, सत्य और गीता पर आधारित उनके वचन बेहद महत्वपूर्ण हैं। प्रस्तुत है महात्मा गांधी के हिंदुत्व सम्बंधी विचार…

1. मैं अपने को को सनातनी हिन्दू कहता हूं क्योंकि :

– मैं वेदों, उपनिषदों, पुराणों और हिन्दू धर्मग्रंथों के नाम से प्रचलित सारे साहित्य में विश्वास रखता हूं और इसलिए अवतारों और पुनर्जन्म में भी।

– मैं वर्णाश्रम धर्म के उस रूप में विश्वास रखता हूं जो मेरे विचार से विशुद्ध वैदिक है लेकिन उसके आजकल के लोक-प्रचलित और स्थूल रूप में मेरा विश्वास नहीं।

–  मैं गो-रक्षा में उसके लोक-प्रचलित रूप से कहीं अधिक व्यापक रूप में विश्वास करता हूं।

–  मैं मूर्तिपूजा में अविश्वास नहीं करता।

                                               – महात्मा गांधी (यंग इंडिया, 6-10-1921) 

  1.  साम्प्रदायिकता का मुझ में लेश मात्र भी नहीं है, क्योंकि मेरा हिन्दू धर्म है।

 – महात्मा गांधी (अस्पृश्यता पर वक्तव्य, 26-11-1932)

  1. अपने आपको हिन्दू कहने में मुझे गर्व का अनुभव इसलिए होता है कि यह शब्द मुझे इतना व्यापक लगता है कि यह न केवल पृथ्वी के चारों कोनों के पैगम्बरों की शिक्षाओं के प्रति सहिष्णु है, बल्कि उन्हें आत्मसात भी करता है।

– महात्मा गांधी (अस्पृश्यता पर वक्तव्य, 04-11-1932)

  1. शास्त्रों के ईश्वर-प्रेरित होने के दावे को आम तौर पर अक्षुण्ण रखकर भी, उनमें नए सुधार और परिवर्तन करने में उसने कभी हिचक महसूस नहीं की। इसलिए हिन्दू धर्म में सिर्फ वेदों को ही नहीं, बाद के शास्त्रों को भी प्रमाण माना जाता है।

 – महात्मा गांधी (अस्पृश्यता पर वक्तव्य, 30-12-1932)

  1. आज दुनिया में सब धर्मों की कड़ी परीक्षा हो रही है। इस परीक्षा में हमारे हिन्दू-धर्म को सौ फ़ीसदी नम्बर मिलने चाहिए, 99 फ़ीसदी भी नहीं।

– महात्मा गांधी (दिल्ली की प्रार्थना सभा, 17-07-1947)

  1. यही तो हिन्दू धर्म की खूबी है कि वह बाहर से आनेवालों को अपना लेता है।

                           – महात्मा गांधी (प्रार्थना प्रवचन, भाग 1, 21)

  1. हिन्दू धर्म एक महासागर है। जैसे सागर में सब नदियां मिल जाती हैं, वैसे हिन्दू धर्म में सब समा जाते हैं।

                            – महात्मा गांधी (प्रार्थना प्रवचन, भाग 2, 168)

 

  1. हिन्दू धर्म की खसूसियत यह है कि उसमें काफी विचार –स्वातंत्र्य है। और उसमें हरेक धर्म के प्रति उदारभाव होने के कारण उसमें जो कुछ अच्छी बातें रहती हैं, उनको हिन्दू धर्म मान सकता है। इतना ही नहीं मानने का उसका कर्तव्य है। ऐसा होने के कारण हिन्दू धर्मग्रन्थ के अर्थ का दिन-प्रतिदिन विकास होता है।  

                            – महात्मा गांधी (हबीबुर्रमान को पत्र, 5-11-1932)

 

  1. सत्य सर्वदा स्वावलंबी होता है और बल तो उसके स्वभाव में ही होता है।

                         – महात्मा गांधी (हिन्दी नवजीवन, 14-2-1924)

  1. मेरे लिए सत्य धर्म और हिन्दू धर्म पर्यायवाची शब्द हैं। हिन्दू धर्म में अगर असत्य का कुछ अंश है तो मैं उसे धर्म नहीं मान सकता। अगर इसके लिए सारी हिन्दू जाति मेरा त्याग कर दे और मुझे अकेला ही रहना पड़े तो भी मैं कहूंगा, “मैं अकेला नहीं हूं, तुम अकेले हो, क्योंकि मेरे साथ सत्य है और तुम्हारे साथ नहीं है।” सत्य तो प्रत्यक्ष परमात्मा है।

– महात्मा गांधी (गांधी सेवा संघ सम्मलेन, हुबली, 20-4-1936)

  1. गीता के मुख्य विषय से जिसकी संगति नहीं बैठती, वह मेरे लिए शास्त्र नहीं है, चाहे वह कहीं भी छपा क्यों न मिलता हो।

– महात्मा गांधी (अस्पृश्यता पर वक्तव्य, 17-11-1932)

  1. यदि अन्य सभी धर्म ग्रन्थ जलकर भस्म हो जाएं तो भी इस (गीता) अमर गुटके के सात सौ श्लोक यह बताने के लिए काफी है कि हिन्दू धर्म क्या है और उसे जीवन में कैसे उतारा जा सकता है।

– महात्मा गांधी (अस्पृश्यता पर वक्तव्य, 04-11-1932)

  1. वन्दनीय (गीता) माता द्वारा उपदिष्ट सनातन धर्म के अनुसार जीवन का लक्ष्य बाह्य आचार और कर्मकांड नहीं, बल्कि मन की अधिक से अधिक शुद्धि और तन, मन और आत्मा से अपने को दिव्य तत्व में विलीन कर देना है। गीता के इसी सन्देश को अपने जीवन में उतार कर मैं लाखों-करोड़ों लोगों के पास गया हूं।

– महात्मा गांधी (अस्पृश्यता पर वक्तव्य, 04-11-1932)

महात्मा गांधी के जीवन का सन्देश हिन्दू धर्मग्रंथों के चिन्तन प्रवाह से प्रगट हुआ है। वे श्रीमदभगवदगीता को माता कहते थे। हिन्दू दर्शनशास्त्रों का प्रतिबिम्ब उनके जीवन और सन्देश में देखा जा सकता है। महात्मा गांधी द्वारा लिखित पत्रों एवं उनके वक्तव्यों, भाषणों व लेखों के अनेक ग्रन्थ देश के अनगिनत ग्रंथालयों में उपलब्ध हैं। बापू के इस 145वीं जयन्ती के अवसर पर उनके विचारों को अधिक गहनता से समझने की आवश्यकता है।

सरदार पटेल : स्वतंत्र भारत के महान नायक

सरदार पटेल : स्वतंत्र भारत के महान नायक
सरदार पटेल : स्वतंत्र भारत के महान नायक

(31 अक्टूबर, सरदार पटेल जयन्ती / राष्ट्रीय एकता दिवस पर विशेष) 

सरदार वल्लभभाई पटेल, ऐसा महान व्यक्तित्व जिनकी दृढ़ता राष्ट्रनीति का मापदंड बन गया। उनकी कार्यशैली राजनीति को देशाभिमुख होने की प्रेरणा देती है। उन्होंने स्वतंत्र भारत के बिखरे रियासतों को टूटने से बचाया। भारत के विभाजन से देश में व्याप्त पीड़ा और जनाक्रोश के बीच दृढ़ता से खड़े होकर देश की जनता में सुरक्षा का विश्वास जगाया। सरदार पटेल वास्तव में स्वतंत्र भारत के महान नायक थे। हैरत की बात है कि ऐसे महान व्यक्ति को स्वतंत्रता के 45 वर्ष के बाद 1991 में भारतरत्न दिया गया। ऐसे में भारत के नए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सरदार पटेल की 182 फीट की मूर्ति जो दुनिया की सबसे ऊंची होगी,का निर्माण करवा रहे हैं, बेहद हर्ष का विषय है।

– लखेश्वर चंद्रवंशी लखेश

अंग्रेजों के अत्याचारों से त्रस्त भारतीय जनता ने स्वतंत्रता के लिए महान संघर्ष किया। सत्याग्रह, सशस्त्र क्रांति और आजाद हिन्द सेना तीनों ही माध्यम से स्वतंत्रता की ज्वाला प्रगट हुई। लोगों ने उसमें अपने तन, मन, धन और समय की आहुति दी। हजारों ने अपने जीवन को स्वतंत्रता की बलिवेदी में अर्पित कर दिया। इस महान त्याग से प्राप्त स्वतंत्रता भारतवर्ष के लिए ईश्वर प्राप्ति या मोक्ष की तरह था। परन्तु इस स्वतंत्रता के आगमन के पूर्व ही अलगाववादी प्रवृत्ति ने देश को निहित स्वार्थ के लिए बांटने की साजिश शुरू कर दी थी। और हुआ वही जिसका डर था। 14 अगस्त, 1947 को भारत का बंटवारा हो गया। भारत और पाकिस्तान ऐसे दो देश बन गए। यह विभाजन भारत की स्वतंत्रता के लिए प्राणप्रण से लड़ रहे करोड़ों भारतीय जनता के दिलोदिमाग को झगझोर कर रख दिया। ऐसा प्रतीत हुआ जैसे अपना ही एक अंग कटकर गिर गया। बंटवारे से प्राप्त पाकिस्तान की भूमि में रह रहे लाखों हिन्दू और सिखों की हत्याएं पाकिस्तान में की जाने लगी। इससे व्याप्त आक्रोश ने भारत में साम्प्रदायिक उन्माद को जन्म दिया। इस हिंसा के दौर में सरदार पटेल ने दृढ़ता का परिचय दिया। उन्होंने कानून व्यवस्था को सुदृढ़ ही नहीं किया, वरन हिंसक घटनाओं को रोकने के लिए जन प्रबोधन भी किया।

सरदार पटेल ने यह कहकर लोगों को शांत किया कि, “शत्रु का लोहा भले ही गर्म हो जाए, पर हथौड़ा तो ठंडा रहकर ही काम दे सकता है।”उन्होंने बंटवारे और साम्प्रदायिक हिंसा से देश में उपजे उन्माद के बीच भारतीय जनमानस में एकता की शक्ति के महत्त्व का स्मरण कराया और कहा, “एकता के बिना जनशक्ति, शक्ति नहीं है जबतक उसे ठीक ढंग से सामंजस्य में न लाया जाए और एकजुट न किया जाए, और तब यह आध्यात्मिक शक्ति बन जाती है।” उन्होंने लोगों को संयमित करने के लिए कहा, “बोलने में मर्यादा मत छोड़ना, गलियां देना तो कायरों का काम है।” उन्होंने लोगों में धाडस बंधाया कि, “जीवन की डोर तो ईश्वर के हाथ में है, इसलिए चिंता की कोई बात हो ही नहीं सकती।”

स्वतंत्र भारत का एकीकरण

स्वतंत्र भारत में उस समय लगभग 600 रियासत थे। सरदार पटेल ने कई शासकों से मुलाकात कर उनसे चर्चा की। इसका परिणाम यह हुआ कि कई शासकों ने अपने राज्य को भारतीय संघराज्य में विलीन कर दिया। परन्तु कुछ राजा और नवाब अंग्रेजों के भारत छोड़ने के बाद निरंकुश शासक बनने का सपना देख रहे थे, जिनमें जूनागढ़, हैदराबाद और कश्मीर मुख्य थे। जूनागढ़ के शासक अपने रियासत को पाकिस्तान में विलीन कराने को गुप्त रूप से षड्यंत्र कर रहे थे। जूनागढ़ के नवाब के इस निर्णय के कारण जूनागढ़ में जन विद्रोह हो गया जिसके परिणाम स्वरूप नवाब को पाकिस्तान भाग जाना पड़ा और जूनागढ़ पर भारत का अधिकार हो गया।

इधर, हैदराबाद का निजाम हैदराबाद स्टेट को एक स्वतन्त्र देश का रूप देना चाहता था इसलिए उसने भारत में हैदराबाद के विलय की स्वीकृति नहीं दी। यद्यपि भारत को 15 अगस्त, 1947 के दिन स्वतन्त्रता मिल चुकी थी किन्तु 18 सितम्बर, 1948 तक हैदराबाद भारत से अलग ही रहा। इस पर तत्कालीन गृह मंत्री सरदार पटेल ने हैदराबाद के नवाब की हेकड़ी दूर करने के लिए 13 सितम्बर, 1948 को जनरल चौधरी के नेतृत्व सैन्य कार्यवाही आरम्भ की। भारत की सेना के समक्ष निजाम की सेना टिक नहीं सकी और पांच दिनों में ही निजाम को 18 सितम्बर, 1948 को आत्मसमर्पण करना पड़ा। हैदराबाद के निजाम को विवश होकर भारतीय संघ में शामिल होना पड़ा। इन रियासतों के सन्दर्भ में गांधीजी ने सरदार पटेल को लिखा था, “रियासतों की समस्या इतनी जटिल थी जिसे केवल तुम ही हल कर सकते थे।”  निःसंदेह,लौहपुरुष सरदार पटेल की दृढ़ कार्यवाही से ही यह संभव हो सका।

sardar-patel
sardar-patel

जम्मू-कश्मीर और सरदार

जम्मू व कश्मीर एक सामरिक महत्त्व का राज्य था, जिसकी सीमाएं पाकिस्तान, चीन आदि देशों से जुड़ी हुई थीं, और सरदार पटेल उत्सुक थे कि उसका भारत में विलय हो जाए। उन्होंने महाराजा हरि सिंह से कहा कि उनका हित भारत के साथ मिलने में है और इसी विषय पर उन्होंने जम्मू व कश्मीर के प्रधानमंत्री पं.रामचंद्र काक को 3 जुलाई, 1947 को एक पत्र लिखा- “मैं कश्मीर की विशेष कठिनाइयों को समझता हूं, किंतु इतिहास एवं पारंपरिक रीति-रिवाजों आदि को ध्यान में रखते हुए मेरे विचार से जम्मू व कश्मीर के भारत में विलय के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प ही नहीं है।”

गृहमंत्री सरदार पटेल उस समय सूचना एवं प्रसारण मंत्री तथा राज्यों संबंधी मामलों के मंत्री होने के नाते स्वाभाविक रूप से जम्मू व कश्मीर मामले भी देखते थे। किंतु बाद में जम्मू व कश्मीर संबंधी मामले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू स्वयं देखने लगे। जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरि सिंह के साथ पंडित नेहरू के तनावपूर्ण सम्बन्ध थे, इस वजह से महाराजा के साथ बातचीत करने के लिए नेहरू को सरदार पटेल पर निर्भर रहना पड़ता था। 27 सितंबर, 1947 को ज्ञात हुआ कि पंजाब के उत्तरी-पश्चिमी सीमा प्रांत से पाकिस्तानी कश्मीर में घुसपैठ की तैयारी कर रहा है। उनकी योजना अक्टूबर के अंत या नवंबर के आरंभ में युद्ध छेड़ने की है। बाद में समाचार यह भी मिला था कि पाकिस्तानी हमलावरों ने कुछ क्षेत्र पर अधिकार कर लिया है और आगे बढ़ रहे हैं। इधर, सरदार पटेल के आह्वान पर महाराजा हरि सिंह ने अपनी रियासत जम्मू-कश्मीर को नई स्थापित हो रही संघीय लोकतांत्रिक सांविधानिक व्यवस्था का अंग बनाने के लिए 26 अक्टूबर,1947 को विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए थे।

भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर की सुरक्षा के सन्दर्भ में पंडित जवाहलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, रक्षा मंत्री सरदार बलदेव सिंह, जनरल बुकर, कमांडर-इन-चीफ जनरल रसेल और आर्मी कमांडर के बीच बैठक हुई। बैठक में सैन्य संसाधनों की कमी और कठिनाइयों पर चर्चा हो रही थी। सभी चिंतित थे, पर सरदार पटेल गंभीरता से सारी बातें सुन रहे थे। पर दृढ़ता के प्रतीक सरदार पटेल ने कहा-  “जनरल,हर कीमत पर कश्मीर की रक्षा करनी होगी। आगे जो होगा, देखा जाएगा। संसाधन हैं या नहीं, आपको यह तुरंत करना चाहिए। सरकार आपकी हर प्रकार की सहायता करेगी। यह अवश्य होना और होना ही चाहिए। कैसे और किसी भी प्रकार करो, किंतु इसे करो।”

सरदार के इस निर्णय से सैन्य अधिकारियों को बल मिला और उन्होंने कश्मीर में आक्रमणकारी पाकिस्तानियों का मुंहतोड़ जवाब दिया। आज जो जम्मू-कश्मीर का जितना भूभाग भारत के पास है वह सरदार पटेल के त्वरित निर्णय, दृढ़ इच्छाशक्ति और विषम-से-विषम परिस्थिति में भी निर्णय के कार्यान्वयन का ही परिणाम है।

वास्तव में, सरदार पटेल के आह्वान और सन्देश में भारतीय समाज में बहुत विश्वास था। जनता मानती थी कि स्वतंत्र भारत के प्रथम गृहमंत्री सरदार पटेल उनकी सुरक्षा, सुविधा और उत्थान के मुख्य आधार हैं। यही कारण है कि सरदार पटेल को लौह पुरुष कहने में लोग गौरवान्वित महसूस करते थे। पर आश्चर्य है कि भारतीय राजनीति के महान आदर्श और स्वतंत्र भारत के एकीकरण के सूत्रधार पटेल के कार्यों के ऐतिहासिक महत्त्व को स्कूली और महाविद्यालयीन शिक्षा में बहुत कम ही जगह मिली, जिसका परिणाम यह हुआ कि सरदार पटेल के कार्यों को गत 6 दशक से जनता ठीक से अवगत न हो पाई। हैरत की बात है कि ऐसे महान व्यक्ति को स्वतंत्रता के 45 वर्ष के बाद 1991 में भारतरत्न दिया गया। ऐसे में भारत के नए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सरदार पटेल की 182 फीट की मूर्ति जो दुनिया की सबसे ऊंची होगी,का निर्माण करवा रहे हैं, बेहद हर्ष का विषय है। पटेल की इस मूर्ति को“स्टैच्यू ऑफ यूनिटी” नाम दिया गया है, जो कि उनके कार्यों के अनुरूप है। यही नहीं तो सरदार पटेल की जयन्ती को “राष्ट्रीय एकता दिवस” के रूप में मनाने का निर्णय किया है और इस अवसर पर देशभर “रन फॉर यूनिटी” अथवा “एकता दौड़” का आयोजन किया जा रहा है। अब आवश्यकता इस बात की है कि हमारे देश की जनता अपने लौह पुरुष के जीवन और सन्देशों को जानें और उनसे प्रेरणा लें।