सन्देश नहीं, षड्यंत्र है ‘pk’

Pk-Movieसुन्दर कथानक, बेहतरीन अभिनय और व्यंग्य-विनोद से भरपूर पीके फिल्म दर्शकों का भरपूर मनोरंजन करती है। दर्शक कहीं भी बोरियत महसूस नहीं करता। यह भी सच है कि लोग फिल्म अपने मनोरंजन के लिए देखते हैं। पर व्यंग्य-विनोद के नाम पर फिल्म निर्माताओं ने हिन्दू दर्शनशास्त्र का सीधा मजाक उड़ाया है। पाखंड का विरोध करने का दावा करनेवाले पीके के निर्देशक राजकुमार हिरानी का कहना है कि फिल्म संत कबीर और महात्मा गांधी से प्रेरित है। इसलिए निर्देशक हिरानी के इस कथन और फिल्म में छुपे निहितार्थ को उजागर करना आवश्यक है।

– लखेश्वर चंद्रवंशी ‘लखेश’

सुन्दर कथानक, बेहतरीन अभिनय और व्यंग्य-विनोद से भरपूर पीके फिल्म दर्शकों का भरपूर मनोरंजन करती है। दर्शक कहीं भी बोरियत महसूस नहीं करता। यह भी सच है कि लोग फिल्म अपने मनोरंजन के लिए देखते हैं। पर व्यंग्य-विनोद के नाम पर फिल्म निर्माताओं ने हिन्दू दर्शनशास्त्र का सीधा मजाक उड़ाया है। पाखंड का विरोध करने का दावा करनेवाले पीके के निर्देशक राजकुमार हिरानी का कहना है कि फिल्म संत कबीर और महात्मा गांधी से प्रेरित है। इसलिए निर्देशक हिरानी के इस कथन और फिल्म में छुपे निहितार्थ को उजागर करना आवश्यक है।

भारत की जनता सचमुच भोली है। इतनी भोली कि मनोरंजन की आड़ में उनकी ही आस्था और आराध्य पर चोट को भी समझने में उन्हें समय लग रहा है। जहां तक फिल्म के निर्देशक राजकुमार हिरानी, लेखक अमिताभ जोशी और अभिनेता आमिर खान के अनुसार इस पीके फिल्म के माध्यम से समाज को अच्छा सन्देश देने की कोशिश की गई है। उनका कहना है कि धर्म के नाम पर लोगों को डराकर अपनी दुकान चलानेवालों से समाज को बचना चाहिए और भगवान तक अपनी बात पहुंचाने के लिए किसी बाबा या फकीर की मध्यस्थता की जरूरत नहीं है। पर क्या इतना ही सन्देश छुपा है इस फिल्म में? बिल्कुल नहीं।

हिन्दू युवतियों को बरगलाने का षड़यंत्र     

‘पीके’ जानबूझकर एक सोची-समझी चाल से बनाई गई फिल्म है, जिसका हेतु केवल और केवल हिन्दू पूजा-पद्धति, देवी-देवताओं और आस्थाओं का मजाक उड़ाना है। साथ ही इस फिल्म के माध्यम से हिन्दू युवतियों का मुस्लिम युवकों पर विश्वास करने के लिए कहा गया है, क्योंकि मुस्लिम युवक धोखा नहीं देते। इस बात को साबित करने के लिए फिल्म में पाकिस्तानी मुस्लिम युवा सरफराज खान (सुशांत सिंह राजपूत), भारतीय हिन्दू युवती जगद्जननी उर्फ़ जग्गू (अनुष्का शर्मा) और एक हिन्दू धर्मगुरु (तपस्वी बाबा) पर केन्द्रित कहानी बनाई गई है। इस कहानी की शुरुवात पाकिस्तानी युवा से हिंदुस्थानी युवती के प्रेम-प्रसंग से होती है, पर तपस्वी बाबा के भविष्य वाणी के चलते दोनों प्रेमी अलग हो जाते हैं। इसके बाद हिन्दू पूजा-पद्धति और भगवान के अस्तित्व पर प्रश्न खड़े करते हुए फिल्म आगे बढ़ती है। फिल्म के अंत में क्लाइमेक्स के रूप में पाकिस्तानी मुस्लिम युवा पर भारतीय हिन्दू युवती विश्वास करती है कि वह मुस्लिम युवा उससे सच्चा प्रेम करता है, और तपस्वी बाबा की भविष्य वाणी गलत साबित होती है। यह फिल्म हिन्दू युवतियों को मुस्लिम युवाओं से प्रेम करने के लिए प्रेरित करती है।

रिमोट के बहाने ईश्वर के अस्तित्व पर प्रश्न

फिल्म के मुख्य नायक आमिर खान ‘पीके’ नामक भूमिका में हैं, जो कि एक दूसरे ग्रह से आया हुआ प्राणी है। वह राजस्थान की रेतीली धरती पर आसमान से उतरता है। उसके शरीर पर कोई कपड़ा नहीं है बस गले में एक चमकता लॉकेट है जोकि एक रिमोट कंट्रोल है। इसी रिमोट कंट्रोल की सहायता से वह अपने यान को वापस बुलाकर अपने ग्रह पर जा सकता है। नए ग्रह पर उतरने के बाद एक चोर उसका लॉकेट छीन कर भाग जाता है। भागते समय उसका ट्रांजिस्टर छूट जाता है। वह लोकेट अर्थात रिमोट की तलाश में इधर-उधर भटकता है, पर वह सफल नहीं हो पाता। आम बोलचाल की भाषा में लोग कहते हैं कि तेरी समस्या भगवान ही सुलझा सकते हैं। इसके बाद पीके भी अपने लॉकेट की मांग को लेकर भगवान का दरवाजा खटखटाता है। वह मंदिर, मस्जिद, गिरिजाघर और गुरुद्वारा तक पहुंचता है, लेकिन उसे लॉकेट नहीं मिलता।

इसी बीच स्वानंद किरकिरे लिखित एक सुन्दर गीत है जिसे सोनू निगम ने गाया है,- “सुना ये पूरी धरती तू चलाता है, मेरी भी सुन ले अर्ज मुझे घर बुलाता है, भगवान है कहां रे तू, हे खुदा है कहां रे तू…। फिल्म में यही एक मात्र स्थान है जहां ईश्वर की खोज में पीके की छटपटाहट दर्शकों के मन में ईश्वर के दर्शन की जिज्ञासा का भाव जाग्रत करता है। ईश्वर दर्शन के लिए यह छटपटाहट हिंदुत्व भावधारा की सुन्दर अभिव्यक्ति है। भारतीय इतिहास में अनेक महान भक्तों की जीवनी का प्रतिबिम्ब इस गीत में दिखाई देती है। शेष सभी जगह ईश्वर के अस्तित्व पर प्रश्न खड़े किए गए हैं। फिल्म में ऐसे संवाद हैं जिसके द्वारा यह बताया गया कि भगवान को पैसे देने पर भी वह काम नहीं करता।

ईश्वर, धार्मिक स्थल और पूजा पद्धति का उपहास

रिमोट की खोज में लगे पीके को शिवजी के भेष में एक व्यक्ति दिखाई देता है। पीके उसके पीछे लग जाता है, बाथरूम में वह उस व्यक्ति को बंद कर देता है। शिवजी का भेषधारी पीके की डर से इधर-उधर भागता है। यह दृश्य दर्शकों को हंसाता है। फिल्म के दर्शकों को मालूम है कि यह व्यक्ति शिवजी नहीं वरन शिवजी का भेषधारी है। पर विचार करनेवाली बात है कि पीके के निर्माता-निर्देशक को भेषधारी के नाम पर केवल शिवजी की ही कल्पना सूझी; उसे कोई मुल्ला, पाधरी आदि की कल्पना नहीं सूझी। इस शिवजी के भेषधारी वाले प्रसंग द्वारा हास्य प्रगट करने के चक्कर में पीके ने शिवजी और उसको माननेवाले करोड़ों जनता की भावनाओं को हताहत किया है। इसके बाद बात आती है शिवजी को दूध का अभिषेक कराने की। तर्क यह दिया गया कि शिव को दूध चढ़ाने के बजाय भूखे बच्चे को दूध पिलाना चाहिए।

क्या फिल्म निर्देशक शिवजी पर दूध के अभिषेक के बजाय शराब, नशा आदि अनेक व्यसनों पर किए जानेवाले रुपयों के खर्च को बालकों के भूख, शिक्षा, स्वास्थ्य और सुविधा में लगाने के लिए कह सकते थे। पर उन्होंने ऐसा नहीं किया। हमारे देश में ऐसे बहुत से तथाकथित समाज सुधारक बुद्धिजीवी पैदा हो गए हैं जिन्हें लगता है कि श्रावण माह के दौरान शिव की पूजा में दूध का चढ़ावा यानी दूध को बर्बाद करना है। फिल्म में पाखंड का खंडन के नाम पर इसी विचार को दर्शाया गया है। इसी तरह फिल्म बताता है कि मंदिर और उसके पुजारी जनता को ठगने, लूटने और भगवान का भय दिखाने के लिए बने हैं। इसी कड़ी में तपस्वी बाबा की भूमिका बनाई गई है। फिल्म में तपस्वी बाबा का सहारा लेकर मंदिर निर्माण का विरोध किया गया है। इतना ही नहीं तो तीर्थस्थलों की यात्रा के महत्त्व हो भी व्यर्थ बताया गया है और कहा गया है कि भक्त डरकर भगवान की पूजा करते हैं, जो कि सही नहीं है।

ऐसा नहीं कि पाखंड का विरोध नहीं होना चाहिए, निश्चित रूप से होना चाहिए। कई बाबाओं के उदाहरण आज हमारे सामने है। पर एकआध बाबा के तराजू में देश के अनगिनत संतों और महापुरुषों की मंशा पर सवाल खड़ा करना क्या उचित है? फिल्म के अंत में चार सन्देश दिए गए। चौथे सन्देश में कहा गया कि जो बाबा यह कहे कि वह ईश्वर से मिलाएगा तो समझना यह रोंग नम्बर है। फिल्म का यह सन्देश गलत है, क्योंकि भारतीय दर्शनशास्त्र के अनुसार जो ईश्वर की अनुभूति करा सके उसकी खोज करनी चाहिए। ईश्वर की अनुभूति करानेवाले तो सदगुरु होते हैं। गुरु-शिष्य परम्परा में इसका बहुत महत्त्व है। हमारा इतिहास गुरु-शिष्य की महान परम्परा के उदाहरणों से भरा पड़ा है। यह फिल्म इसी विचारधारा का विरोध करता है। फिल्म में अनावश्यक रूप से अनेक बार डांसिंग कार का प्रसंग ‘भारत में ऐसा होता है’, के तर्ज पर विदेशी कामुकता को खुले रूप से चित्रित किया गया है, जो बेहद आपत्तिजनक है।

विरोध के कारणों को समझें

पीके का विरोध कर रहे विश्व हिन्दू परिषद्, बजरंग दल आदि संगठनों पर मीडिया और तथाकथित सेकुलर दल के नेता (अखिलेश, नीतीश) व्यंग्य कस रहे हैं। पीके के संदेशों में कुछ हो न हो, हिन्दू मतों का विरोध के चलते इन्होंने अपने राज्य में इसे टैक्स फ्री तक कर दिया। पर इस फिल्म का विरोध कर रहे संगठनों का कहना है कि इस फिल्म में केवल हिन्दू दर्शन और देवी-देवताओं का उपहास किया गया है। इसमें इस्लाम और ईसाइयों में फैले अंधविश्वासों को छूने का प्रयास बिल्कुल नहीं किया गया। फिल्म निर्माताओं ने आतंकवाद कहां और कैसे पनपता है, यह विषय उठाने की हिम्मत नहीं दिखाई, बल्कि ‘लव जिहाद’ को बढ़ावा देते हुए हिन्दू युवतियों को भरमाने, उलझाने और बरगलाने का कुत्सित प्रयत्न इस फिल्म के माध्यम से किया गया है। यदि सचमुच यह फिल्म सदगुरु कबीर से प्रेरित होता तो यहां सभी मत, सम्प्रदायों और विचारधारा की गलती पर प्रहार होता। पर ऐसा नहीं है, इस फिल्म में टारगेट केवल हिन्दू संस्कृति है। संत कबीर त्रुटियों, पाखंड और पापों पर प्रहार करते थे पर यहां पर तो सीधे आस्था पर प्रहार है। कबीर साहब मनुष्य को ईश्वर के करीब लाते हैं और यह फिल्म ईश्वर के अस्तित्व पर ही सवाल खड़ा करता है। फिल्म निर्देशक का यह कहकर पल्ला झाड़ना कि फिल्म संत कबीर से प्रेरित है तो यह सही नहीं है। जो भी व्यक्ति थोड़ा ध्यान से इस फिल्म के कथानक को समझने का प्रयत्न करे तो बड़ी सहजता से फिल्म का हेतु स्पष्ट हो जाता है।

क्या सेंसर बोर्ड भारत के सामाजिक ताने-बाने से अनभिज्ञ हैं या इसमें भी भ्रष्टाचार का खेल है?  यह फिल्म सहजता से देशभर में प्रदर्शित हो गई और देश के बड़े पत्रकार और नेता फिल्म का समर्थन करते हैं। फिल्म को पसंद करना न करना, व्यक्तिगत मामला है पर जिस देश में बहुसंख्यक हिन्दू समाज के आस्था पर चोट की जाती है तो देश का कानून और राजतन्त्र को कोई शिकायत नहीं होती। इसी प्रकार का फिल्म यदि पाकिस्तान में मुस्लिम विरोधी होती तो क्या होता? बांग्लादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन ने इस सन्दर्भ में कहा कि यदि इस प्रकार की फिल्म पाकिस्तान या बांग्लादेश में बनती तो अभिनेता-निर्देशक जेल की कोठरी में होते या फिर बाहर रहते तो मार दिए जाते। गौरतलब है कि एक पाकिस्तानी मीडिया के कार्यक्रम में अभिनेत्री वीना मलिक और उनके पति बशीर के नकली निकाह में धार्मिक गीत बजाया गया तो वहां के न्यायालय ने वीना और बशीर सहित टीवी शो की मेजबान शाइस्ता वाहिदी को भी 26 साल कैद की सजा सुनाई।

पर यह भारत है, यहां ऐसा नहीं हो सकता। यहां का कानून अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को अधिकार देता है कि वह अपनी बातें जनता के समक्ष रख सकें। पर इस व्यवस्था को यह भी स्मरण में रखना जरुरी है कि अभिव्यक्ति स्वतंत्रता के नाम पर करोड़ों लोगों के मत, पंथ, पूजा-पद्धति और आस्था का माखौल न उड़ाया जाए। और हम सभी देशवासियों को जागरूक रहकर ऐसे फिल्मों में जो षड्यंत्र परोसा जाए उससे सावधान रहें, अपने विवेक को सदैव जगाए रखें। वैसे भाजपा नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी ने ‘पीके’ के फाइनेंसरों के तार आतंकवाद से जुड़े होने के आरोप लगाया है, आगे इसकी भी जांच हो सकती है।

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कबीर पंथ : स्थापना से वर्तमान यात्रा  

सदगुरु कबीर साहब और धनी धर्मदास
सदगुरु कबीर साहब और धनी धर्मदास

‘कबीर पंथ’ एक ऐसा पंथ है जो सदगुरु कबीर साहब के संदेशों को समाज जीवन में स्थापित करने के लिए प्रतिबद्ध है। सदगुरु कबीर की साखियों और पदों के माध्यम से मानवीय जीवन मूल्यों को समाज में आचरणीय बनाना जिसका लक्ष्य है। यह सर्वविदित है कि सदगुरु कबीर की वाणी भारतीय विचारधारा की अक्षय निधि है। यह विचार निधि किस रूप में, किसके माध्यम से हम तक पहुंचा, यह जानना आज बहुत ही प्रासंगिक है। वर्तमान वर्ष ‘श्री सदगुरु कबीर धर्मदास साहब वंशावली’ का यह पंच शताब्दी समारोह है।  

– लखेश्वर चंद्रवंशी ‘लखेश’

‘सदगुरु कबीर साहब’ जिससे भारत ही नहीं सारी दुनिया परिचित है। कबीरपंथी उन्हें ‘सदगुरु’ कहते हैं, साहित्यकार उन्हें ‘भक्तकवि’ कहते हैं और समाजसेवी उन्हें ‘समाज सुधारक’ के रूप में याद करते हैं। इस लेख में भी उनके लिए ‘सदगुरु’ ही लेखन अधिक युक्तिसंगत और उपयुक्त है क्योंकि सदगुरु कबीर की वाणियों को अपने जीवन का अभिन्न अंग माननेवाला हमारा सामान्य भारतीय समाज अपने पथदर्शक को ‘सदगुरु, गुरु अथवा संत’ के रूप में स्मरण करता है। परन्तु हमारे ही देश के कुछ तथाकथित विद्वानों ने सदगुरु कबीर साहब को ‘कबीरदास’ कहकर उनकी वाणियों को महज एक समाज सुधारक कवि के रूप में मंडित करना शुरू कर दिया, जो अबतक शुरू है। इतना ही नहीं तो कबीर पंथ के नाम पर अनेकों की दुकानें भी खुल गईं, जिसका एक उदाहरण (रामपाल) के रूप में उजागर हुआ है। आज इस समाज में जिस तरह पाखंडी बाबाओं की पोल खुल रही है, ऐसे में कबीर पंथ के उस महान परम्परा पर ध्यान केन्द्रित हो जाता है जो विगत 500 वर्षों से लगातार सदगुरु की वाणी-वचनों को देश और दुनिया तक पहुंचा रहा है। भारतीय दर्शन को सहज, सुगम, सटीक और सही परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करनेवाले सदगुरु कबीर साहब की वाणियों और उसके संवाहक आचार्यों की परम्परा का स्मरण इस दृष्टि से भी आवश्यक है, क्योंकि वर्तमान वर्ष ‘श्री सदगुरु कबीर धर्मदास साहब वंशावली’ का पंच शताब्दी में प्रवेश कर गया है।

कबीर साहित्य  

सदगुरु कबीर साहब ने अपने जीवनकाल में अनगिनत बातें कहीं, जो श्रुति रूप में आज भी देश के अनेक बोली-भाषाओं में प्रचलित है। पर वाणियों की प्रामाणिकता और विश्वसनीयता के तौर पर कबीरपंथ में अनेक ग्रंथ संगृहित है। साहित्य जगत में ‘बीजक’ को ही प्रामाणिक माना गया, तब हिंदी साहित्य के प्रखर विद्वान् आचार्य पंडित हजारीप्रसाद द्विवेदी ने अपनी रचना ‘कबीर’ में अनेक ग्रंथों का आधार लेकर यह बताने का सार्थक प्रयत्न किया कि महज कुछ पृष्ठों में संकलित ‘बीजक’ एकमात्र प्रामाणिक ग्रंथ नहीं हो सकता। इसपर यह तर्क दिया जा सकता है कि साधारण लेखक भी अपने जीवन काल में 20 से अधिक किताबों की रचना कर सकता है, तो सदगुरु कबीर जैसे प्रखर और क्रांतिकारी व्यक्तित्व का धनी अपने 119 वर्ष की आयु में केवल एक छोटी सी पुस्तिका में समा जाए, क्या इतनी ही वाणी कही होगी? भोर से संध्या तक समाज में व्याप्त कुरीतियों को समाप्त करने तथा समाज में नीति मूल्यों को स्थापित करने के लिए सार्थक प्रयत्न करनेवाले सदगुरु कबीर साहब ने निश्चय ही अनगिनत वाणियां कहीं हैं। आज जब हम उन वाणियों को पढ़ते-समझते और उससे प्रेरणा लेते हैं, तो उसके स्रोत को समझना बेहद जरुरी है।

सदगुरु कबीर साहब के वाणियों के लेखक और संकलनकर्ता धनी धर्मदास  

यूं तो धर्मदास साहब का नाम जुडावनदास था, परन्तु सदगुरु कबीर साहब के प्रति अनन्य भक्ति और समर्पण के चलते उन्होंने अपनी सारी सम्पत्ति समाजहित के लिए अर्पित कर दी। और तब सदगुरु को ‘नाम दान’ देकर धनी बना दिया और वे धनी धर्मदास कहलाए। इस सन्दर्भ में धर्मदास साहब ने लिखा है :-

संतों! हम तो सत्यनाम व्यापारी।

कोई कोई लादे कांसा पीतल, कोई कोई लौंग सुपारी।

हम तो लादे नाम धनी को, पूरन खेप हमारी।

पूंजी न घटी नफा चौगना, बनिज किया हम भारी।

नाम पदारथ लाद चला है, धर्मदास व्यापारी।।

धर्मदास साहब का जन्म मध्य प्रदेश के बांधवगढ़ में विक्रम संवत 1452 की कार्तिक पूर्णिमा को हुआ था। विकम संवत 1519 में व्यापार और तीर्थाटन के दौरान मथुरा में सदगुरु कबीर साहब से उनका सम्पर्क हुआ। उनकी दूसरी मुलाकात वि.सं. 1520 में हुई, जिसके बाद सदा के लिए सदगुरु ने उन्हें अपना बना लिया। धर्मदास साहब के निवेदन पर सदगुरु उनके गृहग्राम बांधवगढ़ आए। सदगुरु ने धर्मदास साहब, उनकी धर्मपत्नी आमीनमाता साहिबा और उनके द्वितीय पुत्र चुरामणिनाम साहब को आरती चौका कर दीक्षा प्रदान की। उल्लेखनीय है कि सदगुरु कबीर साहब ने धर्मदास साहब को नाम दान के साथ ही अटल ब्यालीस वंश का आशीर्वाद दिया, जिसके फलस्वरूप वि.सं.1538 में चुरामणि नाम साहब का प्रागट्य हुआ।

धनी धर्मदास साहब ने अनथक परिश्रम कर सदगुरु कबीर की अनगिनत वाणियों में से बहुत सी वाणियों को लिपिबद्ध किया, जिससे कुछ ग्रंथों की निर्मिती हो पाई, – बीजक, शब्दावली, साखीग्रंथ, कबीर सागर, सागर में ज्ञान सागर, अनुराग सागर, अम्बु सागर, विवेक सागर, सर्वज्ञ सागर, बोध सागर, ज्ञान प्रकाश, आत्मबोध, स्वसमवेद बोध, धर्म बोध, ज्ञान बोध, भवतारण बोध, मुक्ति बोध, चौका स्वरोदय, कबीर बानी, कर्म बोध, अमर मूल, ज्ञान स्थिति बोध, संतोष बोध, काया पांजी, पंच मुद्रा, श्वांस गुंजार, आगम-निगम बोध, सुमिरन बोध, गुरु महात्म्य, जीव धर्म बोध, स्वतंत्र ग्रंथ पूनो महात्म्य, ज्ञान स्वरोदय, गुरु गीता, आगम सन्देश, हंस मुक्तावली आदि। यह ज्ञान रूपी धन समाज जीवन में अविरल प्रवाहित होती रहे, इसके लिए सदगुरु कबीर साहब ने पंथ की स्थापना की और इसका दायित्व धनी धर्मदास और उनके ब्यालीस वंशों को दी।

कबीर पंथ की स्थापना और उनके संवाहक आचार्य 

गुरुगद्दी और कार्यकाल

सदगुरु कबीर साहब और धनी धर्मदास गुरु-शिष्य परम्परा के आदर्श हैं। धर्मदास साहब ने कबीर पंथ की आधारशिला रखनेवाले धर्मदास साहब का लोक गमन (निर्वाण) वि.सं. 1569 को हुआ। इसके बाद विक्रम संवत 1570 में स्वयं सदगुरु कबीर साहब ने धर्मदास साहब की धर्मपत्नी आमीनमाता साहिबा और संत समाज की उपस्थिति में उनके द्वितीय पुत्र चुरामणि नाम साहब जिन्हें मुक्तामणिनाम साहब भी कहा जाता है, को तिलक लगाकर गुरु गद्दी पर बैठाया। इस प्रकार मुक्तामणिनाम साहब कबीर पंथ के प्रथम आचार्य हुए। यह कबीर पंथ ‘श्री सदगुरु कबीर धर्मदास साहब वंशावली’ के नाम से आज दुनियाभर में जाना जाता है। कबीर पंथ के आचार्य को पंथ श्री कहा जाता है। कबीर पंथ के वंश परम्परा में गुरुगद्दी का स्थान और कालखंड प्रस्तुत है:-

पंथ श्री वचनवंश मुक्तामणिनाम साहब (बांधवगढ़, वि.सं 1570 से वि.सं. 1638 कुदुरमाल)

पंथ श्री सुदर्शननाम साहब (कुदुरमाल, वि.सं 1630 से वि.सं. 1690 रतनपुर)

पंथ श्री कुलपतिनाम साहब (रतनपुर, वि.सं 1690 से वि.सं. 1750 कुदुरमाल)

पंथ श्री प्रबोधगुरु (बालापीर) नाम साहब (कुदुरमाल, वि.सं 1750 से वि.सं. 1775 मंडला)

पंथ श्री केवलनाम साहब (मंडला, वि.सं 1775 से वि.सं. 1800 धमधा)

पंथ श्री अमोलनाम साहब (धमधा, वि.सं 1800 से वि.सं. 1825 मंडला)

पंथ श्री सुरतिसनेहीनाम साहब (मंडला, वि.सं 1825 से वि.सं. 1853 सिंघोड़ी)

पंथ श्री हक्कनाम साहब (सिंघोड़ी, वि.सं 1853 से वि.सं. 1890 कवर्धा)

पंथ श्री पाकनाम साहब (कवर्धा, वि.सं 1890 से वि.सं. 1912 कवर्धा)

पंथ श्री प्रगटनाम साहब  (कवर्धा, वि.सं 1912 से वि.सं. 1939 कवर्धा)

पंथ श्री धीरजनाम साहब (कवर्धा, 1936 में गद्दीशीन होने से पूर्व लोक गमन)

पंथ श्री उग्रनाम साहब (कवर्धा, वि.सं 1939 से वि.सं. 1971 दामाखेड़ा)

पंथ श्री दयानाम साहब  (दामाखेड़ा, वि.सं 1971 से वि.सं. 1984 दामाखेड़ा)

पंथ श्री गृन्धमुनिनाम साहब (दामाखेड़ा, वि.सं 1995 से वि.सं. 2048 दामाखेड़ा)

पंथ श्री प्रकाशमुनिनाम साहब (दामाखेड़ा, वि.सं 2046 से वर्तमान)

कबीर पंथ की वंशावली

इस प्रकार कबीर पंथ में 15 आचार्यों की पीढ़ी सेवारत हैं, जिन्होंने देश-विदेश में भ्रमण कर सदगुरु के वचनों को प्रसारित करने का कार्य किया। कबीर पंथ के 14वें आचार्य गृन्धमुनिनाम साहब के कार्यकाल में कबीर पंथ का तेजी से विस्तार हुआ। हिंदी साहित्य के प्रकांड विद्वानों, यथा,- आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, महादेवी वर्मा, डॉ. रामकुमार वर्मा जैसे साहित्यकार पंथ श्री गृन्धमुनिनाम साहब की विद्वता और ज्ञान के आगे नत थे। वर्तमान में पंथ श्री प्रकाशमुनिनाम साहब इस परम्परा के संवाहक आचार्य हैं। पंथ श्री प्रकाशमुनिनाम साहब (दामाखेड़ा) अपने पूर्ववर्ती आचार्यों की ही तरह ‘नाम स्मरण’, ‘शाकाहार के आग्रही और मांसाहार का कड़ा विरोध, ‘मनुष्य निर्माण’, ‘धर्म का मर्म’, ‘सामाजिक कुरीतियों का विरोध’, ‘प्रकृति के साथ विकास’, ‘सत्य धर्म का प्रचार’ आदि अनेक विषयों को प्रवचन के माध्यम से जन सामान्य तक पहुंचाया।

कबीर पंथ का वर्तमान मुख्यालय दामाखेड़ा (रायपुर, छत्तीसगढ़) है, दामाखेड़ा गुरु गद्दी की स्थापना विजयादशमी को हुई थी, विजयादशमी को ही पंथ श्री प्रकाशमुनिनाम साहब का भी प्रागट्य हुआ। अतः दामाखेड़ा में प्रतिवर्ष विजयादशमी को ‘भव्य शोभायात्रा’ निकाली जाती है, जिसमें पंथ श्री रथ पर सवार होकर दर्शन देते हैं। इस शोभायात्रा में देश-विदेश के लोग सम्मिलित होते हैं, विभिन्न राज्य के लोग और जनजाति भजन, गीत और नृत्य करते हैं। इसी प्रकार माघ माह की पूर्णिमा के अवसर पर लगभग एक सप्ताह तक संत समागम समारोह का आयोजन प्रतिवर्ष होता है, जहां दुनियाभर के लाखों लोग सहभागी होते हैं।