‘सरफरोशी की तमन्ना’ जिनके दिल में थीं

रामप्रसाद बिस्मिल-अशफाक उल्ला खां-रोशन सिंह
रामप्रसाद बिस्मिल-अशफाक उल्ला खां-रोशन सिंह

“सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है”। इस गीत के रचयिता महान क्रांतिकारी पंडित रामप्रसाद बिस्मिल, उनके महान क्रांतिकारी मित्र अशफ़ाक उल्ला खां और ठाकुर रोशन सिंह को 19 दिसम्बर, 1927 को अंग्रेजों ने फांसी दी थी। भारत की स्वतंत्रता के लिए सशस्त्र क्रांति का मार्ग चुनकर अपनी जवानी खपा देनेवाले इन बलिदानी वीरों को शत-शत नमन।

– लखेश्वर चंद्रवंशी ‘लखेश’

‘बलिदान’, यह एक महान शब्द है। यह ऐसा शब्द जिसमें समर्पण, भक्ति और प्रेरणा का आदर्श निहित है। इस महान शब्द को उच्चार करते ही भारतमाता के चरणों में अपना सर्वस्व न्योछावर करनेवाले क्रांतिकारियों का चेहरा आंखों के सामने आ जाता है। याद आता है उस गीत की पंक्तियां जो आज भी युवा हृदय को झकझोर देता है, उत्साह से भर देता है। वह गीत है, – सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है इस गीत के रचयिता महान क्रांतिकारी पंडित रामप्रसाद बिस्मिल, उनके महान क्रांतिकारी मित्र अशफ़ाक उल्ला खां और ठाकुर रोशन सिंह को 19 दिसम्बर, 1927 को अंग्रेजों ने फांसी दी थी। भारत की स्वतंत्रता के लिए सशस्त्र क्रांति का मार्ग चुनकर अपनी जवानी खपा देनेवाले इन बलिदानी वीरों को शत-शत नमन।

काकोरी कांड

स्वतंत्रता आन्दोलन में सशस्त्र क्रांति करनेवाले क्रांतिकारियों के पास इतनी धनराशी नहीं होती थी कि वे उन लोगों का भरण पोषण कर सकें जो अपना पूरा समय देश-सेवा के कार्यों में समर्पित करते थे। कभी-कभी क्रांतिकारियों को भूखा भी रहना पड़ता था। क्रांतिकारियों को सम्पर्क, पत्राचार, हथियार आदि के लिए पर्याप्त धन की आवश्यकता रहती थी। धन के अभाव में ये क्रांतिकारी मेहनत-मजदूरी कर धन एकत्रित करते थे। इसके बावजूद भी क्रांतिपथ पर धन का अभाव महसूस हुआ तो क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों के कब्जेवाले सरकारी खजानों पर डाका डालने की योजना बनाई।

एक विदेशी संगठन ने क्रांतिकारियों को गोला-बारूद देने का वादा किया था जिसको खरीदने के लिए बहुत सारे धन की आवश्यकता थी। रामप्रसाद का सुझाव था कि इस धन संचय के लिए जो खजाना रेलगाड़ियों द्वारा ले जाया जाता है उसे लूटा जाए। इस योजना पर गंभीर विचार करने के लिए बिस्मिल और आजाद के नेतृत्व में 8 अगस्त, 1925 को शाहजहांपुर में क्रांतिकारियों की एक महत्वपूर्ण बैठक हुई जिसमें हथियारों के लिए ट्रेन में ले जाए जानेवाले सरकारी खजाने को लूटने की योजना बनाई गई। क्रांतिकारी जिस धन को लूटना चाहते थे दरअसल वह धन अंग्रेजों ने भारतीयों से ही हड़पा था। 9 अगस्त, 1925 को राम प्रसाद बिस्मिल, चंद्रशेखर आजाद, अशफाक उल्ला खां, राजेंद्र लाहिड़ी, ठाकुर रोशन सिंह, सचिंद्र बख्शी, केशव चक्रवर्ती, बनवारी लाल,मुकुंद लाल और मन्मथ लाल गुप्त ने अपनी योजना को अंजाम देते हुए लखनऊ के नजदीक काकोरी में ट्रेन में ले जाए जा रहे सरकारी खजाने को लूट लिया। इतिहास में यह घटना काकोरी कांड के नाम से जानी जाती है।

काकोरी कांड को एक माह बीत गया पर अंग्रेज इस कांड से जुए एक भी व्यक्ति को पकड़ न सकी। इस कारण अंग्रेजों ने जाल बिछाया। अंग्रेजों ने इस सम्बन्ध में 10 क्रांतिकारियों के नाम का ‘सम्मन’ जारी किया तथा इसकी सूचना देनेवाले को 5 हजार रूपये इनाम की घोषणा कर दी गई। इन क्रांतिकारियों में रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां का भी नाम था। अंग्रेजों का यह जाल काम कर गया, रामप्रसाद और अशफाक को अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर लिया। इनपर ब्रिटिश सरकार के साथ युद्ध की घोषणा, हत्याएं, षड़यंत्र और डकैत का आरोप लगाकर उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई।

प्रेरक प्रसंग

फांसी लगने के एक दिन पहले रामप्रसाद की माँ मूलमति उनसे मिलने गई। माँ को देखकर रामप्रसाद की आंखों से आंसू निकल आए। रामप्रसाद के आंखों में आंसू देखकर माँ बोली, “बेटा यह क्या ? मैं अपने पुत्र को नायक मानती हूं। मैं सोचती थी कि मेरे बेटे का नाम सुनकर अंग्रेज सरकार भय से कांपने लगाती है। पर यह मैंने कभी नहीं सोचा था कि मेरा पुत्र मृत्यु को सामने देखकर डर जाएगा।यदि तुम्हें इस तरह रोते हुए मौत को गले लगाना था तो इस राह पर चले ही क्यों?”

रामप्रसाद की माँ के इस वचन को सुनकर पास खड़े सैनिक दांग रह गया। रामप्रसाद ने उत्तर देते हुए कहा, “मेरी प्यारी माँ, ये डर के आंसू नहीं है और न ही मुझे मृत्यु से डर लगता है। यह तो प्रसन्नता के आंसू हैं – ये आप जैसी बहादुर माँ का पुत्र होने की ख़ुशी है जो आँखों से अश्रु बनकर छलक पड़ी।”

देशभक्ति रचनाओं में

आज रामप्रसाद, आजाद, अशफाक, भगत सिंह आदि अनगिनत क्रांतिकारी हमारे बीच नहीं हैं। पर उनका जीवन और उनकी रचनाएं आज भी युवा मन को देशभक्ति के भाव से भर देता है। उल्लेखनीय है कि पंडित रामप्रसाद बिस्मिल और अशफ़ाक उल्ला खां दोनों गहरे मित्र थे। दोनों उच्च कोटि के शायर, कवि और लेखक थे। दोनों ने अपने क्रांतिकारी जीवन में अनेक देशभक्तिपरक शायरी, कविता और गीतों की रचना की। बलिदान के एक दिन पहले रामप्रसाद बिस्मिल ने लिखा :-

“यदि देश के हित मरना पड़े मुझको सहस्त्रों बार भी।

तो भी न मैं इस कष्ट को, निज ध्यान में लाऊं कभी।।

हे ईश ! भारतवर्ष में शतवार मेरा जन्म हो।

कारण सदा ही मृत्यु का देशोपकारक कर्म हो।।

मरते हैं बिस्मिल, रोशन, लाहिड़ी अत्याचार से।

होंगे पैदा सैंकड़ों, उनके रूधिर की धार से।।

उनके प्रबल उद्योग से, उद्धार होगा देश का।

तब नाश होगा सर्वदा, दुख शोक के लवलेश का।।

अशफाक उल्ला खां महात्मा गांधी से काफी प्रभावित थे। गांधीजी द्वारा जब चौरी चौरा की घटना के बाद असहयोग आंदोलन वापस ले लिया। इससे अशफाक के मन को अत्यंत पीड़ा पहुंची। इसके बाद वे रामप्रसाद बिस्मिल तथा चंद्रशेखर आजाद आदि क्रांतिकारियों के सम्पर्क में आए थे। अशफ़ाक उल्ला खां की यह रचना देखिए :-

“कस ली है कमर अब तो, कुछ करके दिखाएंगे,

आज़ाद ही हो लेंगे, या सर ही कटा देंगे।

हटने के नहीं पीछे, डरकर कभी ज़ुल्मों से

तुम हाथ उठाओगे, हम पैर बढ़ा देंगे।

बेशस्त्र नहीं है हम, बल है हमें चरख़े का,

चरख़े से जमीं को हम, ता चर्ख गूंजा देंगे।

परवा नहीं कुछ दम की, गम की नहीं, मातम की

है जान हथेली पर, एक दम में गंवा देंगे।

उफ़ तक भी जुबां से हम हरगिज़ न निकालेंगे,

तलवार उठाओ तुम, हम सर को झुका देंगे।

सीखा है नया हमने लड़ने का यह तरीका,

चलवाओ गन मशीनें, हम सीना अड़ा देंगे।

दिलवाओ हमें फांसी, ऐलान से कहते हैं

खूं से ही हम शहीदों के, फ़ौज बना देंगे।

मुसाफ़िर जो अंडमान के तूने बनाए ज़ालिम,

आज़ाद ही होने पर, हम उनको बुला लेंगे।”

 

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धार्मिक मुद्दे पर ओबामा की व्यर्थ नसीहत   

obamaअमेरिकी राष्ट्राध्यक्ष बराक ओबामा द्वारा “भारत को धार्मिक आधार पर नहीं बंटने” की नसीहत देना कितना भी अच्छा क्यों न हो, पर वह हमें पीड़ा देता है।

– लखेश्वर चंद्रवंशी ‘लखेश’

तीन दिवसीय भारत यात्रा के अंतिम दिन दिल्ली स्थित सिरीफोर्ट आडिटोरियम में अपने संबोधन में अमेरिका के राष्ट्राध्यक्ष बराक ओबामा भारत के विकास में धार्मिक सहिष्णुता को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि भारत तब तक सफल रहेगा जब तक वह धार्मिक आधार पर नहीं बंटेगा। हालांकि, ओबामा ने अपने भाषण में महिलाओं के उत्थान, शिक्षा, स्वास्थ्य, वैज्ञानिक और सामरिक सहयोग जैसे कई महत्वपूर्ण विषयों पर बातें की लेकिन भारत के समाचार पत्रों का शीर्ष समाचार “भारत तब तक सफल रहेगा जब तक वह धार्मिक आधार पर नहीं बंटेगा” के रूप में इस तरह प्रकाशित हुआ मानों भारत में धर्म के आधार पर विभाजन का घोर संकट मंडरा रहा हो।

यह सच है कि सन 1947 को भारतीय मुसलमानों के कुछ नेताओं के जिद और हिन्दू विरोधी दुर्भावना के चलते भारत का विभाजन हुआ, और एक अखंड भारतवर्ष भारत और पाकिस्तान के रूप में खंडित हो गया। धार्मिक अलगाव के फलस्वरूप हुए देश के इस विभाजन को भारत कभी भूल नहीं सकता। यह विभाजन भारत के लिए आज सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़ा है। इस विभाजन का मूल कारण मुसलमानों का अलग देश बनाने की मंशा रही है, पर इससे भी बड़ा कारण अंग्रेजों की “फूट डालो और राज करो” की नीति रही है। सन 1857 से लेकर 1914 तक भारतीय मुसलमानों ने भारत की सम्पूर्ण स्वतंत्रता के लिए हिंदुओं के साथ मिलकर अंग्रेजों से संघर्ष किया, पर उसके बाद मुसलमानों के मन में अलग “मुस्लिम देश” की चाह अंग्रेजों ने ही जगाई। इतना ही नहीं तो अंग्रेजों ने अलगाववादी विचार रखनेवाले मुस्लिम नेताओं को पोषित करने का कुटिल चाल चला। अंग्रेजों की इस धूर्तता के फेर में तो गांधी जैसे महात्मा भी फंस गए और भारत का विभाजन हो गया। धार्मिक आधार पर भारत का बंटवारा तो अंग्रेजों ने ही किया। ऐसे में अमेरिकी राष्ट्राध्यक्ष बराक ओबामा द्वारा “भारत को धार्मिक आधार पर नहीं बंटने” की नसीहत देना कितना भी अच्छा क्यों न हो, पर वह हमें पीड़ा देता है। पर यह सवाल मन में आता है कि बराक ओबामा क्या अपने देश के ईसाई मिशनरियों को यह पाठ पढ़ाएंगे कि सभी धर्म-सम्प्रदाय एक ही बगीचे के फूल हैं, तो आप भारत के लोगों का धर्मांतरण करने क्यों जाते हैं?

सच है कि पाकिस्तान पोषित आतंकवाद ने हमेशा ही भारत की शांति और सौहार्द्र भाव पर आघात किया है। दुनिया जानती है कि भारत के विरोध में जन्मा पाकिस्तान आतंकवाद और घुसपैठ की नीति अपनाता है। पर यह बात भी किसी से छिपी नहीं कि अमेरिका प्रतिवर्ष आधुनिक हथियार और अरबों रूपये की सहायता राशि देकर पाकिस्तान का मनोबल बढ़ाता है। इसलिए बराक ओबामा के वक्तव्य के निहितार्थ को भारतीय परिप्रेक्ष्य में समझना चाहिए।

इधर ओबामा के इस बयान पर कांग्रेस को मोदी सरकार और संघ परिवार पर व्यंग्य करने का बहाना मिल गया। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने ट्वीट किया, “ओबामा ने मोदी को आयना दिखा दिया। शाबाश ओबामाजी। मोदीजी आपकी चाय पर गपशप में भारतीय संविधान की धारा 25 पर चर्चा तो हुई होगी? सबक़ लीजिए।” दिग्विजय ने एक के बाद एक कई ट्विट्स किए और ओबामा के इस नसीहत के बहाने मोदी से कई सवाल पूछे। दिग्विजय ने ट्वीट किया, क्या मोदी अपने दोस्त बराक ओबामा की सलाह को मानेंगे। क्या वीएचपी और मोहन भागवत को घर वापसी से रोकेंगे?” कांग्रेस का यह बयान हास्यास्पद तो है ही, साथ ही मूर्खतापूर्ण भी है। कांग्रेस संघ और भाजपा का विरोध का कोई अवसर नहीं छोड़ती। वह ओबामा के नसीहत के बहाने मीडिया के सम्मुख इस तरह बयान दे रही थी मानों संघ और भाजपा ही देश को धार्मिक स्तर पर बांट रही है।

कांग्रेस को क्या इस बात का स्मरण है कि ओबामा ने अपने भाषण विश्व धर्म सम्मलेन का उल्लेख करते हुए कहा, – स्वामी विवेकानन्द ने 100 साल पहले कहा था-” सिस्टर्स एंड ब्रदर्स आफ अमेरिका”, आज मैं आपसे कहता हूं-” सिस्टर्स एंड ब्रदर्स आफ इंडिया”। ओबामा ने या भी कहा कि स्वामी विवेकानन्द ने हिंदुत्व और योग को अमेरिका तक पहुंचाया। क्या कांग्रेस स्वामी विवेकानन्द द्वारा विश्वपटल पर दिए गए ‘हिंदुत्व’ के उस सन्देश को जिसका ओबामा ने उल्लेख किया, को मानेंगे? अबतक तो ऐसा नहीं हुआ। कांग्रेस जो सेकुलर होने का ढोंग करती है, ने कभी हिंदुओं के हित की बात नहीं की। यही कारण है कि आज उसकी छवि सेकुलर दल के बजाय ‘हिन्दू विरोधी’ बन गई है।

सूर्य को समर्पित महापर्व ‘मकर संक्रांति’

Makar-Sankranti-parvaमकर संक्रांति भगवान सूर्य को समर्पित भारतवर्ष का महान पर्व है। दुनियाभर में रहनेवाले लोगों के लिए सूर्य एक प्राकृतिक तत्त्व या एक महत्वपूर्ण ग्रह है, पर भारतवर्ष में सूर्य को भगवान के रूप में पूजा जाता है। भगवान इसलिए क्योंकि सूर्य ऊर्जा और प्राण का स्रोत है, जिसके बिना जीवन संभव ही नहीं। इसलिए हिन्दू उपासना पद्धति में सूर्य की आराधना का विशेष महत्त्व है, ‘मकर संक्रांति’ इसी आराधना का महत्वपूर्ण उत्सव है।   

– लखेश्वर चन्द्रवंशी ‘लखेश’

मकर संक्रांति भगवान सूर्य को समर्पित भारतवर्ष का महान पर्व है। दुनियाभर में रहनेवाले लोगों के लिए सूर्य एक प्राकृतिक तत्त्व या एक महत्वपूर्ण ग्रह है, पर भारतवर्ष में सूर्य को भगवान के रूप में पूजा जाता है। भगवान इसलिए क्योंकि सूर्य ऊर्जा और प्राण का स्रोत है, जिसके बिना जीवन संभव ही नहीं। सूर्य का प्रकाश जीवन का प्रतीक है और चन्द्रमा भी सूर्य के प्रकाश से आलोकित है। सूर्य अनुशासन, प्रामाणिकता, गतिमान संतुलन और सातत्य का महान आदर्श है। इसलिए हिन्दू उपासना पद्धति में सूर्य की आराधना का विशेष महत्त्व है, ‘मकर संक्रांति’ इसी आराधना का महत्वपूर्ण उत्सव है।

यूं तो भारतीय काल गणना के अनुसार वर्ष में बारह संक्रांतियां होती हैं, जिसमें ‘मकर संक्रांति’ का महत्व अधिक माना गया है। इस दिन से सूर्य मकर राशि में प्रवेश करने लगता है, इसलिए इसे मकर संक्रांति कहते हैं। इसी दिन से सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण में गति करने लगता है, अतः इसे सौरमास भी कहते हैं। इसी दिन से सौर नववर्ष की शुरुआत होती है। इस अवसर पर लोग पवित्र नदियों एवं तीर्थस्थलों पर स्नान कर भगवान सूर्य की आराधना करते हैं। सूर्य आराधना का यह पर्व भारत के सभी राज्यों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। भारत के विभिन्न प्रांतों में इस त्यौहार को मनाए जाने के ढंग में भी भिन्नता है, लेकिन उत्सव का मूल हेतु सूर्य की आराधना करना ही है। मकर सक्रांति को पतंग उत्सव, तिल संक्रांति, पोंगल आदि नामों से भी जाना जाता है। इस दिन  तिल-गुड़ खाने-खिलाने, सूर्य को अर्ध्य देने और पतंग उड़ाने का रिवाज है। इस दिन से दिन धीरे-धीरे बड़ा होने लगता है।

धार्मिक मान्यता : मकर संक्रांति से अनेक पौराणिक कथाएं जुड़ी हुई हैं। मान्यता है कि इस दिन भगवान सूर्य अपने पुत्र शनि से मिलने स्वयं उसके घर जाया करते हैं। शनिदेव चूंकि मकर राशि के स्वामी हैं, अतः इस दिन को मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है। मकर संक्रांति के दिन ही गंगाजी भागीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर आगे बढ़ी थी। यह भी कहा जाता है कि गंगा को धरती पर लानेवाले महाराज भगीरथ ने अपने पूर्वजों के लिए इस दिन तर्पण किया था। उनका तर्पण स्वीकार करने के बाद इस दिन गंगा समुद्र में जाकर मिल गई थी। इसलिए मकर संक्रांति पर गंगा सागर में मेला लगता है।

महाभारत काल में वयोवृद्ध योद्धा पितामह भीष्म ने भी अपनी देह त्यागने के लिए मकर संक्रांति का ही चयन किया था। कहा जाता है कि भगवान विष्णु ने इसी दिन असुरों का अंत कर युद्ध समाप्ति की घोषणा की थी। इस प्रकार यह दिन बुराइयों को समाप्त करने का दिन भी माना जाता है। ऐसी भी मान्यता है कि माता यशोदा ने जब पुत्र प्राप्ति के लिए व्रत किया था तब सूर्य उत्तरायण काल में पदार्पण कर रहे थे और उस दिन मकर संक्रांति थी। कहा जाता है तभी से मकर संक्रांति व्रत का प्रचलन हुआ।

खिचड़ी पर्व : उत्तर प्रदेश में मकर संक्रांति को खिचड़ी पर्व भी कहा जाता है। खिचड़ी बनने की परंपरा को शुरू करनेवाले बाबा गोरखनाथ थे। कहा जाता है कि अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के समय नाथ योगियों को खिलजी से संघर्ष के कारण भोजन बनाने का समय नहीं मिल पाता था। इससे योगी अक्सर भूखे रह जाते थे। इस समस्या का समाधान स्वरूप बाबा गोरखनाथ ने दाल, चावल और सब्जी को एक साथ पकाने की सलाह दी। बाबा गोरखनाथ ने इस व्यंजन का नाम खिचड़ी रखा। इस तरह झटपट बननेवाली खिचड़ी से नाथयोगियों की भोजन की समस्या का समाधान हो गया और खिलजी के आतंक को दूर करने में वे सफल रहे। खिलजी पर विजय प्राप्त करने के कारण गोरखपुर में मकर संक्रांति को विजय दर्शन पर्व के रूप में भी मनाया जाता है। उल्लेखनीय है कि गोरखपुर के बाबा गोरखनाथ के मंदिर के पास मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी मेला आरंभ होता है। कई दिनों तक चलनेवाले इस मेले में बाबा गोरखनाथ को खिचड़ी का भोग चढ़ाया जाता है और इसे प्रसाद रूप में वितरित किया जाता है।

Makar-Sankranti-parva-1पतंगबाजी का आनंद : प्राचीनकाल से ही मनुष्य की इच्छा रही है कि वह मुक्त आकाश में उड़े। संभवतः इसी इच्छा ने पतंग की उत्पत्ति हुई होगी। गुजरात और महाराष्ट्र में मकर संकांति के दिन पतंग उड़ाने की परम्परा है। इस दिन चारों ओर वो काट, कट गई, पकड़ो का शोर मचता है। गुजरात का अहमदाबाद भारत सहित पूरे विश्व में पतंगबाजी के लिए प्रसिद्ध है। प्रतिवर्ष मकर संक्रांति के अवसर पर यहां अंतरराष्ट्रीय पतंग महोत्सव का आयोजन होता है।

नशा का यह जूनून आहत करनेवाला है

smoking-Girlsएक तरफ देश के नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देश और दुनिया में भारत का वर्णन “युवा देश” के रूप में कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर शिक्षित युवा वर्ग आधुनिकता के नाम पर नशाखोरी को अपने जीवन शैली का अंग मानने लगे हैं। आज नशाखोरी से देश का हर गली, मोहल्ला, नगर, ग्राम, स्कूल, कॉलेज, पर्व, उत्सव आदि कुछ भी अछूता नहीं है। नशाखोरी का यह फैशन युवकों में ही नहीं, युवतियों में भी तेज गति से बढ़ रही है जो बेहद चिंताजनक है।

– लखेश्वर चंद्रवंशी ‘लखेश’

भारतीय नारी का अतीत संसार के अन्य नारियों से कहीं अधिक आदर्श और प्रेरणादायी रही है। आज भी करोड़ों महिलाएं चाहे वह शिक्षित हो अथवा निरक्षर, अपनी बुद्धिमत्ता, ममता, करुणा और मेहनत से परिवार, समाज और राष्ट्र के भविष्य का निर्माण कर रही है। आज भी भारतीय समाज दुनिया के लिए प्रेरणा का स्रोत है जहां परिवार को स्वास्थ्य, सुरक्षित और संस्कारवान बनाने में महारत हासिल है। इसका मुख्य कारण है कि हमारे समाज की स्त्रियां, जो भारतीय जीवन मूल्यों को अपने परिवार में सहजता से स्थापित कर उसे समृद्ध बनाती हैं। यदि ऐसा कहा जाए कि भारत की महानता के पीछे स्त्रीत्व की सबसे बड़ी भूमिका है, तो यह गलत नहीं होगा।

आज जिस तरह से दुनिया में बाहरी चमक-धमक और नशा की लत बढ़ी है, उसका प्रभाव निश्चित रूप से भारत में भी दिखाई देता है। हमारे देश के युवाओं में जिस तरह शराब, सिगरेट, बीड़ी, तम्बाखू, ड्रग्स आदि के प्रति आकर्षण बढ़ा है, बहुत चिंताजनक है। हजारों रुपये की नौकरी करनेवाले युवाओं से लेकर बेरोजगार, हताश और मौज-मस्ती में दिन गुजरनेवाले करोड़ों युवा इस नशा के शिकार हैं। एक तरफ देश के नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देश और दुनिया में भारत का वर्णन “युवा देश” के रूप में कर रहे हैं, वहीं नशा के अधीन हो चुके युवाओं से उनके परिवारजन परेशान हैं, विशेषकर माताएं। प्रत्येक माँ अपनी बेटी के लिए योग्य वर की खोज करती है, उसका पहला मापदंड होता है कि वर किसी मद्य सेवन अथवा कोई अन्य नशा के लत में न पड़ा हो। युवती भी अपने लिए योग्य वर की तलाश में सबसे पहला यही मापदंड रखती हैं कि उसका पति शराबी न हो। यह दृष्टिकोण दर्शाता है कि नशा के अधीन हो चुके परिवार कभी भी स्त्री जीवन के लिए उपयुक्त नहीं है। ऐसे में युवाओं में बढ़ते नशाखोरी के प्रति जागरूकता लाना अति आवश्यक है।

एक तरफ माता-पिता अपने पुत्र और पुत्रियों को उच्च शिक्षा देकर उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए अनथक प्रयत्न करते हैं, तो दूसरी ओर शिक्षित वर्ग आधुनिकता के नाम पर नशाखोरी को अपने जीवन शैली का अंग मानने लगे हैं। आज नशाखोरी से देश का हर गली, मोहल्ला, नगर, ग्राम, स्कूल, कॉलेज, पर्व, उत्सव आदि कुछ भी अछूता नहीं है। नशाखोरी का यह फैशन युवकों में ही नहीं, युवतियों में भी तेज गति से बढ़ रही है जो बेहद चिंताजनक है। वर्ल्ड एंटी स्मोकिंग डे पर हुए एक सर्वे के मुताबिक दिल्ली विश्वविद्यालय की 70 प्रतिशत युवतियां और 31 फिसद युवक ‘स्मोकर्स’ पाए गए। इनमें से हर कोई लगभग 14 सिगरेट रोज पीता है। बीस साल की उम्र तक पहुंचते ही युवा सिगरेट के आदी हो जाते हैं। करीब 83 फीसद युवा और 87 फीसद युवतियां सिर्फ मस्ती के लिए सिगरेट पीती हैं। हाई सोसाइटी की महिलाएं सिगरेट पीने को अपना स्टाइल मानती हैं। महिलाओं में यह लत तेजी से पनप रही है।

कल्पना कीजिए कि, यदि भारत की सभी महिलाएं और स्त्रियां शराब, तम्बाखू, ड्रग्स आदि के नशा से ग्रस्त हो जाएं, तो इस देश का क्या हाल होगा ? परिवारों और समाज की क्या स्थिति होगी ? सोचकर ही मन घबरा जाता है। ऐसे अनगिनत महिलाएं हैं जिनके पति ने उन्हें त्याग दिया है अथवा उनका निधन हो गया है, फिर भी पवित्रता, पुरुषार्थ और ममत्व के बल पर अपने परिवार के बड़े-बुजुर्गों की सेवा और बालक-बालिकाओं को शिक्षित, सक्षम और संस्कारवान बनाया। ऐसे में भारतीय समाज की उन करोड़ों महिलाओं को नमन करने का मन होता है, जिन्होंने भारतीय समाज को नशा के गर्त से उबारने का महान प्रयत्न किया है। पर आज जिस तरह फैशन, स्टाइल और आधुनिकता के नाम पर नशा का जूनून युवतियों में दिखाई दे रहा है, वे बड़ी आहत करनेवाली है। भारतीय समाज का रीढ़ स्त्री जीवन है; यदि वह ही बहकने लग जाए तो समाज को कौन बचाएगा?

‘आप’ की जीत में हरा रंग छाया…

arvind-kejriwal

‘आप’ की जीत में हरा रंग छाया है।

केजरीवाल को बधाई देने,

सारा सेकुलर दल आगे आया है।

केसरिया रंग को देखते ही,

सेकुलरवादी खीजते हैं, चिल्लाते हैं।

पर हरा रंग देख कर न जाने क्यों मुस्कुराते हैं?

केजरीवाल के विजय क्षण पर तिरंगे का केसरिया गायब रहा,

रंग केसरी स्वच्छ राजनीति के लोगों के न लायक रहा।

छोटी सी दिल्ली में भाजपा की हार

मोदी विरोधियों के मन में खूब छाया है,

पर यह भी सोचो देशबंधुओं कि,

“आप” पार्टी को जीत की बधाई देने,

पाकिस्तान, चीन और दुबई से क्यों फोन आया है?

– लखेश्वर चंद्रवंशी ‘लखेश’