धार्मिक मुद्दे पर ओबामा की व्यर्थ नसीहत   

obamaअमेरिकी राष्ट्राध्यक्ष बराक ओबामा द्वारा “भारत को धार्मिक आधार पर नहीं बंटने” की नसीहत देना कितना भी अच्छा क्यों न हो, पर वह हमें पीड़ा देता है।

– लखेश्वर चंद्रवंशी ‘लखेश’

तीन दिवसीय भारत यात्रा के अंतिम दिन दिल्ली स्थित सिरीफोर्ट आडिटोरियम में अपने संबोधन में अमेरिका के राष्ट्राध्यक्ष बराक ओबामा भारत के विकास में धार्मिक सहिष्णुता को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि भारत तब तक सफल रहेगा जब तक वह धार्मिक आधार पर नहीं बंटेगा। हालांकि, ओबामा ने अपने भाषण में महिलाओं के उत्थान, शिक्षा, स्वास्थ्य, वैज्ञानिक और सामरिक सहयोग जैसे कई महत्वपूर्ण विषयों पर बातें की लेकिन भारत के समाचार पत्रों का शीर्ष समाचार “भारत तब तक सफल रहेगा जब तक वह धार्मिक आधार पर नहीं बंटेगा” के रूप में इस तरह प्रकाशित हुआ मानों भारत में धर्म के आधार पर विभाजन का घोर संकट मंडरा रहा हो।

यह सच है कि सन 1947 को भारतीय मुसलमानों के कुछ नेताओं के जिद और हिन्दू विरोधी दुर्भावना के चलते भारत का विभाजन हुआ, और एक अखंड भारतवर्ष भारत और पाकिस्तान के रूप में खंडित हो गया। धार्मिक अलगाव के फलस्वरूप हुए देश के इस विभाजन को भारत कभी भूल नहीं सकता। यह विभाजन भारत के लिए आज सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़ा है। इस विभाजन का मूल कारण मुसलमानों का अलग देश बनाने की मंशा रही है, पर इससे भी बड़ा कारण अंग्रेजों की “फूट डालो और राज करो” की नीति रही है। सन 1857 से लेकर 1914 तक भारतीय मुसलमानों ने भारत की सम्पूर्ण स्वतंत्रता के लिए हिंदुओं के साथ मिलकर अंग्रेजों से संघर्ष किया, पर उसके बाद मुसलमानों के मन में अलग “मुस्लिम देश” की चाह अंग्रेजों ने ही जगाई। इतना ही नहीं तो अंग्रेजों ने अलगाववादी विचार रखनेवाले मुस्लिम नेताओं को पोषित करने का कुटिल चाल चला। अंग्रेजों की इस धूर्तता के फेर में तो गांधी जैसे महात्मा भी फंस गए और भारत का विभाजन हो गया। धार्मिक आधार पर भारत का बंटवारा तो अंग्रेजों ने ही किया। ऐसे में अमेरिकी राष्ट्राध्यक्ष बराक ओबामा द्वारा “भारत को धार्मिक आधार पर नहीं बंटने” की नसीहत देना कितना भी अच्छा क्यों न हो, पर वह हमें पीड़ा देता है। पर यह सवाल मन में आता है कि बराक ओबामा क्या अपने देश के ईसाई मिशनरियों को यह पाठ पढ़ाएंगे कि सभी धर्म-सम्प्रदाय एक ही बगीचे के फूल हैं, तो आप भारत के लोगों का धर्मांतरण करने क्यों जाते हैं?

सच है कि पाकिस्तान पोषित आतंकवाद ने हमेशा ही भारत की शांति और सौहार्द्र भाव पर आघात किया है। दुनिया जानती है कि भारत के विरोध में जन्मा पाकिस्तान आतंकवाद और घुसपैठ की नीति अपनाता है। पर यह बात भी किसी से छिपी नहीं कि अमेरिका प्रतिवर्ष आधुनिक हथियार और अरबों रूपये की सहायता राशि देकर पाकिस्तान का मनोबल बढ़ाता है। इसलिए बराक ओबामा के वक्तव्य के निहितार्थ को भारतीय परिप्रेक्ष्य में समझना चाहिए।

इधर ओबामा के इस बयान पर कांग्रेस को मोदी सरकार और संघ परिवार पर व्यंग्य करने का बहाना मिल गया। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने ट्वीट किया, “ओबामा ने मोदी को आयना दिखा दिया। शाबाश ओबामाजी। मोदीजी आपकी चाय पर गपशप में भारतीय संविधान की धारा 25 पर चर्चा तो हुई होगी? सबक़ लीजिए।” दिग्विजय ने एक के बाद एक कई ट्विट्स किए और ओबामा के इस नसीहत के बहाने मोदी से कई सवाल पूछे। दिग्विजय ने ट्वीट किया, क्या मोदी अपने दोस्त बराक ओबामा की सलाह को मानेंगे। क्या वीएचपी और मोहन भागवत को घर वापसी से रोकेंगे?” कांग्रेस का यह बयान हास्यास्पद तो है ही, साथ ही मूर्खतापूर्ण भी है। कांग्रेस संघ और भाजपा का विरोध का कोई अवसर नहीं छोड़ती। वह ओबामा के नसीहत के बहाने मीडिया के सम्मुख इस तरह बयान दे रही थी मानों संघ और भाजपा ही देश को धार्मिक स्तर पर बांट रही है।

कांग्रेस को क्या इस बात का स्मरण है कि ओबामा ने अपने भाषण विश्व धर्म सम्मलेन का उल्लेख करते हुए कहा, – स्वामी विवेकानन्द ने 100 साल पहले कहा था-” सिस्टर्स एंड ब्रदर्स आफ अमेरिका”, आज मैं आपसे कहता हूं-” सिस्टर्स एंड ब्रदर्स आफ इंडिया”। ओबामा ने या भी कहा कि स्वामी विवेकानन्द ने हिंदुत्व और योग को अमेरिका तक पहुंचाया। क्या कांग्रेस स्वामी विवेकानन्द द्वारा विश्वपटल पर दिए गए ‘हिंदुत्व’ के उस सन्देश को जिसका ओबामा ने उल्लेख किया, को मानेंगे? अबतक तो ऐसा नहीं हुआ। कांग्रेस जो सेकुलर होने का ढोंग करती है, ने कभी हिंदुओं के हित की बात नहीं की। यही कारण है कि आज उसकी छवि सेकुलर दल के बजाय ‘हिन्दू विरोधी’ बन गई है।

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