सूर्य को समर्पित महापर्व ‘मकर संक्रांति’

Makar-Sankranti-parvaमकर संक्रांति भगवान सूर्य को समर्पित भारतवर्ष का महान पर्व है। दुनियाभर में रहनेवाले लोगों के लिए सूर्य एक प्राकृतिक तत्त्व या एक महत्वपूर्ण ग्रह है, पर भारतवर्ष में सूर्य को भगवान के रूप में पूजा जाता है। भगवान इसलिए क्योंकि सूर्य ऊर्जा और प्राण का स्रोत है, जिसके बिना जीवन संभव ही नहीं। इसलिए हिन्दू उपासना पद्धति में सूर्य की आराधना का विशेष महत्त्व है, ‘मकर संक्रांति’ इसी आराधना का महत्वपूर्ण उत्सव है।   

– लखेश्वर चन्द्रवंशी ‘लखेश’

मकर संक्रांति भगवान सूर्य को समर्पित भारतवर्ष का महान पर्व है। दुनियाभर में रहनेवाले लोगों के लिए सूर्य एक प्राकृतिक तत्त्व या एक महत्वपूर्ण ग्रह है, पर भारतवर्ष में सूर्य को भगवान के रूप में पूजा जाता है। भगवान इसलिए क्योंकि सूर्य ऊर्जा और प्राण का स्रोत है, जिसके बिना जीवन संभव ही नहीं। सूर्य का प्रकाश जीवन का प्रतीक है और चन्द्रमा भी सूर्य के प्रकाश से आलोकित है। सूर्य अनुशासन, प्रामाणिकता, गतिमान संतुलन और सातत्य का महान आदर्श है। इसलिए हिन्दू उपासना पद्धति में सूर्य की आराधना का विशेष महत्त्व है, ‘मकर संक्रांति’ इसी आराधना का महत्वपूर्ण उत्सव है।

यूं तो भारतीय काल गणना के अनुसार वर्ष में बारह संक्रांतियां होती हैं, जिसमें ‘मकर संक्रांति’ का महत्व अधिक माना गया है। इस दिन से सूर्य मकर राशि में प्रवेश करने लगता है, इसलिए इसे मकर संक्रांति कहते हैं। इसी दिन से सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण में गति करने लगता है, अतः इसे सौरमास भी कहते हैं। इसी दिन से सौर नववर्ष की शुरुआत होती है। इस अवसर पर लोग पवित्र नदियों एवं तीर्थस्थलों पर स्नान कर भगवान सूर्य की आराधना करते हैं। सूर्य आराधना का यह पर्व भारत के सभी राज्यों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। भारत के विभिन्न प्रांतों में इस त्यौहार को मनाए जाने के ढंग में भी भिन्नता है, लेकिन उत्सव का मूल हेतु सूर्य की आराधना करना ही है। मकर सक्रांति को पतंग उत्सव, तिल संक्रांति, पोंगल आदि नामों से भी जाना जाता है। इस दिन  तिल-गुड़ खाने-खिलाने, सूर्य को अर्ध्य देने और पतंग उड़ाने का रिवाज है। इस दिन से दिन धीरे-धीरे बड़ा होने लगता है।

धार्मिक मान्यता : मकर संक्रांति से अनेक पौराणिक कथाएं जुड़ी हुई हैं। मान्यता है कि इस दिन भगवान सूर्य अपने पुत्र शनि से मिलने स्वयं उसके घर जाया करते हैं। शनिदेव चूंकि मकर राशि के स्वामी हैं, अतः इस दिन को मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है। मकर संक्रांति के दिन ही गंगाजी भागीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर आगे बढ़ी थी। यह भी कहा जाता है कि गंगा को धरती पर लानेवाले महाराज भगीरथ ने अपने पूर्वजों के लिए इस दिन तर्पण किया था। उनका तर्पण स्वीकार करने के बाद इस दिन गंगा समुद्र में जाकर मिल गई थी। इसलिए मकर संक्रांति पर गंगा सागर में मेला लगता है।

महाभारत काल में वयोवृद्ध योद्धा पितामह भीष्म ने भी अपनी देह त्यागने के लिए मकर संक्रांति का ही चयन किया था। कहा जाता है कि भगवान विष्णु ने इसी दिन असुरों का अंत कर युद्ध समाप्ति की घोषणा की थी। इस प्रकार यह दिन बुराइयों को समाप्त करने का दिन भी माना जाता है। ऐसी भी मान्यता है कि माता यशोदा ने जब पुत्र प्राप्ति के लिए व्रत किया था तब सूर्य उत्तरायण काल में पदार्पण कर रहे थे और उस दिन मकर संक्रांति थी। कहा जाता है तभी से मकर संक्रांति व्रत का प्रचलन हुआ।

खिचड़ी पर्व : उत्तर प्रदेश में मकर संक्रांति को खिचड़ी पर्व भी कहा जाता है। खिचड़ी बनने की परंपरा को शुरू करनेवाले बाबा गोरखनाथ थे। कहा जाता है कि अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के समय नाथ योगियों को खिलजी से संघर्ष के कारण भोजन बनाने का समय नहीं मिल पाता था। इससे योगी अक्सर भूखे रह जाते थे। इस समस्या का समाधान स्वरूप बाबा गोरखनाथ ने दाल, चावल और सब्जी को एक साथ पकाने की सलाह दी। बाबा गोरखनाथ ने इस व्यंजन का नाम खिचड़ी रखा। इस तरह झटपट बननेवाली खिचड़ी से नाथयोगियों की भोजन की समस्या का समाधान हो गया और खिलजी के आतंक को दूर करने में वे सफल रहे। खिलजी पर विजय प्राप्त करने के कारण गोरखपुर में मकर संक्रांति को विजय दर्शन पर्व के रूप में भी मनाया जाता है। उल्लेखनीय है कि गोरखपुर के बाबा गोरखनाथ के मंदिर के पास मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी मेला आरंभ होता है। कई दिनों तक चलनेवाले इस मेले में बाबा गोरखनाथ को खिचड़ी का भोग चढ़ाया जाता है और इसे प्रसाद रूप में वितरित किया जाता है।

Makar-Sankranti-parva-1पतंगबाजी का आनंद : प्राचीनकाल से ही मनुष्य की इच्छा रही है कि वह मुक्त आकाश में उड़े। संभवतः इसी इच्छा ने पतंग की उत्पत्ति हुई होगी। गुजरात और महाराष्ट्र में मकर संकांति के दिन पतंग उड़ाने की परम्परा है। इस दिन चारों ओर वो काट, कट गई, पकड़ो का शोर मचता है। गुजरात का अहमदाबाद भारत सहित पूरे विश्व में पतंगबाजी के लिए प्रसिद्ध है। प्रतिवर्ष मकर संक्रांति के अवसर पर यहां अंतरराष्ट्रीय पतंग महोत्सव का आयोजन होता है।

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