‘सरफरोशी की तमन्ना’ जिनके दिल में थीं

रामप्रसाद बिस्मिल-अशफाक उल्ला खां-रोशन सिंह
रामप्रसाद बिस्मिल-अशफाक उल्ला खां-रोशन सिंह

“सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है”। इस गीत के रचयिता महान क्रांतिकारी पंडित रामप्रसाद बिस्मिल, उनके महान क्रांतिकारी मित्र अशफ़ाक उल्ला खां और ठाकुर रोशन सिंह को 19 दिसम्बर, 1927 को अंग्रेजों ने फांसी दी थी। भारत की स्वतंत्रता के लिए सशस्त्र क्रांति का मार्ग चुनकर अपनी जवानी खपा देनेवाले इन बलिदानी वीरों को शत-शत नमन।

– लखेश्वर चंद्रवंशी ‘लखेश’

‘बलिदान’, यह एक महान शब्द है। यह ऐसा शब्द जिसमें समर्पण, भक्ति और प्रेरणा का आदर्श निहित है। इस महान शब्द को उच्चार करते ही भारतमाता के चरणों में अपना सर्वस्व न्योछावर करनेवाले क्रांतिकारियों का चेहरा आंखों के सामने आ जाता है। याद आता है उस गीत की पंक्तियां जो आज भी युवा हृदय को झकझोर देता है, उत्साह से भर देता है। वह गीत है, – सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है इस गीत के रचयिता महान क्रांतिकारी पंडित रामप्रसाद बिस्मिल, उनके महान क्रांतिकारी मित्र अशफ़ाक उल्ला खां और ठाकुर रोशन सिंह को 19 दिसम्बर, 1927 को अंग्रेजों ने फांसी दी थी। भारत की स्वतंत्रता के लिए सशस्त्र क्रांति का मार्ग चुनकर अपनी जवानी खपा देनेवाले इन बलिदानी वीरों को शत-शत नमन।

काकोरी कांड

स्वतंत्रता आन्दोलन में सशस्त्र क्रांति करनेवाले क्रांतिकारियों के पास इतनी धनराशी नहीं होती थी कि वे उन लोगों का भरण पोषण कर सकें जो अपना पूरा समय देश-सेवा के कार्यों में समर्पित करते थे। कभी-कभी क्रांतिकारियों को भूखा भी रहना पड़ता था। क्रांतिकारियों को सम्पर्क, पत्राचार, हथियार आदि के लिए पर्याप्त धन की आवश्यकता रहती थी। धन के अभाव में ये क्रांतिकारी मेहनत-मजदूरी कर धन एकत्रित करते थे। इसके बावजूद भी क्रांतिपथ पर धन का अभाव महसूस हुआ तो क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों के कब्जेवाले सरकारी खजानों पर डाका डालने की योजना बनाई।

एक विदेशी संगठन ने क्रांतिकारियों को गोला-बारूद देने का वादा किया था जिसको खरीदने के लिए बहुत सारे धन की आवश्यकता थी। रामप्रसाद का सुझाव था कि इस धन संचय के लिए जो खजाना रेलगाड़ियों द्वारा ले जाया जाता है उसे लूटा जाए। इस योजना पर गंभीर विचार करने के लिए बिस्मिल और आजाद के नेतृत्व में 8 अगस्त, 1925 को शाहजहांपुर में क्रांतिकारियों की एक महत्वपूर्ण बैठक हुई जिसमें हथियारों के लिए ट्रेन में ले जाए जानेवाले सरकारी खजाने को लूटने की योजना बनाई गई। क्रांतिकारी जिस धन को लूटना चाहते थे दरअसल वह धन अंग्रेजों ने भारतीयों से ही हड़पा था। 9 अगस्त, 1925 को राम प्रसाद बिस्मिल, चंद्रशेखर आजाद, अशफाक उल्ला खां, राजेंद्र लाहिड़ी, ठाकुर रोशन सिंह, सचिंद्र बख्शी, केशव चक्रवर्ती, बनवारी लाल,मुकुंद लाल और मन्मथ लाल गुप्त ने अपनी योजना को अंजाम देते हुए लखनऊ के नजदीक काकोरी में ट्रेन में ले जाए जा रहे सरकारी खजाने को लूट लिया। इतिहास में यह घटना काकोरी कांड के नाम से जानी जाती है।

काकोरी कांड को एक माह बीत गया पर अंग्रेज इस कांड से जुए एक भी व्यक्ति को पकड़ न सकी। इस कारण अंग्रेजों ने जाल बिछाया। अंग्रेजों ने इस सम्बन्ध में 10 क्रांतिकारियों के नाम का ‘सम्मन’ जारी किया तथा इसकी सूचना देनेवाले को 5 हजार रूपये इनाम की घोषणा कर दी गई। इन क्रांतिकारियों में रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां का भी नाम था। अंग्रेजों का यह जाल काम कर गया, रामप्रसाद और अशफाक को अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर लिया। इनपर ब्रिटिश सरकार के साथ युद्ध की घोषणा, हत्याएं, षड़यंत्र और डकैत का आरोप लगाकर उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई।

प्रेरक प्रसंग

फांसी लगने के एक दिन पहले रामप्रसाद की माँ मूलमति उनसे मिलने गई। माँ को देखकर रामप्रसाद की आंखों से आंसू निकल आए। रामप्रसाद के आंखों में आंसू देखकर माँ बोली, “बेटा यह क्या ? मैं अपने पुत्र को नायक मानती हूं। मैं सोचती थी कि मेरे बेटे का नाम सुनकर अंग्रेज सरकार भय से कांपने लगाती है। पर यह मैंने कभी नहीं सोचा था कि मेरा पुत्र मृत्यु को सामने देखकर डर जाएगा।यदि तुम्हें इस तरह रोते हुए मौत को गले लगाना था तो इस राह पर चले ही क्यों?”

रामप्रसाद की माँ के इस वचन को सुनकर पास खड़े सैनिक दांग रह गया। रामप्रसाद ने उत्तर देते हुए कहा, “मेरी प्यारी माँ, ये डर के आंसू नहीं है और न ही मुझे मृत्यु से डर लगता है। यह तो प्रसन्नता के आंसू हैं – ये आप जैसी बहादुर माँ का पुत्र होने की ख़ुशी है जो आँखों से अश्रु बनकर छलक पड़ी।”

देशभक्ति रचनाओं में

आज रामप्रसाद, आजाद, अशफाक, भगत सिंह आदि अनगिनत क्रांतिकारी हमारे बीच नहीं हैं। पर उनका जीवन और उनकी रचनाएं आज भी युवा मन को देशभक्ति के भाव से भर देता है। उल्लेखनीय है कि पंडित रामप्रसाद बिस्मिल और अशफ़ाक उल्ला खां दोनों गहरे मित्र थे। दोनों उच्च कोटि के शायर, कवि और लेखक थे। दोनों ने अपने क्रांतिकारी जीवन में अनेक देशभक्तिपरक शायरी, कविता और गीतों की रचना की। बलिदान के एक दिन पहले रामप्रसाद बिस्मिल ने लिखा :-

“यदि देश के हित मरना पड़े मुझको सहस्त्रों बार भी।

तो भी न मैं इस कष्ट को, निज ध्यान में लाऊं कभी।।

हे ईश ! भारतवर्ष में शतवार मेरा जन्म हो।

कारण सदा ही मृत्यु का देशोपकारक कर्म हो।।

मरते हैं बिस्मिल, रोशन, लाहिड़ी अत्याचार से।

होंगे पैदा सैंकड़ों, उनके रूधिर की धार से।।

उनके प्रबल उद्योग से, उद्धार होगा देश का।

तब नाश होगा सर्वदा, दुख शोक के लवलेश का।।

अशफाक उल्ला खां महात्मा गांधी से काफी प्रभावित थे। गांधीजी द्वारा जब चौरी चौरा की घटना के बाद असहयोग आंदोलन वापस ले लिया। इससे अशफाक के मन को अत्यंत पीड़ा पहुंची। इसके बाद वे रामप्रसाद बिस्मिल तथा चंद्रशेखर आजाद आदि क्रांतिकारियों के सम्पर्क में आए थे। अशफ़ाक उल्ला खां की यह रचना देखिए :-

“कस ली है कमर अब तो, कुछ करके दिखाएंगे,

आज़ाद ही हो लेंगे, या सर ही कटा देंगे।

हटने के नहीं पीछे, डरकर कभी ज़ुल्मों से

तुम हाथ उठाओगे, हम पैर बढ़ा देंगे।

बेशस्त्र नहीं है हम, बल है हमें चरख़े का,

चरख़े से जमीं को हम, ता चर्ख गूंजा देंगे।

परवा नहीं कुछ दम की, गम की नहीं, मातम की

है जान हथेली पर, एक दम में गंवा देंगे।

उफ़ तक भी जुबां से हम हरगिज़ न निकालेंगे,

तलवार उठाओ तुम, हम सर को झुका देंगे।

सीखा है नया हमने लड़ने का यह तरीका,

चलवाओ गन मशीनें, हम सीना अड़ा देंगे।

दिलवाओ हमें फांसी, ऐलान से कहते हैं

खूं से ही हम शहीदों के, फ़ौज बना देंगे।

मुसाफ़िर जो अंडमान के तूने बनाए ज़ालिम,

आज़ाद ही होने पर, हम उनको बुला लेंगे।”

 

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