सात द्वीप नौ खंड में, गुरु से बड़ा न कोय

महर्षि वेदव्यास
महर्षि वेदव्यास

(गुरु पूर्णिमा पर विशेष)

– लखेश्वर चंद्रवंशी ‘लखेश’

हमारे भारतवर्ष में आषाढ़ पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाने की परम्परा सदियों से चली आ रही है। आज भी सभी मत, पंथ और संप्रदाय में गुरु पूर्णिमा को बड़े धूमधाम से श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है। आषाढ़ पूर्णिमा को ही महाभारत के रचयिता कृष्ण द्वैपायन व्यास का जन्म हुआ था। उन्होंने ही वैदिक ऋचाओं को एकत्रित कर चार वेदों की रचना की। इस कारण उन्हें महर्षि वेद व्यास भी कहते हैं। उन्होंने ही महाभारत, 18 पुराणों व 18 उप पुराणों की रचना की थी जिनमें भागवत पुराण जैसा अतुलनीय ग्रंथ का भी समावेश है। वैदिक ज्ञान को धरातल में लानेवाले वेदव्यास को आदिगुरु की संज्ञा दी गई है और उन्हीं के सन्मान में व्यास पूर्णिमा को ‘गुरु पूर्णिमा’ के नाम से मनाया जाता है।

Dr Hedgewar_1राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की स्थापना के समय इसके संस्थापक आद्य सरसंघचालक डॉ. केशव बलिरामपंत हेडगेवार ने ज्ञान, त्याग व यज्ञ की संस्कृति की विजय पताका भगवे ध्वज को गुरु के रूप में प्रतिष्ठित किया। आज भी प्रतिदिन शाखा पूजनीय भगवा ध्वज (गुरु) की छत्रछाया में एकत्रित हो भारतमाता को परमवैभव पर ले जाने की साधना करोड़ों स्वयंसेवक विश्वभर में करते हैं। विवेकानन्द केन्द्र की स्थापना के समय इसके संस्थापक श्री एकनाथ रानडे ने ईश्वर के वाचक प्रणवमन्त्र ओंकार को गुरु के रूप में प्रतिष्ठित किया।

उल्लेखनीय है कि भारत के सभी सम्प्रदायों और पंथों में गुरु को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। प्रत्येक समाज में सबसे पहले गुरु की वंदना होती है। पुराणों ने गुरु को सर्वप्रथम पूजनीय बताया है। सदगुरु कबीर साहब ने तो यहां तक कह दिया कि

“सात द्वीप नौ खंड में, गुरु से बड़ा न कोय।

करता करे न कर सके, गुरु करे सो होय।।”

प्रत्येक मनुष्य के जीवन में गुरु की भूमिका सबसे अधिक होती है। शिष्य अपने गुरु के बताए पथ पर आगे बढ़ता है। शिष्य के जीवन में सदाचार, कौशल, ज्ञान और बुद्धिमत्ता का विकास गुरु की कृपा से ही संभव होता है। इसलिए शिष्य को गुरु का कृपापात्र होना जरुरी होता है। जिसमें पात्रता नहीं वह कदापि ज्ञान का अधिकारी नहीं हो सकता। संत कबीर ने शिष्य के पूर्ण समर्पण को प्राथमिकता देते हुए कहा है कि :-

“पहले दाता शिष्य भया, तन मन अरपे शीश।

दूसर दाता गुरु भया, जिन ज्ञान दिया बख्शीश।।”

एक तरफ जहां शिष्य के समर्पण को महत्वपूर्ण बताया गया है, वहीं हमारे शास्त्र में गुरु का अपमान करनेवालों को मूर्ख और पापी बताया गया है। गुरु की आज्ञा का उल्लंघन करनेवाले या अवहेलना करनेवालों के लिए दंड का भी विधान है। महर्षि वेदव्यास ने कहा है कि

‘शिष्यस्याशिष्यवृत्तेस्तु न क्षन्तव्यं बुभूषता।’

(महाभारत, आदिपर्व,79/9)

अर्थात जो शिष्य होकर भी शिष्योचित बर्ताव नहीं करता, अपना हित चाहनेवाले गुरु को उसकी धृष्टता क्षमा नहीं करनी चाहिए।

शिष्य के मन में अपने गुरु के प्रति कभी भी अविश्वास या संदेह नहीं होना चाहिए। गुरु की निंदा व गुरु का विरोध प्रत्यक्ष तो दूर मन में भी नहीं लाना चाहिए। संत कबीर ने कहा है कि ‘‘गुरु की निंदा सुने जो काना, ताको नाही मिले भगवाना।” उन्होंने कहा कि

“कबिरा ते नर अंध है, गुरु को समझे और।

हरि रूठे गुरु शरण हैं, गुरु रूठे नहीं ठौर।।”

संत कबीर के अनुसार कभी ईश्वर रूठ गए तो गुरु हमारी रक्षा करते हैं, पर यदि शिष्य अपने गुरु को ठेस पहुंचता है तो उसे भगवान भी क्षमा नहीं करते। इसलिए शिष्य को चाहिए कि उससे कभी कोई भूल न हो। यदि कभी गलती हो गई तो तुरंत ही उसे अपनी भूल सुधारकर गुरु के शरणागत हो जाना चाहिए, क्योंकि गुरु तो बड़े कृपालु होते हैं। उनके मन में अपने शिष्य के प्रति बेहद करुणा होती है।

Kabir Saheb copyहमारे समाज में गुरु किसे कहा जाए, इसकी अनेक अवधारणा है। हमारे देश में शिशु के जन्मदात्री माता, शिशु की सेवा करनेवाली दाई मां, नाम रखनेवाले पण्डित, शिक्षा देनेवाले शिक्षक, विवाह सम्पन्न करनेवाले पुरोहित, मंत्र देनेवाला धार्मिक व्यक्ति तथा अंतिम संस्कार करनेवाला सामाजिक व्यक्ति- ये सभी तो गुरु माने जाते हैं। इन सभी से श्रेष्ठ और महान् गुरु है जो जीव को भय-बन्धन से मुक्त कर दिव्य जीवन प्रदान करता है। इसी गुरु को सदगुरु की उपाधि मिलती है। सदगुरु के समान अधिकारी, मनुष्यों में तो कोई है ही नहीं, देव-वर्ग भी इस श्रेणी में नहीं आते। सदगुरु कबीर साहब ने गुरु को गोविन्द से भी अधिक महत्व दिया है। गुरु की महिमा का वर्णन करते हुए संत कबीर कहते हैं :-

“गुरु गोविन्द दोउ खडे, काके लागूं पाय।

बलिहारी गुरु आपने, जिन गोविन्द दियो लखाय।।”

सात समंद की मसि करौं, लेखनि सब बनराइ।

धरती सब कागद करौं, तऊ हरि गुण लिख्या न जाइ॥

सतगुरु की महिमा अनंत, अनंत किया उपकार।

लोचन अनंत उघाड़िया, अनंत दिखावनहार॥

यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान।

सीस दिए जो गुर मिलै, तो भी सस्ता जान॥

गुरु कुम्हार शिष्य कुम्भ है, गढ़ी गढ़ी काढ़े खोट।

अंतर हाथ सहार दे, बाहर मारे चोट।।

हमारे देश में गुरु-शिष्य परम्परा के अनेक उदाहरण है, जिनमें महर्षि वशिष्ठ-श्रीराम, महर्षि संदीपनी-श्रीकृष्ण, सदगुरु कबीर-धनि धर्मदास, समर्थ रामदास-शिवाजी महाराज, श्रीरामकृष्ण परमहंस-स्वामी विवेकानन्द आदि का समावेश है। इसी प्रकार गुरु द्रोणाचार्य के प्रति एकलव्य की गुरुभक्ति को विशेष स्थान प्राप्त है। अतः गुरु के महत्त्व को समझते हुए हमें अपने जीवन को गुरुमय बनाना आवश्यक है। इसके लिए जरुरी है कि हम अच्छे गुरु की तलाश करें, क्योंकि आज गुरु बनने और शिष्य बनाने की होड़ सी मच गई है। हर गांव-गली में भेषधारी अनेक बाबा, साधू अपने को गुरु बताकर श्रद्धालुओं को ठगते हैं। ऐसे में बड़ी सावधानीपूर्वक गुरु का शोध करना चाहिए। इस आधुनिकता की होड़ में गुरु के प्रति निष्ठा कम न हो पाए इसपर भी हमें ध्यान देना होगा। हमारे देश के सभी मत-सम्प्रदायों में बड़े-बड़े महापुरुष, गुरु और आचार्य हुए हैं। आइए, इस गुरु पूर्णिमा में हम अपने तथा उन सभी महापुरुषों को नमन कर अपने जीवन को सत्य-धर्म के पथ पर ले जाने का संकल्प करें।

Advertisements

बाल गंगाधर तिलक की ‘लोकमान्य’ पत्रकारिता

लोकमान्य बल गंगाधर तिलक
                                           लोकमान्य बल गंगाधर तिलक

(23 जुलाई, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक जयंती पर विशेष)

– लखेश्वर चंद्रवंशी ‘लखेश’  

बाल गंगाधर तिलक यह नाम ‘लोकमान्य’ है, क्योंकि तिलक जननायक थे। जनता का उनपर अटूट विश्वास था। यह विश्वास इसलिए नहीं था कि वे बहुत धनवान थे अथवा उस समय के अंग्रेजी शासनकर्ताओं के साथ उनकी खूब बनती थी, वरन इसलिए था कि उन्होंने अंग्रजों के अत्याचारों के विरुद्ध जनता में राष्ट्रीय चेतना का अलख जगाया था। हताश, निराश और दिशाहीन समाज में ‘सम्पूर्ण स्वाधीनता’ का भाव जगाया था और सिंहवत गर्जना के साथ उद्घोष किया था,- “स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और में इसे लेकर ही रहूंगा।”  यह उद्घोष एक लहर की तरह देशभर में फ़ैल गया। जनता के विचार, व्यवहार और चेहरे पर स्वराज्य प्राप्ति की चाह हिलोरें लेने लगी। यह उद्घोष आज भी हर भारतीय के जुबान पर राज कर रहा है। ‘स्वराज, स्वाधीनता, बहिष्कार, स्वदेशी’ ये शब्द तिलक जी के राष्ट्रीयता से ओतप्रोत मुखर पत्रकारिता की देन है।

लोकमान्य तिलक की पत्रकारिता ने ही स्वतंत्रता आन्दोलन को व्यापक बनाया। तिलक ने विष्णु शास्त्री चिपलूणकर के साथ मिलकर सन 1881 में मराठी भाषा में ‘केसरी’ और अंग्रेजी में ‘मराठा’ नामक साप्ताहिक अख़बार की शुरुवात की। बाद में सन 1891 में उन्होंने केसरी और मराठा दोनों पत्रों का पूरा भार स्वयं पर ले लिया और स्वतंत्र रूप से उसका प्रकाशित करना शुरू कर दिया। उन्होंने अपनी प्रतिभा, लगन और अदम्य साहस के बल पर पत्रकारिता के महान आदर्श बन गए। उनकी प्रखर लेखनी ने केसरी और मराठा को पत्रकारिता जगत में बड़ी पहचान दी। दोनों की अख़बार स्वतंत्रता आन्दोलन का ‘अग्निमंत्र’ बन गया।

‘केसरी’ के सम्बन्ध में उन्होंने पत्रकारिता के अपने उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए लिखा था –“केसरी निर्भयता एवं निष्पक्षता से सभी प्रश्नों की चर्चा करेगा। ब्रिटिश शासन की चापलूसी करने की जो प्रवृत्ति आज दिखाई देती है, वह राष्ट्रहित में नहीं है। ‘केसरी’ के लेख इसके नाम को सार्थक करनेवाले होंगे।

सन 1905 में जब ब्रिटिश शासन ने बंगाल प्रान्त का विभाजन की योजना बनाई तब तत्कालीन कांग्रेस में हडकंप मच गया। कांग्रेस को अनुनय-विनय की नीति अपनायी, पर लोकमान्य तिलक ने पत्रकारिता के माध्यम से इसे व्यापक राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया। इस आन्दोलन में तिलक के केसरी और मराठा साप्ताहिक की महत्वपूर्ण भूमिका रही। लोकमान्य तिलक ने मराठा और केसरी के माध्यmम से गणेश उत्सव, शिवाजी उत्सव एवं स्वदेशी के उपयोग में लोगों से भागीदार बनने की अपील की। लोकमान्य जो आंदोलन चलाते उसका उनके पत्र बखूबी आह्वान करते थे। तिलक ने ही स्वदेशी के उपयोग एवं ब्रिटिश वस्तुओं के बहिष्कार का आह्वान किया था। तिलक ने स्वदेशी और बहिष्कार आन्दोलन के राजनीतिक महत्व को उजागर किया। उन्होंने लोगों से कहा कि चाहे कुछ भी त्याग करना पड़े, वे स्वदेशी का उपभोग करें। अगर कोई भारतीय वस्तु उपलब्ध न हो तो उसके स्थान पर गैरब्रिटिश वस्तु इस्तेमाल में लाएं। उन्होंने लिखा-

“ब्रिटिश सरकार चूंकि भारत में भय से मुक्त है, इससे उसका सिर फिर गया है और वह जनमत की नितान्त उपेक्षा करती है। वर्तमान आन्दोलन से जो एक सार्वजनिक मानसिकता उत्पन्न हो गई है, उससे लाभ उठाकर हमें एक ऐसे केन्द्रीय ब्यूरो का संगठन करना चाहिए जो स्वदेशी माल और गैरब्रिटिश माल के बारे में जानकारी एकत्रित करे। इस ब्यूरो की शाखाएं देशभर में खोली जाएं, भाषण और मीटिंगों द्वारा आंदोलन के उद्देश्य की व्याख्या की जाए और नई दस्तकारियां भी लगाई जाएं।”

तिलक ने अपने पत्र के माध्यम से चार सूत्री कार्यक्रम – बहिष्कार, स्वदेशी,  राष्ट्रीय शिक्षा और स्वराज आंदोलन को प्रसारित कर देश में जनजागरण किया। भारतवासियों को बहिष्कार आंदोलन का मर्म समझाते हुए तिलक ने ‘केसरी’ के सम्पादकीय में लिखा था –

“लगता है कि बहुत से लोगों ने बहिष्कार आंदोलन के महत्व को समझा नहीं। ऐसा आंदोलन आवश्यक है, विशेषकर उस समय जब एक राष्ट्र और उसके विदेशी शासकों में संघर्ष चल रहा हो। इंग्लैंड का इतिहास इस बात का ज्वलंत उदाहरण प्रस्तुत करता है कि वहां की जनता अपने सम्राट का कैसे नाकों चने चबवाने के लिए उठ खड़ी हुई थी, क्योंकि सम्राट ने उनकी मांगे पूरी करने से इंकार कर दिया था। सरकार के विरूद्ध हथियार उठाने की न हमारी शक्ति है न कोई इरादा है। लेकिन देश से जो करोड़ों रूपयों का निकास हो रहा है, क्या हम उसे बंद करने का प्रयास न करें? क्या हम नहीं देख रहे हैं कि चीन ने अमेरिकी माल का जो बहिष्कार किया था, उससे अमेरिकी सरकार की आंखें खुल गईं। इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है कि एक परतंत्र राष्ट्र, चाहे वह कितना ही लाचार हो, एकता साहस और दृढ़ निश्चय के बल पर बिना हथियारों के ही अपने अंहकारी शासकों को धूल चटा सकता है।”

लोकमान्य तिलक के स्वदेशी प्रेम और विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार की नीति से महात्मा गांधी बहुत प्रभावित थे, उन्होंने आगे चलकर तिलक के इस नीति का अपने सत्याग्रह में अनुसरण किया। महात्मा गांधी ने लोकमान्य तिलक के सम्बन्ध में कहा है कि, –“तिलक-गीता का पूर्वाद्ध है ‘स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है’, और उसका उत्तरार्द्ध है ‘स्वदेशी हमारा जन्मसिद्ध कर्तव्य है’। स्वदेशी को लोकमान्य बहिष्कार से भी ऊंचा स्थान देते थे।” 

तिलक की पत्रकारिता राष्ट्रीयता से ओतप्रोत थी। राष्ट्रहित के सिवा उनकी पत्रकारिता का कोई उद्देश्य नहीं था। पर स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद आज पत्रकारिता का हेतु, उद्देश्य और स्वरुप भी बदल सा गया है। आज की पत्रकारिता तथ्य और सत्य से अधिक जनता को भ्रम में डालकर उन्हें बरगलाने का काम करती है। पत्रकारिता आज देशहित से अधिक लाभार्जन और अपना रौब झाड़ने का साधन बन गया है, यह आज किसी से छिपा नहीं है। ऐसे में तिलक की ‘लोकमान्य’ पत्रकारिता से वर्तमान पत्रकारों और समाचार पत्रों के मालिकों को प्रेरणा लेने की आवश्यकता है।

भारत-पाक सम्बन्ध : बात तो करनी ही होगी, ऐसे या वैसे!

indo-pakभारत सदैव सबका हित चाहता है, उस सब में पाकिस्तान का नाम भी शामिल है। पाकिस्तान को यह बात समझना होगा कि उसे किस तरह की वार्ता कबूल है,- शांति की या कोई और? वरना नियति उसका निर्णय स्वयं लेगी।

– लखेश्वर चंद्रवंशी ‘लखेश’

नि:संदेह पाकिस्तान से बात तो करनी ही होगी, क्योंकि यही एक उपाय है जो युद्ध को टाल सकता है। भारत नहीं चाहता कि शत्रुभाव कभी अपने पड़ोसियों के आपसी संबंधों में स्थायी रूप से बना रहे। स्थिति को समझते हुए पाकिस्तान को भी अपना शत्रुभाव ख़त्म करने की दिशा में पहल करनी होगी। भारत ने सदैव शांति के पथ को अपनाया है। पाकिस्तान को भारत के इस नीति का अनुसरण करना होगा। यह उसके लिए भी बहुत जरुरी है। इसी में दोनों देशों की सीमा में रहनेवाले जनता की भलाई है। पाकिस्तान को समझना होगा कि यमन, ईरान, इराक, सीरिया, अफगानिस्तान और खुद उनका अपना पाकिस्तान आतंकवाद, आपसी कलह और युद्ध जैसे स्थिति से जूझ रहा है। ऐसे में भारत के ‘विश्व कल्याण, वैश्विक शांति और बहुमुखी विकास’ की नीति का समर्थन करते हुए उसे अपनी नीति स्पष्ट करनी होगी।

सारी दुनिया जानती है कि पाकिस्तान बना कैसे? भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान मुस्लिम कट्टरता, निहित स्वार्थ, कमजोर नेतृत्व और असहमति के चलते तत्कालीन नेता गांधीजी, पंडित जवाहरलाल नेहरू, मोहम्मद जिन्ना, अब्दुल कलाम आजाद आदि के राजनीतिक सत्ताकांक्षा के कारण भारत को विभाजन का दर्द झेलना पड़ा। इस विभाजन के विद्वेष ने लाखों निरपराध लोगों के प्राण हर लिए। आज भी वह पीड़ा मन को चुभती है। यह पीड़ा और भी बढ़ जाती है जब पाकिस्तान से कोई आतंकी घुसपैठिया भारत की धरती पर आतंकी हमलों को अंजाम देता है। भारत द्वारा सबूत दिए जाने के बावजूद पाकिस्तान अपने देश में पल रहे आतंकियों के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं करता।

हाल ही में जब 10-11 जुलाई में रूस के उफा शहर में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और पाकिस्तानी के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की मुलाकात हुई तो आतंकवाद का मुद्दा छाया रहा। 26 नवम्बर, 2008 को पाकिस्तानी आतंकियों ने मुंबई में हमला किया था। प्रधानमंत्री मोदी ने मुंबई हमले के मास्टरमाइंड आतंकी जकीउर रहमान लखवी के खिलाफ पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को कार्रवाई करने के लिए कहा ताकि दोनों देशों के बीच शांति बनी रहे। इस बैठक में पाकिस्तान ने मुंबई हमलों की जांच को आगे बढ़ाने का समर्थन किया। प्रधानमंत्री मोदी ने भी 2016 में पाकिस्तान में होनेवाले सार्क सम्मेलन में शामिल होने का आमंत्रण भी स्वीकार कर लिया। सारी दुनिया ने भारत-पाक वार्ता बहाली के सकारात्मक पहल का स्वागत किया।

लेकिन इस सकारात्मक बातचीत के तीन दिन बाद ही फिर से पाकिस्तान की ओर से नकारात्मक बयानबाजी शुरू हो गई। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के सलाहकार सरताज अजीज ने रूस के उफा में हुए समझौते से पलटते हुए कहा कि भारत को मुंबई हमले पर और सबूत देने होंगे। उन्होंने कहा कि जब तक कश्मीर का मुद्दा एजेंडे में शामिल नहीं होगा, भारत के साथ कोई वार्ता प्रक्रिया नहीं की जाएगी। सरताज अजीज के इस बयान के बाद भारत-पाक वार्ता के औचित्य पर ही सवाल उठने लगा। इतना ही नहीं तो पाकिस्तान ने सीजफायर का उल्लंघन किया। भारतीय सीमा के गांवों पर गोलीबारी की। पाकिस्तान के इस उद्दंडता का जवाब देते हुए हमारे 2 सैनिक शहीद हो गए और एक महिला की मौत हो गई।

एक तरफ भारत जहां पाकिस्तान से वार्ता करना चाहता है, अनावश्यक युद्ध टालना चाहता है, तो दूसरी ओर पाकिस्तान हर बार संघर्षविराम का उल्लंघन कर भारतीय सीमा पर गोलीबारी करता है। पाकिस्तान को इतिहास के उस सच्चाई को भी याद रखना होगा कि भारत ने 1948, 1965, 1971 और 1999 में युद्ध के दौरान पाकिस्तान को परास्त किया था। आज भारत में पूर्ण बहुमत की मजबूत मोदी सरकार है। देश में अब तक के सभी सरकारों से अधिक सक्रिय और दृढ़ प्रधानमंत्री विद्यमान है। यदि पाकिस्तान भारत के इस शांति वार्ता को स्वीकार नहीं करेगा तो उसे भयंकर परिणाम भुगतना पड़ सकता है।

पाकिस्तान यूं तो कई बार अपने चीनी सहयोग के बूते पर न्यूक्लियर शक्ति होने का दावा करता है, पर अपनी बात बोलते समय वह भारत की महाशक्ति और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की उदात्त छवि को भूल जाता है। दूसरी ओर पाकिस्तान की छवि आज आतंकियों को पोषित करनेवाला देश के रूप में दुनिया में ख्यात है। लादेन का खात्मा भी पाकिस्तान की भूमि पर अमेरिका ने किया था। इसलिए उसे अपने ऊपर लगे आतंकियों को पोषित करने की सच्चाई वाला जो कलंक लगा है, उसे धोना होगा। पाकिस्तान अपने में अन्तःकरण में झांके और समझे कि उसे किस तरह दुनिया में अपना छवि बनाना है।

पाकिस्तान, जो कि भारत की भूमि से अलग होकर एक मुल्क बना है, आज वह सबसे ज्यादा भारत को पीड़ा पहुंचा रहा है। भारत सदैव सबका हित चाहता है, उस सब में पाकिस्तान का नाम भी शामिल है। पाकिस्तान को यह बात समझना होगा कि उसे किस तरह की वार्ता कबूल है,- शांति की या कोई और? वरना नियति उसका निर्णय स्वयं लेगी।

‘मोहल्ला अस्सी’ के विवाद पर निर्देशक चंद्रप्रकाश द्विवेदी से संवाद

mohalla-assi-chandraprakash– लखेश्वर चंद्रवंशी ‘लखेश’

‘मोहल्ला अस्सी’ फिल्म रिलीज से पहले ही विवादों के जाल में फंस गई है। सोशल मीडिया में इस फिल्म को गाली-गलौच और आस्था के साथ खिलवाड़ करनेवाली फिल्म कहकर कोसा जा रहा है। कुछ संगठनों द्वारा इसके विरोध में स्वर भी उठे हैं। पर ‘मोहल्ला अस्सी’ आस्था के साथ खिलवाड़ करनेवाली फिल्म होगी ऐसा यकीन नहीं होता, क्योंकि इसके निर्देशक चंद्रप्रकाश द्विवेदी हैं, जिन्होंने चाणक्य, उपनिषद् गंगा, एक और महाभारत जैसे महान धारावाहिक से जनमानस के हृदय में आपना स्थान बनाया है। इसलिए ‘मोहल्ला अस्सी’ से जुड़े सभी विवादित मुद्दों पर लखेश्वर चंद्रवंशी ने फिल्म निर्देशक डॉ.चंद्रप्रकाश द्विवेदी से बातें की। डॉ.द्विवेदी ने सभी प्रश्नों का विस्तृत उत्तर दिया।  

प्रस्तुत है बातचीत का सम्पूर्ण विवरण :- 

1) ‘मोहल्ला अस्सीफिल्म में ऐसा क्या है, जिसने विवाद को जन्म दे दिया?

पहले तो मैं स्पष्ट कर दूं कि फिल्म को लेकर अभी तक कोई विवाद नहीं है। फिल्म अभी तक पूरी नहीं हुई है। फिल्म को अभी केंद्रीय फिल्म प्रमाणण बोर्ड के पास भेजा भी नहीं गया है। उसके पहले फिल्म के एक अनधिकृत, गैरकानूनी पायरेटेड फुटेज को लेकर विवाद हो रहा है।

मोहल्ला अस्सी काशीनाथ सिंह के उपन्यास काशी का अस्सी और मुख्यतः उसकी एक कहानी “पांडे कौन कुमति तोहे लागी” पर आधारित है। यह उपन्यास पहले हंस नामक पत्रिका में छपा था। उसके बाद निरंतर राजकमल प्रकाशन के इसके कई संस्करण निकाले हैं। इसी उपन्यास और कहानी के आधार पर प्रसिद्ध रंग कर्मी उषा गांगुली ने काशीनामा के नाम से एक नाटक भी किया था, जिसका मंचन बनारस में भी हुआ था। इसी उपन्यास के आधार पर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के छात्रों ने भी एक नाटक किया था। काशी का अस्सी एक लोकप्रिय उपन्यास है।

2) फिल्म के कथित प्रोमो के लिक होने पर जो दृश्य देखा गया उससे प्रतीत होता है कि मोहल्ला अस्सीमें केवल कामुक दृश्य, फूहड़ता और गालियों की ही भरमार है। 

यदि  काशीनाथ सिंह जी के उपन्यास से सारी कथा निकाल दी जाए और सिर्फ गालियां रखी जाए तो क्या वह “काशी का अस्सी” उपन्यास रह जाएगा? उसी प्रकार विवादित फुटेज में किसी भी प्रकार से फिल्म को प्रतिबिंबित नहीं करता। ऐसा ट्रेलर फिल्म का प्रतिनिधि ट्रेलर हो ही नहीं सकता। यह तो विकृति है। यह फुटेज/ट्रेलर मैंने भी देश के अन्य नागरिकों की तरह सोशल मीडिया पर आने पर देखा। इसे मेरी ओर से न कोई रचनात्मक स्वीकृति दी गई थी, न ही मुझे इसकी जानकारी थी। मोहल्ला अस्सी एक संवेनदशील कथा है। यह उदारीकरण के बाद देश के सामने आई चुनौतियों की कहानी है। वास्तविक चुनौती संस्कृति के सामने है। कथा में वर्तमान के बनारस का इतिहास है। वास्तव में फिल्म संस्कृति के पक्ष में अपना विचार रखती है।

मोहल्ला अस्सी तो बनारस और देश की संस्कृति की लड़ाई की कहानी है। फिल्म 1988 से 1998 के काल खंड को प्रतिम्बिम्बित करती है। किस तरह से देश में हो रहे बड़े आंदोलनों ने देश, समाज और व्यक्तियों को प्रभावित किया, उसकी कथा है मोहल्ला अस्सी। फिल्म में श्रीराम जन्मभूमि का आंदोलन पृष्ठभूमि में है। संस्कृत शिक्षकों के सामने चुनौती इसकी मुख्य कथा है। इस फिल्म में मूल्यों, चरित्र के ह्रास की कहानी है। इस दौर में किस तरह हमारे मूल्य ढह रहे हैं और इस अवस्था से आस्था व संस्कृति के सामने जो संकट आ खड़ा है उससे कैसे लड़ा जा सकता है, इसकी कहानी है मोहल्ला अस्सी। गालियां उपन्यास में है, और जो भाषा और समाज उपन्यास का है वही फिल्म में भी है। पूरा फुटेज कुप्रचार के लिए है इसलिए जिस प्रकार के बिम्बों का उसमें प्रयोग किया गया है उससे फिल्म का फूहड़ और गालियों की भरमार लगना स्वाभाविक है, परन्तु फिल्म में कामुक दृश्यों की न तो भरमार है और न ही वह उसका उद्देश्य।

गालियों के सन्दर्भ में  उपन्यास में कहा गया है -“धक्के देना और धक्के पाना, जलील करना और जलील होना, गालियां देना और गालियां पाना औघड़ संस्कृति है। अस्सी की नागरिकता के मौलिक अधिकार और कर्तव्य। इसके जनक संत कबीर रहे हैं और संस्थापक औघड़ कीनाराम। चंदौली के एक गांव से नगर आए एक अप्रवासी संत। अस्सीवासी उसी औघड़ संस्कृति की जायज़ नाजायज़ औलादें हैं। गालियां इस संस्कृति की राष्ट्रभाषा है जिसमें प्यार और आशीर्वाद का लेन देन होता है।” ( काशी का अस्सी, पृष्ठ संख्या-38)

उपन्यास के पहले  पृष्ठ पर ही लिखा है – “हर हर महादेव के साथ भोंसड़ी के नारा इसका सार्वजनिक अभिवादन है”, मेरी दृष्टि में भाषा और जीवन की सहज अभिव्यक्ति ही इस उपन्यास की ज़मीन है।

3) खबर है कि मोहल्ला अस्सी में गालियों और फूहड़ता की भरमार से फिल्म के लेखक काशीनाथ सिंह भी हैरान हैं।

काशीनाथ जी से मेरी फोन पर बात हुई है। उन्होंने मुझे बताया कि उनके नाम पर ऐसा बहुत कुछ लिखा जा रहा है जो उन्होंने नहीं कहा है। ‘काशी का अस्सी’ तो बाज़ार में उपलब्ध है। कोई भी पाठक/ दर्शक उसे पढ़ सकता है और स्वयं तय कर सकता है कि मैं उपन्यास से दूर हूं या उपन्यास के नजदीक! बरसों से लोग उपन्यास पढ़ रहे हैं। काशी का अस्सी को लेकर विशेषांक भी निकले हैं। जब यह उपन्यास हंस में श्रृंखलाबद्ध प्रकाशित हुआ था तब भी इसका विरोध हुआ था परन्तु स्वर्गीय राजेंद्र यादव ने इसे छापना जारी रखा। जो उपन्यास में है उसी के बिम्ब आपको फिल्म में भी देखने को मिलेंगे।

4) बनारसको विश्व की आध्यात्मिक राजधानी बनाने की बात चल रही है, और लोगों का कहना है कि इस फिल्म में काशी की इमेज के साथ खिलवाड़ किया गया है? 

काशी की छबि के साथ खिलवाड़ कौन कर सकता है? वास्तव में जैसा कि मैंने पहले कहा कि यह तो काशी के मूल स्वरुप को बचाने की लड़ाई की कहानी पर बनी फिल्म है। क्या काशी भारत नहीं है? क्या काशी पर इस देश के नागरिकों को गर्व नहीं है ? क्या काशी भारत की आध्यात्मिक आस्था का केंद्र और सांस्कृतिक विरासत की नगरी नहीं है? मैं बनारस को भारत से अलग कर के नहीं देख सकता। मेरी दृष्टि में काशी की छबि के साथ खिलवाड़ भारत की छबि के साथ खिलवाड़ है। क्या काशीनाथ सिंह के उपन्यास की ज़मीन भारत की छबि के साथ खिलवाड़ की है? काशीनाथ सिंह को हाल ही में सन 2012 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। इस उपन्यास के प्रति आकर्षित ही इसलिए हुआ था। ‘काशी का अस्सी’ में बदल रहे भारत और बदल रहे बनारस को लेकर सांस्कृतिक सन्दर्भों में कई मुद्दे हैं। उनमें से कुछ मुद्दे फिल्म में हैं।

5) आप पर आरोप है कि शिवजी के मुख से गाली बोलवाकर आपने आस्था के साथ खिलवाड़ किया है, क्या यह सही है

जिसे दर्शक देखकर प्रतिक्रिया दे रहे हैं वह फिल्म में एक बहुरुपिया है जो शिव जी का रूप धारण कर घाट-घाट घूमकर पर्यटकों के साथ फोटो खिंचवाता है। धर्मनाथ पांडे (मुख्य अभिनेता) और बहुरूपिये के बीच इस बात को लेकर तकरार होते रहती है। धर्मनाथ पांडे जब अपने जीवन में कठिन काल से गुज़र रहा होता है तो किस प्रकार से यह बहुरुपिया, धर्मनाथ पांडे के स्वप्न में आकर उसके भीतर चल रहे अंतर्द्वंद का समाधान करता है। बहुरुपिया धर्मनाथ पांडे की ही भाषा बोलता है क्योंकि धर्मनाथ वही उत्तर चाहता है। यह जरुरत और आस्था के बीच की लड़ाई का दृश्य है। संकट के काल में कैसे मनुष्य अपने मन को समझा लेता है और उसे अपनी सुविधा के अनुसार ईश्वर का आदेश मानकर मूल्यों और सिद्धांतों से समझौता कर लेता है। यह इस दृश्य की उपकथा है। उपन्यास में शिवजी स्वप्न में आते हैं। फिल्म में शिव के रूप में बहुरुपिया जिसे धर्मनाथ पांडे जानते हैं। “पांडे कौन कुमति तोहे लागी” की कहानी और उपन्यास के  पृष्ठ संख्या 132 पर यह घटना शब्दांकित है।

चूंकि फिल्म की स्थापना में ही गालियों को “प्यार और आशीर्वाद” का रूप माना गया है और अस्सी की औघड़ संस्कृति की सहजता, मूल उपन्यास और फिल्म में भी उसी भावना को अभिव्यक्त किया गया है। अंतर्मन, स्वप्नावस्था, मनोदशा, भय, जरुरत, आस्था, और उससे उपजा समाधान, कई परतों को इस दृश्य में खोलने का प्रयत्न हुआ है। चूंकि सोशल मीडिया पर चल रहे फुटेज में सन्दर्भों को नहीं दिखाया गया है उससे दर्शकों में रोष होना स्वाभाविक है। मोहल्ला अस्सी हमारे जीवन से शिव और शिवत्व के हो रहे विस्थापन के कहानी है। ऐसी फिल्म देश की आस्था के साथ खिलवाड़ कैसे कर सकती है?  ‘पांडे कौन कुमति तोहें लागी में’ इसी “कुमति” के खिलाफ आवाज़ है जो हमें चेता रही है कि बनारस के हर घर के मुखिया बाबा (शिव)  हैं, जिन्हें हमारे घरों, मनों और हृदय से विस्थापित करने का किसी को अधिकार नहीं है। शिव है तो अस्सी है, शिव है तो बनारस है, शिव है तो भारत है।

6) इसका प्रोमो लीक क्यों हुआ,  कहीं इसके पीछे कोई षड़यंत्र है या फिर पब्लिसिटी स्टंट? 

2011 में बनारस में 22 दिन बनारस के घाटों पर इसकी शूटिंग हुई थी। चार सालों  मेरा निरंतर प्रयास चल रहा है कि यह फिल्म दर्शकों तक पहुंचे। कई मुद्दों के चलते यह फिल्म ‘फिल्म फेडरेशन ऑफ वेस्टर्न इंडिया सिने इम्प्लोयी’ की आपसी  विवाद हल करने की एक समिति की देख रेख में बनाईं जा रही है। फिल्म अभी पूरी नहीं हुई है। मैं किसी भी संभावना से नकार नहीं करता। मैं इतना दावे के साथ कह सकता हूं कि मैं इस कुचक्र और कुमति का हिस्सा नहीं हूं, न हो सकता हूं। एक लीक मेरी जानकारी से नहीं हुआ है। आवश्यकता पड़ने पर मैं इस सन्दर्भ में अपनी भागीदारी न होने के प्रमाण प्रस्तुत कर सकता हूं।

7) इस फिल्म की मूल संकल्पना (concept) क्या है अथवा इसका सन्देश क्या है? 

‘संस्कृत और संस्कृति बचेगी तो देश बचेगा!’ यह इसकी मूल संकल्पना है। इसी संकल्पना पर आधारित है मोहल्ला अस्सी का कथानक।

यह फिल्म एक सवाल खड़ा करती है कि जब बनारस और देश में ‘शिव और शिवत्व’ नहीं रहेगा तो क्या भारत रहेगा? हमारे घरों और जीवन से “शिव” के हो रहे विस्थापन और उसे बचाए रखने के जद्दोजहद की कहानी है – मोहल्ला अस्सी। फिल्म में एक संवाद है –

“अस्सी की आत्मा का अपहरण हो रहा है।” क्या कोई आगे आएगा?

8) क्या यह फिल्म परिवार के साथ देखी जा सकती है?

यह फिल्म अपने मूल रूप में वयस्कों के लिए होगी ऐसा मेरा मानना है, परन्तु इसका दूसरा और संशोधित संस्करण परिवार और टेलीविज़न के दर्शकों के भी होगा, जिसे पूरे परिवार के साथ देखा जा सकेगा।

9) सनी देओल के साथ काम करके कैसा लगा? फिल्म की कहानी उनको कैसी लगी

सनी देओल भारत और विश्व भर में हिंदी दर्शकों के बीच एक लोकप्रिय कलाकार हैं। वे कहानी और अपने चरित्र से इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने अपना पारिश्रमिक फिल्म रिलीज़ होने के बाद लेने की शर्त पर काम किया। मेरी दृष्टि में यह भूमिका उनके जीवन की श्रेष्ठ भूमिकाओं में एक है। एक बात में यहां जोड़ना चाहूंगा – कि जो कलाकार भारत के सिने जगत में पिछले 35 सालों से काम कर रहा है, जिसका परिवार भारत के सिने जगत में पचास सालों से अधिक समय बिता चुका है, जिसके परिवार के अधिकतर सदस्य फिल्म क्षेत्र से जुड़े हैं, जिस परिवार का पूरा देश सम्मान करता है – वह सनी देओल गालियां देने और सस्ती लोकप्रियता के लिए या किसी आर्थिक लाभ के लिए किसी ऐसी फिल्म में काम करेगा जो फूहड़ और गलियों से भरी हो? साक्षी तंवर जिसे भारत की अधिकतर महिलाओं ने सराहा है – क्या ऐसी फिल्म में काम करेंगी जो फूहड़ हो ? इस फिल्म के साथ हिंदी सिने जगत के कई प्रसिद्ध शिल्पी जुड़े हैं। क्या वे सब मिलकर एक फूहड़ फिल्म बना रहे हैं?

10) एक लोकप्रिय धारावाहिक चाणक्य के माध्यम से घर-घर में पहचान बना चुके मौजूदा सेंसर बोर्ड सदस्य डॉ.चंद्रप्रकाश द्विवेदी इस फिल्म से कितने संतुष्ट हैं?

मैंने इस फिल्म के विषय को चुना ही इसलिए था कि ‘काशी का अस्सी’ की कहानी हमारे समाज का यथार्थ है। मुझे दुःख है कि फिल्म देखे बिना ही इस पर कई तरह के प्रश्न चिन्ह लग गए। मेरी मंशा पर संदेह होने लगा। काश, इन सबसे यह फिल्म बच पाती तो मुझे खुशी होती। आज मैं समाज की दृष्टि में संस्कृति विरोधी, समाज विरोधी, धर्म विरोधी के रूप में उनके कटघरे में खड़ा हूं। मुझे संतोष तब होगा जब मोहल्ला अस्सी इन सब आरोपों और संदेहों से मुक्त हो।

11) आजकल फिल्मों के माध्यम से समाज में मान्य परम्पराओं और धार्मिक आस्थाओं को आहत करने का दौर चल रहा है, जिसमें कई विज्ञापन और धारावाहिक भी शामिल है। क्या आस्थाओं पर चोट किए बिना लोगों को सन्देश नहीं दिया जा सकता

मैं नहीं मनाता कि कोई भी फिल्मकार देश और समाज की अस्मिता और सम्मान के विरोध में फिल्म बनाएगा। फिल्म या कला तो सृजन का माध्यम है कोई विकृत मस्तिष्क ही ऐसा कर सकता है। एक बात और – हिंदू समाज ने हमेशा विरोधी मतों, विचार और दर्शन को भी अपने समाज में स्थान दिया है। यही हमारी विशेषता है। चार्वाक और लोकयतों ने वेदों का उपहास किया – भारत ने उन्हें भी स्वीकार किया। बुद्ध ने वैदिक मतों का खंडन किया, भारत ने उन्हें स्वीकार किया। कई अवैदिक मतों ने वैदिक मतों को चुनौती दी, भारत ने उसे भी स्वीकार किया। भारत का इतिहास वैदिक और सनातन धर्म को दी जा रही चुनौतियों के इतिहास से भरा पड़ा है पर वैदिक मत निरंतर बढ़ता रहा। कितने आक्रमण हुए भारत पर – पर हिन्दू समाज आज भी गर्व से जी रहा है। कितनों ने चुनातियां दी हिन्दू समाज की आस्था और विश्वास को – पर हिन्दू समाज आज भी सनातन के साथ चल रहा है।

भारत विश्व में एक मात्र देश है जो ईश्वर (रचाकार) और उसकी रचना (जगत)  को एक दूसरे से अलग नहीं मानता। द्वैत, अद्वैत, विशिष्टाद्वैत का यह देश है। जीव और ब्रह्म को एक मानने वाला देश। अनेक मत फिर भी सबका सम्मान! काशी में ही कबीर हुए और तुलसी ने उसे अपनी कर्मभूमि बनाया। सबने विरोध सहा, पर काशी ने उनका ही सम्मान भी किया। यह है हमारी सबको स्वीकार करनेवाली संस्कृति। मोहल्ला अस्सी भी उसी संस्कृति से उपजी एक फिल्म है जिसका लेखक बनारस का है और जिसका निर्देशक बनारस की उस आस्था में विश्वास रखने वाला कि – बनारस का कंकर-कंकर शिवशंकर। ऐसा इस ब्रह्माण्ड में कुछ भी नहीं है जो शिव नहीं है – कुछ हो तो दिखा दीजिए! “सर्वम्  खल्विद  ब्रह्म!”  एकमेव अद्वितीयम् ब्रह्म का घोष जिस धरा से होता है। जो तुम ढूंढ रहे हो वह तुम ही हो – तत् त्वं असि – जिस देश का महावाक्य है – उस देश की संस्कृति को क्या फ़िल्में चुनौती दे सकती हैं?

11) फिल्म का विरोध करनेवाले संगठनों और दर्शकों से आप क्या कहना चाहेंगे?

मैं भाग्यशाली रहा हूं कि मुझे संस्कृति के पक्ष में काम करने का हमारे समाज ने अवसर दिया। विरोध करनेवाले मित्र और हितैषी पहले फिल्म देखें और यदि उसके बाद वे इस निर्णय पर पहुंचे कि मोहल्ला अस्सी संस्कृति विरोधी है तो मुझे देश के न्यायालय में ले जाएं। बाबा काशी विश्वनाथ की अदालत में मैं गुहार लगा चुका हूं। वहां मेरी एक न चलेगी और न वहां किसी वकील की। यदि बाबा की अदालत में आपका विश्वास है तो वे मेरा फैसला करेंगे। इस देश में एक संविधान की अदालत है। मामला उसमें पहुंच गया है। संविधान और देश की अदालत ‘मोहल्ला अस्सी’ पर अंतिम निर्णय देने में सक्षम है।

इस देश में कई नुक्कड़ और चौराहों पर फिल्म देखें बिना ही फैसले हो रहे हैं – उन मित्रों से गुहार कि पहले फिल्म देखें (यदि वह दर्शकों तक पहुंचती है) और बाद में फैसला करें कि क्या मोहल्ला अस्सी और मैं संस्कृति, समाज और धर्म विरोधी हैं?

12) आगे और कौन-कौन से फिल्म अथवा धारावाहिक बनाने की योजना है? 

गुप्त काल के एक महानायक और 16वीं शताब्दी के एक युग पुरुष पर काम कर रहा हूं। शायद वे भी दर्शकों तक पहुंचे!

जानिए : आरएसएस के शक्तिशाली और विस्तारित होने का रहस्य

आद्य सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार
आद्य सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार

– लखेश्वर चंद्रवंशी ‘लखेश’

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) सारी दुनिया के चिंतन का केन्द्रीभूत विषय बन गया है। संघ जहां धर्म, अध्यात्म, विश्व कल्याण और मानवीय मूल्यों की रक्षा करनेवालों के लिए शक्ति स्थल है, वहीं वह हिन्दू या भारत विरोधी शक्तियों के लिए चिंता और भय कम्पित करनेवाला संगठन भी है। विश्व के सबसे बड़े संगठन के रूप में ख्यात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की स्थापना सन 1925 में विजयादशमी के दिन नागपुर में हुआ। पराधीन भारत में जन्में इस संगठन के विस्तार की राह आसान नहीं थी। संघ को रोकने के लिए विरोधी पग-पग पर कांटें बोते रहे पर वे संघ के संगठन शक्ति को रोक नहीं पाए।

आखिर, संघ के मूल में ऐसी कौन सी शक्ति छिपी है जिसने उसे इतना बड़ा कर दिया कि आज वह दुनिया के बुद्धिजीवियों के ध्यानाकर्षण का केन्द्र बन गया है। यही प्रश्न संघ के प्रशंसकों, विरोधियों और शोधकर्ताओं के मन में उठता है। इसलिए इन प्रश्नों के उत्तर यदि चाहिए तो सबको संघ संस्थापक एवं आद्य सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के विचारों को उचित परिप्रेक्ष्य में समझना होगा, क्योंकि उन्होंने ही संघ की स्थापना की और उसका लक्ष्य निर्धारित किया। वास्तव में डॉ.हेडगेवार के संदेशों में ही छिपा है आरएसएस के शक्तिशाली और विस्तारित होने का रहस्य।

स्वयं के उद्धार के लिए संघ की स्थापना

डॉ. हेडगेवार ने 13 अक्टूबर, 1937 को विजयादशमी के दिन अपने प्रबोधन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के उद्देश्य को निरुपित करते हुए कहा था कि,

“राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना केवल अपने स्वयं के उद्धार के लिए ही किया गया है। संघ का कोई दूसरा-तीसरा उद्देश्य न होकर केवल स्वयं का उद्धार करना, यही उसकी इच्छा है। परन्तु स्वयं का उद्धार कैसे होगा, पहले हमें इसपर विचार करना होगा। स्वयं का उद्धार करने के लिए जीवित रहना पड़ता है, जो समाज जीवित रहेगा वही समाज स्वयं का और अन्यों का उद्धार कर सकता है और संघ की स्थापना इसी के लिए हुआ है। हिन्दू समाज जीवित रहे अथवा “Sarvival of the fittest” इस तत्व के अनुसार जीवित रहने योग्य रहे इस उद्देश्य से ही संघ का जन्म हुआ है।”

hedgewar-pune
hedgewar-pune

डॉ. हेडगेवार के इस आहवान को स्वीकार कर अनेकों ने संघ कार्य के लिए अपने जीवन को समर्पित किया, जिनमें श्रीगुरूजी गोलवलकर, बालासाहब देवरस, एकनाथ रानडे, भाउराव देवरस, यादवराव जोशी, दादा परमार्थ, बाबासाहेब आपटे तथा माधवराव मुले आदि महानुभावों प्रमुख थे।

आक्रान्ताओं को दोष न दें

डॉ.हेडगेवार ने कहा,

“हिन्दू राष्ट्र पर अतीत में अनेक आक्रमण हुए, वर्तमान में भी हो रहे हैं और कदाचित भविष्य में भी होता रहेगा, यह संघ जानता है। संघ को यह भी मालूम है कि दूसरे समाज पर जो समाज आक्रमण करता है, दूर से देखनेवाले लोग उन्हें दोष देते हैं और जिनपर आक्रमण होता है उसके प्रति सहानुभूति रखते हैं। पर ये उनकी दृष्टि से ठीक है। अब जिनपर आक्रमण होता है उस समाज ने आक्रान्ताओं को दोष देते बैठे रहने के बजाय ये आक्रमण क्यों होते हैं, इसके कारणों को खोजकर उसे दूर करना चाहिए। यह दृष्टि सामने रखकर अपने हिन्दू समाज की ओर देखें तो ये अत्याचार व आक्रमण होने का मुख्य कारण हमारी दुर्बलता व नासमझी ही है। आज हिन्दू समाज इतना नासमझ हो गया है कि कोई भी आता है और अपने सनकी मिजाज से हिन्दू समाज पर मनमानी अत्याचार करता है। पर अभी भी हमें इसकी कोई चिंता नहीं होती तथा अपने असंगठित और बिखरेपन को दूर करने के लिए जैसा होना चाहिए वैसा प्रयास होता दिखाई नहीं देता, संघ को यह अच्छा नहीं लगता। हमें गुस्सा आता है हिन्दुओं के इस तिरस्कृत मनोवृत्ति का, न कि हिन्दुओं का। क्योंकि वे अपने ही हैं और उनके उद्धार के लिए ही हमारा जन्म हुआ है। पर यह तिरस्करणीय मनोवृत्ति – स्वयं की रक्षा न करने की वृत्ति – मौजूदगी की वजह से हिन्दू समाज पर होनेवाले आक्रमण समाप्त होना संभव नहीं। संघ को हिन्दुओं की इस कमजोरी को निकाल बाहर कर इस पाप को धोकर निकलना है और इसलिए ही इस आसेतु हिमालय हिन्दुस्थान के प्रत्येक कोने में संघ की शाखाओं का मजबूत संजाल फैलाकर सम्पूर्ण हिन्दू समाज को संगठित, प्रबल और स्वरक्षणक्षम बनाना, यही यही संघ की इच्छा है।”

sangh-seva-seva-bharati-RSSप्रत्यक्ष काम करनेवाले लोग चाहिए

29 अगस्त, 1939 को लाहौर में संपन्न हुए अधिकारी शिक्षण वर्ग में डॉ.हेडगेवार ने अपने भाषण में संघ को अपेक्षित स्वयंसेवकों की योग्यता और गुण संवर्धन को लेकर महत्वपूर्ण बातें कही थी। उन्होंने कहा,

“संघ को प्रत्यक्ष काम करनेवाले लोग चाहिए। संघ के पास ऐसी कोई सत्ता नहीं कि किसी से काम करवा सके, न धन है जिससे तनखा दे सके। संघ का कार्य moral force (नैतिक बल) से चलता है। वह किसी पर जबरदस्ती नहीं कर सकता। इसलिए नैतिक बल से ही लोगों को खींच कर आप संघ में ला सकते हैं। आपकी संख्या इतनी हो जानी चाहिए कि आप लोगों को आकर्षित कर सकें, उनके दिलों को मोह लें, अपने character (चरित्र) के मोह से। आपके सम्बन्ध में लोगों के दिलों में प्रेम होना चाहिए। इस दृष्टि से आप attraction centre (आकर्षण का केन्द्र) बनने की कोशिश करें। लोगों के अन्दर जो तकरार होती है, हमारे में न हो। आपको लोग आदर्श समझे। वह कहे कि नौजवान वह, कि जो संघ के स्वयंसेवक जैसा हो। उनके मन में ऐसा विचार हो कि मेरा छोटा भाई भी संघ में जाकर ऐसा बनें। संघ के स्वयंसेवक पर इस नाते सभी जवाबदारी है।”

उन्होंने कहा,

“आपके मन में विचार हो कि पढ़ना भी संघ का कार्य है, क्योंकि संघकार्य के लिए पढ़ना है। जितना ज्यादा पढ़ जाऊंगा उतना ज्यादा कार्य कर सकूंगा। आपका व्यवहार आदर्श हो। दूसरे लोगों को भी ऐसा बनाने की आपकी जिम्मेदारी है। संघ का काम करने के लिए आपको योग्य होना चाहिए, शरीर से, दिमाग से, सब ओर से। ताकतवर आदमी कमजोर से ज्यादा कार्य कर सकता है।”

RSS-Hedgewarप्रेम से प्रेम की वृद्धि

डॉ. हेडगेवार स्वयंसेवकों को प्रेम का महत्त्व बताते हैं। वे कहते हैं,

“लोगों को ऐसा प्रतीत होना चाहिए कि यह हमारे पास आए, बैठे, बातचीत करें। ऐसा नहीं कि आपको देखकर लोग दौड़े, छिपते फिरें। लोगों को आप प्रेम से देखें, तो लोग भी आपको प्रेम से देखेंगे। प्रेम से प्रेम की वृद्धि होती है।”

उन्होंने कहा कि,

“मेरा सन्देश यही है कि आप ऐसे प्रेम और आदर्श की मूर्ति बनें कि लोग आपकी ओर खींचे आए। आपके हाथ के साथ किसी का हाथ भी लगे, आपके साथ कोई बात भी कर ले फिर वह आपको न भूल सके। ऐसी आपकी वाणी में मिठास हो। किसी पुरुष के आप सदगुण ग्रहण करें, साथ ही अपने प्रभाव से उसके दुर्गुण दूर करें।”

डॉ. हेडगेवार स्वयंसेवकों को आत्मपरीक्षण की सलाह देते हुए कहते हैं कि,

“आप कभी भी अपनाप को सर्वगुणसम्पन्न मत समझो, नहीं तो आपके सब गुण निरर्थक हो जाएंगे। आप रात को सोते समय विचार करें कि दिनभर मैंने क्या किया, क्या गलती की है, आगे क्या करना है। ऐसा सोचने से तथा करने से आप समाज के नेता बनेंगे और जाति का काम बहुत बढ़ा सकेंगे।”

डॉ. हेडगेवार राष्ट्र से जितना प्रेम करते थे, उतना ही प्रेम वे समाज व स्वयंसेवकों से करते थे। उनमें मनुष्य को देशकार्य के लिए समर्पित होने की प्रेरणा देने का अदभुत कौशल था। वे स्वयंसेवकों को मातृवत स्नेह करते थे, सलाह देते थे, प्रेरित करते थे। उनकी वाणी, चरित्र और कार्य में इतना सामर्थ्य था कि उन्होंने जिसके कन्धों पर हाथ रखा वे उनके साथ चलने लगे। उन्होंने जिसे पुकारा वे उनके हो गए। उन्होंने जिनको संघ के माध्यम से राष्ट्रकार्य में लगाया, उन सभी ने अपने ही तरह सैंकड़ों को तैयार किया, सैंकड़ों ने हजारों को तैयार किया, हजारों ने लाखों स्वयंसेवकों का जीवन गढ़ा। अब स्वयंसेवकों की तादात करोड़ों में हो गई है और ये स्वयंसेवक देश और दुनिया में समाज के उत्थान के लिए सेवाकार्यों के माध्यम से अपना कर्तव्य कर रहे हैं।

आज संघ के ही एक स्वयंसेवक व प्रचारक श्री नरेन्द्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री हैं। उनके ही प्रस्ताव को मानकर हाल ही में 21 जून, 2015 को दुनियाभर में “अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस” मनाया गया। यह संघ के स्वयंसेवक के प्रस्ताव की वैश्विक मान्यता का अनुपम उदाहरण है।

सामाजिक समरसता व सेवाकार्यों के संवाहक ‘श्री बालासाहब देवरस’

श्री बालासाहेब देवरस (आरएसएस)
श्री बालासाहेब देवरस (आरएसएस)

– लखेश्वर चन्द्रवंशी ‘लखेश’

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के तृतीय सरसंघचालक श्री मधुकर दत्तात्रय देवरस उपाख्य बालासाहब देवरस ‘सामाजिक समरसता और सेवाकार्यों द्वारा सामाजिक उत्थान’ के पुरोधा के रूप में जाने जाते हैं। बाल्यकाल से जीवन के अंतिम क्षण समाज में फैले कुरीतियों, विषमताओं और अभावों को दूर करने के लिए उन्होंने अनेक योजनाएं बनाईं। उन योजनाओं को कार्यान्वित करने के लिए लोकशक्ति का निर्माण किया, समाज का प्रबोधन किया। यही कारण है कि बालासाहब समरसता के संवाहक माने जाते हैं। 1974 में पुणे में आयोजित ‘वसंत व्याख्यानमाला’ में उन्होंने हिन्दू समाज में समरसता लाने और विषमता को दूर करने के लिए जो बातें कही थी, वह आज भी प्रासंगिक है। उन्होंने कहा था, “हम सभी के मन में सामाजिक विषमता के उन्मूलन का ध्येय अवश्य होना चाहिए। हमें लोगों के सामने यह स्पष्ट रूप से रखना चाहिए कि विषमता के कारण हमारे समाज में किस प्रकार दुर्बलता आई और उसका विघटन हुआ। उसे दूर करने के उपाय बतलाने चाहिए तथा इस प्रयास में हर एक व्यक्ति को अपना योगदान देना चाहिए।”

सामाजिक समरसता और वंचित, पीड़ित, दलित व शोषित समाज के उत्थान के लिए सेवाकार्यों को देशभर में विस्तारित करने का लक्ष्य बनानेवाले बालासाहब देवरस का जन्म 11 दिसम्बर, 1915 में नागपुर में हुआ था। बालासाहब देवरस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के कुछ समय बाद ही संघ संस्थापक और आद्य सरसंघचालक डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार के सम्पर्क में आए। वे नागपुर के मोहिते के बाड़े में लगनेवाली पहली शाखा के स्वयंसेवक थे। संघ से उनकी निकटता बढ़ती गई और डॉ. हेडगेवार की प्रेरणा से उन्होंने अपना पूरा जीवन संघ के माध्यम से राष्ट्रकार्य में लगाने का निश्चय किया। संघ की कार्यपद्धति के निर्माण तथा कार्यक्रमों के विकास में बालासाहब का विशेष योगदान रहा। गणवेश, शारीरिक एवं बौद्धिक कार्यक्रम और गणगीत आदि निश्चित करने में उनकी मुख्य भूमिका रही है।

विद्यार्थी जीवन  

कुशाग्र बुद्धि के धनी बालासाहब ने विद्यार्थी जीवन में सभी परीक्षाएं प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। उन्होंने अनाथ विद्यार्थी वसित गृह में दो वर्ष तक अध्यापन कार्य भी किया। इसी अवधि में इन्हें नागपुर के नगर कार्यवाह का दायित्व दिया गया। इस दायित्व को उन्होंने बखूबी से निर्वहन किया। उन्होंने शाखाओं के विस्तार के साथ ही शीत शिविर, वन विहार कार्यक्रम, सहभोज और स्वयंसेवकों में गुणात्मक वृद्धि के लिए नैपुण्य वर्ग की शुरूआत की।

बालासाहब बचपन से ही खुले विचारों के थे। उस समय प्रचलित छुआछूत, खानपान और जाति-भेद के वे प्रबल विरोधी थे। उनके घर पर उनके सभी जातियों के मित्र आते थे। वे सब मिलकर एक साथ भोजन करते थे। वे शाखा के स्वयंसेवकों को अपने साथ रसोई में भोजन कराते थे। उनके इस पहल का प्रारंभ में घर पर विरोध हुआ, डांट भी पड़ी किन्तु बाद में सब ठीक हो गया। उन्हें नागपुर के मोहिते के बाड़े में लगने वाली सायं शाखा के ‘कुश पथक’ में शामिल किया गया। इसमें विशेष प्रतिभावान छात्रों को ही रखा जाता था। बालासाहब खेल में बहुत निपुण थे। कबड्डी खेलना उन्हें बहुत अच्छा लगता था।

बालासाहब का प्रचारक जीवन  

बालासाहब देवरस तो बचपन से ही संघ के स्वयंसेवक रहे, पर उनका प्रचारक जीवन सन 1939 से प्रारंभ हुआ। प्रचारक बनाते ही वे सर्वप्रथम संघकार्य के विस्तार हेतु बंगाल गए। किन्तु सन 1940 में डॉ. हेडगेवार के निधन के बाद उन्हें नागपुर वापस बुला लिया गया। 1940 के बाद लगभग 30-32 साल तक उनकी गतिविधियों का केन्द्र मुख्यतः नागपुर ही रहा। इस दौरान उन्होंने नागपुर के काम को आदर्श रूप में खड़ा किया।

देशभर के संघ शिक्षा वर्गों में नागपुर से शिक्षक जाते थे। नागपुर से निकले प्रचारकों ने देश के हर प्रान्त में जाकर संघ कार्य खड़ा किया। नागपुर नगर से प्रचारकों की एक बहुत बड़ी फौज तैयार कर पूरे देश में भेजने का श्रेय बाला साहब देवरस को ही जाता है। यही नहीं जिन प्रचारकों को देश के अन्य भागों में भेजा आया उनके घर की भी पूरी चिन्ता करने का काम बालासाहब ने किया। इसके अलावा जो भी प्रचारक 10 या पांच साल बाद प्रचारक जीवन से वापस आया उसकी भी हर प्रकार की नौकरी से लेकर व्यवसाय तक की पूरी चिन्ता उन्होंने की। नागपुर से जो प्रचारकों की खेप पूरे देश में भेजी गई उसमें स्वयं उनके भाई भाऊराव देवरस भी शामिल थे। भाऊराव देवरस को उत्तर प्रदेश भेजा गया था। भाऊराव ने लखनऊ में रहकर संघ कार्य को गति प्रदान की और एकात्म मानववाद के प्रणेता पण्डित दीनदयाल उपाध्याय और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे लोगों को संघ से जोड़ा।

1948 में जब गांधी हत्या का झूठा आरोप लगाकर संघ पर प्रतिबन्ध लगाया गया। उस समय केन्द्र की नेहरू सरकार ने तत्कालीन संघ के सरसंघचालक माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर (श्री गुरूजी) सहित तमाम पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं को कारावास में डाल दिया। बालासाहब के कुशल नेतृत्व में इस अन्याय के विरूद्ध स्वयंसेवकों ने देशव्यापी सत्याग्रह किया। फलस्वरूप सरकार को बिना शर्त संघ से प्रतिबन्ध हटाना पड़ा। सरकार व देश के प्रतिष्ठित महानुभावों से वार्ता की गई। फलस्वरूप संघ के संविधान की रचना हो सकी। संघ शिक्षा वर्गों तथा नागरिकों के कार्यक्रमों में प्रश्नोत्तर कार्यक्रम भी शुरू किया गया। इन सभी प्रक्रियाओं में बालासाहब की मुख्य भूमिका रही थी।

आपातकाल और सरसंघचालक रूप में बालासाहब देवरस का कार्य  

बालासाहब देवरस सन 1965 में सरकार्यवाह बनें तथा श्री गुरुजी के देहान्त के पश्चात् सन 1973 में वे सरसंघचालक बनें। इसके पश्चात संघ कार्य को गति देने के उद्देश्य देशभर में प्रवास किया। दो वर्ष के पश्चात ही इन्दिर गांधी की घृणित राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं में 04 जुलाई, 1975 को संघ पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। संघ पर लगे इस प्रतिबन्ध का उन्होंने बड़े धैर्य से सामना किया। बालासाहब को 21 महीने (पुणे) जेल में बन्दी बनाकर रखा गया। जेल में उनके उदार विचारों तथा व्यवहार ने बन्दी राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं को संघ के निकट लाया। उन्हीं की प्रेरणा से कांग्रेस व साम्यवादियों को छोड़कर अन्य सभी सामाजिक, धार्मिक एवं राजनीतिक संगठनों ने मिलकर आपातकाल के विरूद्ध देशव्यापी जबरदस्त सत्याग्रह किया। परिणामस्वरूप संघ से प्रतिबन्ध हटाया गया और 1977 के चुनाव में कांग्रेस की जबरदस्त पराजय हुई। स्वयं इंदिरा गांधी तथा उनके पुत्र संजय गांधी चुनाव में बुरी तरह से पराजित हुए।

सन 1983 में मीनाक्षीपुरम (तमिलनाडु) के हिन्दुओं का इस्लाम पंथ में सामूहिक मतांतरण हुआ। इस घटना ने पूरे देश के हिन्दुओं को झकझोर कर रख दिया। इस चुनौती का सामना करने के लिए बालासाहब देवरस के मार्गदर्शन में देशभर में एकात्मता यात्रा निकाली गई। इस यात्रा के माध्यम से देश में अभूतपूर्व जनजागरण हुआ।

श्रीराम जन्मभूमि आन्दोलन और बालासाहब

यह सर्वविदित है कि श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति आन्दोलन में हिन्दू शक्ति का भव्य रूप प्रगट हुआ। इस आन्दोलन में देश के लगभग सभी सामाजिक और धार्मिक संगठनों से शामिल हुए। आन्दोलनकारियों ने 06 दिसम्बर, 1992 को श्रीराम जन्मभूमि पर विवादित ढ़ांचे का विध्वंस कर दिया। इसके बाद देश और दुनिया में इस आन्दोलन को लेकर तथाकथित सेकुलर दल और मुस्लिम कट्टरपंथियों ने हाय तौबा मचाई। आज भी राजनीतिक लाभ के लिए तोड़े गए विवादित ढांचे का मातम मनाते दिखाई देते हैं। पर उस समय सरसंघचालक बालासाब देवरस ने बड़ी प्रखरता और तठस्थता के साथ कहा था कि जब श्रीराम जन्मभूमि पर एक विवादित ढांचे को गिराया गया तो दुनियाभर के मुस्लिम लोग हाय तौबा मचा रहे हैं, पर जब हिन्दुओं के अनगिनत मंदिरों और मठों को नष्ट किया गया, वहां की सम्पत्ति लूटी गई तो हिन्दुओं को कितनी पीड़ा हुई होगी? क्या मुस्लिम समाज ने कभी इसपर विचार किया?

उस समय संघ चाहता तो मंदिर का निर्माण भी कर सकता था लेकिन बालासाहब का मानना था कि अगर श्रीराम मन्दिर बना दिया गया तो कहीं लोगों को यह न लगने लगे कि यह मन्दिर संघ या विहिप का है। उनका मानना था कि अयोध्या में श्रीराम मन्दिर के निर्माण में सभी की भागीदारी होनी चाहिए। उनका मानना था कि देश में रहनेवाला हर व्यक्ति और हर राजनीतिक दल को श्रीराम मन्दिर निर्माण के लिए आगे आना चाहिए।

संघ कार्य का विस्तार

सरसंघचालक रहते हुए बालासाहब ने संघकार्य में अनेक नए आयाम जोड़े। इनमें सबसे महत्वपूर्ण है निर्धन बस्तियों में चलनेवाले सेवाकार्य। इससे वहां चल रही धर्मान्तरण की प्रक्रिया पर रोक लगी। स्वयंसेवकों द्वारा प्रान्तीय स्तर पर अनेक संगठनों की स्थापना की गई थी। बालासाहब ने वरिष्ठ प्रचारक देकर उन सबको अखिल भारतीय रूप दे दिया। बालासाहब देवरस के ही कार्यकाल में संघ का विस्तार देशभर में तहसील स्तर तक पहुंचा। देशभर में एक ओर जहां शाखाओं का व्यापक स्तर पर विस्तार हुआ वहीं उनके 21 वर्षों के कालखण्ड में अपने सहयोगी संगठनों की शक्ति में भी पर्याप्त वृद्धि हुई।

सन 1988-89 में संघ संस्थापक और आद्य सरसंघचालक डॉ.हेडगेवार का जन्म शताब्दी वर्ष मनाया गया। इस अवसर पर डॉ. हेडगेवार का साहित्य गांव-गांव पहुंचाया गया। इस कालखण्ड में सर्वाधिक प्रचारक संघ कार्य के निमित्त निकले। बालासाहब ने ‘हिन्दू जगे तो विश्व जगेगा’ तथा ‘नर सेवा नारायण सेवा’ का उद्घोष किया। उन्हीं के कार्यकाल में देशभर में हजारों सेवा कार्य प्रारम्भ हुए।

उल्लेखनीय है कि बालासाहब देवरस ने कारंजा (बालाघाट) के अपने पैतृक संपत्ति को बेचकर उससे प्राप्त धनराशि से नागपुर-वर्धा मार्ग पर स्थित खापरी में 20 एकड़ भूमि खरीदी। 1970 में उन्होंने इस 20 एकड़ कृषि भूमि को भारतीय उत्कर्ष मंडल को दान कर दिया। ज्ञातव्य है कि खापरी स्थित इस भूमि पर ग्रामीण बालक-बालिकाओं के लिए भारतीय उत्कर्ष मंदिर (विद्यालय), गोशाला और स्वामी विवेकानन्द मेडिकल मिशन नामक अस्पताल ग्रामवासियों के सेवार्थ कार्यरत है। बालासाहब की प्रेरणा से ही “भारतीय उत्कर्ष ट्रस्ट” की स्थापना की गई।

त्याग का अनुपम उदाहरण

मधुमेह रोग के बावजूद 1994 तक सरसंघचालक के रूप में उन्होंने दायित्व निभाया। जब उनका शरीर प्रवास योग्य नहीं रहा, तब उन्होंने प्रमुख कार्यकर्ताओं से परामर्श कर यह दायित्व श्री रज्जू भैया को सौंप कर पद त्याग का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया। इतना ही नहीं सन 1996 में अपना शरीर छोड़ने के पूर्व ही उन्होंने निर्देश दिया कि उनका दाह संस्कार सामान्य व्यक्ति की भांति सार्वजनिक स्थल पर किया जाए। इसके पीछे उद्देश्य था कि उनकी स्मृति में किसी स्मारक का निर्माण न हो। अपने जीवित रहते हुए ही उन्होंने जो पत्र लिखा था उसमें दो बातें प्रमुख थी। एक कि उनके नाम पर कहीं भी स्मारक का निर्माण न कराया जाए और दूसरा यह कि आद्य सरसंघचालक डॉ. हेडगेवार और द्वितीय सरसंघचालक गुरूजी के अलावा अन्य किसी सरसंघचालक का चित्र नहीं लगाया जाएगा।

17 जून, 1996 में बालासाहब इस संसार से विदा हो गए। उनकी इच्छानुसार उनका दाहसंस्कार रेशिमबाग की बजाय नागपुर में सामान्य नागरिकों के शमशान घाट में किया गया।

बांग्लादेशी जनगणना : विलुप्त होते हिन्दू समुदाय का प्रमाण!

बांग्लादेशी जनगणना : विलुप्त होते हिन्दू समुदाय का प्रमाण!
बांग्लादेशी जनगणना : विलुप्त होते हिन्दू समुदाय का प्रमाण!

– लखेश्वर चंद्रवंशी ‘लखेश’

बांग्लादेश में हिन्दू समुदाय बड़े चमत्कारिक ढ़ंग से विलुप्त होता जा रहा है। इतना ही नहीं यहां हिन्दुओं के गायब होने का सिलसिला अपने चरम पर पहुंचता दिखाई दे रहा है। 2011 में बांग्लादेश की जनगणना के निष्कर्ष इस बात को रेखांकित करते हैं। यहां हिन्दू समुदाय को अपने अस्तित्व के खतरे के खिलाफ आवाज उठाने के लिए कोई भी मंच नहीं है। यहां उसकी सुध लेनेवाला कोई नहीं है। इस विदारक स्थिति से आहत होकर बांग्लादेशी हिन्दू बड़ी ख़ामोशी से, दुनिया की नज़रों से ओझल होकर धीरे-धीरे समाप्त होता जा रहा है। इसका जो भी कारण हो पर यह एक कटु सत्य है। आंकड़ों से ज्ञात होता है कि बांग्लादेशी हिन्दुओं को अपनी आवाज उठाने के लिए कोई मंच नहीं है, संयुक्त राष्ट्र में भी नहीं। यही कारण है कि 2013 में बांग्लादेश सरकार की वेबसाइट पर जारी किए गए आंकड़ों पर किसी का ध्यान नहीं गया, जहां 2011 में बांग्लादेशी सरकार द्वारा जारी किए गए धार्मिक जनगणना का डाटा उपलब्ध है।

बांग्लादेश की जनगणना 2011
बांग्लादेश की जनगणना 2011

इस समय बांग्लादेश में हिन्दुओं की संख्या महज 8.6 प्रतिशत रह गई है। 1951 के बाद से हर दशक में हिंदुओं के प्रतिशत में गिरावट आई है। यह गिरावट बांग्लादेश के सभी जिलों में बिना किसी अपवाद के देखी जा सकती है।

BangladeshDistrictsMap_negativeबांग्लादेश में ऐसे 9 जिले हैं जहां 2001 की तुलना में हिन्दुओं की नकारात्मक वृद्धि दर दर्ज की गई है, जो कि हिन्दू आबादी में हो रहे लगातार भारी कमी को इंगित करता है।

Bangladeshबांग्लादेश में पहली जनगणना में (जब वह पूर्वी पाकिस्तान था), तब वहां मुस्लिम आबादी 3 करोड़, 22 लाख थी जबकि हिन्दुओं की जनसंख्या 92 लाख, 39,000 थी। अब 60 वर्षों के बाद हिन्दुओं की संख्या केवल 1 करोड़, 20 लाख है, जबकि मुस्लिमों की संख्या 12 करोड़, 62 लाख हो गई है। इससे स्पष्ट होता है कि बांग्लादेश में हिन्दू आबादी किस तरह विलुप्त होती जा रही है।  

6percent1981 में, बांग्लादेश के 7 जिलों में हिन्दुओं की संख्या में 6 प्रतिशत से अधिक गिरावट देखी गई थी। सांख्यिकी मापदंडों, जैसे जनसंख्या वृद्धि दर और जन्मदर के आधार पर कई समाजशास्त्रियों का आकलन है कि इस आधी सदी में 40 से 80 लाख हिन्दू बांग्लादेश से ‘विलुप्त’ हुए हैं। दीपेन भट्टाचार्य, जो कि मूलतः बांग्लादेशी हैं और जो वर्तमान में अमेरिका में बतौर वैज्ञानिक काम कर रहे हैं, उन्होंने अपने लेख “बांग्लादेशी हिन्दुओं का सांख्यिकी भविष्य में कहा है कि “इस सदी के अंत तक बांग्लादेश में हिन्दुओं की औसत संख्या 1.5 रहेगी, जबकि 2011-2051 के दौरान हिन्दू जनसंख्या वृद्धि दर -0.64% होगा और 2051 में इसकी संख्या 1974 के बराबर हो जाएगा।”

बांग्लादेश में हिंदुओं के साथ-साथ,बौद्ध आबादी में भी भारी कमी आई है। बौद्ध समुदाय चिटगांव पहाड़ी मार्ग के तीन जिलों, – बंदरबन, खग्राछरी और रंगमती में ही सिमट कर रह गए हैं। गत तीन दशकों में जनजातीय बौद्ध लोगों की एक बड़ी संख्या को यहां से विस्थापित कर दिया गया।

हिन्दुओं के इस “गायब” होने के पीछे कुछ लोगों का कहना है कि रोजगार के बेहतर अवसर की तलाश में यहां के हिन्दुओं ने पलायन किया है। हालांकि यह भी सत्य है कि बांग्लादेशी मुस्लिमों का भी भारी संख्या में स्थानांतरण हुआ है और यह हिन्दुओं के अनुपात के बराबर हो सकता है, फिर भी इससे हिन्दू प्रतिशत में आई गिरावट को स्पष्ट नहीं किया जा सकता। हां, 2011 की जनगणना में इस सम्बन्ध में कुछ महत्वपूर्ण संकेत जरुर मिलते हैं।

Buddhist
2011 की जनगणना के अनुसार, 2001 की तुलना में बांग्लादेश में लैंगिक अनुपात लगभग 6%  घटा है। यह दर्शाता है कि यहां पहले की तुलना में इस बार 40 लाख की कमी का अंतर है (2001 की तुलना में पुरुषों की संख्या कम है,या फिर महिलाओं की संख्या अधिक है जिसकी संभावना कम ही है)। इस अंतर के बाद यह तार्किक निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि धार्मिक अनुपात में मुसलमानों की तुलना में हिंदुओं का पलायन लगभग बराबर है।

Sex-ratioयह स्पष्ट है कि बांग्लादेश में विलुप्त होते हिन्दुओं की संख्या के पीछे अनेक कारण होने चाहिए। विभिन्न अध्ययनों और समाचार रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि वहां हिन्दुओं पर अत्याचार, धर्मान्तरण और उनकी भूमि हड़पने की घटना इसके पीछे मुख्य कारण हैं।

हिन्दुओं पर अत्याचार, सीमाओं से परे और बेहद शर्मनाक 

पिछले कुछ वर्षों में यहां हिन्दुओं पर हमलों की कई घटनाएं हुईं हैं। हिन्दुओं की संपत्तियों को लूटा गया, घरों को जला दिया गया तथा मंदिरों की पवित्रता को भंग कर उसे आग के हवाले कर दिया गया। और ये हमले बेवजह किए गए। 2013 में, अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय द्वारा जमात-ए-इस्लामी के उपाध्यक्ष दिलावर हुसैन को 1971 के युद्ध अपराधों के लिए मौत की सजा सुनाई गई। इसकी प्रतिक्रिया में जमाते इस्लामी के समर्थकों ने हिन्दुओं पर जमकर हमले किये तथा लूटपाट की। उल्लेखनीय है कि 1971 में पाकिस्तान के खिलाफ नौ महीने तक चले बांग्लादेश के स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान हिन्दुओं पर अत्याचार, बलात्कार और नरसंहार के आरोपों में दिलावर को दोषी पाया गया था।

2012 में, कॉक्स बाजार जिले के रामू में कट्टरपंथियों ने 22 बौद्ध मंदिरों को नष्ट कर दिया और फेसबुक के कुछ पोस्ट के खिलाफ प्रतिक्रिया के रूप में कई घरों को जला दिया गया।

बांग्लादेश के विख्यात बुद्धिजीवी अफसान चौधरी के अनुसार

यह बेहद शर्मनाक है कि सैंकड़ों मुल्लाओं ने जमात-ए-इस्लामी द्वारा बौद्ध मंदिरों और घरों पर किए गए हमलों का समर्थन किया, और वह इसलिए कि कटटरपंथियों ने फेसबुक पर कथित इस्लाम विरोधी तस्वीर के खिलाफ अपना विरोध जताया था। यह एक ऐसा समय रहा जो यह स्पष्ट करने के लिए काफी है कि दुनियाभर में मुसलमान अलोकप्रिय क्यों हैं? अपने साथ दुर्व्यवहार का दावा करते हुए कट्टरपंथियों ने सामूहिक और सामाजिक बर्बरता को चरम चिखर पर पहुंचा दिया है।

2013 के चुनाव और उसके बाद चुनावी उन्माद में हिंदुओं को निशाना बनाया गया और बेरहमी से विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा उनपर दबाव डाला गया।

इस दौरान कई रिपोर्टें आईं जिसमें नाबालिग हिन्दू लड़कियों को जबरन शादी और धर्मान्तरण के लिए मजबूर किया गया। उदाहरणार्थ, 2013 में ढाका ट्रिब्यून में “अपहरण के बाद धर्मान्तरण के लिए मजबूर शीर्षक से स्टोरी चली थी जिसमें ऐसे कई मामलों का पता चलता है।

पुरुषों का अपहरण, और 10 से 16 वर्ष की अल्पसंख्यक समुदाय की लड़कियों का जबरन निकाह, और उनसे जबरदस्ती हस्ताक्षर कराया गया कि वे वयस्क हैं और वे इस्लाम कबुल करना चाहते हैं।

जहां इस प्रकार के हिन्दू उत्पीडन का दुष्चक्र रचा गया, उससे बचने के लिए बड़ी संख्या में हिन्दुओं ने पलायन कर लिया। बांग्लादेश के राजनीति शास्त्री और प्रोफ़ेसर अली रियाज, जो कि अब अमेरिका में रहते हैं, ने अपनी पुस्तक “गॉड विलिंग : द पॉलिटिक्स ऑफ़ इस्लामीजम इन बांग्लादेश” में यह निष्कर्ष निकाला है कि पिछले 25 वर्षों में बांग्लादेश से 53 लाख हिन्दू पलायन कर गए हैं।

wallसांप्रदायिक राजनीति का विकास : हिंदुओं! भाग जाओ!

बांग्लादेश का राजनीतिक माहौल वर्ष दर वर्ष अधिकाधिक सांप्रदायिक होता जा रहा है। 1977 में संविधान से सेक्युलरिज्म शब्द हटा दिया गया। 1988 में बांग्लादेश ने खुद को इस्लामिक देश के रूप में घोषित कर दिया गया। जमात-ए-इस्लामी की तरह इस एक दशक में कई राजनीतिक दल के उदय से यहां का माहौल बिगड़ा है। परिणामस्वरूप बांग्लादेश के 350 सदस्यीय संसद में केवल 15 हिन्दू सांसद हैं। आम तौर पर अवामी लीग अल्पसंख्यकों के लिए उदार पार्टी के रूप में जाना जाता है। आज भी संसद के 15 हिन्दू सदस्यों में से 13 सदस्य अवामी लीग से है, जबकि 2 सदस्य निर्दलीय हैं। अन्य तमाम राजनीतिक दलों में हिन्दू प्रतिनिधि की संख्या शून्य है। यहां यह ध्यान में रखना चाहिए कि बांग्लादेश के उन 9 जिलों में जहां हिन्दुओं की संख्या काफी कम है, वहां 2001 के चुनाव में गोपालगंज जिले को छोड़कर हिन्दू विरोधी कट्टर दल जमात-ए-इस्लामी और बीएनपी गठबंधन ने सभी सीटें जीतीं।

शत्रु संपत्ति अधिनियम : जब सरकार ही लुटेरा बन गया

एक और कारण जो कि आसानी से समझ में नहीं आता। पिछले कई दशकों में तथाकथित शत्रु संपत्ति अधिनियम [VPA] जैसे अनुचित प्रावधानों के पक्षपातपूर्ण कार्यान्वयन के चलते हिन्दुओं को अपनी संपत्ति गंवानी पड़ी।

ढाका विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और अर्थशास्त्री अबुल बरकत जिनका ‘पॉलिटिकल इकॉनोमी ऑफ़ वेस्टेड प्रोपर्टी एक्ट इन रूलर बांग्लादेश’ और ‘एन इन्क्वायरी इनटू काउसेस एंड कोन्सेक़ुएन्केस ऑफ़ डेप्रिवेशन ऑफ़ हिन्दू माइनॉरिटीज इन बांग्लादेश थ्रू द वेस्टेड प्रोपर्टी एक्ट’  पर गहरा अध्ययन है। उनके अध्ययन के अनुसार, लगभग 12 लाख (43%) हिन्दू परिवारों को EPA या VPA के जरिए प्रभावित किया गया है। इस अधिनियम के तहत हिन्दू समुदाय के स्वामित्व की लगभग 20 लाख एकड़ भूमि को हड़प लिया गया, जो कि बांग्लादेश की भूमि का केवल 5% है, लेकिन यह भूमि हिन्दू समुदाय के स्वामित्व के लगभग 45% है।” 

अध्ययन यह भी रेखांकित करता है कि यह अधिनियम भूमि हथियाने का मात्र एक तरीका है। किसी परिवार के एक सदस्य की मृत्यु होने या पलायन करने की स्थिति में उस परिवार की सारी संपत्ति हड़पने के लिए एक बहाने के रूप में इस अधिनियम का प्रयोग किया जाता है। ऐसे कई उदाहरण हैं जिसमें प्रभावशाली पार्टियों, भू-माफियाओं और फर्जी दस्तावेजों का उपयोग करके हिन्दुओं के जमीन पर कब्ज़ा किया गया।

उदाहरणार्थ, 2009 में ‘जुगांतर’ के एक जांच से पता चला कि इस अधिनियम के तहत चिटगांव प्रशासन द्वारा विनियोजित भूमि की 30,000 एकड़ जमीन का केवल 5000 एकड़ भूमि ही सरकारी नियंत्रण में है, शेष भूमि ‘अज्ञात तत्वों’ के कब्जे में हैं। इस सन्दर्भ में ‘डेली स्टार’ समाचार रिपोर्ट का यह कथन वास्तविकता को दर्शाने के लिए विशेष उदाहरण है। समाचार रिपोर्ट के अनुसार,

स्थानीय धनिकों और भूमि प्रशासकों द्वारा इस अधिनियम के तहत हिंसा और सत्ता के दुरुपयोग के कई मामले हैं। शिराजदिखा मुंशीगंज के शमरेशनाथ ने इस अधिनियम के अंतर्गत लिए गए उनकी रियासती संपत्ति की घोषणा को जब चुनौती दी, तब उस क्षेत्र के यूनियन निर्वाही ऑफिसर ने स्थानीय हिंसक गुंडों और पुलिस के द्वारा उनको और उनके परिवार को शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया। उच्च न्यायालय ने 2009 में नाथ के पक्ष में फैसला सुनाया, इसके बावजूद यूनियन निर्वाही ऑफिसर ने तबतक नाथ और उनके परिवार को धमकाना बंद नहीं किया, जबतक वे अपने परिवार के साथ वहां से चले नहीं गए। नाथ आज तक अपने घर नहीं लौट सके हैं। उन्होंने कहा, “मेरे पिता बांग्लादेश के जिला आयुक्त थे। जब उनको न्याय नहीं मिल सका, तो यहां आम लोग कहां जाएंगे?”

Buddhistबुद्ध मतावलंबियों को भी यहां ऐसी ही विदारक स्थिति से गुजरना पड़ रहा है। अबुल बरकत के अध्ययन के अनुसार,चिटगांव पहाड़ी मार्ग के तीन जिलों, – बंदरबन,खग्राछरी और रंगमती में 22% बौद्ध धर्मावलम्बियों की भूमि छीन ली गई। 1978 में बौद्धों के स्वामित्ववाली भूमि 83% थी जो कि 2009 में घटकर 41% ही रह गई है, इस कारण उन्हें मजबूरन भूमिहीन होना पड़ा।

बांग्लादेश में हिन्दुओं की लगभग आधी आबादी को अपनी भूमि से वंचित होना पड़ा है और इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि भूमि हड़पे जाने के बाद वे वहां से पलायन कर रहे हैं।

ऐसा नहीं कि सभी बांग्लादेशी इससे खुश हैं। अफसान चौधरी ने कहा कि

हम कितना ही क्यों न कह लें, सिवा मायूसी के कुछ हासिल नहीं होगा। हम कभी नहीं चाहते कि ऐसा बार-बार हो, और फिर…हमें पुराने पाकिस्तान के एक नए संस्करण की जरूरत पड़े। हम ऐसा देश बनाने में असफल हो गए जिसपर हम गर्व कर सकें। हालांकि बांग्लादेश पूर्व पाकिस्तान से बिल्कुल विपरीत है, तथापि बांग्लादेश में अक्षमता, भ्रष्टाचार, कट्टरता और धार्मिक भेदभाव के चलते वह अच्छा देश नहीं बन सका। हमारे लिए यहाँ अब केवल लज्जा ही शेष है। हमारे इस कथन से जो सहमत हैं, उन सभी लोगों की ओर से हम उन सभी अल्पसंख्यक और पीड़ित लोगों से अंतःकरण से माफ़ी चाहते हैं कि जिन्होंने यहां यातनाओं को सहा है।”  

कुछ बांग्लादेशी नागरिक बांग्लादेशी हिन्दुओं के लिए वास्तव में चिंतित हैं, तब वहां कुछ आशा की किरण जरुर दिखाई देती है। पर यह हिन्दुओं के इस स्थिति को बदलने के लिए पर्याप्त नहीं है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में यहूदियों ने एक मजबूत भूमिका निभाई है। आज दुनियाभर में वे यहूदियों की सुरक्षा को सुनिश्चित कर पाए, और उन्होंने विभिन्न वैश्विक प्लेटफार्मों पर इसराइल के लिए समर्थन जुटाया। जनगणना के अनुसार भारत में 3% से भी कम ईसाई हैं। पर गत कुछ माह से अमेरिका व वैश्विक शक्तियों की सहायता से इतने कम संख्या होने के बावजूद ईसाई समुदाय अपनी आवाज तथ्यहीन और निराधार स्थितियों के समर्थन में उठा रहे हैं। दूसरी ओर अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर हिन्दुओं के अधिकारों के लिए प्रतिबद्ध राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) व विश्व हिन्दू परिषद की प्रबल शक्ति के बावजूद वैश्विक हिन्दू समाज आज उस स्थिति में दिखाई नहीं देता, जिससे कि बांग्लादेशी हिन्दुओं की स्थिति की ओर विश्व का ध्यान दिला सकें। दुनिया के किसी भी कोने में रहनेवाले हिन्दू भारत से स्वाभाविक अपेक्षा रखता है, पर भारत इस विषय पर चुप्पी साधे हुए बैठा है। क्योंकि भारत के राजनेताओं को यह डर है कि यदि वे हिन्दुओं के पक्ष में अपनी बात रखेंगे तो उनके तथाकथित सेकुलर होने की बात पर प्रश्न उपस्थित होगा। अंततः इस परिप्रेक्ष्य में यह बहुत व्यापक और गंभीर प्रश्न है कि यह बांग्लादेशी हिन्दुओं का धीरे-धीरे होनेवाला पतन है या पूर्णतः विनाश का संकेत?

news bharti में अंग्रेजी में किए गए शोधात्मक लेख “Census 2011 Bangladesh : The vanishing Hindus!” का हिंदी अनुवाद