‘मोहल्ला अस्सी’ के विवाद पर निर्देशक चंद्रप्रकाश द्विवेदी से संवाद

mohalla-assi-chandraprakash– लखेश्वर चंद्रवंशी ‘लखेश’

‘मोहल्ला अस्सी’ फिल्म रिलीज से पहले ही विवादों के जाल में फंस गई है। सोशल मीडिया में इस फिल्म को गाली-गलौच और आस्था के साथ खिलवाड़ करनेवाली फिल्म कहकर कोसा जा रहा है। कुछ संगठनों द्वारा इसके विरोध में स्वर भी उठे हैं। पर ‘मोहल्ला अस्सी’ आस्था के साथ खिलवाड़ करनेवाली फिल्म होगी ऐसा यकीन नहीं होता, क्योंकि इसके निर्देशक चंद्रप्रकाश द्विवेदी हैं, जिन्होंने चाणक्य, उपनिषद् गंगा, एक और महाभारत जैसे महान धारावाहिक से जनमानस के हृदय में आपना स्थान बनाया है। इसलिए ‘मोहल्ला अस्सी’ से जुड़े सभी विवादित मुद्दों पर लखेश्वर चंद्रवंशी ने फिल्म निर्देशक डॉ.चंद्रप्रकाश द्विवेदी से बातें की। डॉ.द्विवेदी ने सभी प्रश्नों का विस्तृत उत्तर दिया।  

प्रस्तुत है बातचीत का सम्पूर्ण विवरण :- 

1) ‘मोहल्ला अस्सीफिल्म में ऐसा क्या है, जिसने विवाद को जन्म दे दिया?

पहले तो मैं स्पष्ट कर दूं कि फिल्म को लेकर अभी तक कोई विवाद नहीं है। फिल्म अभी तक पूरी नहीं हुई है। फिल्म को अभी केंद्रीय फिल्म प्रमाणण बोर्ड के पास भेजा भी नहीं गया है। उसके पहले फिल्म के एक अनधिकृत, गैरकानूनी पायरेटेड फुटेज को लेकर विवाद हो रहा है।

मोहल्ला अस्सी काशीनाथ सिंह के उपन्यास काशी का अस्सी और मुख्यतः उसकी एक कहानी “पांडे कौन कुमति तोहे लागी” पर आधारित है। यह उपन्यास पहले हंस नामक पत्रिका में छपा था। उसके बाद निरंतर राजकमल प्रकाशन के इसके कई संस्करण निकाले हैं। इसी उपन्यास और कहानी के आधार पर प्रसिद्ध रंग कर्मी उषा गांगुली ने काशीनामा के नाम से एक नाटक भी किया था, जिसका मंचन बनारस में भी हुआ था। इसी उपन्यास के आधार पर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के छात्रों ने भी एक नाटक किया था। काशी का अस्सी एक लोकप्रिय उपन्यास है।

2) फिल्म के कथित प्रोमो के लिक होने पर जो दृश्य देखा गया उससे प्रतीत होता है कि मोहल्ला अस्सीमें केवल कामुक दृश्य, फूहड़ता और गालियों की ही भरमार है। 

यदि  काशीनाथ सिंह जी के उपन्यास से सारी कथा निकाल दी जाए और सिर्फ गालियां रखी जाए तो क्या वह “काशी का अस्सी” उपन्यास रह जाएगा? उसी प्रकार विवादित फुटेज में किसी भी प्रकार से फिल्म को प्रतिबिंबित नहीं करता। ऐसा ट्रेलर फिल्म का प्रतिनिधि ट्रेलर हो ही नहीं सकता। यह तो विकृति है। यह फुटेज/ट्रेलर मैंने भी देश के अन्य नागरिकों की तरह सोशल मीडिया पर आने पर देखा। इसे मेरी ओर से न कोई रचनात्मक स्वीकृति दी गई थी, न ही मुझे इसकी जानकारी थी। मोहल्ला अस्सी एक संवेनदशील कथा है। यह उदारीकरण के बाद देश के सामने आई चुनौतियों की कहानी है। वास्तविक चुनौती संस्कृति के सामने है। कथा में वर्तमान के बनारस का इतिहास है। वास्तव में फिल्म संस्कृति के पक्ष में अपना विचार रखती है।

मोहल्ला अस्सी तो बनारस और देश की संस्कृति की लड़ाई की कहानी है। फिल्म 1988 से 1998 के काल खंड को प्रतिम्बिम्बित करती है। किस तरह से देश में हो रहे बड़े आंदोलनों ने देश, समाज और व्यक्तियों को प्रभावित किया, उसकी कथा है मोहल्ला अस्सी। फिल्म में श्रीराम जन्मभूमि का आंदोलन पृष्ठभूमि में है। संस्कृत शिक्षकों के सामने चुनौती इसकी मुख्य कथा है। इस फिल्म में मूल्यों, चरित्र के ह्रास की कहानी है। इस दौर में किस तरह हमारे मूल्य ढह रहे हैं और इस अवस्था से आस्था व संस्कृति के सामने जो संकट आ खड़ा है उससे कैसे लड़ा जा सकता है, इसकी कहानी है मोहल्ला अस्सी। गालियां उपन्यास में है, और जो भाषा और समाज उपन्यास का है वही फिल्म में भी है। पूरा फुटेज कुप्रचार के लिए है इसलिए जिस प्रकार के बिम्बों का उसमें प्रयोग किया गया है उससे फिल्म का फूहड़ और गालियों की भरमार लगना स्वाभाविक है, परन्तु फिल्म में कामुक दृश्यों की न तो भरमार है और न ही वह उसका उद्देश्य।

गालियों के सन्दर्भ में  उपन्यास में कहा गया है -“धक्के देना और धक्के पाना, जलील करना और जलील होना, गालियां देना और गालियां पाना औघड़ संस्कृति है। अस्सी की नागरिकता के मौलिक अधिकार और कर्तव्य। इसके जनक संत कबीर रहे हैं और संस्थापक औघड़ कीनाराम। चंदौली के एक गांव से नगर आए एक अप्रवासी संत। अस्सीवासी उसी औघड़ संस्कृति की जायज़ नाजायज़ औलादें हैं। गालियां इस संस्कृति की राष्ट्रभाषा है जिसमें प्यार और आशीर्वाद का लेन देन होता है।” ( काशी का अस्सी, पृष्ठ संख्या-38)

उपन्यास के पहले  पृष्ठ पर ही लिखा है – “हर हर महादेव के साथ भोंसड़ी के नारा इसका सार्वजनिक अभिवादन है”, मेरी दृष्टि में भाषा और जीवन की सहज अभिव्यक्ति ही इस उपन्यास की ज़मीन है।

3) खबर है कि मोहल्ला अस्सी में गालियों और फूहड़ता की भरमार से फिल्म के लेखक काशीनाथ सिंह भी हैरान हैं।

काशीनाथ जी से मेरी फोन पर बात हुई है। उन्होंने मुझे बताया कि उनके नाम पर ऐसा बहुत कुछ लिखा जा रहा है जो उन्होंने नहीं कहा है। ‘काशी का अस्सी’ तो बाज़ार में उपलब्ध है। कोई भी पाठक/ दर्शक उसे पढ़ सकता है और स्वयं तय कर सकता है कि मैं उपन्यास से दूर हूं या उपन्यास के नजदीक! बरसों से लोग उपन्यास पढ़ रहे हैं। काशी का अस्सी को लेकर विशेषांक भी निकले हैं। जब यह उपन्यास हंस में श्रृंखलाबद्ध प्रकाशित हुआ था तब भी इसका विरोध हुआ था परन्तु स्वर्गीय राजेंद्र यादव ने इसे छापना जारी रखा। जो उपन्यास में है उसी के बिम्ब आपको फिल्म में भी देखने को मिलेंगे।

4) बनारसको विश्व की आध्यात्मिक राजधानी बनाने की बात चल रही है, और लोगों का कहना है कि इस फिल्म में काशी की इमेज के साथ खिलवाड़ किया गया है? 

काशी की छबि के साथ खिलवाड़ कौन कर सकता है? वास्तव में जैसा कि मैंने पहले कहा कि यह तो काशी के मूल स्वरुप को बचाने की लड़ाई की कहानी पर बनी फिल्म है। क्या काशी भारत नहीं है? क्या काशी पर इस देश के नागरिकों को गर्व नहीं है ? क्या काशी भारत की आध्यात्मिक आस्था का केंद्र और सांस्कृतिक विरासत की नगरी नहीं है? मैं बनारस को भारत से अलग कर के नहीं देख सकता। मेरी दृष्टि में काशी की छबि के साथ खिलवाड़ भारत की छबि के साथ खिलवाड़ है। क्या काशीनाथ सिंह के उपन्यास की ज़मीन भारत की छबि के साथ खिलवाड़ की है? काशीनाथ सिंह को हाल ही में सन 2012 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। इस उपन्यास के प्रति आकर्षित ही इसलिए हुआ था। ‘काशी का अस्सी’ में बदल रहे भारत और बदल रहे बनारस को लेकर सांस्कृतिक सन्दर्भों में कई मुद्दे हैं। उनमें से कुछ मुद्दे फिल्म में हैं।

5) आप पर आरोप है कि शिवजी के मुख से गाली बोलवाकर आपने आस्था के साथ खिलवाड़ किया है, क्या यह सही है

जिसे दर्शक देखकर प्रतिक्रिया दे रहे हैं वह फिल्म में एक बहुरुपिया है जो शिव जी का रूप धारण कर घाट-घाट घूमकर पर्यटकों के साथ फोटो खिंचवाता है। धर्मनाथ पांडे (मुख्य अभिनेता) और बहुरूपिये के बीच इस बात को लेकर तकरार होते रहती है। धर्मनाथ पांडे जब अपने जीवन में कठिन काल से गुज़र रहा होता है तो किस प्रकार से यह बहुरुपिया, धर्मनाथ पांडे के स्वप्न में आकर उसके भीतर चल रहे अंतर्द्वंद का समाधान करता है। बहुरुपिया धर्मनाथ पांडे की ही भाषा बोलता है क्योंकि धर्मनाथ वही उत्तर चाहता है। यह जरुरत और आस्था के बीच की लड़ाई का दृश्य है। संकट के काल में कैसे मनुष्य अपने मन को समझा लेता है और उसे अपनी सुविधा के अनुसार ईश्वर का आदेश मानकर मूल्यों और सिद्धांतों से समझौता कर लेता है। यह इस दृश्य की उपकथा है। उपन्यास में शिवजी स्वप्न में आते हैं। फिल्म में शिव के रूप में बहुरुपिया जिसे धर्मनाथ पांडे जानते हैं। “पांडे कौन कुमति तोहे लागी” की कहानी और उपन्यास के  पृष्ठ संख्या 132 पर यह घटना शब्दांकित है।

चूंकि फिल्म की स्थापना में ही गालियों को “प्यार और आशीर्वाद” का रूप माना गया है और अस्सी की औघड़ संस्कृति की सहजता, मूल उपन्यास और फिल्म में भी उसी भावना को अभिव्यक्त किया गया है। अंतर्मन, स्वप्नावस्था, मनोदशा, भय, जरुरत, आस्था, और उससे उपजा समाधान, कई परतों को इस दृश्य में खोलने का प्रयत्न हुआ है। चूंकि सोशल मीडिया पर चल रहे फुटेज में सन्दर्भों को नहीं दिखाया गया है उससे दर्शकों में रोष होना स्वाभाविक है। मोहल्ला अस्सी हमारे जीवन से शिव और शिवत्व के हो रहे विस्थापन के कहानी है। ऐसी फिल्म देश की आस्था के साथ खिलवाड़ कैसे कर सकती है?  ‘पांडे कौन कुमति तोहें लागी में’ इसी “कुमति” के खिलाफ आवाज़ है जो हमें चेता रही है कि बनारस के हर घर के मुखिया बाबा (शिव)  हैं, जिन्हें हमारे घरों, मनों और हृदय से विस्थापित करने का किसी को अधिकार नहीं है। शिव है तो अस्सी है, शिव है तो बनारस है, शिव है तो भारत है।

6) इसका प्रोमो लीक क्यों हुआ,  कहीं इसके पीछे कोई षड़यंत्र है या फिर पब्लिसिटी स्टंट? 

2011 में बनारस में 22 दिन बनारस के घाटों पर इसकी शूटिंग हुई थी। चार सालों  मेरा निरंतर प्रयास चल रहा है कि यह फिल्म दर्शकों तक पहुंचे। कई मुद्दों के चलते यह फिल्म ‘फिल्म फेडरेशन ऑफ वेस्टर्न इंडिया सिने इम्प्लोयी’ की आपसी  विवाद हल करने की एक समिति की देख रेख में बनाईं जा रही है। फिल्म अभी पूरी नहीं हुई है। मैं किसी भी संभावना से नकार नहीं करता। मैं इतना दावे के साथ कह सकता हूं कि मैं इस कुचक्र और कुमति का हिस्सा नहीं हूं, न हो सकता हूं। एक लीक मेरी जानकारी से नहीं हुआ है। आवश्यकता पड़ने पर मैं इस सन्दर्भ में अपनी भागीदारी न होने के प्रमाण प्रस्तुत कर सकता हूं।

7) इस फिल्म की मूल संकल्पना (concept) क्या है अथवा इसका सन्देश क्या है? 

‘संस्कृत और संस्कृति बचेगी तो देश बचेगा!’ यह इसकी मूल संकल्पना है। इसी संकल्पना पर आधारित है मोहल्ला अस्सी का कथानक।

यह फिल्म एक सवाल खड़ा करती है कि जब बनारस और देश में ‘शिव और शिवत्व’ नहीं रहेगा तो क्या भारत रहेगा? हमारे घरों और जीवन से “शिव” के हो रहे विस्थापन और उसे बचाए रखने के जद्दोजहद की कहानी है – मोहल्ला अस्सी। फिल्म में एक संवाद है –

“अस्सी की आत्मा का अपहरण हो रहा है।” क्या कोई आगे आएगा?

8) क्या यह फिल्म परिवार के साथ देखी जा सकती है?

यह फिल्म अपने मूल रूप में वयस्कों के लिए होगी ऐसा मेरा मानना है, परन्तु इसका दूसरा और संशोधित संस्करण परिवार और टेलीविज़न के दर्शकों के भी होगा, जिसे पूरे परिवार के साथ देखा जा सकेगा।

9) सनी देओल के साथ काम करके कैसा लगा? फिल्म की कहानी उनको कैसी लगी

सनी देओल भारत और विश्व भर में हिंदी दर्शकों के बीच एक लोकप्रिय कलाकार हैं। वे कहानी और अपने चरित्र से इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने अपना पारिश्रमिक फिल्म रिलीज़ होने के बाद लेने की शर्त पर काम किया। मेरी दृष्टि में यह भूमिका उनके जीवन की श्रेष्ठ भूमिकाओं में एक है। एक बात में यहां जोड़ना चाहूंगा – कि जो कलाकार भारत के सिने जगत में पिछले 35 सालों से काम कर रहा है, जिसका परिवार भारत के सिने जगत में पचास सालों से अधिक समय बिता चुका है, जिसके परिवार के अधिकतर सदस्य फिल्म क्षेत्र से जुड़े हैं, जिस परिवार का पूरा देश सम्मान करता है – वह सनी देओल गालियां देने और सस्ती लोकप्रियता के लिए या किसी आर्थिक लाभ के लिए किसी ऐसी फिल्म में काम करेगा जो फूहड़ और गलियों से भरी हो? साक्षी तंवर जिसे भारत की अधिकतर महिलाओं ने सराहा है – क्या ऐसी फिल्म में काम करेंगी जो फूहड़ हो ? इस फिल्म के साथ हिंदी सिने जगत के कई प्रसिद्ध शिल्पी जुड़े हैं। क्या वे सब मिलकर एक फूहड़ फिल्म बना रहे हैं?

10) एक लोकप्रिय धारावाहिक चाणक्य के माध्यम से घर-घर में पहचान बना चुके मौजूदा सेंसर बोर्ड सदस्य डॉ.चंद्रप्रकाश द्विवेदी इस फिल्म से कितने संतुष्ट हैं?

मैंने इस फिल्म के विषय को चुना ही इसलिए था कि ‘काशी का अस्सी’ की कहानी हमारे समाज का यथार्थ है। मुझे दुःख है कि फिल्म देखे बिना ही इस पर कई तरह के प्रश्न चिन्ह लग गए। मेरी मंशा पर संदेह होने लगा। काश, इन सबसे यह फिल्म बच पाती तो मुझे खुशी होती। आज मैं समाज की दृष्टि में संस्कृति विरोधी, समाज विरोधी, धर्म विरोधी के रूप में उनके कटघरे में खड़ा हूं। मुझे संतोष तब होगा जब मोहल्ला अस्सी इन सब आरोपों और संदेहों से मुक्त हो।

11) आजकल फिल्मों के माध्यम से समाज में मान्य परम्पराओं और धार्मिक आस्थाओं को आहत करने का दौर चल रहा है, जिसमें कई विज्ञापन और धारावाहिक भी शामिल है। क्या आस्थाओं पर चोट किए बिना लोगों को सन्देश नहीं दिया जा सकता

मैं नहीं मनाता कि कोई भी फिल्मकार देश और समाज की अस्मिता और सम्मान के विरोध में फिल्म बनाएगा। फिल्म या कला तो सृजन का माध्यम है कोई विकृत मस्तिष्क ही ऐसा कर सकता है। एक बात और – हिंदू समाज ने हमेशा विरोधी मतों, विचार और दर्शन को भी अपने समाज में स्थान दिया है। यही हमारी विशेषता है। चार्वाक और लोकयतों ने वेदों का उपहास किया – भारत ने उन्हें भी स्वीकार किया। बुद्ध ने वैदिक मतों का खंडन किया, भारत ने उन्हें स्वीकार किया। कई अवैदिक मतों ने वैदिक मतों को चुनौती दी, भारत ने उसे भी स्वीकार किया। भारत का इतिहास वैदिक और सनातन धर्म को दी जा रही चुनौतियों के इतिहास से भरा पड़ा है पर वैदिक मत निरंतर बढ़ता रहा। कितने आक्रमण हुए भारत पर – पर हिन्दू समाज आज भी गर्व से जी रहा है। कितनों ने चुनातियां दी हिन्दू समाज की आस्था और विश्वास को – पर हिन्दू समाज आज भी सनातन के साथ चल रहा है।

भारत विश्व में एक मात्र देश है जो ईश्वर (रचाकार) और उसकी रचना (जगत)  को एक दूसरे से अलग नहीं मानता। द्वैत, अद्वैत, विशिष्टाद्वैत का यह देश है। जीव और ब्रह्म को एक मानने वाला देश। अनेक मत फिर भी सबका सम्मान! काशी में ही कबीर हुए और तुलसी ने उसे अपनी कर्मभूमि बनाया। सबने विरोध सहा, पर काशी ने उनका ही सम्मान भी किया। यह है हमारी सबको स्वीकार करनेवाली संस्कृति। मोहल्ला अस्सी भी उसी संस्कृति से उपजी एक फिल्म है जिसका लेखक बनारस का है और जिसका निर्देशक बनारस की उस आस्था में विश्वास रखने वाला कि – बनारस का कंकर-कंकर शिवशंकर। ऐसा इस ब्रह्माण्ड में कुछ भी नहीं है जो शिव नहीं है – कुछ हो तो दिखा दीजिए! “सर्वम्  खल्विद  ब्रह्म!”  एकमेव अद्वितीयम् ब्रह्म का घोष जिस धरा से होता है। जो तुम ढूंढ रहे हो वह तुम ही हो – तत् त्वं असि – जिस देश का महावाक्य है – उस देश की संस्कृति को क्या फ़िल्में चुनौती दे सकती हैं?

11) फिल्म का विरोध करनेवाले संगठनों और दर्शकों से आप क्या कहना चाहेंगे?

मैं भाग्यशाली रहा हूं कि मुझे संस्कृति के पक्ष में काम करने का हमारे समाज ने अवसर दिया। विरोध करनेवाले मित्र और हितैषी पहले फिल्म देखें और यदि उसके बाद वे इस निर्णय पर पहुंचे कि मोहल्ला अस्सी संस्कृति विरोधी है तो मुझे देश के न्यायालय में ले जाएं। बाबा काशी विश्वनाथ की अदालत में मैं गुहार लगा चुका हूं। वहां मेरी एक न चलेगी और न वहां किसी वकील की। यदि बाबा की अदालत में आपका विश्वास है तो वे मेरा फैसला करेंगे। इस देश में एक संविधान की अदालत है। मामला उसमें पहुंच गया है। संविधान और देश की अदालत ‘मोहल्ला अस्सी’ पर अंतिम निर्णय देने में सक्षम है।

इस देश में कई नुक्कड़ और चौराहों पर फिल्म देखें बिना ही फैसले हो रहे हैं – उन मित्रों से गुहार कि पहले फिल्म देखें (यदि वह दर्शकों तक पहुंचती है) और बाद में फैसला करें कि क्या मोहल्ला अस्सी और मैं संस्कृति, समाज और धर्म विरोधी हैं?

12) आगे और कौन-कौन से फिल्म अथवा धारावाहिक बनाने की योजना है? 

गुप्त काल के एक महानायक और 16वीं शताब्दी के एक युग पुरुष पर काम कर रहा हूं। शायद वे भी दर्शकों तक पहुंचे!

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