समस्या अनेक उपाय एक : घर-घर गाय, ग्राम-ग्राम गौशाला

गोमाता गो-विज्ञान अनुसंधान केन्द्र (देवलापार, नागपुर) के समन्वयक श्री सुनील मानसिंहका के साथ गौ-हत्या प्रतिबंध, गौ-रक्षा, गौ-पालन, किसान आत्महत्या के समाधान आदि विषयों पर विस्तृत वार्ता के आधार पर प्रस्तुत लेख)   

लखेश्वर चंद्रवंशी ‘लखेश’      

गाय, गौमाता, कामधेनु जैसे अनेक नामों से गोवंश को पुकारा जाता है। गौमाता की पूजा करनेवाला भारतवर्ष आज अपने ही देश के गद्दारों और सत्ता के लोभियों के स्वार्थ के चलते गौमाता की रक्षा करने में असमर्थ दिखाई देता है। सवा सौ करोड़ के इस भारत देश में लगभग 100 करोड़ हिन्दू रहते हैं, बावजूद इसके देश में गायों की तस्करी और गौमांस का निर्यात बड़ी आसानी से किया जा रहा है। ऐसा क्यों? यह प्रश्न देश के गौभक्तों को अपनेआप से पूछा जाना चाहिए, क्योंकि इस प्रश्न के अन्दर ही इसका समाधान निहित है।

गौहत्या प्रतिबंध कानून और वास्तविकता

महाराष्ट्र और हरियाणा सरकार गोवंश की हत्या पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने का कानून बनाया। इसके पूर्व भी देश के कई राज्यों में गौ-हत्या पर प्रतिबंध है, फिर भी उन राज्यों में गौ तस्करी और गौ हत्या धड़ल्ले से शुरू है। झारखंड, महाराष्ट्र, दिल्ली, उत्तरप्रदेश और पंजाब में प्रतिबंध के बावजूद गायों की हत्या की जा रही है। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात और राजस्थान में गायों की हत्या के मामले तो सामने नहीं आए हैं, पर यहां गौ तस्करी होती रहती है। बिहार में गोवंश हत्या प्रतिबंधित नहीं है, और यहां गैर-लाइसेंसी बूचड़खानों में अवैध गौ हत्या होती है।

गत चार वर्षों में भारत में बीफ यानी गोवंश और भैंस के मीट की खपत में लगभग 10 प्रतिशत वृद्धि हुई है। 2011 में बीफ की खपत 20.4 लाख टन थी, जो 2014 में बढ़कर 22.5 लाख टन हो गई है। पशुगणना के अनुसार देश में गोवंश की संख्या में 2007 के मुकाबले 2012 में 4.1 प्रतिशत की कमी आई है। इसमें भी देशी गोवंश की संख्या में करीब 9 प्रतिशत की कमी आई है। इसलिए केवल कानून बना देने भर से काम नहीं होता। क्योंकि गौ हत्या प्रतिबंध कानून के बावजूद पुलिस, प्रशासन और गौ-हत्यारों की मिलीभगत से गौ-हत्या और गौ-तस्करी का कारोबार देश के अनेक प्रांतों में धड़ल्ले से जारी है। विशेषकर, उत्तर भारत के अनेक राज्यों से रोजाना बड़ी संख्या में गायों को ट्रकों में लादकर अवैध रूप से कटने के लिए बांग्लादेश की सीमा पर भेजा जा रहा है। अतः गोरक्षकों के सामने चुनौती इस बात की है कि जैसे भी हो गोवंश को गौ-हत्यारों के हाथों में पहुंचने ही न दिया जाए।

अभी नहीं तो कभी नहीं

गौ तस्करी, गौ-हत्या और गौ-मांस के निर्यात को देखते हुए गौ-रक्षा के लिए “अभी नहीं तो कभी नहीं” वाली चुनौती हमारे सम्मुख है। इसके लिए व्यापक जनजागरण की आवश्यकता है। गौ-पालन के लाभ को अधिकाधिक लोगों तक पहुंचाना होगा। घाटे में चल रही कृषि व्यवसाय, जिनसे करोड़ों किसान जुड़े हैं; उन्हें गौ-पालन से अधिकाधिक लाभ कैसे प्राप्त किया जा सकता है, इस सम्बन्ध में जानकारी और प्रशिक्षण देने की आवश्यकता है।

गौ-रक्षा का कार्य गोशालाओं के द्वारा संभव है। गोशालाओं में गायें उम्र भर सुरक्षित ढंग से रखी जा सकती हैं। वहां अनेक उत्पादक कार्यों में गोवंश का प्रभावी ढंग से उपयोग हो सकता है और कई गोशालाओं में यह हो भी रहा है। इसलिए उत्तम सुविधाओं से युक्त गोशालाओं के निर्माण पर जोर देना होगा। प्रत्येक ग्राम में कम से कम एक गोशाला हो और प्रत्येक घर में गाय हो, इस दृष्टि से व्यापक अभियान चलाना होगा। प्रत्येक गांव में पर्याप्त मात्र में गोचर भूमि हो। इसके लिए शासन और ग्रामवासियों को मिलकर योजना बनानी होगी।

गौ-पालन से लाभ

हमारे देश में ‘गौ आधारित जीवन व्यवस्था’ थी। हमारी संस्कृति ने हमारे सम्मुख “गोमय  वसते लक्ष्मी” और ‘गोमूत्र वसते अमृत’ की संकल्पना रखी। इसलिए हम गाय को कामधेनु, गौमाता और गौ-लक्ष्मी भी कहते हैं। इसके पीछे अनेक वैज्ञानिक कारण हैं। गोपालन प्रकृति की रक्षा और संवर्धन में सहायक है। गाय का दूध पीने से शरीर, मन, बुद्धि स्वस्थ्य रहता है। गाय के गोबर से केंचुवा खाद, गोमूत्र नीम से कीटनियंत्रक बनता है। गोमूत्र से बने अर्क और अन्य पंचगव्य से बने अनेक औषधि उत्पाद से विभिन्न रोगों का इलाज किया जाता है। इसके अतिरिक्त गाय के दूध, दधि, माखन, घी आदि से अनेक स्वादिष्ट और स्वास्थ्यवर्धक मिठाई बनाई जाती है, जिसका लाभ भारत सहित सारी दुनिया ले रही है।

पंचगव्य चिकित्सा

पंचगव्य का निर्माण भारतीय नस्ल की गाय के दूध, दही, घी, मूत्र और गोबर के द्वारा किया जाता है। पंचगव्य द्वारा शरीर के रोगनिरोधक क्षमता को बढाकर रोगों को दूर किया जाता है। पंचगव्य आयुर्वेद चिकित्सा जो हमारे प्राचीन चिकित्सक व आयुर्वेदाचार्य चरक, सुश्रुत आदि के द्वारा प्रदत्त ज्ञान के आधार पर विकसित हो रहा है। पंचगव्य चिकित्सा आज आयुर्वेद की महत्ता और विश्वसनीयता को जन-मन में स्थापित कर रही है, क्योंकि इसके मूल में प्रामाणिकता और ईमानदारी है।

देवालापार स्थित गो-विज्ञान अनुसन्धान केन्द्र के द्वारा पंचगव्य उत्पादों में अर्क, आसव, घनवटी, हरदे चूर्ण, मालिश तेल, मरहम, गोमाय टिकिया (साबुन), उबटन, मंजन, धूप, घृत, (विभिन्न औषधि युक्त) आदि स्थापित उत्पादों में आ गए हैं। इन पंचगव्य औषधियों से असाध्य मानेजाने वाले रोगों का निदान करने की शक्ति परिलक्षित हो रहा है; जैसे – सोराइसिस, एग्जिमा, एलर्जी, पेट की बीमारियां, किडनी के रोग, कमजोरी, सफ़ेद दाग, रक्तचाप, मधुमेह, बच्चों और महिलाओं के रोगों पर आशातीत प्रभावकारी साबित हुए हैं। गो-विज्ञान अनुसन्धान केन्द्र के पंचगव्य आयुर्वेद चिकित्सा के अंतर्गत गोमूत्र अर्क को पांच से ज्यादा अंतर्राष्ट्रीय पेटेंट प्राप्त हुआ है। यह विश्व की श्रेष्ठतम औषधि के रूप में सामने आई है।

गौ-आधारित शाश्वत कृषि

भारतीय कृषि भूमि सन 1960 के दशक में लगभग रसायन मुक्त थी। अब यह भूमि रासायनिक खाद के भार से बीमार हो चली हैं, उसकी उर्वरा शक्ति लुप्त होती जा रही है। यही कारण है कि किसानों को खेती से पर्याप्त मात्रा में लाभ नहीं मिल रहा है। यही नहीं तो भारत का किसान आए दिन असमय बारिश, बाढ़ और सूखे जैसी प्राकृतिक आपदा की मार झेलने को विवश है। कृषि उसके लिए घाटे का व्यवसाय बन गया है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार गत दस वर्षों में 98 लाख किसानों ने खेती छोड़ी है। 264 जिलों का जलस्तर एकदम नीचे (Dark Zone) जा चुका है। एक द्दाने से हजारों-लाखों दानों का निर्माण करनेवाले किसान आज कर्ज से ग्रस्त है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड कार्यालय के अनुसार 1997 से 2013 तक देश में लगभग 3 लाख किसानों ने आत्महत्या की। दूसरों को जीवन देनेवाले किसों में लाचारी और हताशा की भावना फ़ैल रही है। इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि रासायनिक कृषि हर दृष्टि से हानिकारक है।

ऐसी स्थिति में गौ-आधारित प्राकृतिक कृषि ही एकमात्र कारगर उपाय है। गौपालन के बिना प्राकृतिक कृषि और प्राकृतिक कृषि के बिना गौपालन संभव नहीं है। मिट्टी में कभी वे सभी तत्व मौजूद हैं जो पेड़-पौधों को चाहिए, लेकिन वे सख्त और जटिल होते हैं। सूक्ष्म जीव एवं केंचुए आदि मिट्टी के कठिन घटकों को सरल घटकों में विघटित कर देते हैं, जिससे पेड़-पौधे आसानी से खींच सकते हैं। गाय के एक ग्राम गोबर में 300 से 500 करोड़ तक ऐसे ही सूक्ष्म जीवे होते हैं। ये सूक्ष्म जीव जमीन के केंचुओं को सक्रिय करने का भी काम करते हैं। केंचुए मिट्टी में खूब सारे छेद करके उसे कृषि योग्य पोला बना देते हैं। इसलिए कह गया है कि ‘गोबर जीवामृत’ सूक्ष्म जीवों का महासागर है। इससे स्पष्ट होता है कि गौ-आधारित कृषि से भूमि की उर्वरक क्षमता आजीवन बनाया जा सकता है। इससे भूमि में जलस्तर अच्छा बना रहता है। भूमि की उर्वरा क्षमता के कारण फसल की पैदावार उचित मात्रा में होती है। इससे ही निराश किसानों में उत्साह का संचार होगा।

पाठ्यक्रम और जागरूकता

गौ आधारित जैविक कृषि, गौ-पालन और पंचगव्य के महत्त्व को भारतीय शिक्षा के पाठ्यक्रम में शामिल करना आज बहुत आवश्यक है। अन्यथा अपने देश का यह अक्षय ज्ञान धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगा। इसके साथ ही किसानों के लिए प्रशिक्षण केन्द्रों का निर्माण करना होगा। समय-समय पर किसानों को प्रशिक्षित करना होगा। ऐसे हजारों-लाखों कार्यकर्ताओं का निर्माण करना होगा जो गौ-पालन और गौ-आधारित कृषि को लाभदायक बनाने के उपायों को गांव-गांव, घर-घर पहुंचा सकें। गो-विज्ञान अनुसन्धान केन्द्र आज देश के विभिन्न क्षेत्रों के किसानों को गौ-आधारित कृषि, गौ-पालन तथा पंचगव्य आधारित उत्पाद के लिए प्रशिक्षित कर रहा है। आज अनेक किसान अपने सीमित भूमि पर अधिकाधित फसल उगा रहे हैं, वह भी प्रकृति को नुकसान पहुंचाए बिना।

हम गौ-सेवा, गौ-पालन, गौ-आधारित प्राकृतिक खेती, पंचगव्य आयुर्वेद चिकित्सा और अनेक उत्पादों की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। इस और अधिक गतिमान और व्यापक करने की महती आवश्यकता है। आइए संकल्प करें – “घर-घर गाय, ग्राम-ग्राम गौशाला के इस अभियान में मेरा भी योगदान रहे।

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