हम भी चाहें ऐसा वर

प्रत्येक मनुष्य सुख और आनंद की चाह रखता है। यह अच्छी बात है, वास्तव में आनंदमय रहना मनुष्य का स्वाभाविक लक्षण है। यही कारण है कि मनुष्य जीवनभर अनथक प्रयत्न करके उन सारी वस्तुओं को प्राप्त करना चाहता है, जिससे उसे सुख मिल सकता है। गाड़ी, बंगला, नौकर-चाकर, ऐश्वर्य, नाम, यश, कीर्ति आदि की उपलब्धि के लिए वह जी तोड़ मेहनत करता है, क्योंकि उसे लगता है कि सुख और आनंद इन्हीं भौतिक वस्तुओं से ही प्राप्त हो सकता है। इसलिए भौतिक समृद्धि को जीवन का लक्ष्य मानकर देश और दुनिया में एक घोर प्रतिस्पर्धा देखी जा सकती है। हमारी शिक्षा, न्याय, विधि, विज्ञान, यहां तक धार्मिक क्षेत्र भी आज भौतिक समृद्धि की राह पर चल पड़ा है। इस भेड़ चाल ने समाज को स्वार्थी बना दिया है।

SwV_Stand_hand-on-beltसमाज का एक दूसरा वर्ग ऐसा भी है जो दूसरों को दुःख देकर, दूसरों का शोषण कर अपना स्वार्थ साधते हैं। यही कारण है कि भ्रष्टाचार, दुराचार और अनैतिकता की अनेक अप्रिय घटना हमारे समाज में दिखाई देती है। आज प्रतिदिन दुराचार की खबर कहीं न कहीं से आती है। नारी अस्मिता की रक्षा को लेकर सारा समाज चिंतित है। अतः चारित्रिक पतन की चुनौती के काल में वास्तविक सुख और आनंद के महान स्रोत की खोज की जानी चाहिए।

शाश्वत की खोज

अपने ओजस्वी वाणी से भारत की महिमा को विश्वपटल पर आलोकित करनेवाले स्वामी विवेकानन्द इसी आनंद की खोज में लगे थे। बाल्यावस्था में कभी वे साधुओं के संग बैठकर उनका भजन सुनते तो कभी अपने मित्रों के साथ राजा-प्रजा का खेल खेलते, कभी किसी गरीब को वस्त्र, भोजनादि देकर आनंद की अनुभूति करते तो कभी ध्यानमग्न होकर शिव की आराधना करते। बजरंगबलि हनुमान के प्रति उनका मन इतना रमा रहता कि उन्हीं की तरह बलोपासना करने में गौरव का अनुभव करते। पर जैसे-जैसे वे बड़े होते गए शाश्वत की खोज में लग गए। क्या सचमुच ईश्वर है ? क्या मैं उसे देख सकता हूं ? बस, इस खोज में ही वे मग्न रहते। और एक दिन ऐसा भी आया जब उन्होंने ईश्वर की अनुभूति कर ली।

स्वामी विवेकानन्द कहते थे, ‘बल ही जीवन है और दुर्बलता ही मृत्यु। विस्तार ही जीवन है और संकोच ही मृत्यु।’

स्वामीजी का यह कथन कई बार मैं अपनेआप से कहता हूं, और जब भी कहता हूं तो हृदय में एक विद्युत तरंग सी लहरें उठने लगती हैं। ऐसा लगता है कि कोई अद्भुत शक्ति अन्दर से बोल रही है। स्वामीजी के ये शब्द हमारे सहज स्वभाव को जाग्रत करते हैं- ‘बलवान बनों, निर्भय बनों, अपने मन का विस्तार करो। यही जीवन है। इसी में आनंद है।’

निर्भय बनों

स्वामी विवेकानन्द जब अमेरिका से भारत लौटे तो देशभर भ्रमण कर युवाओं को कहते- ‘निर्भय बनों। बलवान बनों। समस्त दायित्व अपने कन्धों पर ले लो और जान लो कि तुम ही अपने भाग्य के विधाता हो। जितनी शक्ति और सहायता चाहिए वह सब तुम्हारे भीतर है।’

क्या सचमुच सारी शक्ति हमारे भीतर है ? यह सवाल भी कई बार मन में आया। पर उत्तर तो स्वामीजी ने ही दे दिया। वे कहते थे- ‘अनंत शक्ति, अदम्य साहस तुम्हारे भीतर है क्योंकि तुम अमृत के पुत्र हो। ईश्वर स्वरूप हो।’

मैं सोचता था, स्वामीजी इतनी बड़ी-बड़ी बातें इतनी सहजता से कैसे बोल लेते थे, और उनके शब्दों में क्या ऐसा जादू था कि संसार के लोग उनकी वाणी पर मंत्रमुग्ध हो जाते। इतना ही नहीं तो उनसे प्रेरित होकर हजारों क्रन्तिकारी देश की स्वतंत्रता आन्दोलन में सहभागी हो गए। कितनों ने अपने प्राणों की आहुति देश-धर्म की रक्षा के लिए दे दी। विश्वधर्म सम्मेलन में तो केवल एक पंक्ति – मेरे अमेरिका निवासी बहनों तथा भाइयों।, ने वहां उपस्थित लोगों को अपना बना लिया। विदेश के अनेक महानुभाव अपने अनुभव में लिखते हैं कि जब भी स्वामी विवेकानन्द भारत शब्द का उच्चारण करते, सुननेवालों के मन में भारत के प्रति आत्मीयता का भाव जाग्रत हो जाता।

स्वामीजी के हृदय में भारत के प्रति अगाध प्रेम और असीम श्रद्धा थी। भारत शब्द के उच्चार मात्र से विदेशियों के मन को भारतभक्ति से भर देने का अदभुत सामर्थ्य था उनके शब्दों में। यह सामर्थ्य हमारे भीतर भी आ सकता है। आवश्यकता है महान चरित्र, अगाध भक्ति, ज्ञान और विवेक की। परन्तु, ज्ञानार्जन के स्थान पर हम जानकारियों का ढेर इकठ्ठा करते हैं, चरित्र संवारने के बजाय अपना रूप संवारते हैं, भक्ति के बदले भगवान से सौदा करते हैं और विवेक के स्थान पर क्षणिक लाभ के पीछे भागते हैं।

ज्ञान, भक्ति, विवेक, वैराग्य

स्वामी विवेकानन्द के जीवन का एक प्रसंग है। उनके पिता विश्वनाथ दत्त के निधन के उपरांत उनके घर की स्थिति बहुत ही ख़राब हो गई। खाने के लिए भी अन्न नहीं था। इधर नरेन्द्र (संन्यास पूर्व स्वामीजी का नाम) को नौकरी भी नहीं मिल रही थी। तब माँ भुवनेश्वरी देवी ने नरेन्द्र से कहा, – जा अपने गुरु के पास और उनसे घर-परिवार के दुखों को दूर करने की प्रार्थना कर। 

swami-vivekananda-gyan-bhakti-vivek-vairagyaजैसे ही नरेन्द्र ने दक्षिणेश्वर काली मंदिर के भीतर प्रवेश किया, उनको महाकाली का साक्षात्कार हुआ। तब नरेन्द्र ने देवी से प्रार्थना की, कि मुझे ज्ञान दे, भक्ति दे, विवेक दे, वैराग्य दे।

ऐसा तीन बार हुआ। वह गया था नौकरी और घर की समृद्धि मांगने, पर मांग आया- ज्ञान, भक्ति, विवेक और वैराग्य।

यह प्रसंग नरेन्द्र के जीवन का टर्निंग पॉइंट था। यह हम सभी जानते हैं और बड़ी ख़ुशी से इस प्रसंग को हम अपने मित्रों को बताते भी हैं। पर अपने और समाज के परिप्रेक्ष्य में हम इस वरदान पर विचार नहीं करते। क्या ज्ञान, भक्ति, विवेक और वैराग्य केवल नरेन्द्र के लिए ही आवश्यक था ? क्या हमारे देश के युवाओं के लिए इन गुणों की आवश्यकता नहीं है?

निश्चय ही हमारे समाज, देश व संसार को इस वरदान की आवश्यकता है। हम नौकरी, व्यवसाय, नाम, यश, कीर्ति और सफलता के लिए भगवान के सम्मुख प्रार्थना करते हैं, फुलमाला चढ़ाते हैं और श्रीफलादि भेंट करते हैं। पर समाज में व्याप्त संवेदनहीनता, भय, तिरस्कार, दुराचार और भ्रष्टाचार को मिटाने का सार्थक उपाय नहीं खोजते। उसे कानून, पुलिस और सरकार पर छोड़ देते हैं। समाज में आदर्शों की स्थापना कानून से नहीं वरन चरित्र के निर्माण से होता है। और चरित्रवान मनुष्य के लिए आवश्यक गुण है- ज्ञान, भक्ति, विवेक और वैराग्य।

आइए, स्वामीजी द्वारा माँ काली से मांगे गए वरदान को समाजजीवन में संप्रेषित करें, ताकि सारा भारत अपने आराध्य से कह सके- ज्ञान दे! भक्ति दे! विवेक दे! वैराग्य दे!”    

– लखेश्वर चंद्रवंशी

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