ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में ‘संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा’ 

mohan bhagwat bhaiya joshi.jpgराष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) देश के सभी सामाजिक संस्थाओं, संगठनों और राजनीतिक दलों से अलग है। क्योंकि संघ का अपना संविधान है, जिसके मूल में लोकतान्त्रिक और संगठनात्मक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता निहित है। संघ में इन संवैधानिक मूल्यों का बड़े आदर और अनुशासन से पालन होता है। 

दलगत स्वार्थ और राजनीतिक द्वेष के चलते अनेक राजनीतिक दल और गैर सरकारी संस्था के लोग आरएसएस को दकियानूसी, पुराणपंथी, लोकतंत्र के विरोधी, एकाधिकारवादी और फासिस्टवादी कहकर उसकी बुराई करते हैं और संघ को बदनाम करने की कोशिश में लगे रहते हैं। लेकिन संघ एक ऐसा संगठन है जहां लोकतांत्रिक मूल्यों का अनुकरण होता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) देश के सभी सामाजिक संस्थाओं, संगठनों और राजनीतिक दलों से अलग है। क्योंकि संघ का अपना संविधान है, जिसमें मूल में लोकतान्त्रिक और संगठनात्मक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता निहित है। संघ में इन संवैधानिक मूल्यों का बड़े आदर और अनुशासन से पालन होता है। इसे समझने के लिए संघ के ऐतिहासिक घटनाक्रमों को जानना होगा।

अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा संघ के निर्णय प्रक्रिया को आगे बढ़ानेवाली सर्वोच्च मंडल है। इस प्रतिनिधि सभा में संघ के सर्वोच्च कार्यकारी अधिकारी अर्थात सरकार्यवाह का चुनाव होता है।

2014 में भारत की राजनीति में सत्ता परिवर्तन हुआ है और 30 वर्षों के बाद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी है। इस कारण देश और दुनिया के मीडिया जगत में संघ का महत्त्व और अधिक बढ़ गया है। यही कारण है कि महीने भर से संघ के इस प्रतिनिधि सभा के सम्बन्ध में अनेक प्रकार के समाचार अख़बारों और टीवी चैनलों में दिखाया जा रहा है। लेकिन संघ का कार्य किस प्रकार चलता है, संघ के सेवा कार्य देशभर में कहां-कहां और किस प्रकार चल रहे हैं, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर संघ का कौन सा कार्य चलता है, इस तरह के समाचार मीडिया से कोसों दूर है। वे कभी इस सम्बन्ध में बताते नहीं हैं। फिर भी प्रतिनिधि सभा के प्रति सभी को उत्सुकता रहती है।

अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की परम्परा

आद्य सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने संघ की स्थापना विजयादशमी को सन 1925 में की। सन 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद झूठे आरोप के तहत संघ पर प्रतिबन्ध लगाया गया। लेकिन इसके तुरन्त बाद ही भारत सरकार ने 1949 को बिना शर्त के यह प्रतिबन्ध हटा लिया। उस समय सरकार ने संघ को अपने संगठन का संविधान बनाने का सुझाव दिया। उस संविधान के अंतर्गत संघ के केन्द्रीय कार्यकारी मंडल की बैठक 21, 22 जनवरी, 1950 में सम्पन्न हुई। उस बैठक में यह प्रस्ताव पारित हुआ कि संघ संविधान के अनुसार अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा का गठन होना चाहिए। इसके आलावा एक और प्रस्ताव पारित किया गया जिसके तहत 26 जनवरी ‘गणतंत्र दिवस’ को राष्ट्रीय उत्सव के रूप में मनाना चाहिए ऐसे निर्देश शाखाओं को दिए गए, क्योंकि 26 जनवरी, 1950 को भारत सार्वभौमिक गणतंत्र राष्ट्र के रूप में प्रतिष्ठित हुआ। सभी शाखाओं ने राष्ट्र ध्वज फहराकर उसे प्रणाम करना चाहिए और अंत में वन्दे मातरम गया जाना चाहिए। यह पूरा प्रस्ताव http://www.archivesofrss.org इस वेब साइट पर उपलब्ध है।

12 मार्च, 1950 को प्रतिनिधि सभा की प्रथम बैठक हुई।

संघ के क्रियाशील और प्रतिज्ञित स्वयंसेवक देशभर में अपने प्रतिनिधियों का चयन करते हैं। ये प्रतिनिधि इस प्रतिनिधि सभा में सहभागी होते हैं। इस वर्ष लगभग 1200 प्रतिनिधि इस सभा में सम्मिलित होंगे। इस सभा में संघ के अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल के अधिकारी, प्रान्त और क्षेत्र कार्यवाह, संघचालक एवं अन्य अधिकारी शामिल होते हैं। इसके अलावा संघपरिवार से जुड़े अनेक संगठनों के शीर्ष अधिकारी सम्मिलित होते हैं, – जैसे भारतीय मजदूरसंघ, भारतीय किसान संघ, वनवासी कल्याण आश्रम, विश्व हिन्दू परिषद् (वीएचपी), अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् (एबीवीपी) आदि।

उल्लेखनीय है कि संघ की यह प्रतिनिधि सभा 1950 से अबतक केवल 3 बार खंडित हुई है, जिसके लिए 1976 और 1977 में आपातकाल तथा 1993 में अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि मंदिर आन्दोलन के चलते संघ पर लगाए गए प्रतिबन्ध कारणीभूत है।

प्रस्ताव अधिक महत्वपूर्ण

प्रतिनिधि सभा में देश के सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और राजनीतिक परिस्थिति तथा अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर प्रस्ताव पारित होते हैं, – जैसे – असम, बांग्लादेश, चीन, गोरक्षा, अल्पसंख्यक तुष्टिकरण, राष्ट्रीय सुरक्षा, उत्तर-पूर्वांचल, धर्मांतरण, श्रीराम जन्मभूमि, प्राकृतिक संसाधन आदि।

प्रतिनिधि सभा के प्रत्येक प्रस्ताव अनुभव आधारित, गहन चिंतन और बहुत बारीकी से बगैर संभ्रम (कन्फ्यूजन) के लिए जाते हैं।

sarkaryavha-rss.jpgसरकार्यवाहों की तेजस्वी परम्परा

अभी तक सरकार्यवाह का चुनाव प्रति 3 वर्ष के बाद नागपुर में ही होता है, क्योंकि संघ का मुख्यालय नागपुर में है।सन 1950 की प्रतिनिधि सभा में सरकार्यवाह के रूप में प्रभाकर बलवंत दाणी उपाख्य भैयाजी दाणी का चुनाव हुआ। वे 1950 से 1956 तक सरकार्यवाह के पद पर रहे। इसी तरह 1956 से 1962 तक एकनाथ रानडे, 1965 से 1973 मधुकर दत्तात्रय उपाख्य बालासाहेब देवरस तथा 1973 से 1979 तक माधवराव मुले इस पद के गौरवमय अधिकारी रहे। इन सभी सरकार्यवाहों के साथ एक विशेष बात जुड़ी है, वह विशेष बात यह है कि ये सभी डॉ. हेडगेवार के सानिध्य में बड़े हुए।

इसके बाद सरकार्यवाह के रूप में 1979 से 1987 तक प्रोफ़ेसर राजेंद्र सिंह उपाख्य रज्जु भैया, 1987 से 2000 तक हो.वे.शेषाद्रि, 2000 से 2009 तक मोहन भागवत दायित्व सम्भाला तथा 2009 से अब तक भैयाजी जोशी इस पद पर कार्यरत हैं।

प्रतिनिधि सभा और सरसंघचालक

सरसंघचालक बालासाहेब देवरस के कार्यकाल में आपातकाल के दौरान संघ ने जहां भारत में लोकतन्त्र को बहाल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, वहीं संघकार्य को एक सामाजिक आशय भी प्राप्त हुआ। उनकी प्रेरणा से संघ के स्वयंसेवक समाज की सेवा में अधिक गति से जुट गए और आज देशभर में संघ के स्वयंसेवकों द्वारा लगभग 1 लाख, 60 हजार से अधिक सेवाकार्य चलाए जा रहे हैं। यह अपने आप में एक विक्रम हैं।

‘सामाजिक समता और हिन्दू संगठन’ इस विषय पर बालासाहेब का पुणे की वसंत व्याख्यान माला में दिया गया भाषण प्रसिद्ध और दूरगामी परिणाम करनेवाला साबित हुआ। इस भाषण में उन्होंने प्रखरता से हिन्दू समाज में व्याप्त अस्पृश्यता के दोष को दूर करने का आह्वान किया था।

balasahab-rajjubhaiya.jpgसन 1994 में प्रतिनिधि सभा में पहली बार बालासाहेब देवरस ने रज्जु भैया को सरसंघचालक का दायित्व सौंपा। प्रोफ़ेसर राजेंद्र सिंह के कार्यकाल में संघ का एक स्वयंसेवक पहली बार देश का प्रधानमंत्री बना। प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का 1996 से 2004 तक का कार्यकाल देश के इतिहास में विशेष उपलब्धि प्राप्त करनेवाला रहा।

sudarshan-bhagwat.jpgइसके बाद सन 2000 में प्रतिनिधि सभा के दौरान ही तत्कालीन सरसंघचालक रज्जु भैया ने कुप्प.सी.सुदर्शन को दायित्व सौंपा। सुदर्शनजी के कार्यकाल में संघ के द्वितीय सरसंघचालक गुरूजी गोलवलकर की जन्म शताब्दी समूचे विश्व में मनाई गई। स्वयं सुदर्शनजी ने नैरोबी के विश्वविद्यालय में आयोजित एक समारोह को सम्बोधित किया था। उसी प्रकार भारत में मुस्लिम और ईसाई समुदायों के साथ सार्थक संवाद उन्हीं के कार्यकाल में प्रारंभ हुआ। इसी क्रम में 2009 में सुदर्शनजी ने डॉ. मोहन भागवत को सरसंघचालक का दायित्व सौंपा। वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत के कार्यकाल में संघ ने जो प्रगति की है वह सभी के सामने हैं। उसपर बहुत अधिक टिप्पणी करने की आवश्यकता नहीं है।

– लखेश्वर चंद्रवंशी ‘लखेश’

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मन वाचा कर्म से सदैव एक रूप हो : मा.भानुदासजी

BHANUDAS-DHAKRAS-VIVEKANAND-KENDRAमन वाचा कर्म से सदैव एक रूप हो : मा.भानुदासजी

मैं कौन हूं? मेरे इस जीवन में मेरी क्या भूमिका है और मैं इस समय क्या कर रहा हूं? इस पर हमें विचार करना होगा। हम सभी सेवारत कार्यकर्ता की भूमिका में हैं। और जैसा कि इस शिविर का थीम है“सेवारत व्यक्ति-व्यक्ति राष्ट्र का ही प्राण है।” हम विद्यार्थी हैं अथवा शिक्षक, व्यवसायी हैं या कर्मचारी, पर हम यह समझ लें कि सेवारत व्यक्ति के रूप में मैं भारत का प्राण हूं। कार्य जितना महान है हमें उतना ही महान बनना होगा। महान कार्य के लिए उदात्त चरित्र की आवश्यकता होती है। यह तभी संभव है जब हम देहात्म बोध से देशात्म बोध की ओर उन्मुख होंगे। राष्ट्र का प्राण होने के लिए हमें आवश्यक गुण अर्जित करने होंगे। यह गुण है मन, वचन और कर्म से सदैव एकरूप होना।

स्वामी विवेकानन्दजी ने अपने गुरु ठाकुर श्री रामकृष्ण परमहंस देव से अपने लिए निर्विकल्प समाधि का आशीर्वाद मांगा था। पर माँ के कार्य के लिए उन्होंने अपने घर-परिवार और गुरुभाइयों से दूर जाकर भारत को जानने के लिए देशभर परिव्राजक बनकर भ्रमण किया। पाश्चात्य विद्वानों के बीच भारत माता को प्रतिष्ठित करने के लिए स्वामीजी अकेले ही निकल पड़े। सारी विपदाओं को सहकर, सारी चुनौतियों को पार कर उन्होंने भारत की प्रतिष्ठा को विश्वपटल पर स्थापित किया। स्वामीजी की निर्विकल्प समाधि की आस देहात्म बोध से प्रेरित था, पर माँ का कार्य करने का संकल्प देशात्म बोध का परिचायक है। स्वामी विवेकानन्दजी ने अपने एक पत्र में इन दोनों ही मनःस्थिति का वर्णन किया है। देहात्म बोध से देशात्म बोध का मार्ग कौन-सा है? वह मार्ग है – मन-वाचा-कर्म से सदैव एक रूप हो। जब ऐसा हो जाए तो देशात्म बोध प्रगट होगा, परन्तु यह आसान नहीं है।

मन-वाचा-कर्म के लिए रामायण में 2 महत्वपूर्ण प्रसंगों का उल्लेख मिलता है। 1) एक बार महर्षि विश्वामित्र राजा दशरथ से मिलने आए। महर्षि के दर्शन से गदगद दशरथ ने कहा दिया, “महर्षि आप आज जो मांगेंगे, मैं उसे श्रद्धापूर्वक आपको दान कर दूंगा।” उस समय दशरथ मन से वचन दे चुके थे। परन्तु जब महर्षि विश्वामित्र ने कहा कि,“दंडकारण्य में असुरों का आतंक फैला है और यज्ञ संस्कृति खतरे में है। इस विषम परिस्थिति में ऋषियों व यज्ञ संस्कृति की सुरक्षा के लिए आपके दो पुत्र राम और लक्ष्मण की आवश्यकता है। आप मुझे ये दोनों पुत्रों को मुझे कुछ समय के लिए सौंप दीजिए।” महर्षि की इस आग्रह को यह कहकर टालने का प्रयत्न किया कि मेरे दोनों पुत्र अभी बालक हैं। ये असुरों का सामना नहीं कर पाएंगे। आप चाहें तो मेरी सारी सेना ले जाइए, स्वयं मुझे ले जाइए पर मेरे पुत्रों को यहीं रहने दीजिए। मन और वचन से संकल्प लेनेवाले राजा दशरथ पुत्र मोह में अपने कर्तव्य को भूल जाते हैं। उनका कर्म बदल जाता है। तब उनको याद दिलाना पड़ता है कि रघुकुल रीति सदा चली आई,प्राण जाए पर वचन न जाई। दशरथ ने मन से कहा था, वचन से कहा था कि जो मांगोगे, दे दूंगा। पर जब कृति की बारी आई तो पीछे हट गए। हमारा भी ऐसा ही होता होगा।

श्रीराम जी के वनवास का दूसरा प्रसंग था। कैकेयी गुस्से थी तो दशरथ ने बोल तो दिया कि आप जो कहोगी मैं करूंगा। तथापि राम को 14 वर्ष का वनवास की बात सुनते ही दशरथ गिर गए। जबकि राम उनके लिए जो छत्र-चंवर आदि आए थे उन सब को लौटाते हुए वनवास जाने की तैयारी करते हैं। मन-वाचा और कर्म से सदैव एकरूप होने का महान आदर्श हैं- मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम। मन ही सबकुछ करता है। मन की सहायता से ही हम आगे बढ़ सकते हैं। मन हमें आगे बढ़ा सकता है और वह हमें गिरा भी सकता है। इसलिए मन को साधना होगा ताकि मन सही दिशा में गतिमान हो। इस क्रम में वाणी का संयम महत्वपूर्ण होता है। इसके लिए वाणी का तप जरुरी है।

सीता सुधि और लंका दहन के पश्चात् जब महावीर हनुमान वापस लौटे तो वे चिंतन करने लगे कि श्रीराम को माता जानकी का सन्देश किन शब्दों में देना चाहिए। लंका दहन का प्रसंग पहले कहूं या सीतामाता की धैर्य का वर्णन? पर ‘बुद्धिमतां वरिष्ठं’ ऐसे महावीर ने वाणी के संयम और तप का महान आदर्श प्रस्तुत किया। हनुमान ने श्रीराम से कहा, “दृष्टवा-देखि”, यानी मैंने माता सीता के दर्शन किए। हनुमान के मुख से निकले इस पहले वाक्य को सुनते ही श्रीराम की विरह वेदना समाप्त हो गई, उनके अंतःकरण में मची खलबली समाप्त हो गई।

एक और उदाहरण है। स्वामी विवेकानन्दजी ने अपने जीवन के अंतिम समय में भगिनी निवेदिता के भोजन करने के उपरांत पानी लेकर उनका हाथ धुलवाया था। तब भगिनी निवेदिता ने स्वामीजी को इसके लिए रोकना चाहा। पर स्वामी विवेकानन्द ने यह कहकर हाथ धोने के लिए जल डाला कि ऐसा तो ईसा मसीह ने भी किया था। भगिनी निवेदिता एकाएक स्तब्ध रह गई। उन्हें याद आया कि जिस दिन ईसा ने भक्तों का हाथ धुलाया था वह उनके जीवन का आखरी दिन था। पर भगिनी निवेदिता ने वाणी का संयम बरतते हुए अपने मन के भावों को बाहर नहीं आने दिया। उन्होंने अपने मनोभाव को अपने मन में धारण किया पर उसे अन्य गुरुभाइयों के आगे व्यक्त नहीं किया। यह वाणी के संयम का बड़ा उदाहरण है।

वाणी की तपस्या और संयम से ही कार्य आगे बढ़ेगा। कर्म ज्ञानेन्द्रियों व कर्मेन्द्रियों से व्यक्त होता है। मन में उदात्त भाव है, वह वचनों में व्यक्त भी होता है, पर वह कृति में प्रगट नहीं होता तो यह बहुत चिंता की बात है। यदि ऐसा है तो “अन्दर कुछ और बहार कुछ” वाली बात रह जाएगी। द्रोणाचार्य ने अपने शिष्यों को एकबार “सत्यं वद” पाठ याद करने के लिए कहा था। अगले ही दिन युधिष्ठिर को छोड़कर सभी शिष्यों ने कहा कि हमें ‘सत्यं वद’ याद हो गया। कुछ दिनों के बाद युधिष्ठिर ने कहा कि अब मुझे याद हो गया। जब उनसे पूछा गया कि ‘सत्यं वद’ के पाठ को याद करने के लिए इतने दिन कैसे लगे? तब धर्मराज युधिष्ठिर ने कहा, “मेरे मन के विचार मेरे कृति में जबतक नहीं आया, तबतक मैं कैसे कह सकता हूं कि मैंने ‘सत्यं वद’ को जान लिया। अब जब मेरे मन के विचार मेरे कृति में प्रगट होने लगा है, तब ही मैं कह रहा हूं कि मुझे ‘सत्यं वद’ याद हो गया।

एक महिला अपने बालक के अधिक गुड खाने की आदत से परेशान थी। उन्होंने ठाकुर से निवेदन किया कि आप इस बालक को गुड न खाने की सलाह दीजिए। आपके कहने से यह गुड खाना छोड़ देगा। महिला 15 दिनों तक रोज ठाकुर के पास यही निवेदन करती रही पर ठाकुर ने उस बालक को गुड खाने के लिए नहीं रोका। ठाकुर रामकृष्ण परमहंस देव ने जब अपनी गुड खाने की आदत का त्याग किया, तब जाकर वे उस बालक को कह सके कि अधिक गुड नहीं खाना चाहिए।

मन, वाचा, कर्म से जीवन में सातत्यता आती है। यदि हम अपने को बदलने के लिए तैयार हैं तो अपने त्रुटियों को सुधारना होगा, अपनी गलत आदतों को छोड़ना होगा। त्रुटियां दिखानेवाले निंदकों की सूचनाओं पर विचार कर अपने में सुधार करना चाहिए। जब माननीय एकनाथजी को अन्यों से ज्ञात हुआ कि उनके स्वभाव में कठोरता है, वे गुसैल हैं। तब उन्होंने अपने स्वभाव को मृदुल बनाने के लिए भरसक प्रयत्न किया और वे इसमें सफल भी रहे। एकनाथजी के सानिध्य में रहे कार्यकर्ता उनके मातृत्व हृदय से परिचित हैं। हम अपने मित्रों के साथ वाणी के तप को बनाएं रखें। भगवद्गीता मन को साधने का उपाय बताती है। गीता के अनुसार, हम अभ्यास और वैराग्य से मन को साध सकेंगे।

स्वामी विवेकानन्द ने हमें स्वदेश मंत्र दिया, जिसमें उन्होंने कहा, “हे भारत! तुम मत भूलना कि तुम्हारी स्त्रियों का आदर्श- सीता, सावित्री और दमयन्ती है। मत भूलना कि तुम्हारे उपास्य- सर्वत्यागी उमानाथ शंकर हैं। मत भूलना कि तेरा विवाह, तेरी धन-सम्पत्ति, तेरा जीवन केवल इन्द्रिय-सुख के लिए, अपने व्यक्तिगत सुख के लिए नहीं है। मत भूलना कि तुम जन्म से ही माता के लिए बलिस्वरूप रखे गए हो। मत भूलना कि तुम्हारा समाज उस विराट महामाया कि छाया मात्र है। मत भूलना कि नीच, अज्ञानी, दरिद्र, अनपढ़, चमार, मेहतर सब तुम्हारे रक्त मांस हैं; तुम्हारे भाई हैं।

हे वीर! साहस का आश्रय लो, निर्भीक बनो और गर्व से बोलो कि मैं भारतवासी हूं, और प्रत्येक भारतवासी मेरा भाई है। तुम गर्व से कहो कि अज्ञानी भारतवासी, दरिद्र और पीड़ित भारतवासी, ब्राह्मण भारतवासी,चांडाल भारतवासी सभी मेरे भाई हैं! तुम भी एक चिथड़े से अपने तन की लज्जा को ढंक लो और गर्वपूर्वक उच्च-स्वर से उद्घोष कर, “प्रत्येक भारतवासी मेरे भाई हैं, भारतवासी मेरे प्राण हैं, भारत के सभी देवी-देवता मेरे ईश्वर हैं। भारत का समाज मेरे बचपन का झूला,मेरे जवानी की फुलवारी और बुढ़ापे की काशी है।”

मेरे भाई! बोलों कि भारत की मिट्टी मेरा स्वर्ग है। भारत के कल्याण में ही मेरा कल्याण है। और रात-दिन जपते रहो कि, “हे गौरीनाथ! हे जदम्बे! मुझे मनुष्यत्व दो! हे शक्तिमयी माँ! मेरी दुर्बलता को हर लो,मेरी कापुरुषता को दूर कर दो और मुझे मनुष्य बना दो, माँ।”

स्वामीजी के इस स्वदेश मंत्र के अनुरूप क्या मेरा जीवन है? हमें यह भी ध्यान में रखना होगा कि मेरे ध्येय के अनुरूप मेरे मित्र हैं क्या? मेरे ध्येय के अनुरूप मैं गीत गुनगुनाता हूं क्या? एकनाथजी ने कहा ही है कि हम समाज को दो आंखों से देखते हैं, समाज हमको हजार आंखों से देखता है। एकनाथजी को उनके एक मित्र वर्ष में एकबार सिल्क का कुर्ता दिया करते थे और वे उसे पहनते थे। जब लोग कहने लगे कि एकनाथजी सिल्क कुर्ते वाले हैं, तो उन्होंने सिल्क के कुर्ते पहनना बंद कर दिया। कहने का तात्पर्य है कि कोई हमारे कृति या पहनावे पर उंगली न उठाएं। हमें इसका ख़याल रखना चाहिए। हम केन्द्र प्रार्थना में गाते हैं – “प्रभो! देहि देहे बलं धैर्य मन्तः।” बलार्जन करते हुए उदात्त विचारों को अंगीकृत कर, धैर्य के साथ हम अपने आदर्श के अनुरूप जिएं। तब आध्यात्मिक शक्तियों का एकत्रीकरण होगा और राष्ट्र पुनरुत्थान का कार्य निरंतर आगे बढ़ेगा।

प्रस्तुति : लखेश्वर चंद्रवंशी ‘लखेश’  

शिव सुंदर नव समाज विश्ववंद्य हम गढ़ें : मा.निवेदिता दीदी

B-NIVEDITA-VIVEKANAND-KENDRAशिव सुंदर नव समाज विश्ववंद्य हम गढ़ें : मा.निवेदिता दीदी

123 वर्ष पूर्व तीन दिन-तीन रात ध्यानस्थ रहकर स्वामी विवेकानन्दजी ने भारत के उत्थान पर गहन चिंतन किया था। देशवासियों के प्रति अगाध आत्मीयता रखनेवाले स्वामीजी ने देश के सामने त्याग और सेवा का महान आदर्श रखा। कोई भी सेवाकार्य हो उसके पीछे दो प्रकार की प्रेरणा कार्य करती है, – 1) आत्मीयता और 2) सजगता। आत्मीयता ऐसी कि यह मेरा देश है, यह मेरा समाज है, इसके उन्नयन में मेरा भी योगदान होना चाहिए। यह समाज मेरा ही अंग है। जब अंगूठे में दर्द होता है तो हम अंगूठे को काटकर नहीं फेंक देते, वरन उस दर्द को दूर करने का प्रयास करते हैं। अंगूठे का दर्द मेरा दर्द है। समाज की पीड़ा मेरी पीड़ा है, इसी भाव को आत्मीयता कहते हैं। हाल ही में चेन्नई में बाढ़ की आपदा में एक युवक ने लगभग 300 लोगों की जान बचाई थी। एक महिला जो दूध का व्यवसाय करती थीं, उसने यह सोचकर बाढ़ के दौरान घर-घर दूध पहुंचाया कि भूख से किसी बालक को परेशान न होना पड़े, भूख की वजह से किसी बालक के जान न जाए। यह संवेदन्शीलता ही है आत्मीयता। इसी तरह समाज की वस्तुस्थिति के प्रति भी हमें सजग रहना चाहिए। समाज के गरीब, अभावग्रस्त लोगों का ख़याल रखना, उनके उत्थान के लिए प्रयत्न करना, यह हमारे सजग होने का लक्षण है। सजगता में एक और महत्वपूर्ण आयाम है विपन्न (भ्रमित/भटके हुए) लोगों को सही राह दिखाना।

सेवा के तीन प्रकार बताए गए हैं। महाभारत में भी इसका उल्लेख है।

1) रोटी, कपड़ा और घर जैसी प्राथमिक आवश्यकताओं की पूर्ति करना।

2) मनुष्य को आत्मनिर्भर बनाना।

3) आत्मबोध के ज्ञान से मनुष्य के आत्मीयता का दायरा बढ़ाना।

अर्थात समाज के प्रति व्यक्ति की संवेदनशीलता को बढ़ाना। माननीय एकनाथजी ने इन तीन सेवाओं से आगे विचार रखते हुए एक चौथी प्रकार की सेवा का आदर्श हमारे सम्मुख रखा, -ऐसे समाज का निर्माण करना जहां आत्मीयता और सजगता के कारण सभी की आकांक्षाओं की पूर्ति हो और सेवा की आवश्यकता ही न रहे। ऐसे आदर्श समाज की रचना करना ही विवेकानन्द केन्द्र का कार्य है।

आजकल सेवा की अवधारणा ही बदल गई है। लोग अनाथालय, वृद्धाश्रम बनाने जैसे कार्य को ही सेवा कहने लगे हैं। केन्द्र की सेवा की अवधारणा यही है कि ऐसे आदर्श समाज की रचना करना जहां अनाथाश्रम अथवा वृद्धाश्रम की आवश्यकता ही न रहे। तात्पर्य है कि प्रत्येक घर में बड़ों का सम्मान हो और किसी को अनाथ न बनना पड़े। हमारे सामने गोस्वामी तुलसीदास के जीवन का उदाहरण है। उनका जन्म कहीं हुआ था, उनका पोषण,उनकी शिक्षा-दीक्षा किसी अन्य स्थान पर। समाज ने ही उनके पोषण व शिक्षा का दायित्व लिया था। असहाय, अभावग्रस्त तथा वंचितों के उत्थान को अपना दायित्व माननेवाला समाज हमें गढ़ना है। ऐसा समाज जो अपने सामाजिक कर्तव्य के प्रति आश्वस्त हो। विवेकानन्द केन्द्र की मूलभूत सेवा का आदर्श यही है।

हम देखते हैं कि आईएसआईएस के आतंकी अपने जीवन को आतंकी गतिविधियों के लिए झोंक देते हैं। इस्लाम मतावलम्बी विश्व की परिकल्पना का स्वप्न लिए आतंकी अपने हिंसक गतिविधियों को अंजाम देते हैं। ईसाई मिशनरियों को भी लगता है कि सिर्फ बाइबल ही सही है। कम्युनिस्ट गरीबों के लिए कथित सहानुभूति और धनवान लोगों के लिए बैर का भाव रखते हैं। कम्युनिस्टों के आदर्श माओ की किताब अब चीन में नामशेष बनकर रह गई है। रद्दी बनकर रह गई है। कोई पाठक जब पुस्तक खरीदने जाता है तो चीन के पुस्तक विक्रेता कहते हैं कि माओ को पढ़ना है तो उन दुकानों में जाओ जहां रद्दी बिकती है अथवा पुरानी किताबें मिलती हैं। ऐसा क्यों? क्योंकि माओ के विचारों को माननेवाले लोगों ने चीन और रूस में करोड़ों लोगों को कथित समानता की आड़ में मौत के घाट उतार दिया था। कम्युनिस्टों के जीवन का आधार भौतिकता है। कम्युनिस्टों ने मानवीय मन की स्वतंत्रता का हनन किया। दूसरी ओर पूंजीपतियों का आधार केवल पैसा कमाना है। चाहे वह जिस मार्ग से आए उन्हें तो बस, केवल धन चाहिए। इसलिए ये विचार टिक नहीं सके, उनकी स्वीकारोक्ति धीरे-धीरे समाप्त होती गई। इसलिए हमें यह बात समझ लेनी चाहिए कि जहां अतिवाद है वहां आदर्श नहीं। तुम्हारा कार्य ऐसा न हो जिससे समाज टूटे। भारतीय समाज ने कभी नहीं कहा कि मेरा ही भगवान सर्वश्रेष्ठ है, वरन सभी के आराध्य के प्रति श्रद्धा का भाव रखा।

अनेक आक्रमणों के बावजूद हमारा राष्ट्र अविचल है क्योंकि हमारी सांस्कृतिक नींव पक्की है। हमें उसे केवल गढ़ना है। शिव सुंदर नव समाज हमें गढ़ना है। शिव जो सदैव कल्याण करनेवाला है, वह मंगलकारी है। और सुंदर यानी समृद्धशाली व आत्मनिर्भर।

इतिहास में हमारे राष्ट्र का उल्लेख बहुत गौरवशाली है। कल्पनातीत धन व प्राकृतिक सम्पदा से भरपूर राष्ट्र के रूप में अपनी ख्याति रही है। सन 1823 में अंग्रेजों ने जब भारत का शैक्षणिक सर्वे किया तब उन्होंने पाया था कि भारत के 72 प्रतिशत जनता शिक्षित हैं। अंग्रेजों ने अपने शोषणपूर्ण नीति द्वारा आर्थिक आधार पर भारत को खूब लूटा। इसके बाद भारत में शैक्षिक पतन शुरू हो गया। इसके बाद शिक्षा के क्षेत्र में हम 72 से 17 प्रतिशत पर पहुंच गए। हमें याद रखना चाहिए कि राकेट (प्रक्षेपास्त्र) अनुसंधान, प्लास्टिक सर्जरी तथा शैल्य चिकित्सा भारत की देन है। गुलामी के काल में भी हमने अपनी अस्मिता, अपना स्वाभिमान नहीं खोया। इस देश में वीरता की भी कोई कमी नहीं है। तुकाराम उम्बले ने मुम्बई के 26/11 के आतंकी हमले के दौरान वीरतापूर्वक आतंकी अजमल कसाब को पकड़ा था। निःशस्त्र होते हुए अपने शरीर पर आतंकी के 54 गोलियों को झेलकर तुकाराम ने आतंकी को पकड़ा, यह उसकी वीरता और देशभक्ति का प्रतीक है। तुकाराम का परिवार इसपर गौरवान्वित है। उनकी बेटी कहती है कि उनके पिता ने कर्तव्यभाव से अपना बलिदान दिया।

हमें आज समय के साथ चलनेवाला, समयानुकूल शिवसुंदर नवसमाज गढ़ना है। इस नवसमाज की संकल्पना को हमें समझना होगा। जब दलितों को न्याय दिलाना था तो डॉ. बाबा साहेब आम्बेडकर ने पहल की। उन्होंने उनके न्याय के लिए संघर्ष का रास्ता अपनाया। संघर्ष का मार्ग अपनाना उस समय के लिए आवश्यक था। पर क्या इस समय संघर्ष का मार्ग उचित है, इस पर विचार करना चाहिए। आज बाबा साहेब के नाम से संघर्ष का वातावरण समाज में बनाया जाता है। लेकिन इस समय संघर्ष की नहीं, सौहार्द्र की आवश्यकता है। इसे सबको समझना होगा।

मुगलों ने भारत पर आक्रमण किया, तब उन्होंने देखा भारत में मूर्तिकला और स्थापत्यकला चरमोत्कर्ष पर है। आक्रान्ताओं ने जन सामान्य पर नानाविध अत्याचार किए, पर कलाविदों के प्राण नहीं लिए। कलाविदों को कैद कर आक्रान्ताओं ने अपने देश और भारत में मस्जिदें बनवाईं, उनसे कलाएं सीखीं। भारत को नष्ट करने आए आक्रान्ता भी यहां से सीख कर जाते हैं, ऐसा गुणसम्पन्न रहा है हमारा देश। अतीत में हमारा भारत जैसा गौरवशाली और वैभवशाली था, उसे उसी तरह गौरवशाली और वैभव संपन्न बनाना, इस संकल्पना को कहते हैं राष्ट्र पुनरुत्थान। हमारी सेवा निरुद्देश्य नहीं है। विश्व कल्याण के लिए भारत का उत्थान यही हमारा लक्ष्य है। लेकिन हैरत की बात है कि आजकल मूल्य लेकर भी उचित सेवा नहीं की जाती। सरकार सैलरी देती है, कर्मचारी उसके अनुरूप सेवा नहीं देता।

प्रवास के दौरान कई लोग पूछते हैं कि आप क्या करतीं हैं।

मैं कहती हूं, “मैं विवेकानन्द केन्द्र का काम करती हूं।”

यानी क्या करते हैं?

मैं कहती हूं, – “सेवाकार्य।”

फिर वे पूछते हैं – केन्द्र के कितने अनाथाश्रम और वृद्धाश्रम हैं?

मैं कहती हूं- एक भी नहीं।

वे कहते हैं – फिर सेवा कैसी?

मैं कहती हूं – हम ऐसे समाज की रचना के सेवाकार्य में लगे हैं जहां वृद्धाश्रम या अनाथाश्रम की आवश्यकता ही नहीं रहे।

हमें सेवा के इस भ्रामक अवधारणा को बदलना होगा और निःस्वार्थ सेवा की संकल्पना को समाजजीवन में प्रतिष्ठित करना होगा। हमें किसी के द्वारा सेवा का सर्टिफिकेट नहीं चाहिए। केन्द्र की सेवा की अवधारणा उदात्त है। यह सही है कि बाढ़, भूकम्प जैसी प्राकृतिक आपदा के दौरान आत्मीयता से सारा देश सहयोग के लिए आगे आता है। ऐसे कठिन काल में निश्चित रूप से ऐसा होना चाहिए, पर आत्मीयता केवल कठिन काल में ही प्रगट न हो। समाज के प्रति आत्मीयता यह सदैव होना चाहिए। सेवा यह योजनाबद्ध होनी चाहिए। घर पर एक-दो बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना यह व्यक्तिगत सेवा का उदाहरण है। पर हम संगठित होकर सामूहिक रूप से सेवा करेंगे, – संस्कार वर्ग, आनंदालय, स्वाध्याय वर्ग, योग वर्ग के माध्यम से। एक-दो नहीं, अनेकों की सेवा संगठित रूप से करना यह हमारा मार्ग है। हम अपनी क्षमताएं बढ़ाएं, हमारा स्वभाव आदर्श होना चाहिए। अपनी क्षमताओं को बढ़ाकर, उत्तम चरित्र और सदाचार से हम विश्व कल्याण के लिए ‘शिव सुंदर नव समाज’ हम खड़ा करें।

प्रस्तुति : लखेश्वर चंद्रवंशी ‘लखेश’

‘वयं सुपुत्रा अमृतस्य नूनं’ का सन्देश लेकर जाएं : मा. बालकृष्णनजी

व्याख्यानों का सारांशA-BALKRISHNAN-VIVEKANAND-KENDRA‘वयं सुपुत्रा अमृतस्य नूनं’ का सन्देश लेकर जाएं : मा. बालकृष्णनजी

आप सभी को यहां (कन्याकुमारी) में देखकर बहुत आनंद हो रहा है। सेवा का भाव इस छोटी आयु में आना बड़े भाग्य की बात है। आप लोगों ने पूर्व जन्म में अवश्य ही कई पुण्य कर्म किए होंगे जिसकी वजह से इस जन्म में आपके मन में सेवा का भाव प्रगट हुआ है। हमारे देश की विशेषता भी देखिए जहां 60 प्रतिशत से अधिक लोग युवा हैं। अपनेआप में यह बहुत बड़ी बात है कि विश्व का प्राचीनतम देश भारत आज भी जवान है।

हमें यह स्मरण में रखना चाहिए कि विदेशी आक्रमणों के बावजूद भारत आज भी स्वाभिमान से खड़ा है। अंग्रेजों ने हमपर खूब अत्याचार किए यहां तक कि देश के नमक पर भी कर लगाया और अंग्रेजों द्वारा बनाए गए नमक को खरीदने के लिए उन्होंने भारतवासियों को बाध्य किया। इसके विरोध में गांधीजी ने नमक सत्याग्रह किया। गांधीजी ने अपने इस सत्याग्रह के क्षण को अवसर में बदला। उन्होंने देशवासियों को संगठित करने का बीड़ा उठाया। हमारे सामने भी अवसर है जहां देश को सामर्थ्यशाली बनाने की चुनौती है। अवसर कभी किसी की प्रतीक्षा नहीं करता। मिले हुए अवसर को कभी नहीं छोड़ना चाहिए। हम भारत को कैसे समर्थ बनाएंगे, अपने जीवन को हम कैसे सार्थक बनाएंगे? इसबात पर सभी को विचार करना होगा। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता की ऊँचाइयों को पार करना होगा,चाहे वह कृषि क्षेत्र हो या शिक्षा का क्षेत्र, चाहे वह विज्ञान हो या पर्यावरण का। हमें प्रत्येक दिशा में सफलता प्राप्त करनी होगी।

सफल होने की हर किसी को इच्छा होती है। हर कोई 100 प्रतिशत सफल होना चाहता है। यह ठीक भी है। जीवन में पैसा कमाना जरुरी है, पर पैसा ही सबकुछ नहीं होता। सफलता मनुष्य जीवन का प्रथम अध्याय है और सार्थकता दूसरा अध्याय। आधा मार्ग सफलता है और आधा मार्ग सार्थकता का। इसलिए हमने समाज से जितना प्राप्त किया है, उससे अधिक लौटाना है। हम केन्द्र प्रार्थना में गाते हैं – “जीवने यावदादानं, स्यात प्रदानं ततोधिकम।” समाज रूपी ईश्वर ने मुझे दिया है, उसे वापस लौटाना है यह भाव चाहिए। ऐसा सोचते हुए इस बात का विचार होना चाहिए कि मैं भी ईश्वर का ही अंश हूं- वयं सुपुत्रा अमृतस्य नूनं।

हमें सफलता, सार्थकता के साथ ही सामर्थ्य की भी आवश्यकता है। जबतक हमारे हृदय में‘त्याग और सेवा’ का भाव नहीं जगता तबतक हमारा जीवन सार्थक नहीं हो सकता। अधिकारियों (कार्यकर्ताओं) के मन में त्याग और सेवा का आदर्श होने ही चाहिए, तभी उनके आचरण के माध्यम से समाजजीवन में त्याग और सेवा का भाव जाग्रत होगा। त्याग और सेवा यानी मानवता। दूसरों के बारे में अच्छा विचार करने से हमारे दुर्गुण दूर हो जाते हैं। स्वामी विवेकानन्द ने कहा है कि त्याग और सेवा ही हमारे राष्ट्रीय आदर्श हैं। हमें इस आदर्श के अनुरूप ही जीना है। भारत तभी जगतगुरु बनेगा जब सभी देशवासियों के मन में त्याग और सेवा की भावना जागेगी।

हम देखते हैं कि आईएसआईएस के लोग क्रूरतापूर्वक निर्दोष लोगों का खून बहा रहे हैं, हत्या कर रहे हैं। उन आतंकियों के अन्दर कोई हृदय नहीं है, उनके जीवन में कोई मूल्य नहीं है। क्या यह आतंकी संगठन विश्व का भला कर सकता है? बिल्कुल नहीं। विश्व को यदि कोई देश शांति का सन्देश दे सकता है तो वह केवल हमारा अपना देश भारत ही है। भारत का सन्देश है – योग। योग सभी को जोड़ता है। स्वामी विवेकानन्द ने यहां 25, 26 और 27 दिसम्बर, 1892 को राष्ट्र का ध्यान किया था। तब उन्होंने भारत के पतन का कारण ढूंढा और पाया कि आध्यात्मिक शक्ति के प्रगटन से ही भारत जाग्रत होगा। उन्होंने देशभर भ्रमण करते हुए संगठन का सन्देश दिया। राष्ट्र ध्यान के बाद संगठन की प्रेरणा देनेवाले स्वामीजी ने मनुष्य निर्माण और आध्यात्मिक जागरण के सन्देश पर बल दिया।

भारत का विश्व को सन्देश है – “सर्वे भवन्तु सुखिनः” और “एकं सद विप्राः बहुधा वदन्ति”। हम मनुष्य का रंग-रूप, वेश-भूषा को नहीं देखते वरन हम मनुष्य में व्याप्त ईश्वरत्व को देखते हैं।

कन्याकुमारी से जाते समय हम एक सकारात्मक मंत्र लेकर जाएंगे- ‘वयं सुपुत्रा अमृतस्य नूनं’। मैं हर कार्य में सफल हो सकता हूं क्योंकि मैं ईश्वर का अंश हूं। अपने भीतर विद्यमान शक्ति का उपयोग कीजिए। ‘नहीं’ कहने की बात न करें। ‘आत्मविश्वास’ नहीं है तो मनुष्य होने का क्या मतलब? स्वामीजी का अध्यययन करनेवाले असाधारण होते हैं। सेवा के यज्ञकुंड के लिए हम समिधा बनें, -चाहे हम सेवाव्रती, जीवनव्रती, वानप्रस्थी अथवा स्थानिक कार्यकर्ता हों। हमें स्मरण रखना होगा कि माननीय एकनाथजी का जीवन अतुल्य है। शिलास्मारक का निर्माण वेतन से नहीं, सेवाभाव से हुआ। एकनाथजी ने सभी को इस कार्य से जोड़ा। जो निःस्वार्थ भाव से कार्य करता है उसके भीतर शक्ति गंगाजल की तरह अवतरित व संचरित होती है।  जबतक विवेकानन्द शिलास्मारक रहेगा, एकनाथजी का नाम रहेगा।  एकनाथजी यह सब कर सके क्योंकि उनका जीवन ‘वयं सुपुत्रा अमृतस्य नूनं’ का प्रगटीकरण था। आइए, हम सब भी इसी मंत्र का प्रगटीकरण अपने जीवन में करें।

प्रस्तुति : लखेश्वर चंद्रवंशी ‘लखेश’  

सेवा के लिए समर्पण की नित्य साधना करनी होगी : मा. पी.परमेश्वरन

कन्याकुमारी में विवेकानन्द केन्द्र द्वारा आयोजित “सार्थक युवा समर्थ भारत शिविर” में देशभर से कुल 680 युवक-युवतियां शामिल हुईं। गत माह 25,26 और 27 दिसम्बर, 2015 को संपन्न हुए इस शिविर में विवेकानन्द केन्द्र के जीवनव्रती कार्यकर्ताओं का उद्भोधन हुआ। केन्द्र के अखिल भारतीय अध्यक्ष श्री पी.परमेश्वरनजी का सन्देश, तथा उपाध्यक्ष द्वय श्री ए.बालकृष्णन तथा सुश्री निवेदिता भिड़े, एवं महासचिव श्री भानुदास धाक्रस के व्याख्यान ने युवाओं के हृदय को राष्ट्रसेवा की प्रेरणा से अभिभूत कर दिया। राष्ट्र के प्रति अपनी भूमिका, राष्ट्रीय कर्तव्य, त्याग और सेवा की अवधारणा तथा मन-वाचा-कर्म से सदैव एकरूप रहने की प्रेरणा देनेवाले व्याख्यानों का हम सारांश प्रस्तुत कर रहे हैं।        

सन्देश  

P-PARMESHWARAN-VIVEKANAND-KENDRA.JPGसेवा के लिए समर्पण की नित्य साधना करनी होगी : मा. पी.परमेश्वरन

अभावग्रस्त लोगों की सेवा करना प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है। इसके लिए प्रत्येक व्यक्ति को अपना जीवन समर्पित करना है। ऐसे समर्पण की नित्य साधना करनी होगी। ऐसे समर्पण का भाव अपने भीतर विद्यमान दिव्यत्व की अनुभूति से प्रगट होता है। सारे समर्पित कार्य का स्रोत अपने हृदय की प्रेरणा होती है। स्वामी विवेकानन्दजी के आदर्शों के अनुरूप माननीय एकनाथजी ने विवेकानन्द केन्द्र की सम्पूर्ण रचना की। चाहे वह योग हो या शिक्षा, ग्रामीण विकास हो या प्राकृतिक संसाधनों का संवर्धन अथवा स्वास्थ्य सेवा, इन सभी में आध्यात्मिक प्रेरणा अनिवार्य है।

इस शिविर में सम्मिलित प्रत्येक शिविरार्थी से यह अपेक्षा है कि वह अपनेआप को लोगों की अपेक्षाओं के अनुरूप उन्नत करें और स्वयं को भारतमाता के कार्य के लिए समर्पित कर दें।  उनके सामूहिक समर्पण पर ही भारत माँ का भविष्य निर्भर है, जो कि अंततोगत्वा विश्व का ही भविष्य है।

भारतमाता जगद्गुरु है और हमेशा से ही रही है। अब हम सभी अपने समर्पित सेवाओं के द्वारा अपने आँखों से, भारतमाता को जगतगुरु के सिंहासन पर, जो कि पहले से अधिक गौरवशाली है, विराजमान होता हुआ देखें।

देशद्रोहियों का अड्डा ‘जेएनयू’, गद्दारों पर कार्रवाई हो या जेएनयू को बंद करो

afjal-jnuहम सरकार को इसलिए टैक्स देते हैं कि सरकार हमारे रुपयों से राष्ट्र की गरिमा और उत्थान के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक कल्याण और राष्ट्र रक्षा के लिए योजना बनाएं और उसके कार्यान्वयन के लिए व्यय करें। लेकिन केन्द्र सरकार के अधीन एक सरकारी विश्वविद्यालय जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) के बहुत से देशविरोधी छात्र-छात्राएं भारत की गरिमा को चुनौती देते हुए हमारे महान राष्ट्र की बर्बादी के नारे लगाए जाते हैं। भारत के अविभाज्य अंग, देश का सिरमौर कश्मीर को भारत से अलग करने की कसमें खाए जाते हैं। यही कारण है कि भारत विरोधी नारों का अड्डा बन चुके जेएनयू परिसर प्रत्येक भारतवासी के हृदय को आहत करनेवाला स्थान बनकर रह गया है।

हाल ही में, जेएनयू में 9 फरवरी को वामपंथी तथा कथित सेक्यूलरिज्म के नशे में चूर सैंकड़ों छात्र-छात्राएं आतंकवादी अफजल गुरु को शहीद के रूप में प्रतिष्ठित कर रहे थे। केन्द्र व दिल्ली सरकार और पुलिस के नाक के नीचे भारत विरोधी नारे लगाकर देश के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का अपमान कर रहे थे। आतंकवादी अफज़ल गुरू, जो भारतीय लोकतंत्र के सबसे बड़े प्रतीक यानी संसद पर हमले का दोषी था और जिसे 11 वर्ष तक चले मुकदमे के बाद देश के सर्वोच्च न्यायालय ने फांसी की सज़ा सुनाई थी, और 9 फरवरी, 2013 को अफज़ल गुरू को फांसी दे दी गई थी। उसी आतंकवादी अफज़ल गुरू को जेएनयू के अन्दर हीरो बनाया जा रहा है। उसी जेएनयू के अन्दर कश्मीर की आज़ादी और भारत की बर्बादी की कसमें खाई जा रही हैं, पाकिस्तान ज़िंदाबाद के नारे लग रहे हैं। देशद्रोही विद्यार्थियों के गो बैक इंडिया, कश्मीर की आजादी तक जंग रहेगी, भारत की बर्बादी तक जंग रहेगी जैसे नारों ने पूरे कैंपस में बवाल खड़ा कर दिया। इसके बाद छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीविपी) के विद्यार्थियों ने इन देशद्रोहियों का तीखा विरोध किया।

मंगलवार, 9 फरवरी को जेएनयू के अंदर क्या-क्या हुआ? किस तरह के नारे लगाए गए और कैसे भारत विरोधी एजेंडा चलाया गया, ये जानना हर भारतीय के लिए बहुत आवश्यक है। क्योंकि जेएनयू के देशद्रोहियों के समर्थन में पाकिस्तान में बैठे आतंकवादी हाफिज सईद और पाकिस्तान रक्षा विशेषज्ञ डॉ.ए.क्यू.खान आगे आया है। भारत के सबसे बड़े दुश्मन हाफिज सईद ने इसका समर्थन करते हुए ट्विट कर कहा है कि हम अपने पाकिस्तानी भाइयों से विनती करते हैं कि वो #SupportJNU पर ट्वीट करें और जेएनयू के पाकिस्तान समर्थक भाइयों का साथ देंगे। इसके अतिरिक्त हाफिज ने #PakStandWithJNU को बढ़ावा देने की भी अपील की है। हाफिज के इस ट्वीट से स्पष्ट होता है कि भारत विरोधी नारे लगानेवालों को किसका संरक्षण प्राप्त है।

देश की सबसे बड़ी यूनिवर्सिटीज़ में एक जेएनयू में राष्ट्रविरोधी नारे लग रहे थे, जब देश की सेना का एक बहादुर जवान हनुमनथप्पा जेएनयू से सिर्फ़ 8 किलोमीटर दूर आर्मी के रिसर्च एंड रेफरल हॉस्पिटल में जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रहे थे। पूरा देश उस समय सियाचिन के हीरो लांसनायक हनुमनथप्पा की ज़िंदगी के लिए दुआएं मांग रहा था। लेकिन जिस दिल्ली में हनुमनथप्पा अपनी ज़िंदगी की लड़ाई लड़ रहे थे, उसी दिल्ली के अंदर जवाहर लाल यूनिवर्सिटी (जेएनयू) में आतंकवादी अफ़ज़ल गुरू की बरसी मनाई जा रही थी। जिस देश के लिए हनुमनथप्पा अपनी जान पर खेल गए उस देश के खिलाफ जेएनयू के अंदर नारे लगाना, बेहद शर्मनाक है।

यह एक ऐसी घटना है जिसे देखकर पीड़ा होती है। लेकिन आश्चर्य है कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को छोड़कर हमारे देश की सबसे पुरानी राजनीतिक दल कांग्रेस पार्टी तथा बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी, जनता दल (यूनाइटेड), आम आदमी पार्टी जैसे जिम्मेदार विपक्षी पार्टी इस मुद्दे पर खामोश रहे। जबकि ये तमाम विपक्षी दल दादरी की घटना और रोहित वेमुला की आत्महत्या के बाद ये सभी राजनीतिक दल वोटबैंक और तुष्टिकरण की राजनीति के लिए अपना सिर पिट रहे थे, विरोध कर रहे थे। पर ये सारे राजनीतिक दल जेएनयू के देशद्रोही गतिविधियों से कन्नी काटते हुए दुबककर खामोश बैठे रहे, लेकिन केन्द्र सरकार ने देश विरोधी नारों में लिप्त कन्हैया कुमार और कुछ छात्रों को गिरफ्तार किया तो नजारा ही बदल गया। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी जेएनयू में जाकर भारतविरोधी नारे लगानेवालों का समर्थन किया और कहा कि सबसे ज्यादा राष्ट्रविरोधी लोग वो हैं जो इस संस्थान में छात्रों की आवाज दबा रहे हैं। राहुल गांधी इस समय तुच्छ राजनीति पर उतर आए हैं, वे भारतविरोधी नारों को छात्रों की आवाज बता रहे हैं, वहीं अन्य विपक्षी दल मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के महासचिव सीताराम येचुरी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के राष्ट्रीय सचिव डी. राजा और जनता दल युनाइटेड (जद-यू) के महासचिव के. सी. त्यागी सरकार को संसद में चुनौती देने की बात कर रहे हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के नेता अरविन्द केजरीवाल ने अपने ट्विटर पर प्रतिक्रिया देते हुए लिखा है कि मोदी सरकार को छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी भारी पड़ सकती है।

यह बहुत दुखद और लज्जास्पद है कि हमारे देश में राष्ट्रप्रहरी नायकों के बलिदान की अनदेखी होती है और एक आतंकवादी की कद्र होती है। देश के अंदर लोग यदि आतंकवादियों को अपना हीरो बनाते रहेंगे तो फिर उन्हें सियाचिन जैसी हड्डियां गलाने वाली जगहों पर, सीना तान कर खड़े रहने की प्रेरणा और साहस कहां से मिलेगा? हम देशवासियों को वोट बैंक की सियासत करनेवाले इन राजनीतिक दलों की मंशा को समझना ही होगा और इनका प्रतिकार भी करना होगा, यह बहुत जरुरी है।

जवाहर लाल यूनिवर्सिटी (जेएनयू) में एक छात्र की पढ़ाई पर सरकार कितना पैसा ख़र्च करती है, यह भी हमें जानना चाहिए। ये रुपये देश की जनता की जेब से टैक्स के तौर पर जाता है यानी देश के पैसों से पढ़ने वाले छात्र हमारे देश के टुकड़े करने की बात कर रहे हैं। जेएनयू को प्रतिवर्ष सरकार से लगभग 244 करोड़ रुपये की राशि सब्सिडी के रूप में प्राप्त होती है। जेएनयू में 8 हज़ार, 308 छात्र पढ़ते हैं। इस दृष्टि से देखा जाए तो एक छात्र की पढ़ाई पर सरकार लगभग 3 लाख रुपये ख़र्च करती है। देश के पैसों से चलनेवाले इस यूनिवर्सिटी का क्या औचित्य है, जहां भारत विरोधी गतिविधियां उत्सव के रूप में मनाए जाते हैं। हमें इस बात पर विचार करना होगा कि देशविरोधी गतिविधियों के अड्डे के रूप में स्थापित हो रहे जेएनयू पर हम खर्च क्यों करें? जेएनयू केन्द्र सरकार के अधीन है, केन्द्र सरकार और मानव संसाधन मंत्रालय ने आगे आकर इसपर कठोर एक्शन लेना चाहिए और जेएनयू के भीतर पल रहे देशद्रोहियों को दण्डित करना चाहिए या जेएनयू को बंद कर देना चाहिए।

– लखेश्वर चंद्रवंशी