मन वाचा कर्म से सदैव एक रूप हो : मा.भानुदासजी

BHANUDAS-DHAKRAS-VIVEKANAND-KENDRAमन वाचा कर्म से सदैव एक रूप हो : मा.भानुदासजी

मैं कौन हूं? मेरे इस जीवन में मेरी क्या भूमिका है और मैं इस समय क्या कर रहा हूं? इस पर हमें विचार करना होगा। हम सभी सेवारत कार्यकर्ता की भूमिका में हैं। और जैसा कि इस शिविर का थीम है“सेवारत व्यक्ति-व्यक्ति राष्ट्र का ही प्राण है।” हम विद्यार्थी हैं अथवा शिक्षक, व्यवसायी हैं या कर्मचारी, पर हम यह समझ लें कि सेवारत व्यक्ति के रूप में मैं भारत का प्राण हूं। कार्य जितना महान है हमें उतना ही महान बनना होगा। महान कार्य के लिए उदात्त चरित्र की आवश्यकता होती है। यह तभी संभव है जब हम देहात्म बोध से देशात्म बोध की ओर उन्मुख होंगे। राष्ट्र का प्राण होने के लिए हमें आवश्यक गुण अर्जित करने होंगे। यह गुण है मन, वचन और कर्म से सदैव एकरूप होना।

स्वामी विवेकानन्दजी ने अपने गुरु ठाकुर श्री रामकृष्ण परमहंस देव से अपने लिए निर्विकल्प समाधि का आशीर्वाद मांगा था। पर माँ के कार्य के लिए उन्होंने अपने घर-परिवार और गुरुभाइयों से दूर जाकर भारत को जानने के लिए देशभर परिव्राजक बनकर भ्रमण किया। पाश्चात्य विद्वानों के बीच भारत माता को प्रतिष्ठित करने के लिए स्वामीजी अकेले ही निकल पड़े। सारी विपदाओं को सहकर, सारी चुनौतियों को पार कर उन्होंने भारत की प्रतिष्ठा को विश्वपटल पर स्थापित किया। स्वामीजी की निर्विकल्प समाधि की आस देहात्म बोध से प्रेरित था, पर माँ का कार्य करने का संकल्प देशात्म बोध का परिचायक है। स्वामी विवेकानन्दजी ने अपने एक पत्र में इन दोनों ही मनःस्थिति का वर्णन किया है। देहात्म बोध से देशात्म बोध का मार्ग कौन-सा है? वह मार्ग है – मन-वाचा-कर्म से सदैव एक रूप हो। जब ऐसा हो जाए तो देशात्म बोध प्रगट होगा, परन्तु यह आसान नहीं है।

मन-वाचा-कर्म के लिए रामायण में 2 महत्वपूर्ण प्रसंगों का उल्लेख मिलता है। 1) एक बार महर्षि विश्वामित्र राजा दशरथ से मिलने आए। महर्षि के दर्शन से गदगद दशरथ ने कहा दिया, “महर्षि आप आज जो मांगेंगे, मैं उसे श्रद्धापूर्वक आपको दान कर दूंगा।” उस समय दशरथ मन से वचन दे चुके थे। परन्तु जब महर्षि विश्वामित्र ने कहा कि,“दंडकारण्य में असुरों का आतंक फैला है और यज्ञ संस्कृति खतरे में है। इस विषम परिस्थिति में ऋषियों व यज्ञ संस्कृति की सुरक्षा के लिए आपके दो पुत्र राम और लक्ष्मण की आवश्यकता है। आप मुझे ये दोनों पुत्रों को मुझे कुछ समय के लिए सौंप दीजिए।” महर्षि की इस आग्रह को यह कहकर टालने का प्रयत्न किया कि मेरे दोनों पुत्र अभी बालक हैं। ये असुरों का सामना नहीं कर पाएंगे। आप चाहें तो मेरी सारी सेना ले जाइए, स्वयं मुझे ले जाइए पर मेरे पुत्रों को यहीं रहने दीजिए। मन और वचन से संकल्प लेनेवाले राजा दशरथ पुत्र मोह में अपने कर्तव्य को भूल जाते हैं। उनका कर्म बदल जाता है। तब उनको याद दिलाना पड़ता है कि रघुकुल रीति सदा चली आई,प्राण जाए पर वचन न जाई। दशरथ ने मन से कहा था, वचन से कहा था कि जो मांगोगे, दे दूंगा। पर जब कृति की बारी आई तो पीछे हट गए। हमारा भी ऐसा ही होता होगा।

श्रीराम जी के वनवास का दूसरा प्रसंग था। कैकेयी गुस्से थी तो दशरथ ने बोल तो दिया कि आप जो कहोगी मैं करूंगा। तथापि राम को 14 वर्ष का वनवास की बात सुनते ही दशरथ गिर गए। जबकि राम उनके लिए जो छत्र-चंवर आदि आए थे उन सब को लौटाते हुए वनवास जाने की तैयारी करते हैं। मन-वाचा और कर्म से सदैव एकरूप होने का महान आदर्श हैं- मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम। मन ही सबकुछ करता है। मन की सहायता से ही हम आगे बढ़ सकते हैं। मन हमें आगे बढ़ा सकता है और वह हमें गिरा भी सकता है। इसलिए मन को साधना होगा ताकि मन सही दिशा में गतिमान हो। इस क्रम में वाणी का संयम महत्वपूर्ण होता है। इसके लिए वाणी का तप जरुरी है।

सीता सुधि और लंका दहन के पश्चात् जब महावीर हनुमान वापस लौटे तो वे चिंतन करने लगे कि श्रीराम को माता जानकी का सन्देश किन शब्दों में देना चाहिए। लंका दहन का प्रसंग पहले कहूं या सीतामाता की धैर्य का वर्णन? पर ‘बुद्धिमतां वरिष्ठं’ ऐसे महावीर ने वाणी के संयम और तप का महान आदर्श प्रस्तुत किया। हनुमान ने श्रीराम से कहा, “दृष्टवा-देखि”, यानी मैंने माता सीता के दर्शन किए। हनुमान के मुख से निकले इस पहले वाक्य को सुनते ही श्रीराम की विरह वेदना समाप्त हो गई, उनके अंतःकरण में मची खलबली समाप्त हो गई।

एक और उदाहरण है। स्वामी विवेकानन्दजी ने अपने जीवन के अंतिम समय में भगिनी निवेदिता के भोजन करने के उपरांत पानी लेकर उनका हाथ धुलवाया था। तब भगिनी निवेदिता ने स्वामीजी को इसके लिए रोकना चाहा। पर स्वामी विवेकानन्द ने यह कहकर हाथ धोने के लिए जल डाला कि ऐसा तो ईसा मसीह ने भी किया था। भगिनी निवेदिता एकाएक स्तब्ध रह गई। उन्हें याद आया कि जिस दिन ईसा ने भक्तों का हाथ धुलाया था वह उनके जीवन का आखरी दिन था। पर भगिनी निवेदिता ने वाणी का संयम बरतते हुए अपने मन के भावों को बाहर नहीं आने दिया। उन्होंने अपने मनोभाव को अपने मन में धारण किया पर उसे अन्य गुरुभाइयों के आगे व्यक्त नहीं किया। यह वाणी के संयम का बड़ा उदाहरण है।

वाणी की तपस्या और संयम से ही कार्य आगे बढ़ेगा। कर्म ज्ञानेन्द्रियों व कर्मेन्द्रियों से व्यक्त होता है। मन में उदात्त भाव है, वह वचनों में व्यक्त भी होता है, पर वह कृति में प्रगट नहीं होता तो यह बहुत चिंता की बात है। यदि ऐसा है तो “अन्दर कुछ और बहार कुछ” वाली बात रह जाएगी। द्रोणाचार्य ने अपने शिष्यों को एकबार “सत्यं वद” पाठ याद करने के लिए कहा था। अगले ही दिन युधिष्ठिर को छोड़कर सभी शिष्यों ने कहा कि हमें ‘सत्यं वद’ याद हो गया। कुछ दिनों के बाद युधिष्ठिर ने कहा कि अब मुझे याद हो गया। जब उनसे पूछा गया कि ‘सत्यं वद’ के पाठ को याद करने के लिए इतने दिन कैसे लगे? तब धर्मराज युधिष्ठिर ने कहा, “मेरे मन के विचार मेरे कृति में जबतक नहीं आया, तबतक मैं कैसे कह सकता हूं कि मैंने ‘सत्यं वद’ को जान लिया। अब जब मेरे मन के विचार मेरे कृति में प्रगट होने लगा है, तब ही मैं कह रहा हूं कि मुझे ‘सत्यं वद’ याद हो गया।

एक महिला अपने बालक के अधिक गुड खाने की आदत से परेशान थी। उन्होंने ठाकुर से निवेदन किया कि आप इस बालक को गुड न खाने की सलाह दीजिए। आपके कहने से यह गुड खाना छोड़ देगा। महिला 15 दिनों तक रोज ठाकुर के पास यही निवेदन करती रही पर ठाकुर ने उस बालक को गुड खाने के लिए नहीं रोका। ठाकुर रामकृष्ण परमहंस देव ने जब अपनी गुड खाने की आदत का त्याग किया, तब जाकर वे उस बालक को कह सके कि अधिक गुड नहीं खाना चाहिए।

मन, वाचा, कर्म से जीवन में सातत्यता आती है। यदि हम अपने को बदलने के लिए तैयार हैं तो अपने त्रुटियों को सुधारना होगा, अपनी गलत आदतों को छोड़ना होगा। त्रुटियां दिखानेवाले निंदकों की सूचनाओं पर विचार कर अपने में सुधार करना चाहिए। जब माननीय एकनाथजी को अन्यों से ज्ञात हुआ कि उनके स्वभाव में कठोरता है, वे गुसैल हैं। तब उन्होंने अपने स्वभाव को मृदुल बनाने के लिए भरसक प्रयत्न किया और वे इसमें सफल भी रहे। एकनाथजी के सानिध्य में रहे कार्यकर्ता उनके मातृत्व हृदय से परिचित हैं। हम अपने मित्रों के साथ वाणी के तप को बनाएं रखें। भगवद्गीता मन को साधने का उपाय बताती है। गीता के अनुसार, हम अभ्यास और वैराग्य से मन को साध सकेंगे।

स्वामी विवेकानन्द ने हमें स्वदेश मंत्र दिया, जिसमें उन्होंने कहा, “हे भारत! तुम मत भूलना कि तुम्हारी स्त्रियों का आदर्श- सीता, सावित्री और दमयन्ती है। मत भूलना कि तुम्हारे उपास्य- सर्वत्यागी उमानाथ शंकर हैं। मत भूलना कि तेरा विवाह, तेरी धन-सम्पत्ति, तेरा जीवन केवल इन्द्रिय-सुख के लिए, अपने व्यक्तिगत सुख के लिए नहीं है। मत भूलना कि तुम जन्म से ही माता के लिए बलिस्वरूप रखे गए हो। मत भूलना कि तुम्हारा समाज उस विराट महामाया कि छाया मात्र है। मत भूलना कि नीच, अज्ञानी, दरिद्र, अनपढ़, चमार, मेहतर सब तुम्हारे रक्त मांस हैं; तुम्हारे भाई हैं।

हे वीर! साहस का आश्रय लो, निर्भीक बनो और गर्व से बोलो कि मैं भारतवासी हूं, और प्रत्येक भारतवासी मेरा भाई है। तुम गर्व से कहो कि अज्ञानी भारतवासी, दरिद्र और पीड़ित भारतवासी, ब्राह्मण भारतवासी,चांडाल भारतवासी सभी मेरे भाई हैं! तुम भी एक चिथड़े से अपने तन की लज्जा को ढंक लो और गर्वपूर्वक उच्च-स्वर से उद्घोष कर, “प्रत्येक भारतवासी मेरे भाई हैं, भारतवासी मेरे प्राण हैं, भारत के सभी देवी-देवता मेरे ईश्वर हैं। भारत का समाज मेरे बचपन का झूला,मेरे जवानी की फुलवारी और बुढ़ापे की काशी है।”

मेरे भाई! बोलों कि भारत की मिट्टी मेरा स्वर्ग है। भारत के कल्याण में ही मेरा कल्याण है। और रात-दिन जपते रहो कि, “हे गौरीनाथ! हे जदम्बे! मुझे मनुष्यत्व दो! हे शक्तिमयी माँ! मेरी दुर्बलता को हर लो,मेरी कापुरुषता को दूर कर दो और मुझे मनुष्य बना दो, माँ।”

स्वामीजी के इस स्वदेश मंत्र के अनुरूप क्या मेरा जीवन है? हमें यह भी ध्यान में रखना होगा कि मेरे ध्येय के अनुरूप मेरे मित्र हैं क्या? मेरे ध्येय के अनुरूप मैं गीत गुनगुनाता हूं क्या? एकनाथजी ने कहा ही है कि हम समाज को दो आंखों से देखते हैं, समाज हमको हजार आंखों से देखता है। एकनाथजी को उनके एक मित्र वर्ष में एकबार सिल्क का कुर्ता दिया करते थे और वे उसे पहनते थे। जब लोग कहने लगे कि एकनाथजी सिल्क कुर्ते वाले हैं, तो उन्होंने सिल्क के कुर्ते पहनना बंद कर दिया। कहने का तात्पर्य है कि कोई हमारे कृति या पहनावे पर उंगली न उठाएं। हमें इसका ख़याल रखना चाहिए। हम केन्द्र प्रार्थना में गाते हैं – “प्रभो! देहि देहे बलं धैर्य मन्तः।” बलार्जन करते हुए उदात्त विचारों को अंगीकृत कर, धैर्य के साथ हम अपने आदर्श के अनुरूप जिएं। तब आध्यात्मिक शक्तियों का एकत्रीकरण होगा और राष्ट्र पुनरुत्थान का कार्य निरंतर आगे बढ़ेगा।

प्रस्तुति : लखेश्वर चंद्रवंशी ‘लखेश’  

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